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बच्चों के चरित्र निर्माण शिक्षक की भूमिका

Posted By wmadmin123 On October 22, 2013 @ 10:39 am In पड़ताल | No Comments

5 सितंबर को बच्चे शिक्षक दिवस मनाते हैं। सर्वपल्ली राधकृष्णन जी का योगदान शिक्षा जगत में सराहनीय था। आज के वातावरण को देखते हुए यदि हम ये आकलन करें कि शिक्षकों की भूमिका हमारे नौनिहालों के चरित्रा निर्माण में क्या है। शिक्षक हमारे समाज कीे नयी पीढ़ी के घड़ों को किस तरह गढ़ते हैं, किस प्रकार का रंग उन पर चढ़ाते हंै।

हमारी संस्कृति में हमारे समाज में बच्चों के चरित्रा निर्माण पर कापफी जोर दिया जाता था। पर आज की तारीख में यह मुा हाशिये पर चला गया है। जिन संस्कारों, जिन आदर्शांे की बात की जाती थी वो अब देखने को नहीं मिलती। जब बच्चे गुरुकुल में शिक्षा गzहण करने जाते थे तो उनके अंदर उन संस्कारों का बीजारोपण किया जाता था जो उन्हें जीवन के सार्थक मूल्यों से अवगत कराते थे। पर आज के बच्चें अपने आदर्श खुद गढ़ते हैं इसलिए उनके चरित्रा का निर्माण भी उसी दिशा में हो रहा है। जहां से वो चल रहे हैं, सोच रहे हैं इसलिए आये दिन अखबारों में ये खबर आना कि विद्यार्थी ने अपने शिक्षक की हत्या कर दी या बच्चों के समूह ने किसी शिक्षक की हत्या कर दी या बच्चों के समूह ने किसी शिक्षक को पीट डाला आम हो गया है। हमारी संवेदना का इतना ßास हो गया है कि इसे सिपर्फ एक खबर समझकर हम चुप रह जाते हैं। जिस देश में शिक्षकों के Åपर ही बच्चों के चरित्रा निर्माण का पूरा दारोमदार होता था वो अब मां-बाप, संगी-साथी, परिवार में बंट गया है। बच्चों की शिक्षा प्रणाली पर कोई चर्चा नहीं होती न ही बच्चों की परवरिश के ढंग पर। बड़ा सवाल उठता है कि बच्चों का भविष्य गढ़ने में शिक्षकों की क्या भूमिका है, आखिर किस तरह उनका भविष्य संवारा जाये।

