September 19, 2018

खगडि़या जदयू विधायक बगावत प्रकरण पूनम यादव पर होगी कार्रवाई ?

By wmadmin123 - Fri Jul 25, 1:05 pm

भले ही राज्यसभा उपचुनाव में क्रास वोटिंग करने वाले जदयू के अठारह विधयकों में से चार विधयक ;ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू, नीरज कुमार बबलू, रविन्द्र राय और राहुल शर्माद्ध को कार्रवाई के दायरे में रखा गया हो, नेतृत्व की ओर से इन सब पर कार्रवाई की अनुशंसा भी कर दी गई हो। लेकिन बाकी के 14 विधयकों पर कार्रवाई होगी ऐसा नहीं लगता। हालांकि, पार्टी नेतृत्व के इस दोहरे कदम पर सवाल उठाए जाने लगे हैं।
आम चुनाव में बागी बनी खगडि़या की जदयू विधयक पूनम देवी यादव बाहुबली पूर्व विधयक रणवीर यादव की पत्नी हैं। रणवीर यादव की दूसरी पत्नी व जदयू विधयक की बहन कृष्णा कुमारी यादव खगडि़या जिला परिषद की अध्यक्ष और जिला जदयू के उपाध्यक्ष भी है।ं आम चुनाव में रणवीर यादव ने कृष्णा कुमारी यादव के लिए राजद से टिकट का जुगाड़ कर उन्हें मैदान में उतार दिया था। जदयू विधयक पूनम देवी यादव भी अपनी बहन राजद उम्मीदवार के पक्ष में पार्टी से बगावत कर खुलकर सामने आ गई। इतना ही नहीं, उन्होंने उस वक्त जदयू नेतृत्व को अपने उफपर कार्रवाई करने की खुली चुनौती भी दी थी। लेकिन पार्टी नेतृत्व उनके खिलापफ निलंबन की कार्रवाई से आगे कुछ ना कर सकी। बहरहाल, अब पूनम देवी यादव अपने आप को जदयू से अलग नहीं मानती। मुख्यमंत्राी जीतनराम मांझी के नेतृत्व में बनी जदयू की नई सरकार के विश्वास मत के दौरान भी वह विधनसभा में मौजूद रहीं और राज्यसभा उपचुनाव में भी जदयू प्रत्याशी के पक्ष में अपना मत दिया। बदले राजनीतिक परिस्थिति में अब उनके खिलापफ कोई कार्रवाई होगी इसकी संभावना बहुत कम दिखती है। पर एक तरपफ स्थानीय जदयू का एक गुट अब भी बागी जदयू विधयक पर कार्रवाई की आस लगाए बैठा है तो दूसरी तरपफ जदयू के जिला स्तरीय नेता मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं। जदयू के स्थानीय नेताओं द्वारा इस प्रकरण पर अपना मुंह नहीं खोलना सापफ दर्शाता है कि पार्टी हाईकमान उन्हें इस मामले में कुछ हिदायत दे रखी है।
विगत 24 सालों से खगडि़या की राजनीति में रणवीर यादव की दबंगता सदैव चर्चा में रही है। इस दरम्यान वे मौसम के मिजाज को भांपते हुये राजद, लोजपा व जदयू का दामन थामते व छोड़ते रहे हैं। 1998 में रणवीर ने लालू यादव को खगडि़या के माडर गांव में एक विवाद के कारण मंच छोड़ने को मजबूर कर दिया तो 2012 में अध्किार यात्रा के दौरान नीतीश कुमार को खगडि़या में उग्र लोगों के बीच से अपनी विधयक पत्नी के सरकारी अंगरक्षक का कार्रबाईन लहराकर मंच तक पहुंचा दिया था। 1995 के चुनाव के बाद वे खुद तो चुनाव नहीं लड़ पाये लेकिन अपनी दोनों पत्नियों के माध्यम से वे हर चुनाव में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। 2014 के आम चुनाव में भले ही उनकी दूसरी पत्नी कृष्णा कुमारी यादव दूसरे नंबर पर रही हो लेकिन यदि यहां से एकमात्रा मुस्लिम उम्मीदवार राजग के चैध्री महबूब अली कैसर अपने समुदाय के वोट बैंक में सेंध्मारी नहीं करते तो परिणाम कुछ अलग हो सकता था। चुनाव पूर्व से ही जदयू के पूर्व सांसद दिनेशचंद्र यादव व सदर विधयक पूनम देवी यादव दोनों जदयू में रहते हुए भी दो खेमें में बंटे हुये थे। आम चुनाव में सदर विधयक अपनी बहन राजद उम्मीदवार को जीत तो नहीं दिलवा पाई लेकिन जदयू उम्मीदवार की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्षेत्रा से कटे रहने और जदयू की आंतरिक गुटबाजी दिनेशचंद्र यादव के हार का कारण बना। हालांकि, जदयू उम्मीदवार दिनेश चंद्र यादव ने इस मामले में लोक प्रसंग को सिपर्फ इतना बताया कि-‘हार तो बस हार है, किसी एक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।’ जदयू की स्थानीय गुटबाजी व बागियों पर कोई प्रतिक्रिया देने से वे सापफ इंकार कर गये। खगडि़या लोकसभा के छः विधनसभा सीटों में से पांच पर जदयू का कब्जा है। लेकिन आम चुनाव में जदयू उम्मीदवार सिपर्फ अलौली विधनसथा में ही अपनी बढ़त बना पाये। सबसे आश्चर्यजनक पहलू परवत्ता विधनसभा क्षेत्रा में दिखाई पड़ी। जहां से 2010 के विधनसभा चुनाव में राजद के सम्राट चैध्री ने जदयू उम्मीदवार आरएन सिंह को मात्रा 808 मतों के मामूली अंतर से हराया था। आम चुनाव के ऐन वक्त पर सम्राट चैध्री के पाला बदलकर जदयू में चले आने से खगडि़या सहित प्रदेश की राजनीति में भूचाल खड़ा हो गया था। लेकिन आम चुनाव में सम्राट चैध्री और आरएन सिंह के संयुक्त प्रयास के बाद भी परबत्ता विधनसभा क्षेत्रा में जदयू उम्मीदवार को सिपर्फ 21,453 मत प्राप्त होना कापफी कुछ बयां कर जाता है। इस क्षेत्रा में लोजपा गठबंध्न को 73,983 तथा राजद गठबंध्न को 47,674 मत प्राप्त हुये। बहरहाल, सम्राट चैध्री को मांझी मंत्रिमंडल में जगह मिल गई है और वे नगर विकास मंत्राी बनाये गये हैं। आरएन सिंह भी राज्यपाल के मनोनयन कोटा से विधन परिषद का सदस्य बनते-बनते रह गये। खगडि़या जिला जदयू के उपाध्यक्ष बबलू मंडल स्वीकार करते हैं कि आंतरिक गुटबाजी के कारण गठबंध्न कुछ कमजोर हुआ है। विभिन्न प्रकोष्ठों का गठन ध्रातल पर होने के बजाय कागजों पर ही सिमट कर रह गया है। लेकिन बागी प्रकरण पर ये भी कुछ बोलने से इंकार कर गये। अब ये देखना दीगर होगा कि स्थानीय नेताओं की ये खामोशी पार्टी को अनुशासित करती है या तूपफान के पूर्व की शांति है। त्र

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