September 26, 2018

गाँधी की धरती से बंगालीयो का दूसरा सत्याग्रह

Photo GalleryBy wmadmin123 - Tue Oct 22, 9:43 am

बहार के साढ़े तीन लाख भाषायी अल्पसंख्यक बांग्लाभाषी शरणार्थियों को नजरअंदाज करना अगले चुनावों में अब राजनीतिक पार्टियांे के लिए महंगा साबित हो सकता है। विगत चुनाव में वोट का वहिष्कार करने की घोषणा करने वाला यह समाज एकबार पिफर से एकजुट होकर अपनी ताकत का एहसास कराया है। यह अलग बात है कि पिछले चुनाव में कतिपय राजनेताओं के आश्वासनों के कारण ये वोट का वहिष्कार नहीं कर सके। लेकिन इनकी समस्याओं की लंबी पफेहरिस्त में अब तक एक दो को छोड़ दें तो बाकी सभी यथावत हैं और अब तक की उपेक्षा से तंग आकर ये गांध्ीगिरी की राह पर चलने के लिए शंखनाद उन्हीं की ध्रती चंपारण से किया है।

उल्लेखनीय है कि महात्मा गांध्ी ने वर्ष 1917 में देश की आजादी की पहली लड़ाई चंपारण से शुरू की थी। जिसे चंपारण सत्यागzह के नाम से जानते हैं। इस सत्यागzह के सौंवे वर्ष पर बिहार के पश्चिम चंपारण जिला मुख्यालय बेतिया नगर भवन मंे 22 सितंबर 2013 को बिहार के करीब 3.5 लाख भाषाई अल्पसंख्यक बंाग्लाभाषी शरणार्थियांे का राज्यस्तरीय सम्मेलन हुआ। जिसमें गांध्ी की ध्रती चंपारण से ही दूसरा सत्यागzह शुरू करने की घोषणा की गई। इस दौरान लोकसभा चुनाव 2014 के पूर्व शरणार्थी विकास प्राध्किरण के गठन के लिए सड़क से संसद तक की लड़ाई के लिए किया गया। यह समाज अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए प्रभातपफेरी के माध्यम से ऐतिहासिक प्रदर्शन भी किया। शरणार्थी विकास प्राध्किरण अथवा विशेष शरणार्थी कल्याण परियोजना आरंभ करने के लिए केन्दz और राज्य सरकारों पर दबाव बनाने की घोषणा की गई। वक्ताओं ने इस समाज के उत्थान और विकास की अब तक हुई सब्जबागी घोषणाओं को छलावा बताया और पूरे बिहार के शरणार्थी काWलोनियों की मौजूदा समस्याओं पर जोरदार चर्चा की और भारत के प्रथम प्रधनमंत्राी जवाहरलाल नेहरू की ओर से भारत के पूर्वी हिस्से को पूर्वी पाकिस्तान बनाने के दौरान की गई घोषणाओं पर भी प्रकाश डाला। कई वक्ताओं ने यहां तक कहा कि उस समय की घोषणाओं को अब तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। जबकि पूर्वी पाकिस्तान से सब कुछ छोड़कर भारत आने वालों को सारी सुविधएं मुहैया कराने की बातें कहीं गई थी। इस क्रम मेंे देश के 22 लाख शरणार्थी परिवारों के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थितियों के अलावा बिहार में बसाये गए समाज के लोगों की खराब हालत पर चिंता जताया गया। कई वक्ताओं ने इस तरह के वक्तव्य पर भी कड़ी नाराजगी जताई कि उन्हें अपने ही देश में आज भी रिÝयूजी माना जाता है।

समारोह के मुख्य अतिथि कोलकाता विश्वविद्यालय के पूर्व उप कुलपति नीतीश विश्वास और इस समाज के प्रमुख चिंतक, गांध्ी के अनुगामी एवं बिहार बंगाली समिति के अध्यक्ष डा.;कैप्टेनद्ध दिलीप कुमार सिन्हा तथा केन्दzीय उपाध्यक्ष मदन वणिक ने केन्दz और राज्य सरकारोंे से अपनी विभिन्न मांगों को पूरा कराने की दिशा में सकारात्मक पहल पर चर्चा की। जबकि बेतिया बंगाली समिति के राधकांत देवनाथ ने पंचायत से लेकर संसद तक में बंगालियों को प्रतिनिध् िमनोनीत करने की मांग मंच से जोरदार ढंग से उठायी। बिहार बंगाली समिति के प्रदेश सचिव डा. मनी राय, अमलान डे और जगदीश वर्मन का कहना था कि बंगाली समाज की अध्कितर आबादी अनुसूचित जाति से आती है। इसलिए इसे अनुसूचित जाति की सूची में शामिल की जानी चाहिए और जिस तरह पश्चिम बंगाल की सूची के अनुसार अन्य राज्योंं मंे जाति प्रमाणपत्रा दी जा रही है, उसी तरह बिहार में भी प्रमाण पत्रा मुहैया करायी जानी चाहिए।

