October 21, 2017

पूर्णिया में भाजपा पर

Photo GalleryBy wmadmin123 - Mon Oct 21, 1:01 pm

सत्ता के संघर्ष में कब और कौन किसी का मित्रा हो जायेगा और कौन शत्राु, यह बता पाना उस व्यक्ति या राजनीतिक दल के लिए भी कठिन है जो कल तक साथ-साथ थे और आज दुश्मन बनकर वार पर वार किये चले जा रहे हैं। संभवत: इसी को दृष्टिगत रखते हुए प्रधनमंत्राी डा. मनमोहन सिंह ने हाल में पत्राकारों द्वारा पूछे गये एक सवाल में सपाट लहजे में उत्तर दिया था-‘राजनीति में न कोई स्थाई मित्रा होता है और न स्थाई शत्राु।’ लेकिन जब शत्राुता वैयक्तिक स्तर पर हावी होने लगती है तो कभी-कभी ऐसा अनर्थ हो जाता है, जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। कुछ ऐसा ही हो रहा है पूर्णिया की उस ध्रती पर जहां कभी राजनीति में शालीनता सबसे बड़ी कसौटी हुआ करती थी। किंतु बीती शताब्दी के नब्बे के दशक में और उसके बाद जो यहां का राजनीतिक परिदृश्य बदला और उसके बाद जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई वह बेहद खौपफनाक रही है। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि पिछले सात-आठ वर्षों से शांत दिखने वाला पूर्णिया पुन: एकबार अशांत होने के कगार पर खड़ा है। भाजपा और जदयू की आपसी रस्सा कशीं तो पिछले वर्ष दिसंबर महीने से ही यहां मुखर थी, जून में बिहारी एनडीए के विघटन के बाद तो लगने लगा है कि यहां राजनीतिक लड़ाई कम, व्यक्तिगत वर्चस्व सर्वोपरि हो गया है।

दूसरी ओर पूर्णिया के पूर्व सांसद राजेश रंजन उपर्फ पप्पू यादव, जो पूर्णिया के तत्कालीन विधयक अजित सरकार की हत्या मेंे सीबीआई द्वारा आरोपित होने के बाद से पूर्णिया के राजनीतिक परिदृश्य से ओझल थे, वे उच्च न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सजा से मुक्त किये जाने के बाद पुन: पूर्णिया एवं कोसी प्रक्षेत्रा में राजनीतिक ठौर की तलाश में सक्रिय हैं। सितंबर महीने के अंतिम सप्ताह में पूर्णिया के ऐतिहासिक कला भवन मेंे आयोजित उनके सम्मेलन में भारी संख्या में उनके समर्थकों की उपस्थिति तो इसी ओर इशारा करता प्रतीत होता है कि उनकी मंशा पुन: पूर्णिया एवं सहरसा प्रमंडल को अपने दम पर प्रभावित कर अपने लोगों को लोकसभा एवं विधनसभा में भेजना लक्ष्य है। हालांकि, उन्होंने आगामी लोकसभा में उम्मीदवारी को लेकर मौन साध्े रखा। कापफी कुरेदने के बाद बस इतना कहा कि वे कोई नया राजनीतिक दल नहीं बनायेंगे। अपने लोगों को किसी राष्ट्रीय दल से ही जोड़ने का प्रयास करेंगे। लेकिन लगे हाथ उन्होंने भाजपा से दूरी बनाये रखने की बात कह कर यह सापफ कर दिया कि वे अपनी ध्र्म पत्नी रंजीता रंजन के साथ कांगzेस का ही दरवाजा खटखटायेंगे। कला भवन के इस सम्मेलन में पप्पू यादव की ध्र्म पत्नी रंजीता रंजन तो उपस्थित थी ही, कसबा क्षेत्रा के कांगzेस विधयक आपफाक आलम इस सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे। जबकि पूर्णिया के डिप्टी मेयर संतोष यादव इस सम्मेलन के प्रमुख संयोजक थे। इस सम्मेलन की सपफलता से पप्पू यादव के पुराने समर्थक कापफी उत्साहित भी हैं। उन्हें उम्मीद लगी है कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद पुन: उनके दिन बहुरने वाले हैं।

