October 21, 2017

और अब… रामभक्तों का मुस्लिम दांव

By wmadmin123 - Fri Aug 21, 7:28 am

श्यामाकांत झा

बिहार की सियासत में शुरु से ही मुसलमान मजबूत दखल रखता आया है। या यूं कहंे कि हमेशा से निर्णायक भूमिका में रहा है। माना यह जाता है कि किसी को सत्ता की कुर्सी पर बिठाने या पिफर सत्ता से बेदखल करने में मुसलमान एक वोट बैंक की तरह काम करता है। खासकर बिहार में यह एक बड़ा पफैक्टर है। इस समुदाय के करीब 16 प्रतिशत वोटर हैं। यही कारण है कि हर राजनीतिक दल इस समुदाय के कृपापात्रा बनना चाहते हैं। हालांकि, भाजपा को इस वर्ग के मतदाताओं से कोई खास उम्मीद नहीं होती पिफर भी इनकी सियासी गतिविध्यिों पर पार्टी की नजर होती है। दरअसल, बीजेपी भी मानती रही है कि मुसलमानों का एक मुश्त वोट उनके खिलापफ पड़ना पार्टी के लिए शुभ नहीं है। इसीलिए मुस्लिम वोटरों को लुभाने और उसमें सेंध् लगाने की कवायद रामभक्तों अर्थात बीजेपी ने भी शुरू कर दी है। बीते 23 जुलाई 2015 को जदयू के पूर्व सांसद साबिर अली को बिहार भाजपा प्रभारी भूपेंद्र यादव की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता दिलायी गई। साबिर अली अल्पसंख्यक चेहरा हैं लिहाजा, बीजेपी ने इनके जरिए सूबे में सेक्युलरिज्म की सियासत करने वाले दलों को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि बिहार में वे लालू-नीतीश के गठजोड़ के खिलापफ मुस्लिमों के बीच में भाजपा की ओर से जवाब होंगे। साबिर अली कहते हैं-‘नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम करने आए हैं और मुस्लिमों के बीच उनके दूत के रूप में काम करेंगे।’ हालांकि, साबिर अली से पहले बीजेपी नीतीश सरकार के पूर्व मंत्राी जमशेद असरपफ, पूर्व मंत्राी मोनाजिर हसन को भी पार्टी में शामिल कर चुकी है। शाहनवाज हुसैन तो बीजेपी के शुरू से ही राष्ट्रीय स्तर के चेहरा हैं। अभी बीजेपी के पास एक मुस्लिम विधयक के रूप में सबा जपफर भी है। सबा जपफर अमौर विधनसभा क्षेत्रा से आते हैं। 2010 के विधनसभा चुनाव में बीजेपी ने मुस्लिम समुदाय से सिपर्फ सबा जपफर को ही टिकट दिया था।
जहां तक केंद्र की बात है वहां भी मंत्राी नजमा हेबतुल्ला, मंत्राी मुख्तार अब्बास नकवी, हाल ही में झारखंड से राज्यसभा सदस्य बने वरिष्ठ पत्राकार एमजे अकबर जैसे चेहरे के बूते बीजेपी मुस्लिम राजनीति को प्रभावित करने के लिए आगे बढ़ रही है। इसी रणनीति के तहत बीते 4 जुलाई 2015 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े एक मुस्लिम संगठन ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ के द्वारा एक इफ्रतार पार्टी का आयोजन किया गया था। यह इफ्रतार पार्टी संसद एनेक्सी में आयोजित थी। इसमें भारत स्थित सभी मुस्लिम देशों के राजदूतों को आमंत्रित किया गया था। गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने पहली बार यह इफ्रतार पार्टी रखी थी। गौरतलब है कि तत्कालीन सरसंघ चालक के. सुदर्शन और वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार की पहल पर मुस्लिम समाज से जुड़ने के प्रयास के तहत वर्ष 2002 में ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ का गठन किया गया था। यह अलग बात है कि इफ्रतार पार्टी में मौजूद आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने दावा किया कि यह कार्यक्रम किसी राजनीतिक हिसाब-किताब के तहत नहीं बल्कि सामाजिक संभावनाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया। बताते चलें कि आरएसएस का यह संगठन देश के 22 प्रांतों और करीब 300 जिलों में काम कर रहा है।
