September 23, 2018

पूर्णिया परिवार परामर्श केंद्र बना रहा इतिहास

By wmadmin123 - Mon Sep 15, 8:39 am

जनसंख्या विस्पफोट, सामाजिक असमानता, टूटते सामाजिक बंध्न और बिखरते परिवार के कारण विद्रूप होती सामाजिक व्यवस्था और आपसी कलह ने जिस प्रकार से व्यक्ति से व्यक्ति को विलगाव की ओर ध्केला है, उसी का परिणाम है कि आज जहां समाज में हिंसा की बढ़ोत्तरी हुई है वहीं परिवार में भी अंतर्कलह चरम पर पहुंचा है। प्रतिदिन पुलिस थाने से लेकर कोर्ट-कचहरी तक हजारों की संख्या में अकारण मुकदमे दर्ज हो रहे हैं, जो वर्षों-वर्षों तक चलते हैं। कुछ को न्याय मिलता है तो वे खुश हो जाते हैं, किंतु जो न्याय पाने में पिछड़ जाते है। वे असंतुष्ट होकर पुनः उफंचे न्यायालयों का रुख करते हैं।
हम अन्यत्रा नहीं, सिपर्फ पूर्णिया के न्यायालयों में लंबित पफौजदारी, दीवानी एवं पारिवारिक विवाद, पति-पत्नी से संबंध्ति विवाद के मामलों की चर्चा करें तो यहां तीन हजार से ज्यादा मुकदमें लंबित हैं और प्रतिदिन नये-नये मामले दर्ज हो रहे हैं। यही कारण है कि तत्कालीन राज्य सरकार ने एक परिपत्रा जारी कर जिले में पदस्थापित पुलिस अध्ीक्षकों को निर्देशित किया था कि वे अपने-अपने जिले में पारिवारिक विवादों के निपटारा के लिए एक पुलिस पदाध्किारी की देखरेख में सामाजिक कार्यकर्ता, विध् िविशेषज्ञ एवं समाज सेवा में रुचि रखने वाले बु(िजीवियों को जोड़ कर ‘परामर्श केंद्र’ का निर्माण करें, जो पति-पत्नी के टूटते रिश्ते, क्षणिक स्वार्थ के लिए वृ( माता-पिता को प्रताडि़त करने वाले पुत्रा-पुत्रियों, भाई-बहन के विवाद, भाई-भाई के विवादों को सद् परामर्श ;काउन्सिलेशनद्ध के जरिये सुलझा सकें ताकि ऐसे छोटे-मोटे मामले न्यायालयों के बोझ को थोड़ा हल्का कर सके। अन्य जिलों या ताल्लुकों में ऐसे पुलिस परामर्श केंद्रों का क्या हश्र हुआ, यह तो नहीं बताया जा सकता, लेकिन वर्ष 2006 में स्थापित पूर्णिया पुलिस परामर्श केंद्र, जिसे सम्प्रति पुलिस अध्ीक्षक के कार्यालय में ही चलाया जा रहा है, यह अन्य जिलों की पुलिस के लिए भी उत्पे्ररणा का केंद्र है।
पूर्णिया पुलिस परामर्श केंद्र में सम्प्रति एक महिला सब इन्सपेक्टर संयोजक के रूप में प्रतिनियुक्त हंै, जो अपने पदस्थापना के स्थानों के दायित्वों को सम्पादित करते हुए प्रत्येक शुक्रवार को तीन से चार घंटे तक परिवार परामर्श केंद्र के मामलों में अन्य परामर्शियों के सहयोग से निबटारा करती देखी जाती हैं। स्थापना काल से अब तक इस परिवार परामर्श केंद्र ने 1800 से अध्कि मामलों का विध् िसम्मत निबटारा कर एक रिकार्ड तो कायम किया ही है, वैसे दंपतियों को राहत पहुंचाई है, जिसे न्यायालय ले जाने पर जहां अत्यध्कि न्यायिक खर्च वहन करना पड़ता और मामलों का निष्कर्ष या निर्णय होने की प्रक्रिया में ही वर्षों लग सकते थे।
यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिये कि पूर्णिया के इस परिवार परामर्श केंद्र को मूर्त रूप देने का काम तत्कालीन पुलिस अध्ीक्षक सुधंशु कुमार ने किया था, इसलिये पहला श्रेय भी उन्हीं को दिया जाना चाहिए या उन्हें ही यह श्रेय प्राप्त है। सुधंशु कुमार सम्प्रति डीआईजी के पद पर कार्यरत हैं। बाद में बच्चू सिंह मीणा और नैयर हसनैन खान ने सुधंशु कुमार के इस नायाब कृत्य को आगे बढ़ाने का काम किया। आज ये दोनों भी बिहार के विभिन्न प्रमंडलों में डीआईजी के पद पर कार्यरत हैं। अमित लोढ़ा, किम शर्मा और अब पूर्णिया के वर्तमान पुलिस अध्ीक्षक अजीत कुमार सत्यार्थी इस परिवार परामर्श केंद्र के संरक्षक के रूप में केंद्र को नया आयाम दे रहे हैं, इसे कतई भूला नहीं जा सकता।