किंतु, इससे इतर एक अन्य घटना, जो यहां सुर्खियों में रही, वह है जनता दल यू के द्वारा पूर्णिया के भाजपा सांसद उदय सिंह उपर्फ पप्पू सिंह की अपने संसदीय क्षेत्रा से गायब रहने पर न केवल ध्रना-प्रदर्शन कर ‘प्रायश्चित दिवस’ मनाया, बल्कि उससे पहले पुलिस के स्थानीय आला अध्किारियों से मिलकर एक मेमोरंडम समर्पित किया, जिसमें सांसद को खोज निकालने का अनुरोध् किया गया था। पूर्णिया की आम आवाम जदयू की इस कार्रवाई से भौंचक है। इन सारे कार्यक्रमों का नेतृत्व इसी जिले के ध्मदाहा क्षेत्रा की विधयक लेसी सिंह, जदयू के प्रदेश महासचिव आशीष कुमार ‘बब्बू’, नवल किशोर यादव आदि नेता कर रहे थे।

भाजपा कार्यकर्ताओं ने जदयू नेताओं पर पलटवार करते हुए अगले ही दिन पूर्णिया की एसपी किम से मिलकर कहा कि मैडम! अपफवाह पफैलाने वालों और चरित्राहनन की राजनीति करने वालों के खिलापफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करें। भाजपा नेता दिलीप कुमार दीपक, भाजपा के जिलाध्यक्ष प्रपफुल्ल रंजन वर्मा, गुप्तेश कुमार आदि ने इसे जदयू की ओछी हरकत बताते हुए सपफाई दी कि जब संसद सत्रा जारी हो तो लाजिमी है कि सांसद दिल्ली में हैं। एसपी किम ने बहुत ही नपे-तुले शब्दों मंे भाजपा नेताओं को प्रत्युत्तर दिया कि एसपी को एसपी ही रहने दें, राजनीति में मत घसीटिये। एक पुलिस की अध्किारी होने के नाते उनका जवाब संभवत: सही ही था। क्योंकि दो राजनीतिक दलों द्वारा चलाये जा रहे वाक~यु¼ में किसी भी प्रशासनिक अध्किारी का यही सटीक उत्तर हो सकता था। बाद में तो भाजपा की ओर से जो बयान जारी किया गया उसकी एक पंक्ति ही उ¼रण के लिए कापफी है, वह है-‘लेसी सिंह सांसद पप्पू सिंह का अभिभावक बनने का प्रयास न करें।’

किंतु जदयू का अभियान यहीं समाप्त नहीं हुआ। जदयू नेताओं ने सांसद पप्पू सिंह से विगत दस वर्षों में उनके द्वारा संसदीय क्षेत्रा में कराये गये कार्यों का ‘हिसाब दो’ आंदोलन प्रारंभ कर उन्हें जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करने का प्रयास प्रारंभ किया है। जलालगढ़ प्रखंड मुख्यालय में इसकी शुरूआत करने पहुंचे जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने भाजपा और स्थानीय सांसद पर शब्दों के तीखे वाण चलाते हुए कहा कि पूर्णिया के विकास में सबसे बड़े बाध्क यहां के भाजपा सांसद और विधयक हैं, इसलिए वे लेसी सिंह के इस अभियान को जनहित में सार्थक और साहसिक पहल मानते हैं। उन्होंने कहा कि पूर्णिया के तप:पुत्रा पूर्व मुख्यमंत्राी स्व. भोला पासवान शास्त्राी की जयंती के दिन यात्राा का शुभारंभ इसलिए किया गया कि स्व. शास्त्राी जन नेता तो थे ही, सादगी और ईमानदारी के मिसाल भी थे। ‘हिसाब दो’ यात्राा सम्प्रति जारी है और जदयू के कई दिग्गज, जिनमें कृषि मंत्राी नरेंदz सिंह आदि विभिन्न तिथियों में भाजपा को औकात में रहने की नसीहत देकर वापस लौट चुके हैं।

