September 24, 2018

अवसरवाद की हांड़ी में सियासी खिचड़ी

By wmadmin123 - Sat Mar 22, 12:08 pm

इस लोकसभा चुनाव में अधिकांश प्रमुख दल अवसरवाद की हांड़ी में सियासी खिचड़ी पकाने में लगे हैं। सि(ांत और मुíे को पीछे ध्केल कर निजी स्वार्थ और हित बेशर्मी से साध् रहे हैं। बीते 27 पफरवरी, 2014 को लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान और भाजपा के बीच हुए तालमेल को इसी परिपेक्ष्य में देखा जा रहा है। ये वही रामविलास पासवान हैं जिन्होंने 29 अप्रैल, 2002 को गुजरात दंगे को लेकर नरेंæ मोदी को धिक्कारते हुए केंæीय मंत्राी पद को थूक दिया था और आज उसी नरेंæ मोदी का ‘जिंदाबाद करने लगे हैं। नीतीश, लालू और कांग्रेस की भी सिथति पासवान से अलग नहीं है। जो नीतीश 17 वर्षों तक नरेंæ मोदी की पार्टी भाजपा के साथ रहकर उसके सहयोग से सत्ता की चाशनी चाटते रहे, पिछले साल नरेंæ मोदी के नाम पर गठबंध्न तोड़, भाजपा और नरेंæ मोदी को ‘सांप्रदायिक शकित कहकर घेरने में जुटे हैं। पूर्व में लालू भी भाजपा के समर्थन से सरकार चला चुके हैं। और जहां तक कांग्रेस की बात है तो वह तो अवसरवादिता की पराकाष्ठा पर ही पहुंच गर्इ है। बीते 9 वर्षों से बिहार कांग्रेस जिस लालू-राबड़ी सरकार के जंगलराज को रेखांकित कर यहां की जनता को खबरदार करती आ रही थी, वह कांग्रेस अब राबड़ी देवी को जिताने की अपील जनता से कर रही है। अवसरवाद की हांड़ी में सियासी दलों के द्वारा पकायी जा रही खिचड़ी पर प्रस्तुत है  महाशंकर की कलम से यह आवरण कथा…………

राजनीति के रंग निराले होते हैं। सियासत की दुनिया में कौन, कब, किसका दोस्त बन जाए और कौन, कब, किसका दुश्मन यह कहा नहीं जा सकता। जानकार कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। इस खेल में सि(ांत और मुदृे पीछे ध्केल दिए जाते हैं तथा स्वार्थ और हित को बेशर्मी से साध् लिया जाता है। सच तो यह है कि आज की तिथि में शायद ही कोर्इ राजनीतिक दल या नेता होगा जो इससे अछूता हो।  बीते 27 पफरवरी 2014 को लोजपा-भाजपा के बीच हुए गठबंध्न को इसी परिपेक्ष्य में देखा जा सकता है।
अवसरवादी हैं रामविलास?
लोजपा-भाजपा गठबंध्न बेशक चौंकाने वाला है। इस गठबंध्न के आकार लेने से पफकत दो दिन पहले तक जो रामविलास पासवान बीजेपी और नरेंद्र मोदी को ‘सांप्रदायिक प्रेत कहते नहीं थकते थे वे, अब उसी बीजेपी की शरण में जाकर ‘नरेंद्र मोदी जिंदाबाद करने लगे हैं। इतना ही नहीं, अब वे प्रदेश में घूम-घूमकर जनता को यह समझाते पिफर रहे हैं कि आज के समय में नरेंद्र मोदी देश की जरूरत है। देश को बचाना है तो केंद्र से कांग्रेस का सपफाया करना होगा। बीजेपी-लोजपा गठबंध्न में रामविलास को सात सीटें, उपेन्द्र कुशवाहा को तीन सीटें तथा भाजपा को तीस सीटें मिली है। दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंध्न से पूर्व रामविलास उसी कांग्रेस से गठबंध्न करने को व्याकुल थे जिस कांग्रेस में अब उन्हें खामियां दिख रही हंै। मजे की बात यह है कि उस दौरान पासवान, कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांध्ी को यहां तक कह आए थे कि आप जिनसे चाहें गठबंध्न तय कर लें, मैं आपके साथ हूं। बावजूद इसके जब वहां बात नहीं बनी तब वे ‘मोदी शरणम गच्छामि की जाप करने लगे। दरअसल, यहां सवाल विचार और सि(ांत का नहीं है, सवाल सीटों के बंटवारे का है जो उन्हें सत्ता की कुर्सी तक ले जाएगी। चूंकि राजद, कांग्रेस और भाजपा में सबसे ज्यादा सीट पासवान को भाजपा देने के लिए तैयार हुर्इ लिहाजा, वे नरेंद्र मोदी की जय-जयकार करने लगे। अब पासवान को नरेंद्र मोदी सुच्चा सेक्युलर लगने लगे हैं। वे कहते हैं-’अछूत नहीं है भाजपा। ये वही रामविलास पासवान हैं जिन्होंने करीब 12 वर्ष पूर्व 2002 में गुजरात के गोध्रा दंगा के बाद नरेंद्र मोदी को धिक्कारते हुए तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के मंत्राी पद से ;29 अप्रैल 2002 कोद्ध इस्तीपफा दिया था।  