इस परिवार परामर्श केंद्र के परामर्शी सदस्य के रूप में जिन दो शख्सीयत ने स्थापना काल से अब तक निरंतर निःस्वार्थ भाव से अपना सहयोग दिया है, उसे कैसे भूला जा सकता है। पेशे से अध्विक्ता दिलीप कुमार ‘दीपक’ एवं समाजसेवी कृष्ण कुमार सिंह बिना नागा किये परिवार परामर्श केंद्र के मामलों को निबटाने में अग्रणी भूमिका ही नहीं निभाई बल्कि यह भी साबित किया कि यदि शासन-प्रशासन को सहयोग प्राप्त हो और प्रशासन नागरिक सहयोग की सच्चे मन से इच्छा रखता हो, तो लिये गये ‘संकल्प’ को उफंचाईयों तक क्षण मात्रा में पहुंचाया जा सकता। उल्लेख्य है कि इस परिवार परामर्श केंद्र के सदस्य राज भाषा परिषद के वर्तमान निदेशक डा. जयकृष्ण मेहता भी रह चुके हैं। सम्प्रति इस परिवार परामर्श केंद्र की संयोजिका पुलिस सब इन्सपेक्टर श्वेता गुप्ता हैं। परामर्शी सदस्यों में अध्विक्ता दिलीप कुमार ‘दीपक’ एवं कृष्ण कुमार सिंह तो हैं ही। समाजसेविका स्वाती वैश्यंती, अध्विक्ता सह पत्राकार कृष्ण कुमार वर्मा आदि के अलावे स्वैच्छिक सेवा देने वाले कार्यालय सहायक के रूप में नारायण गुप्ता जैसे युवक भी हैं।
इस क्रम में परामर्श केंद्र द्वारा घरेलू हिंसा को सुलझाने में सपफल हाल की एक घटना का उल्लेख करना लाजिमी समझते हैं। नशे के आदी एक दामाद ने गुस्से में अपनी सास की पिटाई कर दी। उसके दांत तोड़ डाले तो पत्नी ने पुलिस अध्ीक्षक के समक्ष उपस्थित होकर अपने पति की शिकायत दर्ज करायी। एसपी ने मामले को परिवार परामर्श केंद्र को विवाद सुलझाने का दायित्व सौंपा। यह घटना पूर्णिया जिले के मरंगा थाने के मिल्की गांव की है। पति का नाम कैलाश दास है, जो विगत 20 वर्षों से घर जमाई बनकर अपनी ससुराल में रह रहा था। पत्नी का मायका कृत्यानंदनगर प्रखंड के बालूघाट गांव में है, जहां वह अपने पति के साथ रहती थी। वादिनी अनीता दास का आरोप था कि उसका पति कोई रोजगार नहीं करता है। प्रतिदिन शराब पीकर घर आता है और घर में अशांति उत्पन्न करता है। कोर्ट में बांड बनाने के बावजूद झगड़े में जानवरों की तरह मारपीट करता है। मामला जब परिवार परामर्श केंद्र में आया तो नोटिस देकर दोनों पक्षों को बुलाया गया। पति का कहना था कि उसकी पत्नी ने उसकी जमीन बेच दी है और रुपये अपने बहन एवं बहनोई को दे दिये। पत्नी ने कहा कि नशे के आदी उसके पति की बीमारी में पैसे खर्च हुए हैं, शेष जो पैसे बचे हैं वह तुरंत लौटाने को तैयार हंै। पत्नी ने पति को परामर्श केंद्र में ही एक लाख रुपये का चेक पति कैलाश दास को दे दिया और शराबी पति से निजात दिलाने की गुहार लगायी तो पति ने ससुराल छोड़ देने का वचन दिया।
एक दूसरे वाकये में एक पुत्रा ने ता जीवन अपनी मां की सेवा का वचन परामर्श केंद्र को दिया। उसने अपनी मां को पचहत्तर हजार रुपये का चेक भी भरण-पोषण हेतु दिया है। घटनाक्रम यह था कि पूर्णिया शहर के ही खुश्कीबाग चैहान टोले की निवासी समरूण खातून ने अपने सौतेले पुत्रा के विरू( पुलिस अध्ीक्षक अजीत कुमार सत्यार्थी से शिकायत की थी कि उसके पति की मृत्यु के पश्चात उसका सौतेला बेटा जमाल उसके साथ मारपीट करता है और घर से निकालने की ध्मकी देता है। उसने जमीन बेच कर सारा रुपया भी हड़प लिया है। पुलिस अध्ीक्षक ने मामले को सुलझाने हेतु परिवार परामर्श केंद्र को कहा, जहां त्वरित गति से मामले को सुलझाने में केंद्र की संयोजिका श्वेता गुप्ता, सदस्य दिलीप कुमार दीपक, के.के. सिंह, स्वाती वैश्यंती आदि ने अहम भूमिका निभायी।
इसके बावजूद घरेलू हिंसा की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। घर के अंदर या बाहर महिलाओं को हिंसक वारदातों का शिकार होना पड़ रहा है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में समान रूप से महिलाओं पर अत्याचार होने की खबरें सुर्खियां बन रही है। एक एनजीओ के सर्वेक्षण को यदि सच माना जाये तो पूर्णिया में ही प्रत्येक महीने दस महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती है। आंकड़ों पर यदि विश्वास किया जाये तो 46 प्रतिशत महिलाओं पर ग्रामीण क्षेत्रों में अत्याचार होता है, 45 प्रतिशत शहरी महिलाएं भी हिंसक वारदातों की शिकार होती हैं।
युवा अध्किवक्ता राजीव रंजन झा का कहना है कि जब तक समाज में जागरूकता नहीं आये तबतक महिलाएं घरेलू हिंसा में प्रताडि़त होती रहेंगी। सिपर्फ कानून बना देने से घरेलू हिंसा में कमी नहीं आ सकती क्योंकि शिक्षा के अभाव में 70 प्रतिशत महिलाएं कानून का संरक्षण प्राप्त करने में अक्षम हैं। इसलिये जरूरत है कि विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत स्वैच्छिक संगठन एवं प्रशासन भी महिलाअें को जागरूक करने की पहल करें। त्र

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