September 24, 2018

मनुष्यता को विलोपित कर देगी संवेदना, आस्था-विश्वास की संकीर्णता

By wmadmin123 - Wed Feb 04, 7:37 am

नंदकिशोर नंदन

जहां विवेक की अनुपस्थिति है वहां जड़ता और कट्टरता का आना स्वाभाविक और अनिवार्य है। कट्टरता हमेशा आस्था की दुहाई देती है। कट्टरपंथी कभी-कभी उसे भावना या संवेदना का नाम दिया करते हैं। यह कट्टरता ध्र्मान्ध्ता की परिणति है जिसका विचार अथवा भावना से दूर-दूर तक कोई संबंध् नहीं होता। आज दुनिया की आतंकी घटनाओं में निर्दोष मनुष्य बड़ी संख्या में मारे जा रहे हैं। क्या ध्र्म का जन्म इस मनोहर पृथ्वी और मनुष्य ;सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणीद्ध के जीवन को रक्त-रंजित करने के लिए हुआ था या कि उसे और मनोहारी बनाने और आनंद से परिपूर्ण करने के लिए? भूमण्डलीकरण की इस विकासशील इक्कीसवीं सदी में समूची दुनिया में हिंसा का यह ताण्डव क्यों हो रहा है? क्यों नहीं यह विश्व एक सुखी गांव के समान मानवीय संबंधें की उष्मा से उद्वेलित हो विकास के उस पथ पर अग्रसर हो रहा है जहां भुखमरी, बेकारी, रोग, कुपोषण और अशिक्षण आदि की भयावह चुनौतियों और प्रश्नों के समाधन मिल सकते हैं? बोको हराम द्वारा हजारों का कत्लेआम हो या पेरिस में अभी-अभी कार्टूनिस्टों-सम्पादकों की हत्या अथवा पेशावर में बच्चों की हिंसा-यह विकास नहीं, विनाश का ही संकेत है।
वस्तुतः राजनीतिक सत्ता का चरित्रा प्रायः सभी देशों में कुछ इस तरह मनुष्य विरोध्ी होता जा रहा है कि वह जनता को प्रभु मानने की जगह उन तत्वों का सहारा ले रही है जो मनुष्य के लिए बहुत पहले ही अपना अर्थ और प्रासंगिकता खो चुके हैं। उन्हीं तत्वों में एक भयावह तत्व है-ध्र्म। जिस धर्मिक आस्था की आड़ में अपने देश में भी दंगों की रथ-यात्रा कर दिल्ली पहुंची सरकार हिन्दू कट्टरवादी ताकतों को प्रश्रय दे रही है, वह स्वयं ‘सबका साथ सबका विकास’ के लुभावने वादे को झूठा साबित कर रही है। जिस तरह हिन्दू राष्ट्रवाद को स्थापित करने की चेष्टा में दक्षिणपंथी सक्रिय हैं, उससे बीस रुपयों पर जीने वाले अस्सी करोड़ों की नारकीय जिंदगी मंे कभी कोई सवेरा नहीं आयेगा। बल्कि सरकार की यह दोमुंही नीति उनके जीवन को कुम्भीपाक में बदल कर रख देगी। हम जिस राष्ट्रीयता की कल्पना को साकार करने में विश्वास करते हैं उसके संबंध् में क्रांतदर्शी उपन्यासकार प्रेमचंद ने 8 जनवरी 1934 में अपने लेख ‘क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?’ में लिखा था-‘राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, समाज में सभ्य भाव का दृढ़ होना। इसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना नहीं की जा सकती।’ इस व्यापक राष्ट्रीयता की जगह सम्प्रदायवादी जातिपरक राष्ट्रीयता कट्टरता और बर्बरता के उस अंध्कार काल में देश को ले जायेगी जहां से मानवीय विकास का रास्ता बहुत मुश्किल हो जायेगा।