इस्तीपफे के बाद से लेकर हाल में हुए गठबंध्न के दो दिन पूर्व तक श्री पासवान भाजपा और नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते रहे। एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के अनुसार गठबंध्न से दो दिन पूर्व भी श्री पासवान ने बीजेपी को देश में ‘सांप्रदायिक राजनीति का वाहक बताया था और नरेंद्र मोदी को भी जमकर कोसा था।  इतना ही नहीं, बीते 18 अगस्त 2013 को एक रैली में श्री पासवान ने कहा था-’भाजपा, भारत जलाओ पार्टी है। राजद के पूर्व प्रदेश सचिव छाया रानी कहती हैं-’रामविलास पासवान भाजपा से गठबंध्न कर अवसरवादिता की पराकाष्ठा का परिचय दिया है। पासवान ने सेक्युलर पालिटिक्स को धेखा दिया है। सूबे की जनता सब देख रही है। उन्हें इसका खामियाजा भुगतना होगा। कहना न होगा कि पूर्व में रामविलास पासवान भी इसी तरह सेक्युलर के मुíे पर भाजपा और नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेकर बयान दिया करते थे। हालांकि, अब पासवान के सुर बदल गए हैं तथा नरेंद्र मोदी एवं अपने उफपर लगे अवसरवादी के आरोपों के जवाब में कुछ इस तरह तर्क देते हैं। पासवान के पुत्रा एवं लोजपा संसदीय बोर्ड के अèयक्ष चिराग पासवान कहते हैं-’अगर हम अवसरवादी होते तो 2002 में रामविलास पासवान मंत्राी पद तथा सुख-सुविधओं का त्याग नहीं करते। रही बात नरेंद्र मोदी की तो इस मुल्क में कानून का राज है। न्यायपालिका सबसे बड़ी संस्था है। जब दंगा की जांच के लिए गठित एसआर्इटी और देश की सबसे बड़ी कचहरी ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दिया है तो देश का कोर्इ भी नागरिक अब नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगे के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। अगर कोर्इ ऐसा राग अलापते हैं तो वह सीध्े न्यायालय का अपमान करते हैं। चिराग अपने बचाव में जो कुछ तर्क दे रहे हों लेकिन सही बात यह है कि नरेंद्र मोदी को अदालत के द्वारा क्लीन चिट मिल जाने के बाद खुद लोजपा के कर्इ नेता भाजपा और नरेंद्र मोदी को सेक्युलरिज्म के लिए खतरा बता चुके हैं। इध्र इस प्रकरण पर रामविलास पासवान का तर्क है-’बारह वर्षों में एक युग बदल जाता है। एक ही बात को रटते रहने से देश का भला होने वाला नहीं है। भाजपा के राष्ट्रीय अèयक्ष हाथ जोड़कर मुसिलमों से मापफी मांगी है और क्या चाहिए? भाजपा ने कहा है कि वह संविधन के अनुसार चलेगी। संविधन से बड़ी कोर्इ चीज नहीं है।
दरअसल, लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान समकालीन भारतीय राजनीति में अत्यंत महत्वाकांक्षी शखिसयत हैं। उनके लिए घटनाएं संभावनाएं हैं और संबंध् आगे बढ़ने की सीढि़यां। दूसरे शब्दों में कहें तो एक लंबे अरसे से राजनीति में सक्रिय श्री पासवान आज के सि(ांतविहीन राजनीतिक दौर के एक मजे हुए यो(ा हैं। ये राजनीति के एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिसे सियासत की बिसात पर पांसे पफेंकने में महारत हासिल है। यही कारण है कि ये अपने विचार और सि(ांत को अपनी सुविध के अनुसार मोड़ लेते हैं।
लिहाजा, जनाब कब किनके बगल में खड़े हो जाएंगे, कहना मुशिकल है। पिछले लोकसभा चुनाव 2009 में लालू यादव के साथ खड़े थे ;राजद-लोजपा का गठबंध्न थाद्ध और भाजपा तथा नरेंद्र मोदी को निशाने पर ले रखे थे। इसबार उसी भाजपा और नरेंद्र मोदी के साथ खड़े होकर लालू-नीतीश और कांग्रेस की बखिया उध्ेड़
रहे हैं।
लालू की अवसरवादिता !
