December 12, 2017

ऐसे बचते रहे लालू

Photo GalleryBy wmadmin123 - Tue Oct 22, 9:29 am

चारा घोटाले में लालू प्रसाद को 5 साल की सजा सुनाए जाने के बाद भले ही उनके और आरजेडी के राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हों लेकिन राजद का कहना है कि वह फैसले से हार नहीं मानेगा और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा। राजद सांसद रामकृपाल यादव ने इस पफैसले पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है-‘हमें सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है। हम इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, असली अदालत जनता की है, हम जनता के पास जाएंगे।

सवाल उठता है कि यह घोटाला है क्या? कैसे पावर पाWलिटिक्स कर लालू अब तक बचते रहे? मामला चाईबासा कोषागार से 37 लाख 70 हजार रुपये अवैध् ढंग से निकालने का है। 950 करोड़ के चारा घोटाले में 63 में 53 मामले झारखंड अलग राज्य बनने के बाद हस्तांतरित हो गए थे। जहां तक लालू यादव की बात है, सीध्े तौर पर आध दर्जन मामलों में आरोपी बनाए गए थे, जिसमें आय से अध्कि संपत्ति का एक मामला पटना में था उसमें वे बरी किए जा चुके हैं। उनके अन्य पांच मामले रांची में सुने जा रहे हैं और उनमें से आरसी 26ए @96 पहला मामला है जिसमें अदालत ने अपना पफैसला सुनाया। चाईबासा कोषागार से वर्ष 1992 से 1995 के बीच 37 करोड़ 70 लाख रुपये अवैध् ढंग से निकालने के मामले की जांच सीबीआई ने वर्ष 1996 में अपने हाथों में ली थी। इसमें लालू यादव के अलावा उनके नजदीकी एवं पूर्व सांसद आरके राणा, जदयू विधयक जगदीश शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्राी डाW. जगन्नाथ मिश्र, कई आईएएस अध्किारी सहित 44 आरोपी थे इस मामले में कुल 330 लोगों की गवाही हुई। लालू यादव के 172 अन्य लोगों की गवाही कराने की याचिका का संज्ञान उच्च न्यायालय के आदेश पर विशेष अदालत ने कुछ अन्य गवाहों की भी गवाही करवाई थी। इसी मामले में डाW. जगन्नाथ मिश्र और लालू यादव की गवाही बीते 14 पफरवरी 2013 को दर्ज की गई थी। सवाल उठता है कि जब 1996 में यह घोटाला प्रकाश में आया था तब इसकी जांच शुरू कैसे हुई?

जनवरी 1996 में चारा महाघोटाला बेनकाब हुआ था, तो छूटते हुए लालू ने ऐलान किया था कि जिन तीन सौ से ज्यादा लोगों के खिलापफ एपफआईआर हुआ है, उन मामलों की सुनवाई हेतु विशेष अदालत का गठन किया जाएगा। उध्र विपक्षी दल वालों ने इसकी जांच सीबीआई से कराने की मांग की तो लालू यादव ने सीध्े इंकार कर डाला था। बस क्या था? सीबीआई से अनुसंधन के वास्ते भाजपा एवं समता पार्टी ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। अंतत: उच्च न्यायालय ने चारा कांड की छानबीन कराने की जिम्मेदारी सीबीआई के हवाले कर डाली थी। इसके खिलापफ लालू यादव सुप्रीमकोर्ट पहुंच गए। वहां उन्हें लेनेे के देने पड़ गए थे। मुल्क की इस सबसे बड़ी कचहरी ने निर्णय दे दिया था कि सीबीआई तो चारा महाघोटाले की पड़ताल करेगी ही, उसकी यह तÝतीश पटना उच्च न्यायालय की देखरेख में चलेगी। लिहाजा, सीबीआई जांच इसी तरह शुरू हुई थी। तब हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन झा एवं न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की बेंच सीबीआई अनुसंधन की माWनिटरिंग करती थी। झारखंड बंटवारा के बाद अब रांची उच्च न्यायालय करती रही है।

लालू यादव यह आरोप लगाते रहे हैं कि सीबीआई ने उन्हें जानबुझ कर पफंसाया है। जनवरी 1996 में चारा महाघोटाला जब उजागर हुआ था तब केंदz में कांगzेस की हुकूमत थी और पीवी नरसिम्हाराव प्रधानमंत्राी थे। लेकिन मई 1996 के संसदीय चुनाव में कांगzेस को बहुमत हासिल नहीं हो सका था। लिहाजा पहले तेरह दिनों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी पीएम बने, पिफर एचडी देवगौड़ा को तीसरे मोर्चे ने प्रधनमंत्राी की कुर्सी पर बैठाया। इस थर्ड प्रफंड को कांगzेस ने बाहर से समर्थन दिया था। देवगौड़ा सरकार को लालू यादव ने भी अपने 17 सांसदों की बदौलत मजबूती प्रदान कर रखी थी। लालू उस घड़ी पशुपालन घपले मेंे पफंस चुके थे। वे चारा के चक्रव्यूह से निकलना चाहते थे। इसके लिए कांगzेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी से उन्होंने पीएमओ पर दबाव भी बनाया था पर देवगौड़ा ने उनकी एक न सुनी थी। नतीजतन, केसरी ने देवगौड़ा गवर्नमेंट गिरा डाली थी। एचडी देवगौड़ा के समय सरदार जोगिंदर सिंह सीबीआई ;केंदzीय अन्वेषण ब्यूरोद्ध के डायरेक्टर थे।

