- lokprasang - http://lokprasang.in -

मगध की सियासत में क्या गुल खिलाएंगे जीतनराम मांझी?

Posted By wmadmin123 On July 22, 2015 @ 8:43 am In ज़िलानाम | No Comments

विनोद प्रसाद ‘विरोध्ी’

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद नीतीश कुमार ने अपने शागिर्द जीतनराम मांझी को सीएम की कुर्सी पर बैठाया और महादलित समुदाय के लिए तथाकथित प्रेम का इजहार कर अपना पद त्याग दिया तब वे सपने में भी नहीं सोचा होगा कि मांझी के कारण उन्हें भी पफजीहत उठानी पड़ेगी।
पिफलवक्त जीतनराम मांझी सत्ता से बाहर हैं और अपनी अलग पहचान बनाने के लिए सूबे के महादलितों को गोलबंद करने में जुटे हैं। इस अभियान में वे अपने गृह जिला समेत मगध् प्रमंडल के तमाम विधनसभा क्षेत्रों पर भी नजर गड़ाये हंै। मगध् की राजनीति में महादलितों के वोट बैंक भी विभिन्न राजनीतिक दलों के जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मगध् के महादलित आगामी विधनसभा चुनाव में किसके साथ होंगे? चूंकि अब तक अध्किांश राजनीतिक दल महादलितों को मोहरा बना कर इस्तेमाल करते रहे हैं। सवाल यह भी है कि मगध् के महादलित जीतनराम मांझी के साथ होंगे या महादलित प्रेम का स्वांग भरने वाले बिहार के सीमए नीतीश कुमार के साथ अथवा कोई और विकल्प की ओर रुख करेंगे?
1980 से कांग्रेस की राजनीति में कदम रखने वाले जीतनराम मांझी गया जिले के पफतेहपुर बोध्गया और बाराचट्टी ;सुरक्षितद्ध के टिकट पर मखदुमपुर ;जहानाबादद्ध विधनसभा क्षेत्रा का प्रतिनिध्त्वि कर रहे हैं। हवा का रुख भांप कर पाला बदलने में माहिर जीतनराम मांझी को गत लोकसभा चुनाव में जदयू ने गया
;सु.द्ध लोकसभा से उम्मीदवार बनाया था लेकिन भाजपा की मोदी लहर में उनका पत्ता सापफ हो गया। यहां के मतदाताओं ने उन्हें तीसरे पायदान पर पहुंचा दिया। यह अलग बात है कि चुनाव में पटकनी खाये जीतनराम मांझी को अपना विश्वासपात्रा समझ कर सूबे का ताज पहना दिया। इस दौरान नौ महीने के मांझी सरकार में जो हाई वोल्टेज ड्रामा चला वह सर्वविदित है।
मगध् की सियासी राजनीति में भाजपा भी छक्के पे छक्का लगाने में जुटी है। गत लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने गठबंध्न के सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के सहारे मगध् प्रमंडल के चारो लोकसभा क्षेत्रा गया, जहानाबाद, नवादा और औरंगाबाद की सीटों पर अपना अध्पित्य जमा लिया तथा अपने वोटों में भी भारी इजापफा कर चुकी है। इध्र जदयू-राजद गठबंध्न से जीतनराम मांझी के अलग होने से भाजपा की राह और भी आसान हो गयी है। वह भी अपनी राजनीति को चमकाने की जुगत में भिड़ चुकी है। राजनीतिक हलकों में यह आम चर्चा है कि भाजपा आगामी विधनसभा चुनाव में महादलित वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। भाजपा मांझी के सहारे नीतीश पर हमला कर सत्ता पाने में भले ही कामयाब नहीं हुआ किंतु अपने मिशन में वह कामयाब जरूर हो गई है। इसका असर मगध् की सियासी राजनीति पर भी पड़ने की पूरी गुंजाईश है। मगध् प्रमंडल अंतर्गत 26 विधनसभा क्षेत्रों में छः विधनसभा क्षेत्रा सुरक्षित है। इनमें गया जिले में इमामगंज, बाराचट्टी व बोध्गया, नवादा जिले में रजौली जहानाबाद में मखदुमपुर तथा औरंगाबाद जिले में कुटुम्ब विधनसभा क्षेत्रा शामिल है।