सच तो यह है कि बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान अकेले नाम नहीं हैं जिनके उफपर सि(ांतहीन राजनीति करने तथा अवसरवादी होने का आरोप चस्पा है। ऐसे नेताओं एवं पार्टियों की एक लंबी पफेहरिश्त है। लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक सबों ने भाजपा के साथ अवसर का पफायदा उठाया तथा काम निकल जाने के बाद उसपर ;भाजपाद्ध सांप्रदायिक होने का ठप्पा मढ़ दिया। स्वयं लालू यादव भाजपा की मदद से पूर्व में सरकार चला चुके हैं। तब ये जनता दल में हुआ करते थे और केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। तब लालू यादव के लिए भाजपा सांप्रदायिक नहीं थी। लेकिन काम निकल जाने के बाद से बीजेपी की लगातार बखिया उध्ेड़ रहे हैं। जहां तक नीतीश कुमार की बात है इन्होंने तो अवसरवादिता का एक नया रिकार्ड ही बना दिया। लगातार सत्राह वर्षों तक भाजपा के साथ गलबहियां कर न केवल केंद्र में मंत्राी बने रहे बलिक बिहार जैसे प्रदेश के मुख्यमंत्राी पद पर भी काबिज हुए। लेकिन पिछले वर्ष जब नरेंद्र मोदी का नाम प्रधनमंत्राी के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया जाने लगा तो नीतीश ने खुद को गठबंध्न से अलग कर लिया। अब जदयू और नीतीश भी नरेंद्र मोदी और भाजपा को ‘सांप्रदायिक शकित कहकर कटघरे में खड़े करने में जुटे हैं।
अवसरवादी है कांग्रेस?
बिहार में राजद-कांग्रेस तथा एनसीपी का भी गठबध्ंन हुआ है। यह गठबंध्न भी अवसरवादिता का साक्षात उदाहरण है। दरअसल, वर्ष 2005 से ही यहां के कांग्रेसी लालू यादव को जंगलराज का पर्याय बताकर उनपर वार करते रहे हैं। सवाल इतना भर नहीं है, कांग्रेस भ्रष्टाचार के विरोध् की बात हमेशा से करती रही है। वहीं दूसरी ओर उसी लालू यादव से गठबंध्न भी करती है जो इसी मामले में सजायाफ्रता हैं। अब कांग्रेस बिहार में लालू यादव की पार्टी को वोट देने की अपील कर रहे हैं। क्या यह अवसरवादिता की पराकाष्ठा नहीं है? करीब 9 वर्षों से बिहार कांग्रेस जिस लालू-राबड़ी सरकार के जंगलराज को रेखांकित कर यहां की जनता को लालू-राबड़ी से खबरदार करती रही है, अब राबड़ी देवी को जिताने के लिए जनता से अपील कर रही है। यह अवसरवादिता की पराकाष्ठा ही तो है। यही है आज के राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों का असली चेहरा। इस विषय पर हम आगे चर्चा करेंगे पिफलहाल, बात करते हैं कि लालू-पासवान की दोस्ती टूटने की वजह क्या है?
दरअसल, इनकी दोस्ती पर पहला ग्रहण कुछ वर्ष पूर्व हुए गया स्नातक क्षेत्रा चुनाव में ही लग गया था। उस चुनाव में दोनों दलों के बीच गठबंध्न रहते हुए लालू यादव ने लोजपा के उम्मीदवार को समर्थन न देकर कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन किया था। पिफर उसके बाद पूर्णिया में राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद हुए विधनसभा उपचुनाव में इनके बीच की दरारें और बढ़ गर्इ। 25 जून 2011 को हुए उस उपचुनाव में रामविलास पासवान ने जहां कांग्रेस प्रत्याशी रामचरित्रा यादव का समर्थन किया था वहीं लालू ने सीपीएम उम्मीदवार अमित सरकार का पक्ष लिया था। उस उपचुनाव में भाजपा ने भारी मतों से कांग्रेस को पटखनी दी थी। वर्तमान में गठबंध्न टूटने का कारण यह बताया जाता है कि पासवान जितनी सीटें चाहते थे, राजद उतना देने को तैयार नहीं हुआ। गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव 2009 में गठजोड़ के तहत लालू यादव और रामविलास पासवान क्रमश: 28 और 12 सीटों पर चुनाव लड़े थे। उस चुनाव में दोनों दलों को भारी नुकसान हुआ था। राजद को चार सीटें मिली और लोजपा का तो सुपड़ा ही सापफ हो गया। दूसरे की बात तो छोड़ दीजिए स्वयं लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान भी हाजीपुर