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इस दशहरे में तो रुपये की किस्मत चमका माँ दुर्गा

Posted By wmadmin123 On October 22, 2013 @ 10:17 am In सरोकार | No Comments

आज के हाईटेक जमाने में जहां हर कोई अपने परिवेश के साथ ही खुद को भी बदल रहा है, डाWलर के मुकाबले रुपये की कीमत लगातार गिर रही है। तरक्की के मार्ग पर सभी अगzसर हैं, मगर रुपया ‘बैक गेयर’ में है। संकट के दौर से गुजर रही देश की अर्थव्यवव्था पर आयी इस आपफत ने महंगाई मंे घुट रहे लोगों खासकर आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। ऐसे में कुछ भी रास नहीं आ रहा किसी को। न पर्व, न खुशियां। न उत्सव, न खरीदारी। हे मां दुर्गे, अब तू ही इस मुसीबत से देश और देशवासियों को उबार सकती है। न केंदz, न ही आरबीआई। दोनों के प्रयास खल्लास! डूबती ‘नइया’ को बचा ले मां, दे दे सबको ‘तिनके’ का सहारा!

इस नवरात्रा में ऐसी कृपा कर अंबे मां ताकि लड़खड़ा रही भारतीय अर्थव्यवस्था न सिपर्फ ‘पटरी’ पर आये, बल्कि अभागे रुपये की किस्मत चमके। डाWलर के मुकाबले रुपये में इतनी ‘जान’ तो डाल ताकि उसके दिन बहुरे। बहुत गिर चुका रुपया अब तो उसका लुढ़कना रोक। केंदz सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने इस संकट से उबरने के लिए अब तक जितने भी कदम उठाये हैं, सभी विपफल साबित हुए। कहीं भी असर न हुआ, कुछ पफर्क नहीं पड़ा। रुपये का लुढ़कना थम नहीं रहा।

आजादी मिलने के समय वर्ष 1947 में एक डाWलर का मूल्य लगभग एक रुपये ही था, आज यह 66 रुपये के बराबर हो चुका है। इसी साल मई-जून में एक डाWलर की कीमत 56.79 रुपये के आसपास थी। दो-तीन माह में ही रुपये का मूल्य लगभग 10 अंक और लुढ़क गया। रुपये की यह ‘गिरावट’ अभूतपूर्व है, चिंताजनक है, खतरे की घंटी है। वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा की मानें तो पश्चिमी देशों की नकल से देश की हालत और खराब हुई है। न तात्कालिक उपायों से देश का भला होने वाला है, न ही सोना गिरवी रखा जाना स्थायी समाधन है। जब तक हम प्रकृति और आत्मनिर्भरता की ओर वापस नहीं लौटेंगे, हालत नहीं सुध्रेगी।

आजादी मिले 66 साल हुए, इतने सालों बाद डाWलर के मुकाबले रुपये में 66 गुना गिरावट आयी हैं तब आजाद मुल्क मेें देश पर कोई विदेशी कर्ज नहीं था। पहले प्रधनमंत्राी जवाहर लाल नेहरू ने तरक्की के लिए देशवासियों को ‘माWडर्न इंडिया’ का सपना क्या दिखाया कि सभी के दिलों मंे तरक्की की चाहत हिलौरे मारने लगी। पिफर तो नेहरू और बाद की सरकारों ने विकास योजनाओं के लिए विदेशों से कर्ज लेना शुरू कर दिया। इसके लिए रुपये के अवमूल्यन की जरूरत पड़ी और डाWलर के मुकाबले इसकी कीमत आहिस्ता-आहिस्ता कम होती गयी।

पिछले कुछ महीनों से डाWलर की तुलना में रुपये की कीमत तेजी से लुढ़क रही है। आर्थिक विश्लेषकों की नजर में गिरावट का यह क्रम ऐसे ही जारी रहा ओर केंदz सरकार और आरबीआई ने शीघz ‘कारगर’ कदम नहीं उठाये तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब 70 रुपये में एक डाWलर मिला करेगा। वर्ष 2001 से 2010 के बीच रुपये की कीमत 39 से 50 रुपये प्रति डाWलर के बीच रही। इस दशक में रुपया सबसे उफपर 2007 में रहा, जब एक डाWलर का मूल्य 39 रुपये रहा। 2008 की वैश्विक मंदी के समय से रुपये की कीमत में गिरावट का नया दौर शुरू हुआ, जो अब तक जारी है।

