December 12, 2017

जिस्मफरोशी : चीनी ‘गुडि़यों’ के चंगुल में लुट रहे भारतीय

By wmadmin123 - Fri Jul 25, 1:10 pm

जिस्म के तिजारत की मंडी कहे जाने वाले नेपाल में नेपाली और भारतीय ‘बारबाला’ का बोल-बाला किसी से छुपी नहीं है। हाल के दिनों में विदेशी नजरें भी इस मंडी पर पड़ी है और एशियन, अप्रफीकी समेत विभिन्न मुल्कों के सेक्स वर्कर की मिल्कीयत बढ़ चली है। इस विदेशी नजरों में चीन की भी नजर नेपाल पर गड़ी है। कुछ वर्षों से डांस-बार से लेकर रेड लाईट एरिया तक ‘चीनी चैध्राहट’ बढ़ती जा रही है। इसके पीछे चीन की कुटिल चाल छिपी है, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। निशाने पर भारत और भारतीय ही हैं। हालांकि नेपाल सरकार भी इस तथ्य को नहीं स्वीकारती। नेपाल लगातार दावा करता रहा है कि वह अपने देश की एक इंच भूमि का भी इस्तेमाल भारत के खिलापफ नहीं होने देगा। भारत सरकार लगातार नेपाल में चीन के बढ़ते दखल का सवाल उठाती रही है। यह दखल नेपाल-चीन सांस्कृतिक मंच और चाइना स्टडी सेंटर से भी जुड़ा रहा है। लेकिन नेपाल अब ‘चाइनीज गुडिया’ का भी ‘सेंटर’ बन कर उभरा है। पहले इस पर तो नेपाल पुलिस को भी विश्वास नहीं होता था लेकिन 5 नवंबर 2009 को पुलिस के सामने इस सचाई पर से पर्दा हटी तो उनकी आंखंे भी खुली की खुली रह गई। दरअसल, इस मुतल्लिक एक सूचना मिली थी कि ठमेल में किंग पैलेस के आस-पास एक चाइनीज कपल ने डेरा लिया था। चंद दिनों में वह डेरा ‘ध्ंघे’ का ‘अड्डा’ बन गया। पुलिस ने लगे हाथ छापेमारी की तो पांव तले जमीन खिसक गई। एक, दो नहीं, पूरे के पूरे छह चाइनीज गुडिया ध्ंध्े करती रंगे हाथ ध्री गई। इन सभी चाइना गल्र्स के साथ छह जिस्मखोर भी पकड़े गए। उनमें नेपाली भी थे और भारतीय भी। नामों का खुलासा नहीं किया गया, मामला आया-गया हो गया। यह चाइनीज सेक्स वर्कर की चालूगिरी का पहला मामला था, अंतिम नहीं। क्योंकि मंडी में चीनी और ध्ंध दोनों आपस में रम चुके हैं। इनको संरक्षण दिए जाने का सवाल भी कम ज्वलंत नहीं है और चुप्पी उससे भी रहस्यमय। लेकिन घटना और ग्रुप वर्क अकाट्य प्रमाण बन चुका है। नेपाल पुलिस के वरिष्ठ अध्किारी व प्रवक्ता नवराज सिलवाल ने भी एक साथ छह चाइनीज सेक्स वर्कर और उसमें संगठित वेश्यावृति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं-‘यह नेपाल के लिए बदनामी जैसी बात है। विदेशी सेक्स वर्कर की बढ़ती संख्या और सक्रियता चिंता का विषय है। नेपाल इसका हब बनता जा रहा है। उस घटना में चाइनीज सेक्स वर्करों के साथ चाइनीज यौन सामग्री भी बरामद की गई थी। मतलब सापफ है-रीति और नीयत दोनों कुटिल है और सापफ भी। चीन ध्ंध्े से पैसा कमाने पर उतर आया है। और निशाने पर भारत तो है ही।
सीध्ी-सीध्ी कहे तो, चीन ‘चीनी गुडि़यों’ को ‘हथियार’ बना कर ‘दक्षिण एशिया’ में दखलदांजी पर उतर आया है। नेपाल में नेपाली और भारतीय अध्किारी इसके प्रायोजित शिकार होते हैं। खास कर रक्षा और गृह के साथ विदेश विभाग से जुड़े अध्किारी। जाल में पफंसाने के बाद यदि वे ‘डूब’ गए तो उन्हें मालामाल भी किया जाता है और दलाल भी बनाया जाता है। नजर तो ‘महत्वपूर्ण’ दस्तावेजों के हथियाने पर ही केंद्रित रहता है। खुपिफया रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल आने वाली ‘चीनी गुडि़यों’ में अध्किांश साम्यवादी चीन की रिटायर्ड पीएलए ;सेनाद्ध की महिला, जवान के साथ चीनी खुपिफया एजेंसी गुयानवो की प्रशिक्षित युवतियां शामिल होती है। जिन्हें खास तौर पर ‘देश सेवा’ के लिए भेजा जाता है और