दरअसल, भाजपा और नरेंद्र मोदी अपने उफपर लगे मुस्लिम विरोध्ी दाग को धेने के लिए न केवल बेचैन हैं बल्कि इस समुदाय में पैठ बनाने के लिए भी प्रयासरत हैं। यह प्रयास उसी दिन से तेज कर दिया गया जिस दिन नरेंद्र मोदी को प्रधनमंत्राी का उम्मीदवार घोषित किया गया था। उसी दिन से श्री मोदी अपनी हर रैलियों में इस बात को अवश्य दुहराते हैं-‘सबका साथ, सबका विकास।’ इस नारे को जमकर प्रचारित-प्रसारित भी किया जा रहा है। मुसलमानों के बीच अपनी छवि चमकाने के लिए श्री मोदी ने पिछले साल सलमान के साथ पतंग भी उड़ाई, हज सब्सिडी का मुद्दा उठाया और गुजरात की राजधनी में मुस्लिम उद्योगपतियों का सम्मेलन आयोजित करवाया। उस आयोजन का नाम था-‘बिजनेस विद हारमनी’।
बिहार में विधनसभा चुनाव है। लिहाजा, बीजेपी भी मुस्लिम कार्ड खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। शाहनवाज हुसैन का नाम बीच-बीच में मुख्यमंत्राी पद के उम्मीदवार के रूप में उछाल कर मुसलमानों का ध्यान बीजेपी अपनी ओर खींचने में लगी है। मंत्राी और बीजेपी के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह डंके की चोट पर कई बार कह चुके हैं कि-‘मेरी इच्छा है कि शाहनवाज बिहार की बागडोर संभाले। मेरा वश चले तो आज ही मैं शाहनवाज को बिहार का मुख्यमंत्राी बना दूं।’ दरअसल, शाहनवाज की चर्चा खासतौर से उसी दिन से शुरू हो गई थी जब वर्ष 2013 में नीतीश ने एनडीए गठबंध्न से खुद को अलग कर लिया था। इसमें दो राय नहीं कि अबतक मुस्लिम समुदाय का वोट मुख्यरूप से लालू-नीतीश और कांग्रेस को ही मिलता रहा है। नब्बे के दशक में बिहार में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोक कर लालू ने पहली बार मुसलमानों के मानस को अंदर तक प्रभावित किया था। लालू के इस सियासी करतब पर मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस से खिसक कर राजद की झोली में आ गया था। 1989 जबरन अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास हुआ और भागलपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए। उसके बाद मुस्लिम वोटों के दावेदारों की, इसकी मार्केटिंग करने वालों की संख्या में बड़ी तेजी से इजापफा हुआ। 1989 से पहले अल्पसंख्यक मतों की मार्केटिंग सिपर्फ कांग्रेस ही किया करती थी। नब्बे के दशक में लालू यादव ने इसकी मार्केटिंग की। माय समीकरण ;मुस्लिम-यादवद्ध बनाकर पन्द्रह वर्षों तक बिहार की सत्ता में काबिज रहे तथा सूबे को हांकते रहे। वर्ष 1980 में इंदिरा गांध्ी ने मुस्लिम तुष्टीकरण के कई कदम उठाए थे। कई मुस्लिम नेताओं को महत्व दिया और उनसे कांग्रेस के पक्ष में अपील करवाई। जामा मस्जिद के शाही इमाम सहित खुद को मुस्लिम वोटों के ठेकेदार समझे जाने वाले को सियासत में पूछ बढ़ गई। वोटों के इन ठेकेदारों को यह पता है कि जबतक यह समुदाय असुरक्षित महसूस करेगा तबतक ही यह वोट बैंक है। जिस दिन यह खुद को सुरक्षित महसूस करने लगेगा, यह वोट बैंक नहीं रहेगा। और पिफर कोई पार्टी अपने मतलब के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर पाएगी। लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा हो नही पा रहा है। मुस्लिम वोटों के ठेकेदार इस कौम को डरा-डराकर अपने पक्ष में इस्तेमाल करते रहे हैं।
