September 25, 2018

मनोज वाजपेयी : लीक से अलग चलने वाला एक अभिनेता

By wmadmin123 - Wed Mar 18, 10:43 am

मनोज वाजपेयी का सिनेमा आते ही सिने-प्रेमियों के बीच में एक उत्सुकता सी बन जाती है कि कुछ तो खास होगा क्योंकि मनोज कुछ भी यूं ही नहीं करते। कामर्शियल पिफल्मों में जहां सारा पफोकस नायक और नायिका के इर्द-गिर्द घूमता है, वहां भी मनोज अपने अभिनय के तेवर से दर्शकों के दिलों-दिमाग में इतने अंदर तक प्रवेश कर जाते हैं कि दर्शकों को केवल और केवल उनका अभिनय याद रहता है। शुरूआती पिफल्म सत्या से लेकर अभी तक ऐसा कारनामा वे कर्इ बार कर चुके हैं।
सह ध्ूप घाम पानी पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें आगे क्या होता है।
अपने जीवन में कालजयी रचना रशिमरथी की इस पंकित को हमेशा गुनगुनाने वाले अभिनेता मनोज वाजपेयी की छवि एक चिंतनशील प्रतिब(, लीक से हटकर काम करने वाले अभिनेता की रही है। आलोचकों की नजरों में उनकी ये दूसरी पारी है पर जो उनके अभिनय के कायल हैं वे जानते हैं कि मनोज न कभी थके, न कभी रूके, बिना छवि की परवाह किये अपने अभिनय के बलबूते अपनी साख बरकरार रखी और बार-बार मेनस्ट्रीम के मिथक को तोड़ते रहे। व्यवसायिकता का दबाव कितना भी क्यों न हो वे अपने किरदार को नहीं दुहराते। ‘राजनीति और ‘सत्याग्रह दोनों पिफल्मों में भ्रष्ट नेता की भूमिका निभायी पर दोनों के किरदारों में उन्होंने थोड़ी-सी विभिन्नता रखी है। उनके अभिनय को देखकर लगता है कि उनके अंदर का अभिनेता स्वयं से प्रतिद्वंद्विता करता है और दर्शकों को अनूठा अभिनय देखने को मिलता है।
जिस समय मनोज वाजपेयी का आगमन भारतीय सिनेमा में हुआ वह समय भारतीय सिनेमा के लिए बेहद चुनौतियां भरा रहा है। बेतुके व्यावसायिक सिनेमा की लहर में इतिहास जान, राम जाने जैसी पिफल्में आ रही थी। इंडस्ट्री स्वयं अपने वजूद को तलाश रहा था कि उसका अगला कदम क्या होगा? आप कह सकते हैं ऐसे पिफल्ममेकर की संख्या अधिक थी जो बस किसी तरह बाजार से पैसा कमाना चाह रही थी। ऐसे दमघोंटु माहौल में सत्या सिनेमा से मनोज वाजपेयी की प्रतिभा का विस्पफोट होता है। मनोज स्वयं कहते हैं-’सत्या पिफल्म बन रही है….इसकी खबर सिपर्फ पिफल्म से जुड़े लोगों को ही थी क्योंकि उस समय के अनुसार न पिफल्म में अमरीशपुरी न गुलशन ग्रोवर न अक्षय कुमार…. थे, सब नये लोग थे जिसे मीडिया ने कुछ छपा ही नहीं। बैंडिट क्वीन, सत्या और गैंग आपफ वासेपुर इन तीनों पिफल्मों ने भारतीय सिनेमा को नये कलाकारों की पौध् दी है और इन तीनों पिफल्मों में मनोज वाजपेयी की मुख्य भूमिका है। सत्या के बाद की कहानी जगजाहिर है। तेवर के बाद उनकी आने वाली पिफल्म ‘सात उचक्के की चर्चा जोरों पर है।
