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प्रियंका लाओ कांग्रेस बचाओ

Posted By wmadmin123 On November 24, 2014 @ 12:38 pm In आवरण कथा | No Comments

आज से करीब 23 वर्ष पूर्व 25 जून 1991 को आग उगलती दोपहरी में दिल्ली के वीरभूमि में स्व. राजीव गांध्ी की अंत्येष्टि के दौरान लोगों की भीड़ में खड़ी 17 साल की एक लड़की ने संपूर्ण भारत का ध्यान अपनी ओर खींचा था। वह लड़की कोई और नहीं सोनिया और राजीव की बेटी प्रियंका गांध्ी थी। तब पूरा हिन्दुस्तान ने देखा था कि उस छोटी-सी उम्र में भी प्रियंका ने त्रासदी के बाद के संवेदनशील वक्त में मां सोनिया और बड़े भाई राहुल को ढाढस बंध रही थी, उन्हें आत्म विश्वास के साथ संभाल रही थी। देश के जिन लोगों ने उन तस्वीरों को देखा था उनमें से अध्किांश लोगों ने प्रियंका के प्रति एक धरणा बना ली कि-‘छोटी उम्र में भी बड़ी समझदार हैं प्रियंका।’ आज जबकि राहुल और सोनिया के नेतृृत्व में कांग्रेस मुश्किलों से घिरती जा रही है, चुनाव-दर-चुनाव कांग्रेस का सपफाया होता जा रहा है। ऐसे त्रासद भरे संवेदनशील समय में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का एक खेमा पार्टी को संभालने के लिए प्रियंका की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है तथा ‘प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ’ की मांग करने लगा है। ऐसा ही एक प्रदर्शन बीते 19 अक्टूबर 2014 को पार्टी नेता जगजीत शर्मा के नेतृत्व में कांग्रेस के दिल्ली कार्यालय 24, अकबर रोड पर किया गया। पूर्व में भी कई मौकों पर ऐसी मांगे की जाती रही है। सवाल उठता है कि क्या वाकई में कांग्रेस के लिए प्रियंका तुरूप का पत्ता है जिसके सामने राहुल गांध्ी की लोकप्रियता कोई मायने नहीं रखती। इतना ही नहीं, सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सोनिया गांध्ी अब रिटायरमेंट के रास्ते पर हैं? क्योंकि बराबर सोनिया की बीमारी की खबरें मीडिया में आती रही है। इध्र, विपक्ष प्रियंका के राजनीति में संभावित प्रवेश को ‘राजमहल में तख्तापलट’ की संज्ञा दे चुके हैं। कुछ माह पूर्व अरुण जेटली ने यह बातें कही थी। हालांकि, कांग्रेसी नेता मणिशंकर अÕयर ने श्री जेटली के बयान का जवाब देते हुए कहा था-‘अरुण जेटली जैसे नेता राजनीतिक लाभ लेने के लिए दोनों भाई-बहन के बीच प्रतिद्वंद्विता की बात करते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि-‘प्रियंका पार्टी के लिए बेहद बेशकीमती है। यदि वे पार्टी में आती हैं तो उनका दिल खोलकर स्वागत किया जाएगा। यह उनपर निर्भर करता है कि वे क्या करती हैं। उध्र, नेहरू-गांध्ी परिवार के बेहद करीबी रहे पूर्व वित्त मंत्राी पी चिदंबरम ने यह कहकर सनसनी पफैला दी है कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष गैर गांध्ी भी हो सकता है। ;देखें बाॅक्स: गैर गांध्ी भी हो सकता है अगला कांग्रेस अध्यक्षद्ध चिदंबरम ने यह चर्चा ऐसे समय में छेड़ी है जब पार्टी के मौजूदा नेतृत्व पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और सांगठनिक चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। सवाल उठता है कि