प्रधनमंत्राी नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर भाजपा से अलग होकर नीतीश ने मुसलमानों को बहुत हद तक बेशक प्रभावित किया। लेकिन बीते लोकसभा चुनाव परिणाम ने उन्हें भी हतोत्साहित किया है। अभी एनडीए में शामिल लोजपा के पास भी एक मुस्लिम सांसद हैं, खगडि़या से महबूब अली कैसर। बीते लोकसभा चुनाव में मुसलमानों ने लोजपा प्रत्याशी श्री कैसर को वोट दिया था। वर्ष 2005 में लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्राी बनाने के नाम पर 29 सीटें जीतकर सूबे की सियासत को एक नयी दिशा दे दी थी। देखना दिलचस्प होगा कि आगामी विधनसभा चुनाव में लोजपा को मुस्लिम का कितना सपोर्ट मिलता है। कहना न होगा, बिहार में 58 सीटें ऐसी है जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 18 से 74 प्रतिशत है। 50 सीटों पर 10 से 17 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं। यह सच है कि मुस्लिम का एक मुश्त वोट इस बार भी लालू-नीतीश और कांग्रेस के महागठबंध्न को ही मिलने की उम्मीद है, लेकिन मुस्लिम उम्मीदवारों के जरिए एनडीए जितना वोट काट सकेगा वह बोनस ही होगा। बताते चलें कि बीते लोकसभा चुनाव में 2 प्रतिशत मुसलमानों ने एनडीए को वोट दिया था।
इध्र, एकबार पिफर बीजेपी ने मुसलमानों के बीच अपनी पैठ बिठाने के लिए जदयू के अल्पसंख्यक चेहरा साबिर अली को नया अल्पसंख्यक चेहरा बनाया है। पिछले साल राज्यसभा का टर्म पूरा होने के बाद नीतीश ने साबिर अली को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा था। शिवहर सीट से उनकी उम्मीदवारी का ऐलान भी हो गया। लेकिन हार की आशंका के कारण वे चुनाव लड़ने नहीं गए। समय की नब्ज पकड़ने में माहिर साबिर ने तब मोदी की तारीपफ करनी शुरू कर दी। लिहाजा, जदयू ने इन्हें पार्टी से निकाल-बाहर किया। पिफर साबिर अली भाजपा के पूर्व प्रभारी ध्र्मेंद्र प्रधन के जरिए भाजपा की सदस्यता भी ग्रहण कर ली। लेकिन उनके पार्टी में आते ही बीजेपी में बवाल खड़ा हो गया। केंद्रीय मंत्राी मुख्तार अब्बास नकवी के विरोध् के बाद तत्काल में पार्टी से बाहर होना पड़ा था। उस प्रकरण में साबिर अली की पत्नी दिल्ली में ध्रने पर बैठी थी और मुख्तार अब्बास नकवी पर केस भी दर्ज कराया गया था। पिफर नकवी लिखित में उनसे मापफी मांगी तो साबिर ने केस वापस ले लिया। हालांकि अब यह बात बहुत पीछे चली गई है। वर्तमान में साबिर अली और मुख्तार अब्बास नकवी के बीच अच्छे संबंध् हैं। साबिर अली ने 2005 में तत्कालीन आदापुर विधनसभा क्षेत्रा जो वर्तमान में नरकटिया विधनसभा क्षेत्रा के रूप में परिणत हो गया है, से अपना भाग्य आजमाया था लेकिन उन्हें सपफलता नहीं मिली। पिफर 2010 के विधनसभा चुनाव में नरकटिया विधनसभा क्षेत्रा से पत्नी यास्मीन को बतौर लोजपा उम्मीदवार मैदान में उतारा लेकिन जदयू के श्याम बिहारी के हाथों यास्मीन पराजित हो गई। आगामी विधनसभा चुनाव में यास्मीन पिफर उम्मीदवार होगी या नहीं यह बात अभी सापफ नहीं है, लेकिन साबिर अली उम्मीदवार होंगे उनके नजदीकी यह दावा जरूर कर रहे हैं। हालांकि, बीजेपी में साबिर की अहमियत क्या होगी? क्या बीजेपी की सियासत में साबिर पिफट हो पाएंगे? इस सवाल का जवाब अभी मिलना शेष है। यह जवाब आनेवाला समय ही देगा।त्र

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