September 19, 2018

गयाः समान काम-समान वेतन की मांग के सवाल पर सरकार-शिक्षक आमने-सामने

By wmadmin123 - Wed Jul 22, 1:28 pm

वनोद प्रसाद ‘विरोध्ी’

इन दिनों संविदा पर बहाल नियोजित शिक्षकों का आंदोलन चरम पर है। ‘समान काम, समान वेतन’ की मांग को लेकर नीतीश सरकार और शिक्षक संगठन आमने-सामने हैं। ज्ञान की भूमि बु( नगरी से उपजा यह आंदोलन आज सूबे में आग की चिंगारी की तरह पफैल गयी है। यह आंदोलन अब नीतीश सरकार के लिए चुनौती बन गई है। दरअसल यह आक्रोश तब पनपा जब बीते 14 मार्च 2015 को राजद-जदयू के लोग केंद्र सरकार की नीतियों के खिलापफ गया स्थित जिला मुख्यालयों पर राज्यव्यापी उपवास कार्यक्रम चल रहा था। ठीक इसी के सामने बीच सड़क पर नियोजित शिक्षकों ने अपनी मांगों के समर्थन में मुख्यमंत्राी का पुतला दहन शुरू कर दिया और सरकार के खिलापफ नारेबाजी करने लगा। इससे उपवास पर बैठे राजद-जदयू कार्यकर्ता भड़क उठे और काबू से बाहर होते हुए आंदोलन कर रहे शिक्षकों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दी। जवाब में नियोजित शिक्षकों ने भी ईंट-पत्थर से वार शुरू कर दिया। स्थानीय प्रशासन की पहलकदमी से मामला को शांत किया गया लेकिन शिक्षकों का गुस्सा कम नहीं हुआ। इनका आंदोलन उग्र हो गया जिसका नतीजा है कि यह आग समूचे सूबे में पफैलता चला गया। यह घटना तब हुई जब सूबे की सत्ता के लिए जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार में रस्साकशी जारी था।
एक तरपफ नौ महीने रहे मुख्यमंत्राी की कुर्सी बचाने के लिए जीतनराम मांझी भाजपा के इशारे पर सत्ता में बने रहने का ऐलान कर रहे थे तो दूसरी तरपफ नीतीश कुुमार को अपनी सत्ता जाने का भय सता रहा था। ऐसे में नियोजित शिक्षकों को अहसास हो चला था कि मगध् की राजनीति में सक्रिय जीतनराम मांझी उनलोगों के लिए कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। हालांकि जीतनराम मांझी ने अपने शासन के अंतिम दिनों में शिक्षकों के हित में कुछ ऐसे शगूपफे छोड़ गये जो नियोजित शिक्षकों के हित में कहे जा सकते हैं। किंतु नीतीश के सत्ता संभालते ही इनके पफैसले को निरस्त कर दिया गया जिससे नियोजित शिक्षकों का पारा और भी चढ़ गया। आज स्थिति यह है कि शिक्षा से जुड़े हर कार्यों को बाध्ति करने में ये जुटे हैं। चाहे वह विद्यालयों में शिक्षण का मामला हो अथवा मैट्रिक के उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन का। नियोजित शिक्षक सारे कामों का बहिष्कार करने पर उतारू हैं। सरकार की ध्मकी भी उन पर बेअसर साबित हो रही है।
क्यों आंदोलित हैं नियोजित शिक्षक?
साल 2001 के पूर्व लालू राज में तेल पिलावन लाठी घुमावन का नारा खूब उछाला गया। बेरोजगार युवा व पढ़े-लिखे लोगों में इसका प्रभाव गलत पड़ा। ठीक इस नारे के विपरीत नीतीश कुमार ने सूबे के युवाओं को लाठी के बजाय कलम उठाने की सलाह दे डाली। जिसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। आम लोगों में एक आशा की नयी किरण जगी। सूबे के खासकर शिक्षित युवाओं ने अपार समर्थन देकर लालू के कथित आतंकराज से निजात दिलायी और नीतीश कुमार को सत्ता की चाभी सौंपी थी। तत्पश्चात सुशासन के मुखिया नीतीश ने 2003 से लेकर लगातार संविदा के आधर पर भारी पैमाने पर रिक्त पड़े प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों में पांच से सात हजार के मानदेय पर शिक्षकों को बहाल कर लिया। लेकिन संविदा पर बहाल शिक्षकों को तब अखरने लगा जब इन्हें वेतनमान पर पूर्व से बहाल शिक्षकों के समान काम करने के लिए विवश किया जाने लगा। शोषण के शिकार बने इन शिक्षकों ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलनात्मक रुख अख्तियार किया जो नीतीश के सामने चुनौती बनी है।
दरअसल, 2015 चुनावी साल है और शोषण के शिकार नियोजित शिक्षक अपनी मांगे मनवाने के लिए संघर्ष पर उतारू हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि चुनाव के पूर्व उनकी मांगे नहीं मानी गयी तो निकट भविष्य में आने वाली नयी सरकार इसे और भी लंबा खींच सकती है। अतएव इस मौके को वे चूकना नहीं चाहते। दूसरी तरपफ इस मुद्दे को सूबे की विपक्षी भाजपा, रालोसपा, लोजपा समेत तमाम छोटी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी अपनी राजनीति चमकाने में लगी है और इनकी मांगों को जायज ठहरा कर राजनीतिक लाभ बटोरना चाह रही है। यह अलग बात है कि जब नीतीश सरकार में भाजपा के सुशील मोदी जब सत्ता में काबिज थे तो इस मुद्दे पर उन्होंने कभी जुबान नहीं खोला। लेकिन सत्ता से हटते ही नियोजित शिक्षकों के हिमायती बन इसे राजनीतिक हवा देनी शुरू कर दी है। खैर जो भी हो, आने वाले दिनों में सूबे की सरकार पर इस बात की चिंता जरूर बढ़ गयी है कि राज्य सरकार पर भारी बोझ बढ़ने वाला है। सत्ता से जुड़े राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सूबे के नियोजित शिक्षकों को वेतनमान की मांग पूरी करने पर राज्य सरकार पर तकरीबन 54 अरब रुपये का अतिरिक्त भार बढ़ेगा जिसकी भरपायी करना सरकार के बूते से बाहर है। इसके जवाब में इध्र नियेाजित शिक्षक संगठन के जिला उपाध्यक्ष सुदेश पासवान का मानना है कि ‘सूबे के राजनेताओं को वेतन भत्ते व अन्य सुविधओं पर व्यापक व अनावश्यक खर्च किये जा रहे हैं, इनकी सुविधओं में भारी ईजापफा किया जा रहा है तो संविदा पर बहाल शिक्षकों के वेतन वृ(ि की मांग पर इतना हाय-तौबा क्यों मच रही है? नियोजित शिक्षकों का संघर्ष अनवरत जारी है। इसका पफलापफल चाहे जो भी हो, किंतु इतना तय है कि आगामी बिहार विधनसभा चुनाव में मौजूदा सरकार के लिए यह चिंता का विषय जरूर है। कहीं ऐसा न हो कि नीतीश के लिए यह आंदोलन दुर्दिन लेकर न आ जाए।

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