क्या भारतीय लोकतंत्रा के इस राज परिवार का सूरज अस्त होने वाला है। हालांकि, कांग्रेस का इतिहास बताता है जब-जब गांध्ी परिवार को चुनौती मिली और पार्टी को गैर गांध्ी नेतृत्व मिला तो वह पफौरी ही साबित हुआ। जगजीवन राम, सीताराम केसरी, माध्वराव सिंध्यिा, जीतेन्द्र प्रसाद, राजेश पायलट जैसे नाम इस सूची में शुमार है। इध्र, गांध्ी परिवार के एक और करीबी दिग्विजय सिंह ने प्रियंका को अहम भूमिका में लाने की मांग के बीच उपाध्यक्ष राहुल गांध्ी को कांग्रेस की कमान सौंपने तथा सोनिया कोे मंेटर ;मार्ग दर्शकद्ध की भूमिका निभाने की बात उछाल कर पार्टी में खलबली मचा दी है। सूत्रा बताते हैं कि दिग्विजय सिंह से यह बयान जानबूझकर दिलाया गया है ताकि राहुल को कमान सौंपने के मद्देनजर पार्टी में संभावित विरोध् का आकलन किया जा सके। दिग्विजय की पहचान राहुल के सियासी गुरु के रूप में भी की जाती है। हालांकि, यही दिग्विजय सिंह बीते 28 जून 2014 को यह बातें कहकर विवाद पैदा किया था कि-‘राहुल गांध्ी का स्वभाव शासन करने वाला व्यक्ति का नहीं है।’
दरअसल, इस समय पार्टी में बदलाव की मांग को लेकर अंदरूनी खींचतान शिखर पर है। इध्र, पार्टी कार्यकर्ता यह सोच-सोचकर दुबले होते जा रहे हैं कि पिछले साल कांग्रेस से दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्य छिन गए। इस वर्ष केंद्र की सत्ता के साथ-साथ पार्टी महाराष्ट्र और हरियाणा की सत्ता से भी बेदखल हो गई है। राहुल का सिक्का चल नहीं पा रहा है पिफर भी सोनिया गांध्ी पुत्रा मोह में राहुल के जरिए ही पार्टी को हांकने में लगी हुई हंै। ऐसे में कैसे बचेगा पार्टी का अस्तित्व? सच तो यह है कि स्वतंत्रा भारत के इतिहास में कांग्रेस की ऐसी दुर्गति पहले कभी नहीं हुई थी। अभी कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमटी हुई है। इसके पास अभी इतनी भी कूबत नहीं है कि ये छाती ठोककर विपक्ष के नेता की कुर्सी हथिया सकें। विपक्ष के नेता के लिए लोकसभा के कुल सीटों ;543द्ध का 10 प्रतिशत अर्थात 53 सीटें चाहिए। दरअसल, अभी कांग्रेस को एक ऐसे चेहरे की दरकार है जिसके व्यक्तित्व में करिश्माई आकर्षण हो। जिसके जरिए अध्कि से अध्कि लोगों को पार्टी से जोड़ा जा सके तथा जो नरेंद्र मोदी के सपने को विखंडित कर सके। मोदी का सपना है कांग्रेस मुक्त भारत। राहुल की अगुवाई में कांग्रेस की हुई दुर्गति इस बात का गवाह है कि उनके पास वह करिश्माई व्यक्तित्व नहीं है। हालांकि, सोनिया ने राहुल को एक मजबूत नेता बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया बावजूद इसके वे अपने व्यक्तित्व को गढ़ने में कामयाब नहीं हो सके। बहरहाल, कार्यकर्ताओं में वर्तमान नेतृत्व के प्रति निराशा व्याप्त है। कहते हैं कि राजनीति, र्पािर्टयों के सहारे चलती है और पार्टियां कार्यकर्ताओं के आसरे। कार्यकर्ताओं को निराशा के कोहरे से बाहर निकालने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के द्वारा भी प्रियंका की मांग की जाने लगी है। इसी 10 नवंबर 2014 को पार्टी के वरिष्ठ नेता हंसराज भारद्वाज ने कहा था-‘राहुल गांध्ी में भीड़ को आकर्षित करने की क्षमता नहीं है। जब मैं कर्नाटक में था तो हमने देखा कि राहुल बड़े जनसमुह को संबोध्ति करने में सक्षम नहीं हैं। यदि प्रियंका को पार्टी में बड़ी भूमिका दी जाती है तो वह कांग्रेस को पिफर से पुराने स्वरूप में लौटा सकती हैं। प्रियंका अपनी दादी इंदिरा गांध्ी जैसी हैं। अब समय आ गया है जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांध्ी को पार्टी में प्रियंका को बड़ा पद देना चाहिए।’ पिछले महीने आॅस्कर पफर्नांडिस ने भी कहा था-‘प्रियंका पहले भी पार्टी के लिए काम करती रही हैं उन्हें आगे आकर पार्टी में अहम भूमिका निभानी चाहिए।’ गौरतलब है कि 1999 से ही प्रियंका मां सोनिया और 2004 से भाई राहुल के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालती रही हैं। इसके अलावा पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्राी एवं वर्तमान में अमृतसर का सांसद कैप्टन अमरिंदर सिंह, निवर्तमान खाद्य मंत्राी केवी थामस, पूर्व मानव संसाध्न मंत्राी एमएम पल्लम राजू जैसे नेता भी प्रियंका के पक्ष में अपनी भावना व्यक्त कर चुके हैं। पूर्व में वरिष्ठ नेता वसंत साठे भी ;अब दिवंगतद्ध कह चुके हैं-‘अगर कांग्रेस को पिफर से सत्ता में लाना है तो इंदिरा जी की तरह आम लोगों के बीच जाकर उन्हें अपनी तरपफ आकर्षित करने का हुनर रखने वाले नेता को आगे लाना होगा। राहुल पर लीडरशिप थोपी गई है और प्रियंका जन्मजात लीडर है। करिश्माई व्यक्तित्व सिपर्फ प्रियंका के पास है।’
दरअसल, कांग्रेसियों का एक बड़ा खेमा प्रियंका में उनकी दादी एवं पूर्व प्रधनमंत्राी स्व. इंदिरा गांध्ी की छवि देखते हंै। यूं भी, जिन्होंने इंदिरा गांध्ी को देखा है प्रियंका में उनके अस्क को नकार नहीं सकते। वही कद-काठी, वैसी ही तीखी नाक, वैसा ही बाल, वैसा ही हाव-भाव, वैसा ही अंदाज। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि इंदिरा गांध्ी की शख्सियत जादुई थी। उनके संबोध्न में गजब का आकर्षण था जिसकी डोर में करोड़ों लोग बंध् जाते थे। इंदिरा गांध्ी आम लोगों और कार्यकर्ताओं से कुछ इस अंदाज में मिलती थी कि सामने वाले को वह अपने परिवार का सदस्य लगने लगती थी। उनके बीच एक अपनापन का रिश्ता कायम हो जाता था। बेशक, एक हद तक ये सारी खुबियां प्रियंका में भी दिखती है। इतना ही नहीं, सोनिया और राहुल के चुनाव क्षेत्रा की कमान सपफलतापूर्वक संभाल कर प्रियंका कई बार अपने कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय भी दे चुकी हंै। यही कारण है कि पार्टी के उफपर मुश्किलों के बादल जब-जब मंडराते हैं, कांग्रेस में प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग तेज हो जाती है। ऐसा ही हुआ जब पिछले माह महाराष्ट्र और हरियाणा का चुनाव परिणाम सामने आया। दोनों जगह कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गयी है। बेचैन कार्यकर्ताओं का एक खेमा बीते दिनों कांग्रेस के दिल्ली स्थित मुख्यालय 24, अकबर रोड पर बैनर-पोस्टर के साथ जमा होकर-‘प्रियंका लाओ कांग्रेस बचाओ’ के नारे लगाने लगे। इससे पूर्व इलाहाबाद और भोपाल में भी पोस्टर लगाकर ऐसी ही मांगे की गई थी।
