October 21, 2017

मंथरा की जय हो |

Photo GalleryBy wmadmin123 - Mon Oct 21, 11:08 am

उस दिन ‘कमलदह पोखरा’ के नजदीक पीपल वृक्ष की छांव में कलयुगी राम और सीता के दर्शन हो गये। साथ में सुंदरी मंथरा ;कुबड़ी नहींद्ध भी थी। माता-पिता के वानप्रस्थ हो जाने के बाद ये लोग भौतिक सुख का आनंद ले रहे थे। मैं भी कभी-कभार इस पोखरा के दर्शनार्थ आते रहता हूं। आज तो पोखरा से कुछ कमल-पुष्प लेने आया था जिसे एक साहित्यिक गोष्ठी में साहित्यकारों को समर्पित करना था। सुनता हूं कि कुछ साहित्यकार ‘कमल-पुष्प-गुच्छ’ को बहुत पसंद करते हैं और कुछ तो भटकटैया से ही संतुष्ट हो लेते हैं।

उधर कलयुगी सीता बड़े प्रेम से कह रही थी-‘अरी मंथरा दाई मां, तुमने तो कमाल ही कर दिया। त्रोता मंे तुमने अयोध्या के राम-सीता को वनवास भिजवाया था। पर कलयुग में जिस कला-कौशल से मेरे सास-ससुर को वानप्रस्थ पर भेजवाया है, वह न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि वंदनीय भी है। सोचती हूं कि कलयुग की प्रत्येक कुलतारण वध्ू को तुम जैसी मंथरा से गुप्त मंत्राणा लेनी चाहिए।’

‘महारानी जी, मैं कभी त्रोता में तुम्हारी तात्कालीन सौतेली सास कैकेयी के साथ लौंडी के रूप में आयी थी। उíेश्य था-केवल और केवल महारानी कैकेयी की हित-साध्ना और उनकी सेवा। परंतु, अब लांैडी भेजने की परंपरा टूट सी गयी है। खुलेआम अब विवाहित कन्या के साथ कोई औरत लौंडी बनकर जाना पसंद नहीं करती। इतनी चेतना तो दलित औरतों में भी आ ही गयी है। परंतु, आप जैसी ‘मैंडमों’ का जबतक अस्तित्व रहेगा, ‘मंथरायें’ कभी मर नहीं सकतीं। हां, वह अब दूसरे रूप में दूसरा रौल अदा कर रही है। वह अब किसी राम-सीता ;नव वर-वध्ूद्ध को वनवास नहीं भेजवाती। प्रत्युत उसकी जगह उसके लाचार मां-बाप ;या सास-ससुरद्ध को ही वानप्रस्थ पर जाने के लिए बहू को गुरु मंत्रा देती है। वह भी मुÝत में नहीं, बाजप्ता पफीस लेकर। सत्ता सुख प्राप्ति ;यानी घर की मालकिन बननेद्ध पर ‘मंथरा’ का हिस्सा तो होना चाहिए न? आप जैसी मैडम तो हिस्सा से कुछ अध्कि ही दे डालती है। ‘मैडम जी, आप मेरे रूप को गांव से लेकर बड़े-बड़े शहरों तक लोग देख सकते हैं। जरूरत है तो थोड़ा प्रयास करने की।’ सुन्दरी मंथरा ने कहा।

अरी मंथरा मां, तुमने इतने गुण कहां से सीखें? घर-घर में सास-बहू के बीच कलह पैदा करने की विशिष्टता तुमने कहां से पायी? तुम लोगों ने ;मंथराओंद्ध कुछ बहुओं को इतना योग्य बना दिया है कि वे बहुएं सास-ससुर के लिए वानप्रस्थ पर जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं छोड़तीं। तुम्हारी इस कला की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही होगी। कहकर कलयुगी सीता ने ‘मंथरा मंत्राणा’ को एक नयी उफंचाई दी।

मंथरा प्रपफुल्लित हो बता रही थी-‘मैडम जी, मैं जानती हूं कि आज की प्रत्येक बहू ;आपके समान हीद्ध ससुराल आते ही एक स्वतंत्रा राज की कामना करने लगती है जिसमें मियां-बीबी, बच्चे के अतिरिक्त कोई दूसरा न हो। मैं भी चाहती हूं कि इस तरह की बहुएं मुझे मिल जायं ताकि मेरी भी जीविका चलती रहे। ऐसी बहुओं में सर्वप्रथम आत्म गौरव का बीज बोती हूं। मैं सदा उसे ‘पंचलीटरा’ किरासन तेल के डिब्बा से सावधन करती हूं कि सास दहेज के नाम पर तुम्हें जला भी सकती है। उन बहुओं को पिफर तीन सूत्राी एजेन्डा क्रियान्वयन हेतु थमा देती हूं जो निम्नांकित हैं:-

प्रथम सूत्रा: इसमें पति परमेश्वर को ‘पालतू’ बनाना है। इसके लिए बहुओं को मध्ुर शब्द जाल में उन्हें पफांसना है तथा उनकी प्रत्येक सेवा के लिए तत्पर रहना है। गर एक बार पति जी ‘पालतू’ बन गये तो समझिये-बेड़ा पार। तब वे मां-बाप के समर्थन में कुछ नहीं बोल सकते। आप तो जानती ही हैं। खुलकर क्या बताया जाये।

दूसरा सूत्रा: मां-बाप को इतना ही ‘खर्चा’ दिया जाय ताकि उनके प्राण बचे रहें और पोषक तत्व सेवन के लिए जी सदा ललचता रहे। दूसरे शब्दों में जैसे पूर्णिमा के बाद चांद की गति होती है, वही गति कायम रहे।

तीसरा सूत्रा: इस सूत्रा में मां-बाप को कुछ अवध् िके लिए ‘राशन-पानी’ नहीं देना है। बहुएं इसके लिए बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, बीमारी का इलाज एवं लोन अदायगी का बहाना बना सकती हैं। स्वाभाविक है कि जैसे-जैसे दीये में तेल की मात्राा कम होगी, रोशनी भी क्रमश: क्षीण होती जायेगी। ये बूढ़े-बूढ़ी स्वत: कमजोर पड़ते जायेंगे और एक दिन विवश हो क्षुधपूर्ति के लिए घर-द्वार त्याग कर वानप्रस्थ हो जायेंगे। यही तो ‘तीन सूत्राी एजेन्डा’ का मूल उíेश्य था।

आप जब सत्ता हासिल कर लेंगी तो स्वभावत: आप मेरी पफीस देंगी ही। लोगों ने दिया भी है। कलयुगी ‘सीता-मंथरा’ का संवाद सुन मेरा âदय गद-गद हो गया। यह हमें भी ज्ञात है कि इस कलयुगी मंथरा को ‘मैडम’ की ओर से कुछ राशि मंथली मिल रही है। वैसे भी, यह सौदा उनके ;मैडम केद्ध लिए महंगा नहीं है। गोष्ठी का समय हो जाने के कारण मैं वहां और अध्कि समय नहीं दे सका, इसका मलाल तो रहेगा ही।

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