September 26, 2018

बिहार विधान परिषद चुनाव क्या इस बार भी चलेगा शहाबुद्दीन का सिक्का

By wmadmin123 - Wed Jul 22, 8:55 am

अविनाश कुमार

वैसे विधन परिषद चुनाव में अभी कुछ समय बाकी हैं लेकिन दलों के समर्थित प्रत्याशी अपनी जोड़तोड़ में लग चुके हैं। अब देखना है कि इस बार मो शहाबुद्दीन का वरदहस्त किसे मिल पाता है। महागठबंध्न का कौन उम्मीदवार होता है। पिछली बार की तरह इस बार भी दरौंदा की विधयिका कविता सिंह के पति बाहुबली अजय सिंह दक्षिण खण्ड के कुख्यात खान ब्रदर्स के छोटे भाई व जदयू जिला सचिव चान्द खान के साथ-साथ पूर्व विधन पार्षद व बीते लोकसभा प्रत्याशी मनोज कुमार सिंह का भी चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। महागठबंध्न में राजद खेमंे से पूर्व विधनसभा उम्मीदवार विनोद कुमार सिंह भी उम्मीदवार बनाये जा सकते हैं। कांग्रेस के भी पूर्व प्रदेश कोषाध्यक्ष सह पूर्व उपाध्यक्ष आॅल इंडिया हैंडलूम बोर्ड व वर्तमान बिहार प्रदेश कांग्रेस प्रतिनिध् िजीतेंद्र गुप्ता भी उम्मीदवार हो सकते हैं। अगर शहाबुद्दीन समर्थकांे की बात करें तो बीके सिंह ही शहाबुद्दीन समर्थित महागठबंध्न के होने वाले विधन परिषद चुनाव के उम्मीदवार हैं। वैसे मनोज सिंह और अजय सिंह से शहाबुद्दीन का छत्तीस का आकड़ा है तो खान ब्रदर्स से भी उनके रिश्ते अलग हैं। जेल में बंद पूर्व सासंद मो. शहाबुद्दीन कभी नहीं चाहेंगे कि मनोज अजय या खान ब्रदर्स के भाई महागठबंध्न के उम्मीदवार हो या चुनाव जीते। ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आ रहा है दलों के प्रत्याशी में बेचैनी क्षेत्रा से लेकर राजधनी पटना तक देखने को मिल रही है। उध्र, शराब करोबार से जुडे़ टुन्ना जी पाण्डेय भाजपा समर्थित दलों के उम्मीदवार एक बार पिफर होंगे। पिछली बार हुए उपचुनाव में उन्होेंने अजय सिंह को मात देकर यह सीट जीती थी। उस बार राजद समर्थित विनय पाण्डेय को शहाबुद्दीन का साथ मिला, लेकिन इस बार उनके लड़ने की चर्चा जिले में नहीं है। उनकी जगह बीके सिंह का चुनाव मैदान में आना तय माना जा रहा है। दूसरी ओर दक्षिण खण्ड के बाहुबाली खान ब्रदर्स अयूब रईश के छोटे भाई दावा अपने कार्यांे व पार्टी के लिए किये गये कार्यों को लेकर है। उनका कहना है कि जदयू जिला अध्यक्ष मंसूर आलम से लेकर वरीय नेता शिवप्रसन्न यादव सहित राजद खेमंे के भी कई बड़े नेता उनके संपर्क मे हंै। उनका कहना है कि अगर महागठबंध्न के वे उम्मीदवार हुए तो उनकी जीत तय है। किसी पार्टी के समर्थित उम्मीदवार नहीं होने की स्थित में वे निर्दलीय भी अपना भाग्य आजमा सकते हैं। इस बावत उनके बड़े भाई और एक माह पूर्व जेल से बाहर निकले अयूब खान भी हर हाल में चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं। मनोज सिंह की पकड़ कोआॅपरेटिव अध्यक्ष रहने व पूर्व विधन पार्षद होने को लेकर है। लेकिन उनका पत्ता पूर्व सासंद मो. शहाबुद्दीन काट रहे हैं। वे खुलकर कहते हैं कि को-आॅपरेटिव अध्यक्ष और पूर्व पार्षद चुनाव जितने को लेकर हर विजयी सदस्य के बीच अच्छी पकड़ है। और उनके द्वारा कराये गये अनेक कार्यों को लेकर मतदाता आज भी उनके साथ हैं वे भी महागठबंध्न समर्थित उम्मीदवार न होने पर निर्दलीय चुनावी समर में कूद सकते हैं।
सूत्रा बताते हैं कि शहाबुद्दीन के साथ रहे मनोज सिंह शहाबुद्दीन समर्थक रियाजुद्दीन की हत्या वर्ष 2004 में अजय सिंह के गांव में हो जाने के बाद उनसे अलग हो गए और 2006 में जब शहर के अस्पताल रोड़ में उनके छोटे भाई मृत्युंजय सिंह की हत्या हो गई तो उसके बाद मनोज सिंह पूरी तरह शहाबुद्दीन विरोध्ी हो गये। रियाजुदिन की हत्या का ठीकड़ा अजय सिंह पर भी पफोड़ा गया था जिसे लेकर सिसवन कांण्ड सख्या 125/4 दर्ज हुआ। उस समय भी पूरा शहाबुद्दीन खेमा अजय सिंह का विरोध्ी रहा। खासकर मुसलमानों का एक बड़ा तबका जो पूर्व सासंद के नजदीकी रहे शायद इसी बावत पूर्व विधन परिषद उपचुनाव में भी शहाबुद्दीन ने अजय सिंह के महागठबंध्न के प्रत्याशी होने के बाद भी उनका साथ नहीं दिया। बाद में अजय सिंह ने खुलकर कहा भी था कि मो. शहाबुद्दीन को महागठबंध्न रास नहीं आ रहा है। उन्हांेने कहा था कि जिले में नेता से लेकर कार्यकर्ता तक सबों ने महागठबंध्न की भावना के अनुरूप काम किया पर पूर्व सासंद द्वारा एक जुटता नही दिखाई गई। लिहाजा, इन तीनों नेताओं को इस बार भी शहाबुद्दीन की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। जदयू के जिला अध्यक्ष मंसूर आलम खुलकर कहते हैं कि जो भी गठबंध्न का उम्मीदवार होगा उसे समर्थन दिया जायेगा और उनकी जीत तय है। टुन्ना जी पाण्डेय भाजपा उम्मीदवार के रूप में पूरे जिले का दौड़ा कर रहे हैं और अपनी पकड़ हर पंचायत बार बढ़ाने में लगें हैं। उनका कहना है कि लगभग एक साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने सभी को सुना और विकास कार्यों को जनता तक पहुंचाया । प्रधनमंत्राी मोदी की लहर का असर इस बार भी देखने को मिलेगा। अब देखना यह कि आने वाले विधन परिषद चुनाव में महागठबंध्न की राजनीति का असर कहां तक देखने को मिलता है। वैसे तो सभी आठ विधयक और बडे़ नेता विधन परिषद चुनाव को लेकर कुछ कहने से कन्नी काट रहे हैं लेकिन बीते विधन परिषद चुनाव का असर इस बार भी देखने को मिलगा कि नहीं, यह बड़ा सवाल है। इतना ही नहीं, यह देखना भी कापफी दिलचस्प होगा कि जिले मंे जेल की सलाखों के पीछे की राजनीति होती और शहाबुद्दीन का एक बार पिफर सिक्का चल पाता है या नहीं। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि कौन होगा शहाबुद्दीन का उम्मीदवार?

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