समाज के राधकांत देवनाथ, गोविंद राय, आशीष गाईन, डा. दुलाल हालदार, भास्कर भौमिक, शंकर पाल, सरजीत बोस आदि ने अपने वक्तव्य में पंचायत एवं प्रखंड अंतर्गत संचालित सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने केे लिए सरकार से सभी शरणार्थियों को बीपीएल की सूची मेंे शामिल करने एवं अब तक वंचितों को मतदाता पहचान पत्रा उपलब्ध कराने की बात कही। मोतिहारी शाखा के पुष्कर बनर्जी ने बाढ़ कटाव के कारण पुनर्वास के लिए भटक रहे 712 लोगों को शीघz पुनर्वास कराने का मुíा उठाया।

वाल्मीकिनगर सासंद वैद्यनाथ प्रसाद महतो ;जदयूद्ध, पश्चिम चंपारण के सांसद डा.संजय जायसवाल ;भाजपाद्ध, बेतिया विधयक रेणु देवी ;भाजपाद्ध, लौरिया विधयक विनय बिहारी ;निर्दलीयद्ध, रामनगर की विधयक भागीरथी देवी ;भाजपाद्ध, वाल्मीकिनगर विधयक राजेश सिंह, जदयू के जिला अध्यक्ष डा. एनएन शाही, जिला परिषद सदस्य मो. गाजी ;राजदद्ध समेत अन्य राजीनतिक दलों के प्रतिनिध्यिों ने भी शरणार्थियों के मुíे को सरकार तक पहुंचाने का भरोसा दिया। यहां तक कि देर से कार्यक्रम में पहंुचे विधयक विनय बिहारी ने नाराज शरणार्थियों को मनाने के लिए मंच पर दो तीन गीत प्रस्तुत कर अपने अपनापन का जादू चलाया। वहीं अन्य राजनेता भी शरणार्थियांें के समस्याओं के समाधन की वकालत करते हुए इन तमाम मुíों को लोकसभा और विधनसभा में रखने का आश्वासन दिया। वैसे शरणाार्थी समाज को तो अब अपने समस्याओं के समाधन से मतलब है, इसलिए वे अभी तक किसी पर वोट के लिए मेहरबान होने के मूड में नहीं हैं क्योंकि मुंह का जला मट~ठा भी पफूंककर पीता है।

शरणार्थी विकास प्राध्किरण की जरूरत क्यों?

उल्लेखनीय है कि 1947 में आजादी के बाद भारत के पूर्वी हिस्से को पूर्वी पाकिस्तान बनाया गया। तब वहां बसे हुए बंगलाभाषी हिंदुओं को अपना घर परिवार और जमीन छोड़कर भारत आना पड़ा। उस समय केन्दz सरकार ने बिहार में इस शरणार्थी समाज को मुख्यत: बिहार के पश्चिम चंपारण के अलावा पूर्वी चंपारण, कटिहार, गया, अररिया, भागलपुर, दरभंगा और सहरसा में बसाया। जहां इनकी वर्तमान जनसंख्या पश्चिम चंपारण जिला मंे 1.20 लाख, पूर्वी चंपारण 65 हजार, पूर्णिया 80 हजार, कटिहार 35 हजार, गोपालगंज 4500, भागलपुर 1000, किशनगंज 3000 हजार के करीब है। इनके अलावा ये दरभंगा, छपरा, गया, जमालपुर तथा मुंगेर आदि जिलों में भी बसे हैं। सर्वेक्षण के अनुसार 67 पफीसदी शरणार्थी परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह आंकड़ा किसी भी समाज के लिए अत्यंत ही चिंताजनक है। वैसे आजादी के 65 वर्षों के बाद भी ये बिहार की मुख्यधरा में नहीं जुड़ सके हैं और अपनी समस्याओं के समाधन के लिए दशकों से संघर्षरत हैं।

