September 25, 2018

जातीय समीकरण तय करेगा दलों का राजनीतिक भविष्य

By wmadmin123 - Wed Feb 26, 12:29 pm

M3365M-4205 Anand Singh DR. N.N. SHAHI Mohan Gond NAND KISHOR CHAUDHRY PREM CHANDRA HAZRA Purnawashee Ram 2 sanjay pandey Satish Pashwan

 

दिल्ली में ‘आप की सरकार को मिली कामयाबी का शोर चंपारण पहुंंच चुकी है। इसका असर आगामी लोकसभा चुनाव में कितना होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन लगातार इस पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर से निकाली गर्इ जुलूस के दौरान आम लोगों की अपेक्षित सकारात्मक टिप्पणी से इसके बढ़ती पैठ के सबूत मिले हैं। लोगों का कहना है कि यदि आप की ओर से यहां उम्मीदवारी हुर्इ तो वे चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। वैसे अन्य दलों के अलग-अलग दावे और राग हैं। बिहार में एनडीए के टूट पर चाहे जितना भी हलचल मचे, लेकिन पशिचम चम्पारण जिले में इस टूट का कोर्इ असर वर्तमान में नहीं दिखता। ऐसे तो मतदाताओं में चाहे जितना भी जागरूकता के दावे कर ली जाय बावजूद इसके पशिचम चंपारण जिले में जातीय समीकरण ही राजनीतिक दलों का भविष्य तय करेगा। वैसे भाजपा के एकमात्रा मंत्राी चंद्रमोहन राय के बर्खास्त होने से भी कोर्इ अंतर नहीं पड़ा है। प्रेक्षकों की नजर में श्री राय का जनता के साथ कोर्इ सरोकार नहीं रहा, वे पार्टी की बदौलत विधनसभा में पहुंचते रहे हैं, इसलिए इनके हटने पर जनता में कोर्इ खास प्रतिक्रिया नहीं हुर्इ। जनता से सरोकार रखने वाले बेतिया के भाजपा सांसद डा. संजय जायसवाल, विधयक रेणु देवी, सतीश चन्द्र दुबे बगैर जदयू के समर्थन के अपनी धक बनाये रखने में कामयाब दिखते हैं। भाजपा से  सटे निर्दलीय दिलीप वर्मा के बारे में कहा जाता है कि ये बड़े ही दम-खम वाले व्यकित हैं। किसी गठबंध्न में रहें-नहीं रहें, कोर्इ समर्थन करे, नहीं कर,े इनके सेहत पर कोर्इ पफर्क नहीं पड़ता। इस बात को लेकर जदयू तनाव में है कि बेतिया संसदीय सीट जो वर्तमान में भाजपा के कब्जे में है उसे जदयू की झोली में कैसे डाला जाए? जदयू इसके लिए किसी मजबूत व्यकित की तलाश में है। समझा जाता है कि पिफल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा पर जदयू दांव लगा सकता है। उध्र वाल्मीकिनगर लोकसभा सीट 1989 से लेकर अब तक जदयू की झोली में है। जदयू ने जिसे टिकट थमाया वहीं संसद पहुंच गया। भाजपा ने इस सीट पर अपनी दावेदारी बहुत पहले छोड़ दी थी। जब यह सीट अनुसूचित जाति के प्रत्याशी के लिए सुरक्षित थी, तब यहां से भाजपा नेता कंचन बैठा ताल ठोकते थे। लेकिन बेसुरा ताल मतदाताओं को कभी आकर्षित नहीं कर सका। हालांकि वाल्मीकिनगर संसदीय क्षेत्रा में नरकटियागंज, रामनगर तथा सिकटा विधनसभा क्षेत्राों में भाजपा की पकड़ मजबूत है, परन्तु यह पकड़ विधनसभा चुनावों  तक ही सीमित रही। लोकसभा में इसका कोर्इ असर नहीं पड़ा। जदयू सांसद वैधनाथ प्रसाद पिछड़ी जाति के नेता के रूप में मतदाताओं पर अपनी पकड़ बनाये हुए हैं। भाजपा के हटने से आगामी लोकसभा चुनाव में आगड़ों के वोट सहित कुछ अन्य वोटाें के इनसे छिटकने की संभावना सापफ-सापफ दिख रही है। प्रेक्षकों की राय में यदि नरेन्द्र मोदी के रोकने के सवाल पर मुसलमानों ने जदयू को पूरा का पूरा समर्थन दिया तो अगड़ाें का वोट का हिसाब-किताब बराबर हो जायेगा। वैसे वाल्मीकिनगर विधयक राजेश सिंह अगड़ी जाति के नेता के रूप में बहुचर्चित हैं। जदयू में ये एक ऐसे नेता हंै, जो पार्टी कम और अपने दम-खम पर लगातार जीतते आ रहे हैं। इध्र जदयू के करीब आये निर्दलीय विधयक विनय बिहारी भी अगड़ी जाति के वोटाें को जदयू के पक्ष में ध््रुवीकरण कराने में कारगर हो सकते हंै। जबकि नौतन विधयक मनोरमा देवी को जातीय शकितकरण पर पूरा भरोसा है। बगहा