उन्हें पगार भी दी जाती है। जो अच्छी-खासी रकम होती है। हालांकि, इस संगठित सेक्स वर्कर के लिए गरीब चीनी लड़कियों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी ‘मेठ’ वहीं की प्रशिक्षित चाइनीज एजेंट होती हैं, जो अपने देश के लिए सब कुछ लुटा कर भी कुछ पाने की तमन्ना रखती है। इन्हें टूरिस्ट या वर्क परमिट वीजा पर नेपाल भेजा जाता है। इन्हें नेपाली और यहां तक कि हिन्दी भाषा की भी शिक्षा दी जाती है, ताकि आॅपरेशन में चूक न हो। इसी चीनी गुडि़यों के भरोसे नेपाल में ध्ड़ाध्ड़ चाईनीज और तिब्बत के अंतकारिक नामों के साथ बार रेस्टूरेंट, मसाज पार्लर आदि खुलने की बहुतायत है। रेडलाईट एरिया के साथ-साथ आॅनलाईन, मोबाइल और होटलों के कैटलाॅग और कैटवाॅक के जरिए चीनी गुडि़या ध्ंध्े में जुटी हैं। काठमांडू व आसपास के इलाके के अलावे पोखरा, और पहाड़ी व तराई क्षेत्रों तक इनका जाल बिछने लगा है। हाई-प्रोपफाइल चीनी गुडि़या की कीमत अध्कितम 25 हजार रुपये ;वन नाईटद्ध और न्यूनतम 500 रुपए में भी उपलब्ध् हो जाती है। राजधनी काठमांडू का ठमेल, दरबार मार्ग और न्यू रोड में इसकी संख्या बहुतायत है, जो मूलतः मौज-मस्ती का केंद्र माना जाता है। रिर्पोट है कि चीनी गुडि़यों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी है। ये मसाज, रेस्टूरेंट, पार्लर, दुकान, पफोटो स्टूडियो में भी काम करने से नहीं हिचकती। और शाम ढ़लते उसका असली रंग-रूप सामने आ जाता है। यही नहीं काठमांडू में ‘लापिफंग बु(’ की नकल कर हाथ में बाउल ;कटोराद्ध और छोटी सी छड़ी लिए चीन के भिखारियों में पुरुषों के अलावे महिलाओं की संख्या बढ़ी है जिसके बारे में बताया जाता है कि वे गतिविध्यिों पर नजर रखने का काम करते हैं। जहां तक डांस बार, रेस्टूरेंट, होटल में चीनी गुडि़या की सक्रियता संरक्षण या चीन/तिब्बत नामित ऐसे ध्ंधें के अड्डे की बात है, इनमें चीन का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निवेश बढ़ा है, तो उसके पार्टनर मापिफया गुंडों से सत्ता के गलियारे में बैठे लोग तक है। ये वही लोग हैं जो चीन के लिए नेपाल में रेड कार्पेट बिछाए हुए हैं। चीनी हुक्मरानों के ‘चांदी के जूते’ इन्हें खूब भाते हैं। खुपिफया रिपोर्ट तो यह भी है कि नेपाल के माओवादी चीनी गुडियों के संरक्षणकर्ता और सहयोगकर्ता हैं। एक ओर चीन नेपाल में अपना प्रभुत्व जमा कर दक्षिण एशिया को प्रभावित करने की मंशा रखता है। ध्न, दस्तावेज और सूचना संग्रह के लिए हर हथकंडे अपनाता है। तो दूसरी ओर इसके प्रायोजित चीनी गुडि़या और उससे जुड़ा ध्ंध का जाल बिहार, यूपी समेत सीमावर्ती क्षेत्रा तक है। उसके दलाल बीरगंज में भी हैं, तो रक्सौल ;बिहारद्ध में भी। चीनी माल का कमाल दिखाने वाले ये दलाल हर तबके के हैं। व्यापारी भी, नेता भी, अध्किारी भी। यहां बताना लाजिमी है कि भारत और राज्य सरकार ने सरकारी अध्किारियों को बिना अनुमति नेपाल या विदेश जाने पर पाबंदी लगा रखी है। लेकिन लालबत्ती वाले साहबानों की गुडि़या नेपाल पहुंच ही जाती है, भले ही वाहन पर लाल बत्ती ना हो। उनकी फ्रलाईट सेमरा से काठमांडू नीयत समय के लिए बुक रहता है। काठमांडू व पोखरा जैसे ठिकानों पर चीनी गुडि़यों के साथ मौज-मस्ती की व्यवस्था होती है। ठुमके, लटके-झटके के बीच कब वे हिन्दी-चीनी एक हो जाते हैं इसका भान नहीं रहता। ध्न लूटा कर चीनी गुडि़यों के आगोश में वे सकून ढ़ूंढते हैं, इध्र भारत कहीं न कहीं लूट और टूट रहा होता है। त्र

 

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