से हार गए थे। उसी हाजीपुर से जहां से श्री पासवान पूर्व में भारी मतों से विजयी हुए थे। जिसके कारण उनका नाम विश्व के गिनीज बुक्स आपफ रिकार्ड में भी दर्ज हुआ। हालांकि राजद-लोजपा गठबंध्न को आकार देने के लिए रामविलास, लालू से मिलने रांची जेल भी गए थे। इसके कुछ दिनों के बाद वे अपने बेटे चिराग के साथ राबड़ी देवी से उनके आवास पर मिले। राबड़ी देवी से लालू के जेल में बंद होने को लेकर उन्होंने सहानुभूति भी जतार्इ। लेकिन मामला तनावपूर्ण तब हो गया जब राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने एक बयान जारी कर यह कह दिया कि-’लोजपा सीटों की मांग करने से पहले जीतने योग्य उम्मीदवारों की सूची प्रस्तुत करे। उध्र रामविलास सोनिया के भी संपर्क में थे। उन्होंने उनसे मुलाकात की तथा गठबंध्न पर जल्दी निर्णय लेने का आग्रह किया। लेकिन उन्हें वहां से भी अपेक्षित रिस्पांस नहीं मिला। उसी बीच रामविलास और नीतीश के बीच गठबंध्न की संभावनाओं को तलाशा जाने लगा। नीतीश और रामविलास ने मीडिया में एक-दूसरे की खुलकर प्रशंसा भी शुरू कर दी। रामविलास के संपर्क में जदयू के राज्यसभा सदस्य केसी त्यागी तो थे ही नीतीश ने मकर संक्रांति ;14 जनवरी 2014द्ध के बहाने पासवान को पटाने के लिए जदयू नेता अली अनवर को दही-चूड़ा का भोज खाने भेज दिया। इतना ही नहीं, जदयू और कांग्रेस में भी संभावित गठबंध्न की चर्चा सूबे की सड़कों पर तैरने लगी। उध्र पासवान सोनिया को यह अधिकार दे आए थे कि वे राजद या जदयू जिनसे चाहें चुनावी तालमेल कर लें, वे उनके साथ हैं। जदयू-लोजपा के चुनावी तालमेल की चर्चा के बीच यह बातें भी हवा में तैरने लगी कि यदि जदयू-लोजपा का तालमेल हुआ तो पशुपति कुमार पारस को बिहार सरकार में मंत्राी बनाया जाएगा। श्री पारस लोजपा के प्रदेश अèयक्ष तथा रामविलास पासवान के अनुज हैं। वैसे पशुपति पारस अभी विधयक नहीं हैं, उनकी विधनसभा सीट अलौली पर भी जदयू का ही कब्जा है। लिहाजा, बात यहां तक होने लगी कि जदयू उन्हें विधन परिषद में भेज सकता है। लेकिन यह मामला भी बहुत आगे नहीं बढ़ सका। दरअसल, पासवान पर उनके कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ गया कि वे ऐसा काम न करें कारण नीतीश ने पासवान जाति के साथ सौतेला व्यवहार किया है तथा लोजपा को समय-समय पर तोड़ने का काम किया है इससे उन्हें मापफ नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि नीतीश ने दलित जातियों को दो भागों में बांट, उनकी एकता को तोड़कर अपनी राजनीति को नर्इ धर दी थी। सूबे में कुल 23 उपजातियां दलित के तहत आती है। नीतीश ने केवल पासवान ;दुसाध्द्ध को छोड़कर सभी 22 जातियों को महादलित में शामिल कर लिया। महादलित के नाम पर जो सुविधएं उन लोगों को नीतीश सरकार दे रही है उन सुविधओं से ‘पासवान बंध्ु वंचित हो गए। कहना न होगा, सूबे में दुसाध् मतदाताओं की संख्या पांच पफीसदी है। दूसरी बात कि लोजपा के कार्यकर्ताओं को इस बात का भी आक्रोश है कि शुरू के दिनों से ही नीतीश उनके विधयक और सांसदों को तोड़-तोड़ कर जदयू में शामिल कराते रहे हैं। सबसे पहले 2005 के विधनसभा चुनाव ;अक्टूबर-नवंबरद्ध में इनके अधिकांश विधयक को नीतीश ने जदयू में शामिल करवाया था। उस समय रामाश्रय प्रसाद सिंह के नेतृत्व में लोजपा के विधयकों ने जदयू का दामन थामा था। 