वैसे, यह भी सच है कि आज विश्व मंदी या मंदी जैसे हालात से गुजर रहा है। अमेरिका और यूरोप के के बाद अपने देश में भी इसकी दस्तक सुनाई पड़ रही है।यहां कई औद्योगिक सेक्टर ऐसे हैं जहां मांग में कमी के चलते उत्पादन का स्तर गिर रहा है। कर्मचारियों की छंटनी हो रही है, इन्प्रफास्ट्रक्चर का दायरा घटाया जा रहा है। कम खर्चों वाला ‘बजट’ बनाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर महंगाई कम होने की बजाय लगातार बढ़ोत्तरी पर है। खुले बाजार में कंपनियां मनमानी पर उतारू हैं। कोई नियंत्राण नहीं, कोई लगाम नहीं। देश की अर्थव्यवस्था दोहरे संकट में पफंसती नजर आ रही है। इस पूरे संकट को डाWलर और अन्य प्रमुख विदेशी मुदzाओं की तुलना में रुपये में आ रही गिरावट ने और गहरा कर दिया है।

एक बार पिफर देशवासियांे को वर्ष 1991 के संकट की याद आ रही है जब देश को अपनी आर्थिक जरूरतों की खातिर सोना गिरवी रखना पड़ा था और आज तकरीबन 20-22 सालों में ही पिफर ऐसी नौबत आने की चर्चा हो रही है। 1991 के संकट का हल उदारीकरण से निकला, पर यह इलाज महज दो दशक में ही पफेल हो गया। इस विपफलता ने हमारे तमाम आर्थिक विश्लेषकों को भी चक्कर में डाल रखा है कि अब क्या हो सकता है मौजूदा संकट का समाधन!

अर्थशास्त्राी डाW. भरत झुनझुनवाला की राय में रुपये में आयी गिरावट का मूल कारण हमारे नेताओं का विदेशी निवेश के प्रति मोह है। विदेशी निवेश को आकर्षित करके देश को रकम मिलती रही।देश की सरकार इस रकम का उपयोग मनरेगा या भोजन का अध्किार जैसी योजनाओं के लिए या पिफर सरकारी कर्मियों को बढ़े वेतन देने के लिए करती रही, साथ ही भzष्टाचार के माध्यम से इसका रिसाव भी करती रही। 2002 से 2011 तक यह व्यवस्था चलती रही।

उदाहरण के साथ डाW. झुनझुनवाला कहते हैं कि मान लीजिये विदेशी निवेशकों ने 100 डाWलर हमारे देश में लाकर जमा किया। सरकार ने इससे गेहूं का आयात किया और भोजन के अध्किार के लिए इसे वितरित किया। गेहूं खत्म हो गया लेकिन कर्ज खड़ा रहा। विदेशी निवेश हमारे उफपर एक प्रकार का कर्ज होता है। अपनी रकम विदेशी निवेशक कभी भी वापस ले जा सकते हैं। जिस प्रकार उद्यमी बैंक से लोन लेता है, उसी तरह देश भी विदेशी निवेशकों से कर्ज लेता है। दस साल तक विदेशी निवेश आते रहे और देश पर कर्ज चढ़ता रहा। लेकिन कब तक? जैसे व्यक्ति शराब पीता ही जाय, तो एक क्षण ऐसा भी आता है जब वह बेहोश हो जाता है। इसी तरह विदेशी निवेश के बढ़ते कर्ज से रुपया बेहोश हो गया है।

दूसरी ओर देश के चालू खाते का घाटा चिंताजनक स्तर पर पहुंचना भी डाWलर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट का बड़ा कारण है। इस ‘घाटे’ को पाटे बिना रुपये की गिरावट पर लगाम मुश्किल है। आर्थिक पंडितों की राय मानें तो इस संकट से निपटने के लिए जरूरी है कि देश पेट्रोलियम आयात पर डाWलर में होने वाले भारी-भरकम खर्च को कम करे। देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए सरकार को खपत कम और निवेश अध्कि करने होंगे। विदेशी निवेशों से प्राप्त रकम का सदुपयोग हाईवे और इंटरनेट सुविधओं के लिए किया जायेगा तभी रुपये में स्थिरता आयेगी।

एक तरपफ महंगाई की मार दूसरी ओर विकास की चाहत। सभी को चाहिए विकास, कोई पिछड़ना नहीं चाहता। मगर महंगाई विकास से टकराव मोल ले उसपर ‘बzेक’ लगा रही है। गzोथ का गzापफ चढ़ने नहीं दे रही। विकास में कमी का सापफ मतलब है, वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में कम बढ़ोत्तरी। उत्पादन मंे कमी है तो तय मानें कीमतों का थमना मुमकिन नहीं। एक तरपफ यह कहा जा सकता है कि विकास बढ़ाने के लिए कीमतों को रोकना होगा, वहीं यह भी उतना ही बड़ा सच है कि कीमतें थामने के लिए विकास में बढ़ोत्तरी लानी होगी। दोनों में आये इस ‘विरोधभास’ के चलते देश की अर्थव्यवस्था थम सी गयी है।