हालिया एक सर्वेक्षण में 95 प्रतिशत शिक्षकों ने कहा कि वे कोर्स पूरा करने के लिए पढ़ाते हैं या उन्हें आमदनी का एक जरिया चाहिए इसलिए पढ़ाते हैं। सिपर्फ 5 प्रतिशत शिक्षक ऐसे हैं जो बच्चों के प्रति समर्पित हैं। औसतन का कहना है कि बच्चों को पढ़ाना उनका काम है इसलिये पढ़ाते हैं। आज के शिक्षक ये आंकड़ा तो रखते हैं कि उन्होंने पढ़ा दिया पर उनके शिष्य ने कितना सीखा इस पर वो गौर नहीं करते। पढ़ाना और सिखाना दो अलग बातें हैं। शिक्षक को ये ध्यान देना होगा कि उन्होंने जो पढ़ाया उसे हर बच्चे ने कितना सीखा, ऐसा नहीं होता क्योंकि शिक्षक हर बच्चे पर ध्यान नहीं दे पाता। हरेक बच्चा अपने में खास होता है इसलिए पढ़ाने की सामगzी भले सबके लिये एक होती है पर सब बच्चों के पढ़ने तथा समझने की क्षमता एक नहीं होती। शिक्षक को चिकित्सक जैसा होना चाहिए डाWक्टर पहले रोग की पहचान करता है पिफर दवा देता है पिफर अपने मरीज को बोलता है कि आपके स्वास्थ्य में कितना सुधर हुआ आकर बतायें। शिक्षक को भी ऐसा ही होना चाहिये जो बच्चें अच्छा प्रदर्शन नहीं करतें उनकी पहचान कर उन पर मेहनत की जानी चाहिये। आज विकास के दौर में बच्चों को कई प्रकार के टूल्स से पढ़ाया जाता है। कोई मौखिक सीखने में समर्थ होता है, कोई लिखकर, कोई मानचित्रा से कोई गzापफ से। आजकल स्कूलों में क्वीज में कांटेस्ट, इंटरव्यू कार्यक्रम, गुzप डिस्कसन, डायलाWग डिलीवरी आदि से भी बच्चों को सिखाया जाता है। आज के दौरे में सीखना पढ़ना और ज्ञान पाना कोई बड़ी बात नहीं है। इंटरनेट की दुनिया में बच्चों को असमय परिपक्व बना दिया है। समय से पहले मूल्यों का क्षरण हो गया है, आदर्शो को ताक पर रखना आम बात है। वैदिक युग वाली हालत आज नहीं है कि शिक्षा पर किसी जाति विशेष या वर्ग विशेष का अध्किार हो। द्वापर में एकलव्य यदि शिक्षा पाने की जिद करना है, गुरु द्वारा मना कर देने पर संकल्प ले कर कनिष्ठ भाव से दzोणाचार्य को अपना गुरु मान कर उनकी प्रतिमा बना कर उनके सामने साध्ना करते हुए विद्या में पारंगत होता है। दzोणाचार्य बिना विद्यादान किये एकलव्य से उसका अंगूठा जब दक्षिणा में मांग लेते हैं तो एकलव्य एक आदर्श शिष्य की तरह सहर्ष अंगूठा काट देता है। यहां गुरु पक्षपात करते हैं कुछ समाजविदों का कहना है कि जाति विशेष का आदमी पारंगत न हो इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई। आज के परिदृश्य में ऐसा नहीं है। सबके लिए व्यवस्था है परंतु शिष्य और शिक्षक के बीच जो मनोवैज्ञानिक संबंध् हुआ करता था आदर का भाव था वो भी आज लुप्त प्राय हो गया हैं। मेरी स्कूल की क्लास टीचर से जब मैं 25 साल बाद मिली तो मंैने उनके चरण स्पर्श करके कहा मैडम पहचानिये तो मैडम ने 2 मिनट मेरा चेहरा देखा और कहा नीलम तुम हो? उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। शाम को जब मैं उनके घर पर मिली तो उन्होंने कहा अब स्टूडेंट~स में पहली वाली बात नहीं रही। सब प्रोपफेशनल हो गये हंै। तब मुझे लगा कि शिक्षक शिष्य के रिश्ते कहां जा रहे हैं। यहां पर एक बात कहना चाहूंगी कि हमारे समय में प्राईवेट ट~यूश्नों का चलन न के बराबर था। आज घर-घर का बच्चा प्राईवेट ट~यूशन पढ़ता है, क्योंकि उसे अपना एकेडेमिक रिकाWर्ड अच्छा रखना है। जब शिक्षा और शिक्षक रजवाड़ों के लिए सिमट गये, दzोणाचार्य जैसे गुरु जब महलों में रहकर, शिष्यों के परिजनों का अनाज खाकर शिक्षा देने लगते हंै तो महाभारत जैसी घटनाएं घटित होती हैं। गुरुकुल में राजा हो या प्रजा सभी को समान भाव से रखा जाता था। जीवन शैली एक जैसी होती थी।

भीक्षाटन सबसे करवाया जाता था। ताकि शिष्य में अहंकार पैदा न हो। शिष्य अपनी इन्दिzयों पर संयम रख सके। एक विशेष विद्यालय के लिए विद्यार्थी को शुरू से ही उसी विद्या में ढाला जाता था कि वह उसी विद्या में पारंगत हो सके। पांच वर्ष की आयु से सीखता हुआ जब तक वह युवा होता 15 सालों में उस विद्या में पारंगत हो जाता था। जब ईस्ट इंडिया कंपनी आयी तो गुरुकुल की परंपरा को तोड़ने के लिए मैकाले ने नई शिक्षा नीति का निर्धरण किया। उसने शिक्षा के मद में खर्च करने के लिए राजकीय बजट बनवाया। कोलकाता और मुम्बई में काWलेज खुलवाये। उसकी सोच थी कि भारतीयों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो जो रक्त और रंग से भारतीय रहें पर सोंच और शैली अंगzेजों जैसी हो। शिक्षा महंगी हो गई और गरीब बच्चे शिक्षा से वंचित होने लगे। नई पति में सभी को सभी विषय पढ़ाया जाने लगा। देश की मानसिक शक्ति का ßास तथा विघटन यहीं से शुरू हो गया।

आज जरूरत है ऐसी व्यवस्था कि जिसमें बच्चों के लिए प्रतिदिन नैतिक शिक्षा का एक पीरियड अनिवार्य हो जाये। बच्चों की रिपोर्ट कार्ड पर उनके बिहेवियर और एटिट~यूड का भी आकलन हो तो शिक्षक के साथ मां-बाप भी बच्चे के नैतिक विकास के प्रति सचेत हो जायेंगे।


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