जीतनराम मांझी बोध्गया के अलावे बाराचट्टी विधनसभा क्षेत्रा से वर्ष 1997 में राजद तथा वर्ष 2005 में जदयू के टिकट पर प्रतिनिध्त्वि कर चुके हैं। यह क्षेत्रा समाजवादी नेत्राी व पत्थर तोड़ने वाली के नाम से विख्यात दिवंगत भागवती देवी का गढ़ रहा है। वे यहां से 1967 से लेकर 1997 तक तीन बार प्रतिनिध्त्वि की थी। इतना ही नहीं वर्ष 1997 में गया संसदीय क्षेत्रा का भी प्रतिनिध्त्वि उन्होंने किया था। वहीं इनके मरणोपरांत इनकी बेटी समता देवी राजद के टिकट पर वर्ष 2004 के उपचुनाव में जीत दर्ज की थी। दिवंगता भागवती देवी के छोटे बेटे विजय कुमार मांझी भी 2005 के चुनाव में जदयू के टिकट पर विधयक चुने गये थे। लेकिन सात दिनों वाली नीतीश की अल्पमत सरकार में वे विधनसभा का मुंह भी नहीं देख सके। तब दुबारा विधनसभा चुनाव में जदयू ने जीतनराम मांझी को टिकट देकर उम्मीदवार बनाया तथा प्रतिनिध्त्वि करने का अवसर हासिल हो सका। लेकिन क्षेत्रा की अनदेखी के कारण यहां के मतदाताओं ने 2010 के इस चुनाव में राजनीति से अलग रहने वाली और इनकी ही समध्नि ज्योति मांझी को टिकट देकर जीत का सेहरा भी पहनाया। इस दौरान जीतनराम मांझी से यहां के मतदाता इतने नाराज थे कि बाराचट्टी के एक जनसभा में नीतीश कुमार की मौजूदगी में ही मांझी के खिलापफ नारेबाजी की गयी और भीड़ ने उन्हें मंच से नीचे उतर जाने के लिए विवश कर दिया था। आम मतदाताओं का प्रतिरोध् और समध्नि के यहां आ जाने के कारण जीतनराम मांझी को अपने पड़ोस के क्षेत्रा मखदुमपुर ;जहानाबादद्ध में जुगाड़ लगाना पड़ा। तब कहीं जाकर उनकी राजनीति बरकरार रही। ऐसे में यह कहना बड़ी ही मुश्किल है कि मगध् की सियासी राजनीति में जीतनराम मांझी कोई करिश्माई चमत्कार कर सकते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण यह भी है कि जब जीतनराम मांझी अपनी सत्ता बचाने के लिए बहुमत के जुगाड़ में थे तब मगध् विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान गया आये तो उनके साथ जिले के दो विधयक को छोड़ कोई भी संगठन अथवा अन्य दल के कोई प्रतिनिध् िसाथ नहीं थे। इनमें एक थी बाराचट्टी विधयिका व उनके समध्नि ज्योति मांझी तथा दूसरे थे टिकरी के विधयक व पूर्व मंत्राी अनिल कुमार। इसके पूर्व जब भी जीतनराम मांझी का गया दौड़ा रहा समूचे प्रशासन के साथ-साथ जदयू-राजद के लोग साथ दिखे। जिसका एहसास शायद मांझी को भी खटका हेागा?
यह अलग बात है कि जीतनाम मांझी के अपने नौ माह के शासनकाल के दौरान अंतिम क्षण में एक से बढ़कर एक जनोपयोगी विध्ेयक कैबिनेट पास करा लिया जिसमें से मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार ने 34 विध्ेयकों को रद्द कर दिया है। जिसको लेकर मगध् के महादलितों समेत अन्य वर्गों में खलबली मची है और इसका खामियाजा भी जीतनराम मांझी के बजाय नीतीश कुमार को भुगतना पड़ सकता है। भाजपा समेत तमाम छोटे-बड़े दल इस मुद्दे को आगामी विधनसभा चुनाव में उछालेगी जिससे नीतीश के वोट बैंक में भारी असर पड़ सकता है। हालांकि, किसका होगा महादलित, इस मुद्दे पर सियासी दलों के बीच ताबड़तोड़ बयानबाजी जारी है। इस बयानबाजी के साथ-साथ पूरे घटनाक्रम को जनता दिल थामकर देख और सुन रही है। जनता का निर्णय क्या होगा यह तो समय बताएगा लेकिन जीतनराम मांझी को जिस तरह बेआबरू करके नीतीश ने गद्दी से उतार दिया इससे महादलित समुदाय व्यथित जरूर है।

 

 


Article printed from lokprasang: http://lokprasang.in

URL to article: http://lokprasang.in/%e0%a4%ae%e0%a4%97%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2/

Copyright © 2013 News World. All rights reserved.