2010 के विधनसभा चुनाव में लोजपा के तीन विधयक जीत कर आए थे। चुनाव के कुछ ही महीनों के बाद उनमें से दो विधयकों को भी नीतीश ने अपनी पार्टी में शामिल करवा लिया। अररिया के विधयक जाकिर हुसैन खान बच गए थे। हालांकि बाद में वे भी भाजपा-लोजपा गठबंध्न हो जाने के बाद जदयू में शामिल हो गए। विधन परिषद में जब लोजपा का खाता खुला। संजय सिंह लोजपा के विधन परिषद सदस्य बने। बाद में उन्हें भी भगाकर नीतीश ने अपनी टोली में शामिल करवा ली। इतना ही नहीं, 2009 में स्थानीय निकाय से विधन परिषद के सदस्यों का चुनाव हो रहा था। राजद-लोजपा का गठबंध्न था। उस चुनाव में लोजपा के तीन सदस्य जीत कर बिहार विधन परिषद पहुंचे थे। बाद में उन तीनों सदस्यों को नीतीश ने एकमुश्त जदयू में शामिल करवा लिया। लोजपा के टिकट पर जीत कर आए जनप्रतिनिधियों को जदयू में शामिल कराने का सिलसिला यहीं समाप्त नहीं हुआ। लोजपा को वर्ष 2008 में साबिर अली के रूप में राज्यसभा में एक सीट मिली। बाद में नीतीश ने उन्हें भी पटाकर जदयू में शामिल करवा लिया। 2010 में रामविलास पासवान राजद की मदद से राज्यसभा जाने में कामयाब हो सके। अभी पटना और दिल्ली के प्रतिनिधि सदनों में अपनी पार्टी की ओर से स्वयं एकमात्रा प्रतिनिधि रह गए हैं। कुल मिलाकर नीतीश के लोजपा के प्रति इस रवैये के कारण श्री पासवान जदयू के साथ गठबंध्न करना उचित नहीं समझा। हालांकि मकर संक्रांति के दिन ;14 जनवरी 2014द्ध भाजपा के रविशंकर प्रसाद भी दही-चूड़ा खाने पासवान के यहां गए थे और भाजपा-लोजपा गठबंध्न की संभावनाओं को अंकुरित करा आए थे। पिफर बिहार में शहनवाज हुसैन एवं राजीव प्रताप रूढ़ी ने इस काम को आगे बढ़ाया। लोजपा की ओर से चिराग पासवान इस गठबंध्न के सूत्राधर बताए जाते हैं।
लालू-रामविलास के बीच की दोस्ती एवं दुश्मनी की कथा भी कापफी दिलचस्प है। दरअसल, दोनों की दोस्ती अपने-अपने मतलब के लिए हुर्इ थी। पहले भी ये दोनों अपने-अपने मतलब के लिए प्रफंट पर आए थे और यह पहला मौका भी नहीं था जब लालू और पासवान के बीच दोस्ती में दरारें आर्इ। इससे पहले भी कर्इ मौकों पर दोनों ने अपने हित के लिए एक-दूसरे के विरू( अपने म्यान से तलवारें खिंची थी। वर्ष 2005 के विधनसभा चुनाव के दौरान ऐसे दृश्य देखने को खूब मिले थे। उस समय रामविलास, राजद और भाजपा को समान बताते थे। 2005 के पफरवरी में हुए विधनसभा चुनाव में श्री पासवान 29 सीटें झटक कर सूबे की सत्ता की चाभी अपने हाथों में रख ली थी। लिहाजा, राबड़ी देवी की सरकार नहीं बन पार्इ। तब लालू और रामविलास के बीच ‘शब्द वाण खूब चले थे। राबड़ी देवी ने श्री पासवान को ‘लंगड़ा बिलाड़ जैसे शब्दों से विभूषित किया था तो लालू यादव ने पासवान की पहली पत्नी को ‘सीता की संज्ञा प्रदान की थी। इतना ही नहीं लालू, रामविलास से चिढ़कर उन्हें पेंडुलम कहने लगे थे। चूंकि राबड़ी देवी को रामविलास के द्वारा समर्थन नहीं दिए जाने के कारण सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया जिससे चिढ़कर लालू यादव पटना सिथत अपने सरकारी आवास के शयनकक्ष से पेंडुलम वाली एक दीवार घड़ी पत्राकारों के सामने ले आए और बोलने लगे-’यह देख रहे हो न…कैसे पेंडुलम का कांटा हिल रहा है इध्र से उध्र…यही रामविलास पासवान हैं। राष्ट्रपति शासन लग जाने के बाद जब श्री पासवान से नाराज होकर उनके 29 विधयकों में से अधिकांश विधयकों ने भाजपा और जदयू का दामन थाम लिया तो उसपर लालू ने पासवान पर टिप्पणी की थी-’कहता था कि बंगला ;लोजपा का चुनाव चिन्हद्ध भी मेरे पास है और उसमें लगे ताले की चाभी भी….लेकिन बंगला चाभी समेत लेकर उसका चेलवा सब भाग गया। उसी वर्ष ;2005द्ध अक्टूबर-नवंबर में पुन: विधनसभा चुनाव हुए। उसमें भी राबड़ी देवी की सरकार नहीं बन सकी। नीतीश के नेतृत्व में जदयू-भाजपा की सरकार बनी। तब रामविलास ने भी लालू को पलट कर जवाब दिया था-’कपार के घाव को खत्म कर ही दिया मैंने…भले मेरी लोजपा की सीटें क्यों न घट गर्इ। कपार के घाव का मतलब लालू यादव से था। उस चुनाव में पासवान 29 सीटों से लुढ़क कर 10 सीटों पर आ गए थे। मजे की बात यह है कि श्री पासवान और लालू के बीच की वह दुश्मनी अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकी। 