बहरहाल, देवगौड़ा के बाद इंदz कुमार गुजराल को प्रधनमंत्राी का तख्त मिला था। गुजराल ने लालू को खुश करने के उíेश्य से पहला काम यह किया था कि 30 जून, 1997 के दिन जोगिंदर सिंह की छुट~टी सीबीआई के निदेशक पद से कर दी थी। जोगिंदर सिंह की जगह ली थी आरसी शर्मा ने। दरअसल, मई 1997 में सूबे के राज्यपाल डाW. एआर किदवई ने लालू यादव के खिलापफ चार्जशीट दायर करने की अनुमति सीबीआई को दे दी थी, तो लालू बुरी तरह तिलमिला गए थे। उन्हें अपनी गिरÝतारी की आशंका सताने लगी थी। लालू के जेहन में यह घुस गया था कि सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह द्वारा उन्हें चार्जशीट करने की घोषणा के पीछे जनता दल की कर्नाटक लाWबी का हाथ था, जिसके सर्वेसर्वा थे एचडी देवगौड़ा और उनके शागिर्द सीएम इबzाहिम। भरोसेमंद सूत्राों के मुताबिक इसी उध्ेड़बुन में घिरे लालू ने इंदz कुमार गुजराल के पास शर्त रखी थी कि वे पफौरन जोगिंदर को सीबीआई निदेशक की पोस्ट से मुक्त करें क्योंकि वे देवगौड़ा के आदमी हैं। इस मुदे पर सरदार जी की बलि चढ़ गई थी। उध्र गुजराल के इशारे पर नए सीबीआई डायरेक्टर आरसी शर्मा ने बयान दे डाला था कि जबतक वे इस पद पर हैं वे वादा करते हैं कि किसी शीर्ष राजनेता की गिरÝतारी अपवाद स्वरूप ही होगी।

प्रधनमंत्राी गुजराल के माध्यम से सीबीआई के संग लालू की किचकिच यहीं नहीं थमी। लालू का यह दबाव था कि पशुपालन के जांच कार्य से सीबीआई के सख्त मिजाज अपर निदेशक डाW. उपेन विश्वास को भी हटाया जाए। किंतु अदालत के भय से डाW. विश्वास को छूने की हिम्मत गुजराल नहीं दिखा सके थे। इसकी पृष्ठभूमि यह थी कि शीर्ष कचहरी ने आदेश दे रखा था कि बगैर उनकी इजाजत के डाW. उपेन विश्वास को अनुसंधन से अलग नहीं किया जा सकता है। वैसे डाW. उपेन विश्वास को भी लालू यादव ने तरह-तरह से भयभीत किया था। अपने साम, दाम, दंड, भेद के तमाम नुस्खे लालू ने प्रयोग किए थे। तब पटना में हल्ला उड़ा था कि लालू यादव ने अपने एक खास कांगzेसी चमचे जो कि विधनसभा के अध्यक्ष भी रह चुके थे, उनके हाथों माWनिटरिंग बेंच के एक जज को करोड़ों रुपयों का थैला भी भिजवाया था। बात दीगर है कि उस एक्स स्पीकर को ईमानदार जस्टिस ने अपने घर से यह कहते हुए बाहर चले जाने का हुक्म दिया था कि अगर आपसे मेरी अंतरंगता नहीं होती, तो अभी पुलिस बुलाकर उसके हवाले आपको कर दिया होता। लालू ने डाW. विश्वास के बु¼िस्ट गुरु से भी उनके पास पैरवी करवाने की असपफल कोशिश की थी।