हालांकि जब-जब प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की मांगे उठी पार्टी की ओर से बयान देकर उनके आने की संभावना को खारिज किया जाता रहा। इतना ही नहीं, प्रियंका खुद भी बराबर आगे आकर इंकार करती रही। जानकार बताते हैं कि भले ही प्रियंका जिस किसी कारण से सक्रिय राजनीति में आने से मना करती रही हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सियासत में उनकी गहरी दिलचस्पी है। यही कारण है कि वे एक लंबी अवध् िसे अपनी मां और भाई के लोकसभा क्षेत्रा में चुनावी अभियान को गति देती रही हैं। इतना ही नहीं, मां और भाई के लोकसभा क्षेत्रों ;अमेठी एवं रायबरेलीद्ध में जिला और ब्लाॅक स्तर के पदाध्किारियों का चुनाव करने में भी गहरी दिलचस्पी दिखायी है। प्रियंका के इंकार की बात पर विचार करते समय हमें इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि इंदिरा गांध्ी भी राजनीति मंे आने से पहले उहापोह की दौर से गुजरी थी। सोनिया गांध्ी भी पहले राजनीति में नहीं आना चाहती थी। इंदिरा गांध्ी की हत्या के बाद जब राजीव गांध्ी को प्रधनमंत्राी बनाने की बात हो रही थी, उस वक्त भी सोनिया ने राजीव को राजनीति में नहीं आने का अनुरोध् किया था। लेकिन समय के साथ राजीव गांध्ी राजनीति में आए और सोनिया भी सियासत में आई। ऐसे में यदि प्रियंका भी सक्रिय राजनीति में आने के सवाल पर ‘ना’ कहती है तो इसे अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए। क्योंकि यही प्रियंका कभी एक सवाल के जवाब में यह भी कह चुकी हैं कि यदि राहुल चाहेंगे तो वे पूरे उत्तर प्रदेश में भी चुनाव प्रचार कर सकती हैं। यह अलग बात है कि राहुल ने ऐसा नहीं चाहा, चुप्पी लगाए रहा। लिहाजा, प्रियंका अमेठी और बरेली से बाहर नहीं निकल सकी। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में जब प्रियंका अमेठी में राहुल के लिए प्रचार कर रही थी तो उस समय प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा ने भी पत्राकारों के साथ बातचीत में कहा था-‘उन्हें ;राजनीति मंेद्ध अवश्य आना चाहिए। जब समय सही होगा तो वे ऐसा करेंगी।’
लेकिन मुश्किल यह है कि बेटे के लाख नाकामियों के बाद सोनिया गांध्ी की पहली पसंद राहुल गांध्ी ही हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं-‘मेरे ख्याल से एक हिन्दुस्तानी मां तो बेटियों की बनिस्पत बेटे को ज्यादा आगे बढ़ाती ही है, एक इटालियन मां भी बेटे को ही ज्यादा चाहती हैं। ऐसे में बेटा यदि कमजोर हो तो मां उसकी ज्यादा पिफक्र करेगी ही।’ पूर्व विदेश मंत्राी एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद कहते हैं-‘राहुल गांध्ी हमारे नेता हैं, हमने उन्हें चुना है। दूसरे को क्यों तकलीपफ हो रही है। उन्होंने 10 साल हमारा पेट भरा है। अब बुरे वक्त में साथ कैसे छोड़ सकते हैं।’ पार्टी सूत्रों की मानें तो इन दिनों राहुल को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज कराने की तैयारी अंदर ही अंदर बड़ी खामोशी के साथ चल रही है। अगले वर्ष 2015 के जुलाई में कांग्रेस के नये अध्यक्ष का चुनाव होना है। सोनिया बीते 16 वर्षों से कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन हैं। वर्ष 1998 में कांग्रेस के कोलकाता अध्विेशन में उन्हें पार्टी की कमान सौंपी गई थी। लगातार इतना लंबा कार्यकाल किसी दूसरे अध्यक्ष का नही रहा। जहां तक राहुल गांध्ी की बात है, इन्हें 19 जनवरी 2013 को उपाध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया गया था। तब कांग्रेस ने पार्टी संविधन की व्यवस्था से अलग हटकर उन्हें पहले उस पद पर काबिज कराया और बाद में पार्टी संविधन में संशोध्न किया। अब उन्हें कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर काबिज कराने की तैयारी चल रही है। इतना ही नहीं, कांग्रेसी सूत्रों की मानें तो चुनावी सियासत में मुंह की खाने के बाद राहुल अब संगठन चुनाव के जरिए पार्टी को साध्ने की तैयारी में हैं। पार्टी के वर्तमान स्वरूप में राहुल को लेकर उठते विरोध्ी स्वरों के बीच कांग्रेस को ‘राहुलमय’ बनाने की रणनीति पर कदम बढ़ाए जाने की योजना है। इस रणनीति में अहम भूमिका निभाने की जिम्मेदारी पार्टी के महासचिवों को दी गई है। सूत्रा बताते हैं कि अब ये महासचिव अलग-अलग प्रांतों में संगठन चुनाव के जरिए राहुल गांध्ी के प्रति निष्ठावान कार्यकर्ताओं को आगे लाएंगे। राहुल के बेहद करीबी माने जाने वाले कार्यकर्ताओं को सूबे में संगठन चुनाव के दौरान पद पर काबिज कराने के निर्देश बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों के प्रभारियों को दिए गए हैं। इध्र कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि आखिर राहुल गांध्ी के नेतृत्व में पार्टी की जितनी बड़ी हार होती है उन्हें उतनी बड़ी प्रोन्नति क्यों दे दी जाती है। उत्तर प्रदेश के विधनसभा चुनाव में बुरी तरह असपफल होने के बाद उन्हें कांग्रेस के महासचिव से उपाध्यक्ष बना दिया गया था। इस वर्ष लोकसभा और दो राज्यों ;महाराष्ट्र व हरियाणाद्ध की सत्ता से बीजेपी के द्वारा खदेड़ दिये जाने के बाद अब उन्हें एक और प्रोन्नति मिलने की बात कही जा रही है। कहना न होगा, राहुल के चुनावी नाकामी का सिलसिला वर्ष 2010 से ही शुरू हो गया था। बिहार विधनसभा चुनाव के दौरान उन्होेंने जमकर प्रचार किया बावजूद इसके कांग्रेस 9 सीटों पर से घटकर 4 सीटों पर आ गई। उन्होंने वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश के विधनसभा चुनाव में तमाम दांव-पंेच लगाया लेकिन कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा 22 से बढ़कर बमुश्किल 28 पर ही जा सका। पिछले तीन सालों में अलग-अलग राज्यों में 18 विधनसभा चुनाव हुए जिसमें 14 में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। केंद्र की सत्ता कांपते हाथों से छूट गई।
बीते दिनों जब दिग्विजय का यह उदगार मीडिया में आया कि राहुल को अब कांग्रेस की कमान संभाल लेनी चाहिए तो पार्टी में विरोध् के स्वर मुखर हो गए। कई वरिष्ठ नेताओं ने श्री सिंह को निशाने पर लिया तथा जोरदार विरोध् दर्ज कराया। 10 जनपथ के वपफादार रहे बुजुर्ग नेता माखनलाल पफोतेदार भी इनमें से एक हैं। श्री पफोतेदार कहते हैं-‘दिग्विजय खुद नेता बनना चाहते हैं इसीलिए इस तरह की बातें कर रहे हैं।’ अंदर की बात यह है कि इन नेताओं ने यूं तो निशाने पर दिग्विजय सिंह को लिया लेकिन मकसद दिग्विजय की आड़ में राहुल का विरोध् करना था। हालांकि, सोनिया को राहुल के मामले में यह पहली बार विरोध् का सामना नहीं करना पड़ा है। इसी 28 अक्टूबर 2014 को पूर्व केंद्रीय मंत्राी सुबोध्कांत सहाय ने कहा था कि राहुल में लीडर की बजाय समाज सुधरक के गुण ज्यादा हैं। इससे पूर्व मध्यप्रदेश से आने वाले कांग्रेसी नेता ;अब निलंबितद्ध एवं पूर्व सांसद गुपफरान-ए-आजम कह चुके हैं-‘राहुल को दस वर्षों तक मौका दिया गया पर अब तक उन्होंने भाषण देना भी नहीं सीखा। उन्हें आज भी भाषण देना नहीं आता।’ गुपफरान-ए-आजम ने 14 जुलाई 2014 को सोनिया गांध्ी को एक पत्रा भी लिखा था उसमें उन्होंने कहा था-‘आज कांग्रेस से अध्कि आप अपने बेटे पर प्यार दिखा रही हैं। राहुल का सामान्य ज्ञान कम है और उन्हें पार्टी पर थोपा गया है।’ गुपफरान-ए-आजम के इस बयान के परिणामस्वरूप ही उन्हें पार्टी से निकाला गया था। पार्टी में कई लोग दबे जुबान से तो कई लोग मुखर होकर राहुल का विरोध् करने लगे हैं। यह अलग बात है कि प्रत्यक्ष रूप से ऐसे विरोध् करने वालों पर पार्टी की ओर से अनुशासनात्मक कार्रवाई भी होती रही है। अब सवाल उठता है कि क्या प्रियंका सचमुच कांग्रेस की डूबती नैया को पार लगा सकती है? प्रियंका की चाची मेनका गांध्ी कह चुकी हैं कि प्रियंका का ग्लैमरस भी पार्टी को ध्वस्त होने से नहीं बचा सकता। यह बात सही है कि प्रियंका के राजनीतिक कौशल का परिष्कृत रूप अभी सामने आना बांकी है। यह बात भी सच है कि प्रियंका गांध्ी ने अबतक राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई परीक्षा भी पास नहीं की है जिसमें उन्हें राहुल से ज्यादा अंक दिए जाए। लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि अबतक उन्हें ऐसी किसी परीक्षा में बैठने भी नहीं दिया गया है। दरअसल, प्रियंका की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनके पास राहुल गांध्ी के असपफलताओं के अतीत का बोझ नहीं है। हां, प्रियंका को पार्टी में लाने के पक्षध्र भी इस आशंका को खारिज नहीं करते कि उनके पति राबर्ट वाड्रा के विवाद को उनके विपक्षी प्रियंका के विरू( इस्तेमाल कर उन्हें असहज करते रहेंगे। प्रियंका की धर कुंद करने के लिए भाजपा ने बीते लोकसभा चुनाव के पहले से ही पूरी तैयारी कर रखी है। बीजेपी ने प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा के विरू( ‘दामाद श्री’ के नाम का एक बुकलेट भी लांच कर चुकी है। दरअसल, बीजेपी इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझती है कि अगर उसने गांध्ी परिवार का मनोबल तोड़ कर रखा तो वह कांग्रेस से आध्ी लड़ाई ऐसे ही जीतती रहेगी। उमा भारती ने प्रियंका की तुलना आईटम गर्ल राखी सावंत से कर चुकी हैं तो भाजपा के सुब्रह्मण्यम स्वामी प्रियंका को शराब पीने वाली एक बिगरैल लड़की के रूप में प्रचारित किया था। बेशक विरोध्यिों के द्वारा आगे भी ऐसे हमले होते रहेंगे लेकिन सही बात यह है वर्तमान में कांग्रेस का मनोबल जिस तरह से टूटा हुआ है, ऐसे में प्रियंका को यदि कमान सौंप भी दी जाती है तो पूर्व के स्वरूप में इसे तुरंत लाना आसान नहीं होगा।


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