December 12, 2017

पोर्न रार्इटर ‘मस्तराम पर बनी फिल्म

By wmadmin123 - Wed Feb 26, 11:43 am

2हिंदी सिनेमा का यह सुनहरा दौर है जहां एक तरपफ कामर्शियल पिफल्में अकूत कमार्इ कर रही है तो दूसरी तरपफ कामर्शियल मापदंडों को ताक पर रखते हुए अनछुए विषयों पर भी पिफल्में बन रही हैं और रीलिज हो रही है। हालांकि कुछ लोगों की इसपर असहमति हो सकती है पर कम से कम अमिताभ के घूसा मार युग ;जादूगर, अकेला, अजूबा…द्ध से तो लाख बेहतर है। जब पिफल्में सतही तरीके से बनती थी और अंत में दर्शक अपने आपको ठगा-सा महसुस करता था। वर्तमान में कर्इ ऐसे पिफल्म मेकर हैं जिनकी पहली पिफल्म ही लीक से हटकर होती है। ‘गैंग्स आपफ वासेपुर के लेखकीय टीम से जुड़े अखिलेश बतौर निर्देशक अपनी पहली पिफल्म ‘मस्तराम लेकर आ रहे हैं। जाहिर है पिफल्म के नाम से ही पाठक समझ चुके होंगे कि हम किस मस्तराम की बात कर रहे हैं। हिंदी प्रदेशों में पोर्नरार्इटर के रूप में मस्तराम बेहद लोकप्रिय हैं। शायद ही कोर्इ ऐसा युवक होगा जिसने मस्तराम की कहानी न पढ़ी हो। आखिर ‘मस्तराम पर पिफल्म बनाने का आर्इडिया कहां से आया? लेखक-निर्देशक अखिलेश कहते हैं कि अन्य युवाओं की तरह हम भी मस्तराम की कहानी पढ़ते थे। पढ़ते वक्त अक्सर मन में ये सवाल आते कि ये लेखक आखिर घर पर क्या कहता होगा? क्या बीबी, बच्चों को पता होगा कि घर में जो पैसे आ रहे हैं उसका माèयम क्या है? कुछ तो मजबूरी रही होगी उस व्यकित की। क्या अपने जीवन में ताउम्र वह यह राज छुपाने में कामयाब हो पाया होगा? ये तमाम सवाल अक्सर मुझे बेचैन करता। पिफर मैंने मस्तराम पर रिसर्च किया और इस पिफल्म को बनायी। 15वें मुंबर्इ पिफल्म पेफसिटवल में ‘मस्तराम सिने-प्रेमियों और आलोचकों का आकर्षण का केंद्र रहा। कुछ लोगों ने शाबासी दी, बधर्इयां दी तो कुछ आलोचकों का कहना था कि जब मस्तराम के परिवार को पता चलता है तो परिवार में समाज में हर एक लोग उसे हिकारत की दृषिट से देखते हैं। इसके बाद मस्तराम टूट जाता है। एक तरपफ परिवार वाले नपफरत करते हैं तो दूसरी तरपफ पोर्न कहानियों में भी उसके कम्पटिटर आ जाते हैं। मस्तराम अपने आपको अकेला महसूस करता है। और पिफर अंत में मस्तराम उसी रास्ते पर चलने लगता है। इस क्षण को देखते वक्त लगता है कि शायद जल्दीबाजी थी, उनके प्रफस्टेशन को और दिखाना चाहिए था। इस सवाल पर निर्देशक कहते हैं कि अच्छी बात है कि लोगों के कमेंटस आ रहे हैं। हरेक लोगों की अपनी-अपनी सोच होती है। हमारे पास कर्इ तरह की मजबूरियां थी। बतौर निर्देशक मेरी पहली पिफल्म है तो कम बजट में समय पर पिफल्में बनानी थी। अब कुछ बात करते हैं मस्तराम के लेखक-निर्देशक अखिलेश के बारे में। अखिलेश भोपाल निवासी हैं। बचपन से ही पिफल्मों में काम करने का शौक था। पढ़ार्इ के बहाने मुंबर्इ आये और मास कम्युनिकेशन में दाखिला लिया। लेकिन पिफल्मों में काम करने के अरमानों को पंख लगे तो पढ़ार्इ बीच में ही छोड़ दी। और सबसे बेहतरीन पल था अनुराग कश्यप के लिए गैंग्स आपफ वासेपुर लिखना। कहते हैं अखिलेश ‘पृथ्वी थियेटर में मैंने और सचिन ने अनुराग को पिफल्म की कहानी सुनायी जो उन्हें बेहद पसंद आयी और उसी क्षण हमें पटकथा लिखने के लिए स्वीकृति दे दी। सचिन, जीशान और मैंने तीनों ने मिलकर ‘गैंग्स आपफ वासेपुर की पटकथा लिखी।
‘मस्तराम पर लौटते हुए हम निर्देशक अखिलेश से पूछते हैं कि चाहे वह कामर्शियल पिफल्म हो या किसी और जोनर की पिफल्में हो सबका अपना एक उíेश्य होता है। मस्तराम बनाने के पीछे क्या मकसद है? कहते हैं अखिलेश कि एक हयुमन स्टोरी है। सेक्स को लेकर सोसायटी कैसे रिएक्ट करती है। 80 के दौरान सेक्स पर लोग खुलकर बातचीत नहीं करते थे। हालांकि आज भी ये माहौल कायम है। उíेश्य यह है कि सेक्स को लेकर सोसायटी दिलचस्पी तो लेती है पर बात निकलने पर लोग शरीपफ बनने लगते हैं। मस्तराम की किताबें हरेक उम्र के लोग पढ़ते हैं पर मस्तराम के असलियत के बारे में जब पता चलता है तो वही लोग जो उसकी कहानियों के दीवाने थे, उससे दूरी बनाने लगते हैं। मार्च में प्रदर्शित होने वाली पिफल्म ‘मस्तराम को मार्केट में मिल रहे रिस्पांस से अखिलेश बेहद खुश हैं। वो रियलासिटक लव स्टोरी पर पिफल्म बनाने वाले हैं जो मस्तराम की तरह ही अनछुर्इ होगी। त्र

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