सर्वेक्षण के आईने में मौजूदा स्थिति

बिहार बंगाली समिति के आगzह पर 27 मई 2009 को बिहार के मुख्यमंत्राी की पहल पर बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सहयोग से आदzी संस्था की ओर से इस समाज की मौजूदा आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति का सर्वेक्षण कराया गया, जिसमें कई हैरतअंगेज तथ्यों का खुलासा हुआ। बिहार के अन्य मैट्रिक पास युवकों की सूचकांक 33 पफीसदी की तुलना में शरणार्थी युवकों का सूचकांक 16.2 पर सिमट गया। इसी तरह बिहार के अनियमित मजदूरों के सूचकांक 18.6 पफीसदी में 43.7 पफीसदी, सरकारी नौकरी में 27 की जगह 3.3 पफीसदी, कल्याणकारी योजनाओं यथा राशन कार्ड, बीपीएल कार्ड, अन्नपूर्णा कार्ड, स्वास्थ्य बीमा योजना तथा अन्त्योदय योजना में 80 की जगह 40 पफीसदी, पीने के पानी के लिए चापाकल और कुंआ पर आश्रित लोगों में 23 की जगह 67.4 पफीसदी, खुले में शौचालय के मामले में 30.2 की तुलना में इनकी भागीदारी 61.1 पफीसदी पाया गया। 40 पफीसदी इस समाज के लोगों को जाति प्रमाण पत्रा नहीं मिलता जबकि 70 पफीसदी को अपनी मातृभाषा का ज्ञान नहीं है।

नहीं है इनकी जातियों की सही सूची

गौरतलब है कि पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित परिवारों में मुख्यत: अनुसूचित जातियों के हैं। आश्चर्य तो यह कि इनमें से 36.2 प्रतिशत लोगों के नाम सर्वेक्षण के दौरान बिहार की अनुसूची में नहीं पाया गया और इनको कोई प्रमाणपत्रा नहीं मिल पा रहा है। जबकि कुछ ही जातियों के नाम अनुसूचित और पिछड़ी जातियोंं में शामिल किया जा सका है।

बिहार बंगाली समिति के पश्चिम चंपारण सचिव राधकांत देवनाथ की माने तो 24 जून 1993 को पूर्व मुख्यमंत्राी बिहार के आदेश पर आयुक्त एके विश्वास की ओर से तैयार रिपोर्ट में 90 पफीसदी शरणार्थी परिवार अनुसूचित जाति के पाये गये। वैसे देश के अन्य राज्यों में शरणार्थी परिवारों को पश्चिम बंगाल की सूची के अनुसार जाति प्रमाण पत्रा मिलता है। सिपर्फ बिहार में ऐसा नहीं है।

गंभीर होती इनकी कुछ अन्य समस्याएं

ऐसे तो इस समाज के समक्ष समस्याओं की लंबी पफेहरिस्त है, लेकिन कई समस्याएं विकराल रूप धरण करती जा रही हैं। इनमें से एक है इस समाज के लोगों की जमीन और मकान हड़पने का खेल खेला जाना। ऐसे ही मामले में करीब 1400 परिवार जमीन और मकान खो चुके हैं। 56 पफीसदी लोगों की मासिक आय 3 हजार से कम है। इंदिरा आवास, वृद्वा पेंशन और विध्वा पेंशन जैसी अन्य कई सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बहुत कम लोगों को मिल रहा है। नदी के गर्भ में जमीन गंवा चुके करीब 712 परिवार पुनर्वासन के लिए भटक रहे हैं। जबकि हजारों लोगों को अभी तक सरकार की ओर से पूर्व की तर्ज पर भूमि ही नहीं उपलब्ध् करायी जा सकी है।

बहरहाल, स्थिति चाहे जो हो, लेकिन पहली बार शरणाथियों की ओर से इस तरह की एकजुटता दिखाते हुए अपनी ताकत का प्रदर्शन किया गया है। राजनीतिक हलके में इनके संगठित होने की सूचना से हड़कंप है। जिला मुख्यालय बेतिया के बेलबाग बंगाली काWलोनी समेत पश्चिम चंपारण की कुल 46 काWलानियों में वर्तमान दुर्गापूजा की तैयारी का लाभ उठाते हुए कई राजनीतिक दल अभी से पहंुचकर पूजा समिति सदस्यों से कुशलक्षेम पूछने लगे हैं। ऐसी उम्मीद है कि इस समाज की नाराजगी को दूर करने में सतारूढ़ दल समेत कोई अन्य पाटियां कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगी।

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