2009 के लोकसभा चुनाव में पिछली सारी बातों को भूलकर वे अपने मतलब के लिए पिफर एक हो गए। रामविलास ने दोबारा उसी कपार के घाव अर्थात लालू के साथ दोस्ती कर ली तथा कहने लगे कि राजद-लोजपा की दोस्ती अटूट है। यह दोस्ती एक जन्म नहीं सात जन्मों की है। उस समय दोनों केंद्र के यूपीए गठबंध्न में मंत्राी थे। इन दोनों ने तब कांग्रेस से बिना बात किये उनकेे लिए मात्रा तीन सीटें छोड़कर शेष सीटों का आपस में बंटवारा कर लिया। इन्हें इतना भी ख्याल नहीं आया कि जिस कांग्रेस के साथ वे मिलकर केंद्र में सत्ता की मलार्इ काट रहे हैं उनके साथ गठबंध्न की सीटों के लिए कम से कम एक बार बात करनी चाहिए। लालू पासवान के इस आचरण से कांग्रेस अपमानित महसूस कर रही थी। लिहाजा, राजद लोजपा से अलग होकर कांग्रेस ने सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। 2009 के लोकसभा चुनाव के परिणाम इन तीनाें के लिए बेहद निराश करने वाला आया। लालू को तो चार सीटें मिली भी पासवान का तो सूपड़ा ही सापफ हो गया।
सवाल उठता है कि आखिर 2005 में रामविलास पासवान और लालू के बीच छत्तीस का आंकड़ा क्यों बना था? इन दोनों के संबंध् को विस्तार से जानने के लिए आइए एक बार पिफर पीछे मुड़कर देखते हैं। लालू-पासवान के बीच संबंधें में आयी खटास की कथा 2004 के लोकसभा चुनाव से शुरू होती है। खटास आने का मूल कारण रेल मंत्राालय था। दरअसल, पासवान और लालू जब चुनाव जीतकर संसद पहुंचे तो दोनों की इच्छा रेल मंत्राी बनने की हुर्इ। हालांकि, लालू पहले गृहमंत्राी बनना चाहते थे। इस मुतलिलक उन्होंने खुलकर बयान भी दिया था कि उन्हें ‘लाठी विभाग ;गृह विभागद्ध चाहिए। लेकिन वह विभाग लालू के हाथों से पिफसल गया। अपेक्षित विभाग न मिलने के कारण लालू 21 मर्इ, 2004 को गुस्से में पटना लौट आए। पिफर लालू की नजर रेल मंत्राालय पर गर्इ। लेकिन सोनिया गांध्ी तब तक रेल मंत्राालय के लिए रामविलास को हामी भर दी थी। तब लालू ने सोनिया पर दबाव बनाना शुरू किया। चूंकि लालू के पास 23 सांसदों की ताकत थी और पासवान के पास केवल चार। लिहाजा, लालू के दबाव के आगे सोनिया झुक गर्इ और पासवान के हाथों से रेल मंत्राालय पिफसल कर लालू के हाथों में आ गया। तभी से बिहार के इन दोनों दिग्गजों के बीच छत्तीस का आंकड़ा बन गया। पिफर 2005 में हुए विधनसभा चुनाव में रामविलास पासवान ने मुसिलम मुख्यमंत्राी का शगूपफा छोड़कर लालू-राबड़ी के हाथों से सत्ता छीन ली थी।
दरअसल, 2005 के पफरवरी में हुए विधनसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। राजद, लोजपा, एनडीए सबों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। पासवान के हाथों में 29 सीटें आ गर्इ। बिना रामविलास के समर्थन के राबड़ी की सरकार नहीं बन रही थी। लेकिन रामविलास राजद और नीतीश किसी को भी समर्थन देने के लिए तैयार नहीं थे। बताया जाता है कि तब श्री पासवान खुद मुख्यमंत्राी बनने की इच्छा रखते थे और राजद का समर्थन चाहते थे। लेकिन लालू यादव सिपर्फ राबड़ी देवी को मुख्यमंत्राी बनाने की जिद पर अड़े रहे। इस बीच रामविलास ने एक दूसरी चाल चल दी। उन्होंने लालू के उफपर यह शर्त रख दिया कि वे राजद को उसी सिथति में समर्थन देगें जब वह अपनी ही पार्टी के किसी मुसिलम को मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर बिठाए। इसके लिए उन्होंने राजद के प्रो. जाबिर हुसैन का नाम भी सुझाया था। पर, लालू इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्हें राबड़ी से कम कुछ भी मंजूर नहीं था। हालांकि, तब नीतीश ने बेशक रामविलास को मुख्यमंत्राी बनने का आपफर दिया था लेकिन पासवान ने उनके आपफर को स्वीकार नहीं किया। दरअसल, नीतीश तब भाजपा के साथ थे और पासवान ने दलित मुसिलम कार्ड खेलकर 29 सीटें हासिल की थी।
अवसरवादी हैं नीतीश!