औद्योगिक उत्पादन की वृ¼ि लगभग ‘शून्य’ पर पहुंच चुकी है, कृषि उत्पादन के बढ़ने की अपनी सीमाएं हैं। पिछली कई तिमाहियों से औद्योगिक उत्पादन में ‘उठाव’ का कोई संकेत नहीं देखा गया। कृषि उत्पादन का हाल किसी से छुपा नहीं। ‘गzोथ’ होता तो किसानों के घर विपत्ति की जगह खुशहाली नजर आती। खेतीबारी पटरी पर ‘दौड़ती’ तो आज देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों को खुदकुशी का मार्ग क्यों अपनाना पड़ता?
2007-08 तक हमारी अर्थव्यवस्था ठीक-ठाक चल रही थी और हम विश्वव्यापी मंदी के प्रभाव से उबरने में भी कामयाब रहे। नजर डालने पर हमें जरूर यह समझ आयेगी कि तीन-चार साल पहले की मजबूत आर्थिक स्थितियांे के चलते ही हम इस मंदी से निपटने में सक्षम रहे थे। हालात के बिगड़ते चले जाने के कारण ढ़ूंढने पर हमें यह मालूम पड़ने लगेगा कि सबसे पहला कारण यह रहा कि 2003-04 के बाद विदेशी निवेश को अंधध्ुंध् बढ़ावा दिया गया। इसके चलते देश से बाहर जाने वाली राWयल्टी की रकम सालाना सात अरब डाWलर से बढ़कर 26 अरब डाWलर तक पहुंच गयी। दूसरा कारण, देश में बढ़ता भzष्टाचार है। जी हां, भzष्टाचार! घोटालों से हासिल ‘सरप्लस’ रकम को सोने की खरीद में निवेश किया गया। हमारे देश में कोई भी व्यक्ति कई किलो तक सोना खरीद सकता है। इस पर कोई पाबंदी नहीं, किसी तरह का सरकारी नियंत्रण नहीं। न ही इसके लिए पैन कार्ड जरूरी होता है। सोने की मांग में वृद्धि से इसका आयात बढ़ता गया जिसके चलते भुगतान शेष घाटा भी बढ़ता गया।

तीसरा कारण, चीन के साथ बढ़ते हमारे आर्थिक संबंध हैं। चीन के साथ हमारे आयात-निर्यात का अंतर 40 अरब डाWलर तक पहुंच चुका है, जो बेहद चिंताजनक विषय है। चीन से आज की तारीख में केवल खिलौने ही आयात नहीं हो रहे, बल्कि वहां से पावर प्लांट के तमाम उपकरणों समेत टेलीकाWम सेक्टर से जुड़ी अनेक चीजें आयात हो रही हैं। यही नहीं, देश में बुनियादी ढांचे समेत अन्य निर्माण कार्यों में चीन की कंपनियां शामिल हंै, जो अपना सामान वहीं से मंगाती हैं। इन सभी कारणों से हमारा व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है जिसका सीध असर रुपये की कीमत पर पड़ रहा है।

भयंकर विदेशी मुदzा संकट की ओर बढ़ते अपने देश में आज निर्यात को बढ़ाने के सभी प्रयास असपफल होते दिखाई पड़ रहे हैं, जबकि आयात बढ़ने की गति और तेज होती जा रही है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सरकार उपभोक्ता वस्तुओं, टेलीकाWम, पावर प्लांट और अन्य परियोजना वस्तुओं ;खास तौर पर चीन सेद्ध के ‘आयातों’ पर पाबंदी लगाये। सोना-चांदी के आयात पर प्रभावी नियंत्राण लगे। विदेशी संस्थागत निवेशकों के निवेशों पर तीन साल का ‘लाWक-इन-पीरियड’ का प्रावधन लागू किया जाये और विदेशी कंपनियों द्वारा अनधिकृत रूप से किये जा रहे विदेशी मुदzा अंतरणों पर भी प्रभावी रोक लगायी जाये। यदि केंदz सरकार ने ये कदम शीघz नहीं उठाये तो देश भयंकर विदेशी मुदzा संकट में पफंस सकता है।

क्या दशहरा, क्या दिवाली, घर-घर की छिन रही खुशहाली। बढ़ती महंगाई, गिरता रुपया, आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया। पहले क्या कम ‘जानलेवा’ थे महांगई के चौतरपफा वार जो अब दसों दिशाओं से नये-नये ‘हमले’ होने लगे हैं। चाहे सोना गिरवी रखे सरकार, चाहे निर्यात बढ़ाये, आयात घटाये, अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव लाना ही होगा वर्ना इस संकट का स्थायी हल मुमकिन नहीं। और यह बदलाव तभी लाया जा सकता है जब हम सभी आत्मनिर्भरता की कसौटी पर खरा उतर नये सिरे से ‘बजट’ बनायेंगे और उसका पालन करेंगे। आइये, हम सभी इस दशहरे में यही शपथ लें और आर्थिक मोर्चे पर विजयी बनें।


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