December 12, 2017

खुद को दर्शको से नहीं जोड़ पा रहे टीवी के नए भगवान

Photo GalleryBy wmadmin123 - Thu Oct 24, 7:31 am

महाभारत में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि पार्थ जब-जब ध्रती पर ध्र्म का नाश होगा तब-तब अवतरित होकर मैं अध्र्म का नाश करूंगा और ध्र्म की स्थापना करूंगा। इस कलिकाल में हरेक जगह भzष्टाचार रूपी अध्र्म की पैठ बनी हुई है और भगवान नदारद हैं। पर भगवान कृष्ण की इस पंक्ति को सबसे अध्कि आत्मसात किसी ने किया है तो टीवी इंडस्ट्री ने। जब-जब टीवी इंडस्ट्री कन्टेंट के स्तर पर किंकर्तव्यविमूढ़ होता है तो भगवान के शरण में जाना बेहतर समझता है। जनमानस में रची-बसी हुई गाथा जब परदे पर अवतरित होती है तो दर्शकों का भरपुर प्यार मिलता है। रामायण और महाभारत के पात्राों को दर्शकों ने इतना प्यार दिया कि वे संसद तक पहुंच गये। वर्तमान से तुलना करंे तो सिपर्फ महादेव में महादेव बने मोहित रैना। ही जनमानस में लोकप्रिय हैं। आखिर धर्मिक सीरियलों, ऐतिहासिक सीरियलों में गzापिफक्स की भव्यता के बावजूद दर्शकों में अपने प्रति वो ललक क्यों नहीं पैदा कर पाती है जो रामानंद सागर के रामायण, चोपड़ा का महाभारत या वर्तमान में प्रसारित महादेव की है।

इस मुíे पर बात करने से पहले बात करते हैं उन बिंदुओं पर जिससे पौराणिक सीरियलों का पुन: निर्माण शुरू हुआ। 2006 तक सिपर्फ डीडीवन ही धर्मिक सीरियलों का खेवनहार था। सेटेलाईट चैनलों पर पारिवारिक सीरियलों का क्रेज गाहे-बगाहे किसी चैनल पर पुराने रामायण व महाभारत का प्रसारण पंजाबी-गुजराती पृष्ठभूमि में रचे-बसे धरावाहिकों से जब दर्शक उब रहे थे तो जीटीवी ने एक अनोखा प्रयोग किया। समाज में नकारात्मक किरदार के रूप में ख्याति प्राप्त रावण पर धरावाहिक का प्रसारण किया। लोगों की जिज्ञासा बढ़ी और शुरूआत में वीकली शो होने के बाद भी रावण चर्चित हुआ। जब रावण का आकर्षण खत्म होने लगा तब तक कलर्स चैनल ‘कृष्णा’ और इमेजिन ‘रामायण’ लेकर आ चुके थे। दोनों धरावाहिकों को सपफलता मिल रही थी। एक तरह से चैनल पौराणिक धरावाहिक के निर्माण में दिलचस्पी लेने लगा था। इसी बीच पारिवारिक डेली सोप में भी एक नई क्रांति हुई। क्रांति इस मायने में कि इससे पूर्व सीरियल में नौकर का भी गोरा होना अहम था। पर एक सांवली रंग की लड़की को मुख्य भूमिका में लाकर जीटीवी ‘अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो’ सीरियल लेकर आया। एक नई पृष्इभूमि में रचे-बसे सीरियल की आधर सपफलता से सारे चैनलों का कैमरा बिहार यूपी की ओर घूमा। कहीं ‘प्रतिज्ञा’ तो कहीं ‘प्रथा’ तो कहीं ‘बिट~टो’ तो कहीं ‘मितवा।’ पिफर आया विवाहित मर्द की प्रेम कथा जो कि अभी तक जारी है।

