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आओ खेले सरकार-सरकार

Posted By wmadmin123 On October 22, 2013 @ 11:04 am In झारखंड-प्रसंग | No Comments

झारखंड अलग राज्य गठन के 13 वर्षों के सियासती इतिहास की कुरूपता एक बार फिर सामने है। राजनीतिक मौकापरस्ती, सत्ता लोलूपता और सियासत की गिरहबाजी के बीच राज्य की जनता एक बार फिर दर्शक की मुदzा में खड़ी है। राज्य गठन के 13 वर्षों के बीच हेमंत सोरेन ने नौवें मुख्यमंत्राी के रूप में सत्ता का ताज धरण किया है।

उल्लेखनीय है कि राज्य में तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगने के बाद राजनीति के सारे गिरहकट इसका ठीकरा एक दूसरे के सिर पर उछाल रहे थे। कोई भी अपने दामन में झांकने को तैयार नहीं था। इनकी सीमा पार बेशर्मी के बीच झारखंडी जनता इस बार अवाक नहीं थी। वह सब कुछ रोजमर्रा का हिस्सा मानकर तमाशबीन बनी हुई थी और आज भी है। उसे इस बात का जरा भी मलाल नहीं है कि राज्य में क्या हो रहा है क्या नहीं। अब जबकि हेमंत ने कांगेzस के रहमो-करम के बीच सत्ता का बागडोर संभाल ली है बावजूद राज्य की जनता इस बात से बेफिक्र है कि कोई भी शासन हो उनके हिस्से में कुछ खास परिवर्तन होने वाला नहीं है। राज्य गठन के बाद से झारखंड की दशा पूरा देश देख रहा है। ‘कौन बनेगा करोड़ पति’ के लिये फिर एक सवाल झारखंड की राजनीति को लेकर तैयार हो सकता है। ‘वह कौन सा राज्य है जो अपने गठन काल के वर्षों में केवल राजनीतिक लंपटई के अलावा कुछ भी नहीं देखा है?’ सनद रहे पिछले वर्ष ‘कौन बनेगा करोड़ पति’ में एक सवाल पूछा गया था कि ‘वह कौनसा राज्य है जिसके गठन के बाद से कोई भी मुख्यमंत्राी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है।’

राज्य गठन के इन 13 वर्षों में राज्य मेंे किसी तरह के विकास का काम धरती पर नहीं दिख रहा है, सिवाय राजनीतिक शतरंज के दाव-पेंचों के। राजनीतिक शतरंज भी अगर राज्य हित को ध्यान में रख कर खेला गया होता तो भी राज्य का कुछ भला हुआ होता, मगर सत्ता में बने रहने के लिये अब तक जो खेल खेले गये हैं, वह केवल व्यक्तिगत स्वार्थ में आर्थिक लूट के लिये खेले गये हैं।

उल्लेखनीय है कि झारखंड अलग राज्य गठन के बाद से अब तक नौ मुख्यमंत्री हुये हैं। पिछली सभी सरकारों में आजसू की भागीदारी काफी अहमियत के साथ रही है, मगर यह पहली बार हुआ है कि सरकार में आजसू आउट है। राज्य में भाकपा ;मालेद्ध को छोड़ लगभग सभी दलों के माननीयों की कमोवेश आजसू जैसी ही स्थिति रही है। वैसे पिछली सरकारों में शामिल निर्दलीयों के कई पूर्व मंत्रिायों की बेलगाम घोटालों को पूरा राज्य देख चुका है। जिनमें कई आज भी जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं।

