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भ्रष्टाचार और लोकतंत्र

Posted By wmadmin123 On October 22, 2013 @ 10:46 am In विमर्श | No Comments

हमारे देश में भ्रष्टाचार लोकतंत्रा की जड़ में इस कदर अपनी पैठ बना चुका है कि इसे उखाड़ पफेंकना हम सबके लिए एक बड़ी चुनौती है। सच तो यह है कि आजादी पश्चात ही भ्रष्टाचार ने अपने पांव धीरे-धीरे पसारने शुरू कर दिए थे। विगत छ: दशकों में धीरे-धीरे फैलते हुए भ्रष्टाचार ने पूरे देश को लूट लिया है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि आजादी पश्चात एक के बाद एक सत्तारूढ़ होने वाली सरकारों ने भ्रष्टाचार से कड़ाई से निपटने के लिए कोई उत्साह तो नहीं ही दिखाया बल्कि अपनी निजी स्वास्र्थ खातिर लीपापोती करने में ज्यादा रूचि दिखाई। यही कारण है कि भ्रष्टाचार फलता-फूलता रहा और इसकी जड़ें और गहरी होती चली गई।

वर्तमान समय में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को भ्रष्टाचार का गढ़ मानना गैरमुनासिब नहीं होगा। चुनावी मौसम आते ही हर राजनीतिक पार्टियांे के घोषणा पत्रा में भ्रष्टाचार हटाना है एजेंडा सबसे उफपर रहता है। हास्यास्पद बात तब होती है जब उसी राजनीतिक पार्टी के नेतागण सत्ता में आने के पश्चात ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं। वर्तमान राजनीति अब लोकतंत्र में सेवा कम व्यापार का रूप ज्यादा ले चुकी है। आज के समय में राजनीति कारपोरेट जगत के निवेश का माध्यम बन चुकी है। जब तक हमारे देश में राजनीतिक पार्टियों को खड़ा करने में औद्योगिक घरानों द्वारा अरबों का निवेश होता रहेगा तब तक बाहुबली अपने बल पर जनमत खरीदते रहेंगे एवं देश की भोली-भाली एवं भावुक जनता को अपने खोखले वादों के जाल में फंसाकर झूठे सपने दिखाकर ठगते एवं लूटते रहेंगे। साथ ही साथ सापफ सुथरे एवं नैतिक चरित्रा वाले व्यक्तियों को विधनसभा एवं संसद के बाहर का रास्ता दिखाते रहेंगे।

अगर हम केंदz सरकार द्वारा अभावगzस्त लोगों के लिए चलाई जा रही महत्वाकांक्षी योजना नरेगा की बात करें तो केंदz सरकार का यह नरेगा कार्यक्रम अब तक भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केंदz बन चुका है। सरकार गरीबों के लिए सस्ते दर पर अनाज, तेल आदि उपलब्ध् कराती तो जरूर है लेकिन वास्तविकता यह है कि वे सस्ती चीजें गरीबों तक न पहुंच कर सीधे बाजार में पहुंच जाती है।भ्रष्टाचार की ये चरम सीमा इस देश को कहां ले जाएगी जहां गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर मंत्राी, अध्किारी बाबू, चपरासी भzष्टाचार रूपी गंगा में स्नान कर दोनों हाथों से जनता का धन लूट रहे हैं।

राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाहों की मिलीभगत के कारण हमारे देश का कोई भी क्षेत्रा ऐसा नहीं है जो भ्रष्टाचार से अछूता रह गया हो। देश की दिनोंदिन बद से बदतर स्थिति होती जा रही है। अमीर लोग और अध्कि अमीर हो रहे हैं और गरीब लोग और गरीब। एक ओर हमारी सरकार का मानना है कि देश महाशक्ति बनने के मार्ग पर है और दूसरी तरपफ लोग भूख और गरीबी से दम तोड़ रहे हैं। अत्याचार और अनाचार दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है।

हालांकि अन्ना हजारे जैसे नेता नैतिक आंदोलन कर अपने जोशीले भाषणों के द्वारा लोकतंत्र को भzष्टाचार मुक्त बनाने के मुहिम से जुड़ा हुआ है। पिफलहाल ऐसे विषैले वातावरण में शुचिता की बात करना एक स्वप्न सा लगता है।


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