चारा महाघोटाले के मकड़जाल मंे पफंस चुके लालू यादव लगातार कोशिश करते रहे कि किसी प्रकार पावर पाWलिटिक्स के माध्यम से पीएमओ को पटाकर इस स्कैम के मुकदमों से मुक्ति पाई जाए, पिंड छुड़ाया जाए। यह जगजाहिर है कि आय से अधिक संपति के मामले मेंे लालू यादव को स्पेशल कोर्ट ने कैसे राहत प्रदान की थी। उसके न्यायाधीश ने अंतिम दिन लालू-राबड़ी के पक्ष में पफैसला सुनाया था। तब लालू यादव रेलवे मिनिस्टर थे। विशेष अदालत के निर्णय के खिलापफ सीबीआई पटना उच्च न्यायालय में अपील करना चाहती थी, किंतु इसकी इजाजत उसे नहीं मिल सकी थी। लिहाजा? प्रधनमंत्राी कार्यालय पर लालू के विरोध्यिों ने आरोपों की झड़ी लगा दी थी। इस जजमेंट के खिलापफ बिहार सरकार ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सूबे की इस सबसे बड़ी कचहरी ने स्टेट गवर्नमेंट की गुजारिश स्वीकार भी कर ली थी। इसी बीच लालू यादव उच्चतम न्यायालय पहुंच गए। सर्वोच्च अदालत ने आखिरकार लालू की बात मानते हुए अपनी राय प्रकट की कि सीबीआई ने ही चूंकि आय से अध्कि संपति के मुकदमे की जांच पूरी की है, इसलिए लोअर कोर्ट के पफैसले के खिलापफ उफपरी न्यायालय में अपील में जाने की हरी झंडी उसे नहीं दिखाई गई। मुनिलाल पासवान कालांतर में अपने जजमेंट के ही चक्रव्यूह में घिर गए। उनकी ‘रिटायरमेंट बेनिपिफट’ पर ही रोक लगा दी गई थी। आय से अध्कि संपति रखने के मामले को लेकर लालू-राबड़ी के सरकारी आवास ;तब राबड़ी देवी सीएम थीं और एक अणे मार्ग में रहती थींद्ध व अन्य ठिकानों पर जबरदस्त छापेमारी भी हुई थी। बताया जाता है कि तब लालू ने पफोडर स्कैम के सबसे प्रमुख गवाह दिनेश चांडक को अपने इनकम टैक्स कमिश्नर समध्ी राव रणविजय सिंह के मापर्फत प्रताड़ित करवाने का कम खेल नहीं खेला था। इस एपिसोड में सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस एस.एन. वटियावा तथा जस्टिस ए.के. माथुर की पीठ ने सीबीआई तथा आयकर विभाग के तत्कालीन साWलिसीटर जनरल के विरू¼ कड़ा ‘सट्रिक्चर’ पास किया था। न्यायमूर्ति वरियावा एवं न्यायमूर्ति माथुर ने भरी अदालत में टिप्पणी की थी-‘केंदz सरकार एक ताकतवर राजनेता को बचाने के लिए अपना स्टैंड बदल चुकी है…।’ यही नहीं, बल्कि पशुपालन महाघोटाले के उस वक्त के सीबीआई के सख्त मिजाज एडिशनल डायरेक्टर डाW. उपेन विश्वास जो कि इन तमाम केसों के विवेचना अध्किारी भी थे, उन्हें भी लालू एंड कंपनी ने पहले तो खरीदना चाहा, पिफर उन्हें तरह-तरह से भयभत भी किया। वैसे लालू का साथ तब सीबीआई के कई सीनियर आWपिफसर भी खुलेआम दे रहे थे। उन हाकिमों को बीच जांच से ही अदालत के पफरमान पर हटाया गया था। डीआईजी रणजीत सिन्हा उनमें से एक थे। रणजीत सिन्हा अभी सीबीआई के निदेशक हैं। लालू के प्रति नरमी दिखाने के चलते ही सीबीआई के तब के निदेशक सरदार जोगेंदz सिंह को पटना हाईकोर्ट से मापफी मांगनी पड़ी थी। उस घड़ी यह भी उजागर हुआ था कि कांगzेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी के दबाव के कारण न चाहते हुए भी देवगौड़ा ने सीबीआई को लालू के विरू¼ कठोर रुख न अपनाने की सलाह दी थी। हालांकि केंदz में बैठी कांगzेस पर यह आरोप लगता रहा है कि वह सीबीआई का उपयोग अपने दुश्मन को साध्ने के लिए भी करती है। हाल के कई मामलों में ऐसी बातें प्रकाश में आयी भी है। जब कोई किसी भी कारण से सीबीआई के चंगुल में आ जाता है तब कांगzेस उस व्यक्ति की समस्या सीबीआई के द्वारा बढ़ा-घटाकर उसे अपने चरणों में पड़े रहने पर मजबूर कर देती है। पिछले कई वर्षों से लालू यादव भी केंदz की कांगzेस को समर्थन देते रहे हैं। इनके द्वारा दिए जा रहे समर्थन को भी लोग इसी परिपेक्ष्य देखते रहे हैं। आज जब लालू यादव पर सीबीआई का पफंदा सख्त हुआ। राजनीति के जानकार इसका अर्थ यह लगा रहे हैं कि अब लालू यादव से ज्यादा कांगzेस के लिए नीतीश कुमार उपयोगी हो गए हैं। लिहाजा, अब लालू का पफंदा सख्त कर दिया गया है।

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