मुंडा सरकार से समर्थन वापसी के लिये झामुमो के सुप्रीमो शिबू सोरेन और उनके सुपुत्रा हेमंत सोरेन को उकसाने में तत्कालीन प्रतिपक्ष के नेता राजेंæ प्रसाद सिंह की खासी भूमिका रही है। सनद रहे पिछले राज्यसभा चुनाव के परिणाम के साथ ही राजेंæ प्रसाद सिंह ने हेमंत सोरेन को जीत की बधई देते हुयें मुख्यमंत्राी के संबोधन से जानकारों को इस बात की भनक लग गई थी कि मुंडा सरकार की आयु अध्कि दिन नहीं रह गई है। वैसे झारखंड में सरकार बनाने के कई कारणों में एक कारण यह भी है कि राज्य में पावर के साथ-साथ सुरक्षा एक स्टेटस सिंबल बना हुआ है। कई पूर्व मुख्यमंत्राी हैं उन सबको जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त है। पूर्व उप मुख्यमंत्रियों को भी जेड प्लस सुरक्षा है। कांगzेस के एक पूर्व केंæीय मंत्राी को भी जेड प्लस सुरक्षा है और कांगzेस के एक राज्यसभा सदस्य को भी जेड श्रेणी की सुरक्षा है। अनेक को वाई श्रेणी की सुरक्षा है यह ज्ञान का विषय है कि कितने अफसर और पुलिस के जवान इनकी सुरक्षा में लगे हैं या इनके घर का काम करते हैं? इन खबरों को जानने के बाद राज्य की जनता यह सोचने पर मजबूर है कि क्या राज्य की पुलिस फोर्स इनके लिए बनी है या जनता की हिफाजत के लिए? पावर और पद के लिये यह राजनीतिज्ञ किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसीलिये नयी सरकार बनाने के गणित पर लंबे समय तक काम चलता रहा। यहां तक कि ‘मुख्यमंत्री कांगzेस का होगा तब भी चलेगा’, यह शिबू सोरेन खुद बोलने लगे थे। लोकतांत्रिक सरकार की दुहाई दी जा रही है। कोई भी मुख्यमंत्री हो किसी को ऐतराज नहीं, कोई फर्क नहीं बस सरकार बननी चाहिए, ऐसी चर्चाएं होने लगी थीं।

उल्लेखनीय है कि 4 सितंबर 2010 को मुंडा की सरकार मुख्य रूप से झामुमो के समर्थन में इस करार पर बनी थी कि 28 महीने भाजपा का मुख्यमंत्राी होगा, उसके बाद 28 महीने झामुमो का मुख्यमंत्री होगा।

12वीं पंचवर्षीय योजना ;2012-17द्ध के लिये 1,06, 278 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के अभी एक वर्ष भी नहीं हुये थे कि सरकार में कई विसंगतियां पैदा हो गई। वैसे भी पिछली 10वीं एवं 11वीं पंचवर्षीय योजनाओं पर हुये खर्च की तस्वीर देखें तो आगामी पांच वर्ष की तस्वीर अभी से ही साफ हो जाती है। 10वीं पंचवर्षीय योजना ;2002-07द्ध की स्वीत राशि 19,042 करोड़ रुपए में मात्रा 15,071 करोड़ रुपए ही खर्च हुये, जबकि 11वीं पंचवर्षीय योजना ;2007-12द्ध में स्वीत 40, 240 करोड़ रुपये में मात्रा 34,470 करोड़ रुपए ही खर्च हो सके हैं, जो 12वीं पंचवर्षीय योजना की तस्वीर की कहानी अभी सापफ बयां कर रही है।
दूसरी तरपफ राज्य गठन के बाद योजनाओं पर जितने भी खर्च किये गये हैं उसका भी परिणाम राज्य में अब तक नहीं दिखा है। लगभग 52 हजार करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद राज्य के खाते में मात्रा 18, 372 करोड़ रुपए की परिसंम्पत्ति दर्ज रही है। राज्य का सकल घरेलू उत्पाद 4.5 पफीसदी रहा जबकि 9.8 फीसदी का लक्ष्य था। राज्य में विकास की गंभीर स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चालू वित्तीय वर्ष में राज्य योजना मद~ में स्वीत 16,300 करोड़ रुपए में साढ़े नौ माह में मात्रा 5400 करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए थे।
राज्य में क्षेत्राीय असमानता की स्थिति कापफी गंभीर है। कुपोषण, भूखमरी, गरीबी राष्ट्रीय औसत से कापफी Åपर है। बावजूद झारखंड अपनी योजनागत व्यय तथा केन्æीय प्रायोजित वित्त का भी सही से इस्तेमाल नहीं कर पाया है। कहना ना होगा कि इसकी एक मात्रा वजह सत्ता पर काबिज राजनेताओं में राजनीतिक दूरदर्शिता
उफर्जा का गलत इस्तेमाल, वैचारिक विकलांगता के कारण सत्ता हासिल करके आर्थिक दोहन एवं लूटतंत्रा की संस्Ñति का विकास है।
हेमंत सरकार पर एक लंबी जवाबदेही है, जो एक चुनौती से कम नहीं है। पिछले तमाम रिकाWर्ड को देखते हुए इनसे कुछ खास उम्मीद की गुंजाइश कम दिखती है। बावजूद इसके राज्य की जनता को इनसे भी कई उम्मीदें हैं। अगर हेमंत जनता की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं तो जनता उन्हें सर आंखों पर बिठायेगी। साथ ही कांगzेस के प्रति भी झारखंडी जनता में एक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होगा। अभी वक्त है अगर हमारे खारख्वांह संभल सकते हैं तो संभल लें।


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