तमिल उपन्यासकार पेरूमल मुरूगन के उपन्यास ‘मथोरूभागन’ के अंग्रेजी संस्करण ‘वन पार्ट वुमेन’ पर दक्षिणपंथियों का हंगामा हो अथवा ‘पीके’ पिफल्म पर प्रदर्शन-ध्रना या ‘दुर्गावाहिनी’ पत्रिका द्वारा सैपफ-करीना के विवाह को नया लव जिहाद का नाम देना अथवा साक्षी महाराज द्वारा हर हिन्दू स्त्राी से चार बच्चे पैदा करने का आह्वान, ये सारी घटनाएं भाजपा और उसके साथ गहरे स्तर पर सम्ब( इन संगठनों की मिलीभगत को ही सम्पुष्ट करती है। ये संगठन किस भावना या संवेदना के आहत होने की बात करते हैं? क्या मनुष्य जाति की भावना या संवेदना भी विभाजित होती है?
संपूर्ण विश्व में हम कहीं भी चले जाएं, बच्चा एक ही तरह से जन्म लेता है, वह एक ही तरह से रोता है, एक ही तरह से हंसता-मुस्कुराता है। ऐसा न कभी देखा-न सुना कि हिन्दू का बच्चा अलग तरह से जन्म लेता है और मुसलमान का बच्चा दूसरी तरह से। सबका रोना-हंसना भी एक जैसा होता है। दक्षिणपंथियों के अनुसार तो अब हमारी संवेदना और संवेग भी बंट जायेंगे। यह हुई हिन्दू हंसी, यह हुई मुस्लिम हंसी। वैसे ही यह ईसाई हंसी, यह ईसाई रूलाई। संवेदना या आस्था-विश्वास की यह संकीर्णता निस्संदेह मनुष्यता को ही विलोपित कर देगी। ‘सवार उफपरि मानुस तहार उफपरि नाई’ कहने वाले चण्डीदास का विश्वास भी मनुष्य मात्रा की श्रेष्ठता में रहा है, किसी अदृश्य ईश्वर में नहीं है जिसके नाम पर हजारों-लाखों की बर्बर हत्या होती आई है और आज भी हो रही है।
विकास की पूंजीवादी अवधरणा से मुनापफा केंद्रीय तत्व है और मनुष्य जाति को वहां कोई ‘स्पेस’ नहीं है क्योंकि न वहां सहिष्णुता होती है न नैतिकता। इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि विगत आठ महीनों में देश में जो असहिष्णुता का वातावरण बना है, उसमें सामान्य जन की दैनिक जीवन स्थितियों को सुधरने की कैसी पहल हो रही है? पहल तो यह हो रही है कि जैसे कारपोरेट घरानों को अध्कि से अध्कि लाभ पहुंचाया जाय। प्रसंगात् यह याद दिलाना जरूरी है कि विचारधरा के अंत की घोषणा के इस युग में भी क्यूबा ने आज के भारत की तरह धर्मिक कट्टरता और असहिष्णुता का रास्ता अपनाया होता, तो वह विकास का मानक नहीं बनता। सत्ता की बागडोर संभालने वाले पिफदेल कास्त्रो ने कहा था-‘क्यूबा भय करना नहीं जानता, झूठ से नपफरत करता है, सम्मान के साथ दूसरों को सुनता है, विचारों में विश्वास करता है, अपने सि(ातों की रक्षा करता है और उसके पास दुनिया से छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है।’ क्या नरेंद्र मोदी ही नहीं, अपने देश के किसी भी नेता में यह कहने का साहस है?
स्वच्छता ही पारदर्शिता लाती है। झाड़ू उठाकर टेलीविजन पर छा जाने वाली स्वच्छता नहीं, बाहर-भीतर की वह स्वच्छता जो सभी बंध्नों से मुक्त होती है और उसका आधर मनुष्य मात्रा के प्रति प्रेम और करूणा है। तभी यह ध्रती स्वच्छ, शांत और सुंदर हो सकती है। ‘द गूड अर्थ’ की महान लेखिका पर्ल एस बेक ने भी ऐसी स्वच्छ, शांत और सुंदर ध्रती का सपना देखा था, जिसका आधर उनकी यह दृढ़ मान्यता थी-‘मेरी एक मात्रा आस्था मनुष्य मात्रा के प्रति है, मैं किसी दूरी आस्था की जरूरत कभी नहीं महसूस करती।’ काश हम भी मनुष्य और केवल मनुष्य के प्रति आस्थावान हो पाते।

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