September 26, 2018

दूसरी पार्टियों से अलग नहीं है ‘आप’ का असली चेहरा उम्मीद की बुझती लौ के बीच राजनीति का संकट

By wmadmin123 - Tue Jul 21, 1:22 pm

नंदकिशोर नंदन

हर राजनैतिक दल और नेता पारदर्शिता की बात करने लगा है। लेकिन वह अपने गिरेबान में झांकने को तैयार नहीं है। अगर वे अपनी तरपफ देखने का साहस करेंगे तो वे तुलसी की इस आत्मस्वीकृति
‘मौसम कौन कुटिल खल कामी,
जा तन दियो, ताहि विसरायो।
ऐसो नमकहरामी।’
से गुजरेंगे। इसलिए वे अपनी तरपफ देखने के बजाय दूसरों की तरपफ ही देखते हैं। उन्हें यह भी अच्छी तरह मालूम है कि पारदर्शिता की पहली और आखिरी शर्त चरित्रा की निर्मलता है। और वे इस शर्त पर सौ जन्मों के बावजूद खरे नहीं उतरेंगे। भारतीय राजनीति ने आदर्श और व्यवहार की खाई उसी तरह से चैड़ी की है जिस तरह उसने इन सड़सठ-अड़सठ वर्षों में गरीबी और अमीरी की खाई को बढ़ाया है।
यह भारत के जन-मन का दुर्भाग्य है कि जहां कहीं उम्मीद की लौ जगमगाती है, वहां उसे बुझाने की कोशिश शुरू हो जाती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि रोशनी की बाहरी चकाचैंध् में हम अंध्ेरे से ही प्यार करने लगे हैं और चिराग लेकर चलने वालों को ही ठिकाने लगाने को जीवन की प्राथमिकता मान बैठे हैं? अभी देश की राजनीतिविदों, शीर्ष पुरुष-मोदी और केजरीवाल के समर्थक यह मानकर बैठे हैं कि पारदर्शिता के प्रतिमान हैं, वही लोकतंत्रा है, वही संविधन हैं, वही न्याय भी हैं। उनमें छिद्र की ओर संकेत करना भी अक्षम्य अपराध् है। इसलिए उनकी माननीय सीमाओं को उजागर कर लोकतांत्रिकता की स्थापना करने की चेष्टा भी देश-द्रोह है, जिसकी सजा यह है कि आप किनारे कर दिए जाएं ताकि भविष्य में दूसरे भी लोकतंत्रा, संविधन और जनता की चिंता न करें। ‘आप’ में मचे घमासान के बरबस यह पूछा जाना जरूरी है कि ‘आप’ के प्रति मेध पाटकर की उदासीनता की क्या वजह है। मैंने चुनाव और चुनाव-परिणाम के बाद अपना सबकुछ होम कर देने वाले एक जुझारू युवक वालिंटेयर की इस आशंका को निराधर कहकर टाल देना चाहा था, जब उसने कहा था-आप इतना आशान्वित और उत्साहित न हों, पार्टी पर उन लोगों का कब्जा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों की आत्मा-पारदर्शिता से घबराते हैं। आज उस कर्मठ वालिंटेयर की बात सच प्रतीत होती है तो इसलिए कि जिस दल में आंतरिक लोकतंत्रा न हो, वह जनता की उम्मीदों से खिलवाड़ तो कर सकता है, उसे कभी साकार नहीं कर सकता।
एक पश्चिमी विचारक ने जब यह कहा होगा कि चरित्रा जीवन का रत्न मुकुट है तो उसकी दृष्टि में जीवन में चरित्रा की सर्वोच्चता रही होगी, लेकिन जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जानेवाली यह शक्ति उन प्रमुख तत्वों-राजनीति, ध्र्म और संस्कृति की विकृतियों से घिरती चली गई जबकि इनका भी लक्ष्य मनुष्य जाति का भौतिक नहीं आत्मिक उन्नयन करना था। प्रधनमंत्राी मोदी हों अथवा दिल्ली के मुख्यमंत्राी केजरीवाल, दोनों की राजनीति में घोषित जन-कल्याण और पारदर्शिता का उपहास होता दिखलाई पड़ता है तो उसकी एकमात्रा वजह चरित्रा का संकट अर्थात कथनी और करनी का न पाटा जानेवाला अंतर है। मोदी जी और उनकी राजनीति के जन-विरोध्ी चरित्रा के साथ ही उनका कारपोरेट-प्रेम इन्हीं नौ-दस महीनों में जग-जाहिर हो चुका है। यदि वहां गांध्ी जैसी तो क्या लालबहादुर शास्त्राी जैसी भी चरित्रा से उद्भूत पारदर्शिता होती तो देश की जनता का कल्याण जरूर होता। कारपोरेट घरानों को टैक्स में आठ हजार करोड़ रुपयों की छूट देने वाला और उन्हीं की समृ(ि के लिए गरीबों-किसानों -आदिवासियों की जमीन छीनने वाला भूमि अध्ग्रिहण कानून पारित कराने के लिए प्रधनमंत्राी की बेचैनी उनके दसलखिया कोट की अंतर्कथा बयान कर देती है।
बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्ला-कहावत के अच्छे उदाहरण अरविंद केजरीवाल हैं, जो दिल्ली के मुख्यमंत्राी बनने को ही जीवन और राजनीति की अंतिम उपलब्ध् िमानकर ‘पफुल्स पैराडाइज’ में रहते हुए अपने और अपने लोगों के अलावा बाकी लोगों को गलत मानने की भूल कर रहे हैं। किसी व्यक्ति को समग्रता में जानना हो तो उसके साथियों को देखना चाहिए क्योंकि सरोकारों की वास्तविक पहचान उसके साथियों के चरित्रा से ही होती है। इसलिए अरविंद जी अपने को जितना पाक-सापफ दिखलाने की कोशिश करें-अहंकार से मुक्त रहने का उपदेश दें, उनकी वास्तविक छवि को उनके साथियों के व्यवहार ने इस तरह क्षत-विक्षत कर दिया है कि उसकी चमक लौटने की अब कोई संभावना नहीं है। वैसे भारतीय राजनीति और लोकतंत्रा में कभी भी कुछ भी घट सकता है। अपने पद और कद की चिंता तक स्वयं को सीमित करने वाले केजरीवाल स्वभावतः अपने उन साथियों के प्रति इतने अनुदार और निर्मम हो सकते हैं कि, जिन्होंने खून-पसीना देकर दल को खड़ा करने में अहम भूमिका का निर्वाह किया हैं यही नहीं देशभर के हजारों-लाखों दलीय कार्यकर्ताओं की उम्मीदें उन्हीं के मूल्यों और संघर्ष चेतना पर टिकी हैं। दिल्ली के चुनाव में आप पार्टी के ऐसे सैकड़ों कार्यकर्ताओं से मेरा सरोकार-संबंध् हुआ, जो आज पफोन करके पूछते हैं-‘यह क्या हो रहा है, इस पार्टी में?’ चण्डीगढ़ से डाॅ. पवन कुमार आर्य ने पूछा-‘प्रशान्त भूषण और योगेन्द्र यादव को इस तरह अपमानित करने से हमारे जैसे हजारों लोग आहत हैं। अगर पार्टी में आंतरिक लोकतंत्रा नहीं होगा तो ‘आप’ का क्या वही हश्र नहीं होगा, जो बाकी पार्टियों का हुआ है?’ मैंने उन्हें कहा कि यह भारतीय समाज और लोकतंत्रा की विसंगति और विडंबना है कि जनता की बढ़ती गहरी निराशा और विकल्पहीनता के कारण जो भी दल और नेता विकल्प की जगह लेता है, वह नये-नये आये थानेदार की तरह शुरू में ईमानदार होने का नाटक भर करता है और बाद में वही करता है, जो दूसरे करते रहे हैं। ‘आप’ पार्टी के प्रति हमारे मोहभंग की यही व्यथा-कथा है, जहां नेतृत्व पर ऐसे ही लोगों का कब्जा है, जो घोर रूढि़वादी, तर्कविमुख और मौका परस्त हैं। आरक्षण-विरोध्ी, अंदर से घोर हिन्दूवादी कर्मकांडी और पूंजीवाद के समर्थक अरविंद केजरीवाल को सापफ दो टूक कहकर जनपक्ष को सामने रखने वाले साथी नेता दुश्मन लगते हैं तो इसका सीध अर्थ है कि वह घोर व्यक्तिवादी हैं। वह ‘इंसान से इंसान का हो भाईचारा’ गीत गाकर पलभर के लिए भावुकता में बहकर ले जा सकते हैं लेकिन उनके पास इसका क्या जवाब है कि उन्होंने जिन विधयक तोमर साहब को अपना कानून मंत्राी बनाया है, उनकी डिग्री ही पफर्जी है। कांच के घर में रहकर दूसरों पर पत्थर चलाने की नादानी कर रहे हैं। जैसे पांच साल के लिए गद्दी पक्की होने पर मोदी जी जन-विरोध्ी कार्य करते हुए विरोध्यिों को ठिकाने लगाने में जुट गये हैं, वही रास्ता अरविंद केजरीवाल ने भी अपना लिया है। वह व्यवस्था बदलने की बात कहकर उसी सड़ी-गली व्यवस्था का एक पुर्जा बन रहे हैं और ‘आप’ को भी उन्हीं भ्रष्ट राजनीतिक दलों की कतार में शामिल कर रहे हैं। इस आशंका से भी इंकार करना मुश्किल है कि ‘आप’ के उन नेताओं को मोदी के इशारे पर ही अपमानित कर निकाला जा रहा है, जो भाजपा की कारपोरेट घरानों को समृ( बनाकर देश के किसानों-मजदूरों, आदिवासियों को कंगाल बनाने वाली आर्थिक नीति और उसके भ्रष्टाचार को देशभर में बेनकाब कर जनता की आवाज बन गये हैं। जनता की उम्मीदों और सपनों से विश्वासघात असहमति को मुखर करने वाले प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव और आनंद कुमार जैसे नेता नहीं, स्वयं मुख्यमंत्राी अरविंद केजरीवाल और उनके साथी कर रहे हैं। उनके कभी विवेक का आगमन हो, यह कामना ही अब शेष रह गई है।
उम्मीदों के टूटने की गहरी हताशा की दारूण घड़ी में खलील जिब्रान की याद संबल बन जाती है। वह एक ओर इस कठोर सच को स्वीकार करते हैं-‘जब मनुष्य की अंतिम लोलुपता प्रौढ़ होती है तो वह उलटकर हजार गुना शक्ति से मानवता पर हमला करती है।’ तो दूसरी ओर वह यह भी संदेश देते हैं-‘तुम मेरे हाथों को जंजीरों में और मेरे पैरों को बेडि़यों में जकड़ सकते हो और मुझे अंध्ेरे बंदीगृह में डाल सकते हो परंतु मेरे विचारों को बंदी नहीं बना सकते क्योंकि वे स्वतंत्रा हैं, विस्तृत आकाश में वायु के समान है।त्र

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