इस समय में जब सपफलता के दो ही मायने हैं शोहरत और कड़ोरों के क्लब की रेस और समय का चलन कहता है कि इसके अलावा सपफलता का कोर्इ और मापदंड नहीं हो सकता। ऐसे माहौल में मनोज न पैसे के पीछे भाग रहे हैं न शोहरत के पीछे। सुकून के साथ अपने अभिनय की कूची से अपने किरदार को नये-नये कलेवर देने में जुटे हुए हैं। हंसल मेहता की एक पिफल्म में वे गे कैरेक्टर की भूमिका निभाने जा रहे हैं। वे कहते हैं-’मैंने हमेशा नये किरदारों को ज्यादा तरजीह दी है। अपने किरदारों के हर इमोशन को टच करता हूं। नकारात्मक किरदारों की इंसानी पिफतरत पर गौर करता हूं। एक्टर होने के नाते यह हमारा पफर्ज बनता है कि हम अपने चरित्राों को किसी कोष्ठक में नहीं डाले। अभिनय मेरा आक्सीजन है और मैं इसे प्रदूषित नहीं कर सकता। जब तक कोर्इ कैरेक्टर उसे उद्वैलित नहीं करता तब तक मैं पिफल्म सार्इन नहीं करता। ध्ैर्य के साथ अच्छी सिक्रप्ट का इंतजार करता हूं। इसे आप तेवर में उनके पहले दृश्य के माèयम से समझे-’व्यस्त हाइवे पर एक आदमी कुर्सी पर अपनी ध्मक के साथ बैठा हुआ है और दोनों तरपफ से गाडि़यों की आवाजाही जारी है। मनोज आज भी ध्ैर्य के साथ इंडस्ट्री के मिथक को तोड़ते हुए टिके हुए हैं, वहींं उनके समकालीन कर्इ अभिनेताओं ने अपना ध्ैर्य खो दिया और आज बेतुके भूमिका में नजर आते रहते हैं।
मनोज वाजपेयी की चर्चा हो और उनके गांव की चर्चा न हो ऐसा नहीं हो सकता। मनोज पूरी शिíत के साथ अपने गांव-घर से सरोकार बनाकर रखते हैं। जब भी अपने व्यस्तम क्षणों में शुटिंग से जब भी पफुर्सत मिलती है, वे अपने गांव घूम आते हैं। कुछ महीनों पहले ही गांव गये थे तो एक हफ्रते तक बेलवा गांव की गली, अपने बचपन के मित्राों से मिलते-जुलते रहे। खेत खलिहान घूमते रहे और सबसे खास बात कि उन्होंने अपने इस यात्राा में नरकटियागंज जिले के हाकी खेलने वाले बच्चों को स्पोर्टस ड्रेस देने का वादा किया और पूरा भी किया। उनसे मिलने पर दो चीजें साबित करती है। एक सादगी और दूसरा सहजता के साथ बातचीत। इस साल उनकी कर्इ बेहतरीन पिफल्में आने वाली हैं और सभी पिफल्मों में अलग-अलग किरदार। सात उचक्के में टपोरी तो ट्रैपिफक में मराठी हवलदार, दुरंतों में पाड़ो कोच की भूमिका। हंसल मेहता के साथ वो एक अनाम पिफल्म में गे प्रोपफेसर की भूमिका में नजर आयेंगे। एक पत्राकार ने उनसे सवाल पूछा कि इस समय में अब आपके सामने क्या चुनौती है। हंसते हुए मनोज ने कहा कि मेरी कोशिश ये है कि कोर्इ भी अच्छी पिफल्म नवाज और इरपफान के पास न जाए। ये वक्तव्य दर्शाता है कि आज भी वे अच्छे किरदार के भूखे हैं। सत्या के बाद उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि उनकी एक ही शर्त है कि उन्हें मुख्य भूमिका या अच्छा किरदार चाहिए। मैं भार्इ भतीजे वाली भूमिका नहीं करना चाहता। मुझमें लगन है, कड़ी मेहनत भी करता हूं। इस तरह से पिफल्म उधोग मुझे बेहतर भूमिका देने के लिए नैतिक रूप से बाèय है। आज उन्हें अच्छे किरदार मिल रहे हैं। मुख्य भूमिका वाली पिफल्में मिल रही हैं और दर्शकों को हमेशा उनका बेहतर काम दिख रहा है। बीते लोकसभा चुनाव में बिहार सरकार की सत्ताधरी पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने का आमंत्राण दिया था पर उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया। दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मनोज वाजपेयी के योगदान को देखते हुए अब उन्हें पदमश्री से सरकार को सम्मानित करना चाहिए।

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