वस्तुत: ‘हिसाब दो’ यात्राा ने जदयू और भाजपा के बीच, बढ़ती तल्खी को सामयिक घटनाक्रम से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता, इसकी बुनियाद तो बहुत पूर्व पड़ चुकी थी जब पिछले वर्ष दिसंबर महीने की 30 तारीख को पूर्णिया के सांसद उदय सिंह उपर्फ पप्पू सिंह ने पूर्णिया के विशाल रंगभूमि मैदान में स्थित इंदिरा गांध्ी स्टेडियम में नीतीश कुमार सरकार के रवैये से क्षुब्ध् होकर ‘वेदना प्रदर्शन’ कार्यक्रम आयोजित कर प्रशासनिक क्षेत्रा में व्याप्त भzष्टाचार, विकास कार्यों की अनदेखी, विभिन्न राष्ट्रीय योजना पर हावी होते विचौलियों पर सवाल उठाकर एक तरह से इस सरकार के विरू¼ बगावत का बिगुल पफूंका था। स्मरणीय है कि उस समय भाजपा सरकार में शामिल थी और उस वक्त यह कहा जाने लगा था कि पप्पू सिंह न केवल नीतीश कुमार को, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिाक गठबंध्न को बदनाम करने पर तुले हैंं। ‘वेदना प्रदर्शन’ रैली के तुरंत बाद विश्वास यात्राा के क्रम में पहुंचे नीतीश कुमार ने भी बड़े ही तल्ख लहजे में सांसद श्री सिंह की परोक्ष रूप से आलोचना की थी। जदयू विधयक तो उस बेदना रैली के पूर्व से ही मुखर थी।