वर्ष 2002 में जब गुजरात में दंगा हुआ था उस समय रामविलास-नीतीश और शरद यादव सभी अटल बिहारी सरकार में मंत्राी थे। नरेंद्र मोदी प्रकरण को लेकर लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने मंत्राी पद को थूक दिया था। सचार्इ यह है कि उस समय नीतीश को नरेंद्र मोदी की ध्र्मनिरपेक्षता पर कोर्इ संदेह नहीं था। लिहाजा, तब नीतीश ने रामविलास को ही निशाने पर लेकर उन्हें एनडीए को कमजोर करने की कोशिश में लगा एक अवसरवादी व्यकित बताया था। इस आशय की खबर 6 मर्इ 2002 को अंग्रेजी अखबार ‘टाइम्स आपफ इंडिया में भी प्रकाशित हुर्इ थी। अखबार के अनुसार इस प्रकरण पर नीतीश कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था-’रामविलास पासवान एक अवसरवादी व्यकित हैं जो कांग्रेस से होते हुए लालू यादव से मिल जाएंगे। पासवान एनडीए में रहते हुए गठबंध्न को कमजोर करने की कोशिश में लगे हुए हैं। यह कितनी हैरत की बात है कि गुजरात दंगे के समय एनडीए गठबंध्न को मजबूत करने में जुटे नीतीश कुमार रामविलास पासवान के इस्तीपफा देने पर उन्हें एनडीए को कमजोर करने का दोषी ठहरा कर उनकी निंदा कर रहे थे। पिछले वर्ष उसी नरेंद्र मोदी के नाम पर नीतीश ने एनडीए गठबंध्न को तोड़ दिया। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आज नरेंद्र मोदी को लेकर हायतौबा मचाने का मतलब क्या है? यह नौटंकी नहीं तो और क्या है कि वर्ष 2002 से लेकर वर्ष 2006 तक नरेंद्र मोदी के विरू( जुबान नहीं खोलने वाले नीतीश अब नरेंद्र मोदी पर तीर बरसा रहे हैं। जानकार बताते हैं कि इसका एक ही कारण है अकलियत वोटों को रिझाना। बिहार में करीब 18 प्रतिशत अकलियत है और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। दरअसल, 2009 के लोकसभा चुनाव में बिहार से जो परिणाम आए, उसने नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा को पंख लगा दिए। उनकी नजर दिल्ली के लालकिले पर लग गर्इ। वे प्रधनमंत्राी बनने के सपने देखने लगे। बीते वर्ष प्रधनमंत्राी पद के उम्मीदवार को लेकर दिए गए बयान पर बवाल भी मचा था। जनाब भूल गए कि वे एक क्षेत्राीय दल से आते हैं और मात्रा 20 सांसदों की उनकी हैसियत है। यह अलग बात है कि इस प्रकरण पर कापफी बवाल मचने के बाद परिसिथति को भांपते हुए नीतीश ने इस बात का खंडन भी किया कि वे प्रधनमंत्राी के उम्मीदवार नहीं हैं।  नीतीश की राजनीति पर नजर रखने वाले कहते हैं कि वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगे के समय नीतीश नरेंद्र मोदी के प्रशंसक इसीलिए थे कि वे तब बिहार के मुख्यमंत्राी नहीं थे। तब उनका लक्ष्य बिहार का मुख्यमंत्राी बनना था। जिसमें नरेंद्र मोदी उनके लिए सहायक हो सकते थे। दूसरा, उस समय यदि नीतीश विरोध् करते तो उन्हें केंद्रीय मंत्राी पद से हाथ धेना पड़ता।
नरेंद्र मोदी के नाम पर नीतीश के दोहरे चरित्रा के चंद दृश्य और। राजनीति में जब कोर्इ व्यकित किसी महत्वपूर्ण पद पर आसीन होता है तो उस व्यकित को दूसरे राजनीतिज्ञों के द्वारा बधर्इ देने की एक स्वस्थ परंपरा रही है। 2012 में जब नरेंद्र मोदी भारी बहुमत के साथ तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर आसीन हुए तो एनडीए गठबंध्न के घटक दल होने के कारण लोगों की यह अपेक्षा थी कि नीतीश कुमार भी नरेंद्र मोदी को बधर्इ देंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कारण नरेंद्र मोदी सेक्युलर नहीं हैं। लेकिन आज से करीब एक दशक पूर्व यही नीतीश कुमार गुजरात दंगे के बाद दिसंबर 2002 में जब गुजरात विधनसभा का चुनाव परिणाम आया था और नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर आसीन हुए थे। तब उन्होंने नरेंद्र मोदी को न केवल बधर्इ दी थी बलिक यह भी कहा था कि गुजरात की जीत में किसी प्रकार का सांप्रदायिक ध््रुवीकरण नहीं हुआ। गुजरात की जीत कांग्रेस के खिलापफ जनादेश है। 