इन तमाम परिस्थितियों में ऐतिहासिक सीरियलों का प्रसारण कहीं न कहीं होता रहता है। पर जब-जब चैनल भगवान के शरण में पहुंचते हैं भगवान तारणहार जरूर बनते हैं। लाईपफ ओके ने लांचिंग के वक्त ही महादेव का प्रसारण चालू किया। तकनीकी भव्यता और अभिनेताओं के कुशल अभिनय ने जनमानस के मानस पटल पर ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि पिफर से पौराणिक सीरियलों की बाढ़ सी आ गयी है। जीटीवी पर रामायण, बु¼ा, लाईपफ ओके पर महादेव, सावित्राी, बाल गणेश। स्टार प्लस पर महाभारत। शीघz परशुराम पर भी धरावाहिक आनेवाला है।


सीरियल हो या सिनेमा, कई सारे दृश्यों में तकनीक का सहारा लेना मजबूरी है। लेकिन मूल चीज है स्टोरी टेलिंग।
रश्मि झा, स्टोरी राईटर

अतीत और वर्तमान में तुलना करें तो एक सवाल उठता है कि आज के ये धर्मिक सीरियल के पात्रा पहले के धर्मिक सीरियल के कलाकारों मसलन, अरुण गोविल और नीतीश भारद्वाज की तरह क्यों नहीं लोकप्रिय हो रहे हैं? तर्क ये भी दिया जा सकता है कि अतीत में सब कुछ पहली बार हुआ तो पिफर ‘महादेव’ के महादेव मोहित रैना क्यों लोकप्रिय हंै? सीध सा जवाब है कि तकनीक की भव्यता मंे अभिनेताओं के कमजोर अभिनय को छुपाने की कोशिश। सारे पौराणिक सीरियलों में तकनीकी भव्यता एक आकर्षण तो पैदा करती है पर यही तकनीक जब हावी होने लगता है तो दर्शक चैनल चेंज करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। संदर्भ में ‘महादेव’ और ‘सावित्राी’ को देखें। तकनीक और अभिनेताओं के कुशल अभिनय के संगम से महादेव को अपार लोकप्रियता हासिल हुई। वहीं ‘सावित्राी’ में तकनीकी कुशलता इस कदर हावी हुई कि खबर है कि यह सीरियल बंद होने वाला है। बुरा हश्र तब होता है जब मिथक को ही बदलने की कोशिश की जाती है। बालाजी ने महाभारत से यही कोशिश की। जनमानस में रची-बसी गाथा को बदलेंगे तो जनता कैसे स्वीकार कर सकती है। धर्मिक सीरियलों के लेखक उमेशचंदz उपाध्याय कहते हैं-‘मिथक को आगे बढ़ाने में तकनीक सहायक हो सकता है पर माध्यम नहीं। मिथक को ही बदलेंगे तो जनता आत्मसात नहीं कर सकती है।’

ये बात सही है कि ग्लोबलाईजेशन के कारण आज के युवा तमाम नयी चीजों से परिचित हैं। विदेशी सिनेमा की तकनीक से ये खुश होते हैं और प्रभावित भी होते हैं। चैनल भी धर्मिक सीरियलों में नई तकनीक के बहाने आज के युवाआंे की नब्ज पकड़ना चाहता है। जीटीवी में बतौर क्रिएटिव हेड काम कर चुकी रश्मि झा कहती हैं-‘कई सारे दृश्यों में प्रोडक्शन वैल्यू दिखाने के लिए तकनीक का सहारा लेना मजबूरी है। अब निर्भर करता है उस प्रोडक्शन हाउफस पर कि वो तकनीक का बेहतर इस्तेमाल कैसे करते हैं? लेकिन मूल चीज है कथानक।’ रामायण, कृष्णा, रावण लिख चुके विजय पंडित कहते हैं-‘यु¼ जैसे दृश्यों में भव्यता लाने के लिए तकनीकी चीजें जरूरी हैं। पर मुख्य दारोमदार कहानी और अभिनेताओं के कुशल अभिनय पर होता है। पर अपफसोस कि शारीरिक सौष्ठव के आड़ में अभिनेताओं के कुशल अभिनय और इमोशन कहीं खो चुका है।’ वैसे भी जब इंडस्ट्री में ये कहा जाए कि अभिनय तो हम करवा लंेगे तो क्या कहा जा सकता है। ताजा उदाहरण स्टार प्लस के महाभारत को देखें। गzापिफक्स का कमाल और अभिनेताओं का शारीरिक सौष्ठव देखते ही बनता है पर संवाद जब बोलते हैं तो इमोशन कहीं दिखता नहीं। सूत्राों के मुताबिक पिछले चार सालों से इस महाभारत के लिए अभिनेताओं का चुनाव हो रहा था। मुंबई में कमोबेस तमाम अभिनेताओं ने आWडिशन दिया। दिल्ली और कोलकाता में भी खोजा गया। पर सीरियल देखते वक्त निराशा ही हाथ लगती है।