यह सही है कि सांसद उदय सिंह उस वेदना प्रदर्शन के बाद अन्य कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं कर पाये हैं, जिससे जनता के बीच उनकी सक्रियता दिखाई देती। यह भी सही है कि सांसद ने वर्ष 2004 के चुनाव के समय से लेकर वर्ष 2009 के चुनाव तक जनता से विकास कार्यों के जितने भी वायदे किये थे, उसमें से 10 प्रतिशत भी शायद वह सरजमीन पर उतारने में सपफल रहते तो शायद उनके विपक्षी इतने मुखर नहीं हो पाते। उन्होंने पूर्णिया को उद्योग संपन्न बनाकर राष्ट्रीय मानचित्रा पर दिखाने का दावा किया था। वह पर्चा आज भी कई लोगों के पास सुरक्षित है, जिसमें विकास चक्र प्रदर्शित किया गया था। लेकिन हुआ क्या? क्या पूर्णिया को औद्योगिक हब बनाने का उनका सपना इसलिए पफलीभूत नहीं हो पाया कि राज्य सरकार ने उसमें रुचि नहीं ली? किंतु सवाल यह भी उठता है कि यदि विकास के कामों, बेरोजगारी के समाधन मेंे वह सक्षम नहीं थे, तो उन्होंने ऐसे वायदे मतदाताओं से किये ही क्यों?
बेशक, पूर्णिया के सांसद उदय सिंह ने पूर्णिया में उद्योगों का जाल बिछाने, भzष्टाचार मुक्त समाज बनाने, विकास कार्यक्रमों को गति देने जैसे ढ़ेर सारे वायदे पूर्णिया संसदीय क्षेत्रा की जनता से किया था। पहले ही लिखा जा चुका है कि वर्ष 2004 में किये गये वायदों को पूरा न कर पाने पर उन्होंने कहा कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद उन वायदों को पूरा किया जायेगा। उन्होंने जनता से जनादेश तो लिया, लेकिन वायदों को पूरा करने मंे पिछड़ गये। यही कारण है कि जदयू नेताओं, खासकर लेसी सिंह को ‘हिसाब दो’ का जुमला गढ़ने का मौका मिल गया। दो-चार ही सही अपने संसदीय क्षेत्रा में अपने बूते वह चाहे तो कृषि पर आधरित उद्योग तो लगा ही सकते थे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। अब जब लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने शेष हैं, तब यदि ध्मदाहा जाने पर भzष्टाचार और लालपफीताशाही जैसे मुíों पर वही जनता उनका घेराव प्रदर्शन करती है तो इसमें आश्चर्य क्या है! जनता ने उनका घेराव भzष्टाचार और अपराध् से मुक्ति के लिए किया था। इसे वे विपक्ष प्रायोजित बता कर यदि पल्ला झाड़ने का प्रयास करते हैं तो इससे दुखद स्थिति और क्या हो सकती है। एक साल पुराने ‘वेदना प्रदर्शन’ की याद दिलाकर जनता की ज्वलंत समस्याओं से कोई जनप्रतिनिध् िकैसे मुख मोड़ सकता है? सिपर्फ यह कह देने से कि यह सरकार ‘भzष्ट’ हंै या अमुक अध्किारी-कर्मचारी भzष्ट है, न तो भzष्टाचार मिटने वाला है और न जनता की समस्याओं का समाधन ही होने वाला है। इसलिए समय रहते एक सध्े हुए सेनापति की तरह यदि उन्होंने कमान नहीं संभाली तो नरेंदz मोदी की हवा भी हवाई होकर रह जायेगी, यह तय है। भाजपा के कार्यकर्ता जुझारू होते हैं, बड़ा से बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकते हैं, लेकिन एसी युक्त कोठी में बैठकर अपने ‘खास मुसाहिबों की पफौज’ से मंत्राणा करने की बजाय पूरी पारदर्शिता दिखाते हुए जनता की मांग के अनुरूप पुन: उफर्जावान होकर जंग में जाने की तैयारी ही भाजपा को यहां सपफलता दिला सकती है। इसके लिए अहंकार का त्याग करना ही होगा। इस प्रकरण में एक बात और उल्लेखनीय है कि आज के दौर में उन तमाम नेताओं को सरकारी भzष्टाचार तो नजर आता है, लेकिन उनके ही इर्द-गिर्द जाल पफैलाये ऐसे भzष्टतत्व मंडराते पिफरते हैं, जो अपना उल्लू सीध करने में माहिर हैं। इसके कारण भी आक्रोश उत्पन्न होता है और ध्रना-प्रदर्शन, घेराव तक की नौबत आती है, इसका भी कारण है। कारण यह है कि पूर्णिया के कतिपय जन प्रतिनिध् िपर सामंती प्रवृत्ति इस कदर हावी है कि वे वैसे ही लोगों को तरजीह देते हैं, जो उनके मन मापिफक बोल बोलते हैं। सच तो यह है कि कई नेता इस रोग से ऐसे गzसित हैं कि सचाई उजागर करने वालों से किनारा कर जाते हैं। ऐसे नेता सत्ताधरी दल में भी हैं और विपक्ष में भी। भाजपा भी इससे अछूता नहीं है। इसलिए एक राजनीतिक विश्लेषक ने यहां तक कह दिया कि जबतक ‘चारणों’ को अपने से दूर नहीं रखेंगे नेता तो कोई भी हवा या आंध्ी चुनाव में विजय की दहलीज पर उन्हेंे नहीं पहुंचा सकता।

एक सच यह भी है कि पूर्णिया ही नहीं संपूर्ण सीमांचल में जिस प्रकार से भzष्टाचार ने पंजा पफैलाया है, वह अभूतपूर्व ही है। मनरेगा, इंदिरा आवास योजना के आवंटन बीआरजीएपफ योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना, कबीर अंत्येष्टि योजना से लेकर जमीन के नामांतरण तक, जो आमजनों से सरोकार रखने वाले कार्यक्रम हैं, में भारी भzष्टाचार व्याप्त है। निश्चित रूप से वर्तमान सत्ताधरी दल जदयू को भी आगामी चुनाव में इसका हिसाब जनता को देना ही होगा।

संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि प्रत्येक राजनीतिक दल चुनाव की तैयारी के क्रम में अपने तरकसों से तीर निकालकर उसकी धर को तीक्ष्ण करने में यहां जुट गया है। यह भी तय है कि पूर्णिया संसदीय क्षेत्रा पर पफतह पाने के लिए जदयू ने जिस प्रकार से ‘प्रोपेगंडावाद’ शुरू किया है, उससे भाजपा को जो भी नुकसान हो, किंतु लाभ जदयू को भी शायद ही मिल पायेगा। हां, तीसरा तो मुंह बाये खड़ा है ही, वह भी समय आने पर अपना पत्ता खोल ही देगा।

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