विधयक प्रभात रंजन पिछड़ी जाति के दमदार नेता हैं। लेकिन दोनों दलों के उम्मीदवारों के आमने-सामने होने पर वे भाजपा उम्मीदवार को पटकनी देने में कारगर तो नहीं दिखते, लेकिन वे संघर्ष के वाहक बन सकते हैं। इस जिले में राजनीति के एक बड़े पुरोध पूर्णमासी राम पिफलवक्त सक्रिय नहीं दिखते। वे गोपालगंज से जदयू सांसद हैं और वहीं से उनके राजद के टिकट पर चुनाव लड़ने की पूरी संभावना भी है। लेकिन बगहा क्षेत्रा में उनकी मर्जी के बगैर एक पत्ता तक नहीं खड़खड़ाता। लोग कह रहे हंै कि शेर शिकार की टोह में है, उनकी दहाड़ पर यहां की राजनीति में उथल-पुथल मच सकती है। ऐसे में भाजपा और जदयू में जितने भी सांसद विधयक हैं, सब दम-खम वाले हैं। राजनैतिक दल भी इनके जीत में कुछ योगदान कर देते हैं। नरेन्द्र मोदी एवं नीतीश कुमार के बीच की तकरार की चर्चा ध्ीरे-ध्ीरे समाप्त होने लगी है। राजनीतिक दलों, शहरी तथा ग्रामीण कथित बु(िजीवियों और चौक-चौराहों पर यह चर्चा सिमटती जा रही है। ऐसे तो भाजपा के सिरमौर नरेन्द्र मोदी यहां के लोगों की जुबान पर हैं। इसी तरह नीतीश कुमार की तुलना लालू-राबड़ी के कथित जंगल राज से कर उनके लोग उन्हें ही बेहतर मानते है। आम लोगों की नजर में बिहार में सुशासन की सरकार और केन्द्र सरकार के मुददों और चुनावी नीतियों से ज्यादा उन्हें महंगार्इ से राहत और जन सुविधओं से मतलब है। लेकिन आम लोगों मेंं इन दोनों मुददों पर कोर्इ सरकार खरी नहीं उतर पा सकी है। ऐसे में आम मतदाताओं का रूझान इनमें से किस ओर होगा कहना मुशिकल है। वहीं विपक्षी दलों में भाजपा और ‘आप समेत अन्य दलों की घोषणाएं बहुसंख्यक मतदाताओं को कितना आकर्षित कर पायेगा, यह तो समय ही बतायेगा? वैसे प्रशासनिक दबदबा ने जदयू कार्यकर्ताओं का मनोबल पहले ही तोड़ दिया है विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं को जितना पारदर्शी और सुगम बनाने की कोशिश की गर्इ, उतना ही ज्यादा भ्रष्टाचार एवं जनता की परेशानी बढ़ती रही है। ऐसे में दोनों दलों को सबक सिखाने का मौका दूसरे राजनीतिक दलों के पास है। परन्तु राजद एवं भाकपा माले को छोड़ कर कोर्इ अन्य मुखर नहीं हो रहा है। कांग्रेस एवं अन्य दलों के नेता अपने आकाओं का मुंह ताक रहे है। आदेश-निर्देश पफरमान जारी होने के बाद कुछ कहने की सिथति में आ सकेंगे। बहरहाल नरेन्द्र मोदी एवं नीतीश कुमार के वाकयु( में ताजा समीकरणों पर प्राय: हरेेक राजनैतिक दलों की नजर है। 17 सालों के बाद अलग हुए जदयू के बारे में कहां जा रहा है कि गंगाजल से पवित्रा होने के बाद भी इस दल को ध्र्म निरपेक्षता की चादर नहीं ओढ़ार्इ जा सकती है। उध्र भाजपा को साम्प्रदायिक कह देने मात्रा से उसकी पैठ को èवस्त नहीं किया जा सकता है। अल्पसंख्यकों के वोटों का ध््रुवीकरण करने में भले ही यह पार्र्टी सक्षम नहीं, लेकिन सत्ता में इस दल के आने की वजह से इससे अल्पसंख्यकों का डर समाप्त हो गया है। भाजपा भी अन्य राजनीतिक दलों की तरह जनता में सक्रिय है। अल्पसंख्यकों का ध््रुवीकरण अब किसी उम्मीदवार को जीत दिलाने में समर्थ नहीं दिखता। लिहाजा जातीय समीकरण ही सभी दलों के राजनीतिक भविष्य का पफैसला करेगा। विकास एवं कल्याण के मुददे गौण पड़ चुके हैं। जातीय समीकरण का सर्वाधिक लाभ राजद एवं जदयू को प्राप्त होने की संभावना है। लिहाजा पशिचम चंपारण जिले में लोकसभा की लड़ार्ड नरेन्द्र बनाम नीतीश की बजाय जातीय समीकरण बनाम जातीय समीकरण के आधर पर होने की प्रबल संभावना है। हालांकि राजद, लोजपा और कांग्रेस के साथ हुए गठबंध्न को भी आगामी लोकसभा चुनाव में कम करके नहीं आंका जा सकता। जबकि ‘आप पार्टी का नया तेवर और वामपंथी दलों की तर्कपूर्ण दावेदारी भी चुनावी गणित को बदल सकता है।त्र

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