मिथक को आगे बढ़ाने में तकनीक सहायक हो सकता है पर मिथक को बदलेंगे तो जनता स्वीकार नहीं करेगी।
उमेशचंदz उपाध्याय
लेखक

सोशल ड्रामा में सब सही क्योंकि वो वर्तमान को अपने आप से जोड़ता है, एक अनकही कहानी होती है। लेकिन पौराणिक कहानियां जनता को स्मरण है। पफेसबुक पर एक पत्राकार ने दुर्योध्न ;नये महाभारतद्ध की तस्वीर को देखकर लिखा कि जनेउफ तो है ही नहीं तो क्या उस समय क्षत्रिायों में जनेउफ पहनने की परंपरा नहीं थी क्या?


पौराणिक धरावाहिकों में तकनीक से भव्यता मिलती है। पर मुख्य है कहानी और अभिनेताओं का अभिनय
विजय पंडित

आप ध्नुष को चेंज कर सकते हैं, गदा को चेंज कर सकते हैं पर जो चीजें जरूरी हैं और दर्शकों को याद है उससे छेड़खानी कैसे किया जा सकता है। क्योंकि भारतीय जनमानस अपने मिथक को बदले रूप में देखने के लिए तैयार नहीं है। दुर्भाग्य है कि शारीरिक सौष्ठव यानी सिक्स पैक के आड़ में सक्षम अभिनेताओं का चुनाव नहीं किया जाता। कई सारे सीरियल्स में बतौर क्रिएटिव हेड और क्रिएटिव डायरेक्टर के तौर पर काम कर चुके ध्नंजय सिंह ‘मासूम’ नये महाभारत ;स्टार प्लसद्ध के संदर्भ में कहते हैं कि ‘कई सारे ऐसे कलाकार हैं जो अपने पात्रा में पिफट नहीं हैं पर दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता है। जाहिर है मार्केटिंग के कारण उनकी लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश की गई है।’ ऐसा तो नहीं है कि सिक्स पैक वाले अभिनेता हैं ही नहीं। सभी चीजों का मिला जुला संगम होने पर ही कोई धरावाहिक लोकप्रिय होता है। यदि गzापिफक्स और सिपर्फ सिक्स पैक से काम चलता तो बालाजी का महाभारत बालाजी के सोशल ड्रामा की तरह ही सपफल होता। इंडस्ट्री में तो लोग ये भी कहते हैं कि महाभारत के कारण ही नाईन एक्स चैनल डूबा।

कहावत है न ‘हाथ कंगन को आरसी क्या- पढ़े लिखे को पफारसी क्या?’ अच्छा बनेगा सीरियल तो खुद लोकप्रियता के साथ-साथ मुनापफे की चाशनी मिलेगी। समय के साथ अवश्य बदले पर मुख्य तत्व को न भुलें। और उसमें अहम है अभिनेताओं का अभिनय और कथानक।

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