15 दिसंबर 2002 को प्रकाशित टाइम्स आपफ इंडिया के अनुसार नीतीश ने कहा था-’गुजरात की छवि जिस तरह से गुजरात से बाहर बनायी गर्इ थी, उससे राज्य के लोग गुस्से में थे। उसका जवाब राज्य के लोगों ने दे दिया है। हिन्दु-मुसिलम के बीच वोटों का किसी तरह से ध््रुवीकरण नहीं हुआ है। जनता ध्र्मनिरपेक्ष है और वह किसी भी पिफरकापरस्त को पसंद नहीं करती। ताज्जुब है कि उसी नीतीश कुमार का एक दशक के बाद वर्ष 2012 में ध््रुवीकरण को लेकर राय उल्टी हो गर्इ। वर्ष 2012 में गुजरात विधनसभा चुनाव के दौरान नीतीश ने कहा कि-’गुजरात में जो कुछ भी हुआ था 2002 में, उससे बाहर में गुजरात की बदनामी हुर्इ थी। देश भर में इसकी चर्चा थी। वह चुनाव एक खास माहौल में हुआ था और वहां पर पूरी राजनीति में ध््रुवीकरण हो गया था भाजपा और कांग्रेस के बीच में। नरेंद्र मोदी के नाम पर नीतीश के दोहरे चरित्रा की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। वर्ष 2008 में बिहार में कोसी का बांध् टूटा था। उत्तर बिहार में प्रलय जैसी सिथति बनी हुर्इ थी। प्रलय से जूझने के लिए नरेंद्र मोदी ने बिहार सरकार को 5 करोड़ रुपये की राशि सहयोग स्वरूप दी थी। उस समय उस राशि को उन्होंने स्वीकार भी कर लिया था। वह राशि तब अछूत नहीं थी। लेकिन उस घटना के करीब दो वर्षों के बाद 2010 में वह राशि अछूत हो गर्इ। नीतीश ने उसे वापस कर दिया। वह राशि इसलिए अछूत हो गर्इ कि 2010 में हुए भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दिन भाजपा के किसी उत्साही कार्यकर्ता ने नरेंद्र मोदी और नीतीश की वह तस्वीर विज्ञापन स्वरूप अखबारों में प्रकाशित करवा दिया था। जिस तस्वीर में नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के हाथों में हाथ दिए मुस्कुरा रहे हैं। अब सवाल उठता है जब आप नरेंद्र मोदी के हाथों में हाथ देकर पफोटो खिंचवाते हैं तो पिफर उसे स्वीकार करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाते। बीते 3 मार्च, 2014 को मुजफ्रपफरपुर में एक सभा को संबोधित करने नरेंद्र मोदी आए हुए थे। उस मंच पर उपेन्द्र कुशवाहा के साथ रामविलास पासवान भी मौजूद थे। मोदी ने नीतीश का बिना नाम लिए उनके अवसरवादिता को रेखांकित करते हुए कहा ‘रामविलास जी हमसे दुखी होकर चले गए, लेकिन वे जब भी जहां भी मिलते थे, हंसकर हाथ मिलाते थे। चाहे घर के अंदर हो या घर के बाहर। पबिलक के सामने हो या टीवी कैमरा के सामने। लेकिन यहां ऐसे भी लोग हैं जो अकेले में घरों के अंदर साथ मिलकर एक टेबल पर खाना तो खाते हैं, मीठी-मीठी बातें करते हैं लेकिन बाहर निकलकर हाथ मिलाने में पसीना छूटने लगता है। पाठकों को याद होगा कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान नीतीश-नरेंद्र मोदी की तस्वीर अखबार में विज्ञापन स्वरूप प्रकाशित हुर्इ थी जिससे नीतीश नाराज हो गए और उन्होंने उस भोज को कैंसिल कर दिया जिसे उन्होंने भाजपा नेताओं के सम्मान में आयोजित कर रखा था। नीतीश के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे जो कहते हैं वे करते नहीं। 19 अक्टूबर 1994 को जब समता पार्टी बनी थी तो उन्होंने कहा था कि वे भाजपा और कांगेे्रस दोनों में से किसी से समझौता नहीं करेंगे। लेकिन वे अपनी उस घोषणा पर कायम नहीं रह सके। भाजपा से उन्होंने 17 वर्षों तक गठबंध्न कर सत्ता की मलार्इ चाटते रहे। वर्ष 2000 में चुनावी हार के बाद नीतीश ने कहा था कि मैं खूंटा ठोककर बिहार में ही रहूंगा और लालू के जंगल राज से बिहार के लोगों को निजात दिलाउफंगा। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद मंत्राी बनने दिल्ली पहुंच गए और बिहार को भूल गए। इतना ही नहीं नीतीश कुमार बराबर कहते रहे कि वे परिवारवाद के हिमायती नहीं हैं। लेकिन पूर्व के वर्षों में हुए उपचुनावों में वे परिवारवाद के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में नजर आए। दरअसल, सवाल ध्र्मनिरपेक्षता की चिंता का नहीं है, सवाल इसके नाम पर राजनीति साध्ने का है। सवाल अवसरवादिता का है।

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