- lokprasang - http://lokprasang.in -

डाॅटर्स-डे पर विशेष : अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

Posted By wmadmin123 On July 25, 2014 @ 1:23 pm In राज्य | | No Comments

कितना सूना लगता है वह घर आंगन जहां एक नन्हीं सी बेटी के पाजेब से रूनझुन की आवाज न सुनाई दे। कितनी तृप्ति महसूस होती है तब जब आपको निढ़ाल देख आपकी नन्हीं परी अपने नन्हें हाथों से पानी का ग्लास थमाती है। पिफर पुत्राी की हत्या क्यों? क्यों उसे भ्रूण नवजात, किशोरावस्था और विवाहोपरांत भी असमय मौत दे ही जाती है? लड़कियों का घटता आंकड़ा हमें सचेत होने की चेतावनी दे रहा है। परंतु हमारा समाज आज भी बेटियों को अहमियत नहीं दे रहा। दस वर्ष पूर्व जहां 1000 ;एक हजार लड़कोंद्ध पर 927 लड़कियां थी, वही 2012 में यह आंकड़ा 1000 पर 914 का हो गया है।
एक बेटे की लालसा केवल हमारे देश में ही नहीं संपूर्ण विश्व में कन्या-भ्रूण हत्या का कारण है। जिसमें चीन भी अव्वल है। अपने देश में भ्रूण हत्या की घटना यूं तो सर्वत्रा है किंतु राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में दिल दहलाने वाला है। एक मात्रा राज्य केरल बेटियों के प्रति उदार है। वहां 1000 लड़कों पर 1082 लड़कियों का अनुपात है। बिहार में 1000 लड़कों पर 916 लड़कियां है। भ्रूण हत्या का ग्रापफ निरंतर बढ़ रहा है। केवल सहरसा में एक दर्जन से अध्कि लेबोरेटरीज हैं जहां भू्रण परीक्षण किया जा रहा है। गैरकानूनी होने के बावजूद इसपर कोई अंकुश नहीं है।
केवल भू्रण ही नहीं बेटियों को नवजात के रूप में भी मारा जाता है। राजस्थान, बिहार, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में नवजात कन्या की हत्या कर देना आम बात है। इसका कोई आंकड़ा नहीं है। क्योंकि इसमें अपराध्ी पूरा समाज होता है। इसलिए कोई किसी पर उंगली नहीं उठाता है। भू्रण हत्या से भी जघन्य है ये। यदि इतिहास पर दृष्टि डालें तो इसकी शुरूआत मुगल काल से ही हो गई थी। मुगल जबरन बेटी से शादी न कर लें, इस डर से राजपूत नवजात पुत्राी की हत्या कर देते थे। आज भी दहेज और इज्जत के डर से लोगों के द्वारा बेटियों को मारे जाने की खबर अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं।
तितली सा आजाद बचपन और किशोरावस्था भी बेटियों के लिए अब भयावह हो गया है। बच्चियों और किशोरियों के साथ लगातार दुष्कर्म व हत्या की घटनाएं घट रही हैं। आंकड़े बताते है। कि हर वर्ष लगभग 24,206 लड़कियों के साथ दुष्कर्म एवं 35,565 का अपहरण कर खरीद पफरोक्त किया जाता है। जनवरी से मार्च 14 तक केवल मध्ेपुरा में दुष्कर्म के 14 मामले दर्ज हुए हैं। सहरसा में 6 और अव्वल नंबर पर सुपौल में 26 मामले दर्ज हुए हैं। जिसका ग्रापफ निरंतर बढ़ रहा है। लगभग 43000 लड़कियां छेड़छाड़ की शिकार हो रही है। बेटे की चाहत में बलि भी बेटियां ही चढ़ती हैं। बिहारशरीपफ में 9 अप्रैल 2014 को चाचा, चाची और दादी ने पुत्रा प्राप्ति के लिए चैती नवरात्राी के अष्टमी को पांच वर्षीया प्रिया की बलि चढ़ा दी। कैसी विडंबना है ये जहां नवरात्राी में लोग नवदुर्गा की पूजा कर कन्या भोजन कराते हैं वहीं पुत्रा प्राप्ति को कन्या की बलि भी चढ़ाते हैं ये दानव। पश्चिम बंगाल में एक पिता ने वाकई कन्यादान के घिसे-पिटे परंपरा को सार्थक कर दिया। उसने अपनी 13 वर्षीया बेटी को जुए में हार विजेता से उसकी शादी तय कर दी। सिमरी बख्तियारपुर के जलकुंभी में मृत पड़ी 9 वर्षीया सुध, महिषि की आठ वर्षीया बच्ची से रेप और हत्या, सहरसा के रेलवे ट्रैक पर गला रेत कर पफेंकी गई 16 वर्षीया बच्ची और यूपी में पेड़ से झूलती बच्चियों का हत्यारा कहां है? इसका जवाब समाज के हर व्यक्ति को खुद के अंदर झांक कर देना होगा।
मायके छोड़ हजारों अरमानों के साथ ससुराल में कदम रखने वाली बेटी को भी दहेज की बलिवेदी पर चढ़ाया जा रहा है। पिछले वर्ष दहेज हत्या का आंकड़ा 8,618 है जो बढ़ते ग्रापफ की ओर है। केवल सुपौल में विगत वर्ष 19 लड़कियों को दहेज के लिए मारा गया। लेकिन यह संतोष का विषय है कि इस विपरीत परिस्थितियों में भी बेटियां न केवल अपनी पहचान बनाने में जुटी हुई हैं बल्कि अपने माता-पिता का संबल बनी हुई है। आइए ऐसी ही कुछ बेटियों से आपको रू-ब-रू कराते हैं।
इस ‘डाटर्स डे’ पर जाने उन बेटियों को जो माता-पिता का संबल बनने के साथ ही समाज के बंदिशों को भी तोड़ीं। प्रज्ञा, जो सशस्त्रा सीमा बल 2008 बैच की कैडेट हैं। पिता कमलेश्वर प्रसाद एवं मां रेणु देवी की चार पुत्रियों में वह दूसरे नंबर पर है। प्राइवेट शिक्षक के तौर पर कार्यरत कमलेश्वर ने बेटियों को आगे बढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2007 के एसएसबी बहाली में हिस्सा लेने प्रज्ञा जब अपने पिता के साथ बरौनी पहुंची तो उनके पास इतने कम पैसे थे कि वो कंैप के बाहर बने एक ढाबे में जहां केवल 10 रुपए में चावल, दाल, चोखा मिलता था, एक ही टाइम खाते थे। रात में मात्रा भूजा से काम चलता था। परंतु प्रज्ञा ने दृढ़ संकल्प ले रखी थी और पांच दिन के इस दौर को उसने बखूबी पूरा किया। बात के क्रम में वह अतीत में खो गई और बोली, मैं दौड़ में पिछड़ रही थी। अचानक पापा की आवाज मेरे कानों से टकराई-दौड़ प्रज्ञा, दौड़ और पिफर मेरे पांव में पंख लगा गए।’ आज प्रज्ञा मध्ुबनी कैंप में रह कर देश सेवा में रत है और माता-पिता एवं बहनों की संबल है।
ऐसी ही एक सबल बेटी है प्रियंका, जिसने समाज के उस मिथक को तोड़ा है। यहां माना जाता है कि लड़कियां हर व्यवसाय में खुद को स्थापित नहीं कर सकती। बहुत ही छोटे कस्बे रानीगंज ;अररियाद्ध की 14 वर्षीया प्रियंका के पिता नागेश्वर रजक जब मध्ुमेह से ग्रसित हुए तो अपने एक मात्रा पान के दुकान को चालने में असमर्थ हो गए। तब प्रियंका ने पिता की जिम्मेदारी बांट ली। वह सरकारी स्कूल में नौवीं की छात्रा है। सुबह के स्कूल से वह दोपहर तक वापस घर आ जाती है। खाना खाकर वह दुकान चली जाती है और पिता को आराम करने घर भेज देती है। शाम के बाद नागेश्वर रजक दुकान संभालते हैं और प्रियंका पढ़ाई करती है। वह भविष्य में शिक्षिका बनना चाहती है। पहले तो लोगों ने ताने मारे परंतु आज वही समाज प्रियंका की सराहना करता है। अब नागेश्वर रजक भी स्वस्थ हैं। आज अपने तीन भाई बहनों में प्रियंका माता-पिता का संबल बन चुकी है। सच तो ये है कि यदि आज माता-पिता अपनी नजरिया नहीं बदलते तो किरण-आईपीएस किरण बेदी नहीं बनती। प्रज्ञा सीमा प्रहरी नहीं बनती और प्रियंका नहीं बन पाती पिता का सहारा। अब समय आ गया है-इस ‘डाटर्स डे’ पर हम प्रण लें कि बेटियों के प्रति अपनी नजरिया बदलंेगे। आइए एक उन्मुक्त और सुंदर माहौल दें अपनी नन्हीं तितलियों को व लिखने दें उन्हें उड़ान की एक उत्कर्ष कहानी।


Article printed from lokprasang: http://lokprasang.in

URL to article: http://lokprasang.in/%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a5%85%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%a1%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7-%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%9c/

Copyright © 2013 News World. All rights reserved.