October 21, 2017

मुज़फ्फरपुर मुसहरी में जेपी की थी ग्राम स्वराज्य की स्थापना

Photo GalleryBy wmadmin123 - Mon Oct 21, 9:03 am

जयप्रकाश नारायण ने 70 के दशक में मुज़फ्फरपुर के मुसहरी (प्रखंड) में 121 ग्राम सभाओं का गठन कर ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया था। लेकिन 90 के दशक से लेकर अब तक प्रदेश की सत्ता की चोटी पर बैठे लालू से लेकर नीतीश कुमार जो जेपी का नाम जपकर राजनीति करते रहे हैं, जिनकी पहचान जेपी के चेलों के रूप में की जाती है, ने उनके उस सपने को चकनाचूर कर दिया। उनके द्वारा गठित ग्राम सभाएं आज की तिथि में अपना अस्तित्व नहीं बचा सकी। इसकी वैध्ता का मामला 12 बर्षो से पटना उच्च न्यायालय में लंबित हैं।

सत्तर के दशक में नक्सली हिंसा की आग में जिले का मुसहरी प्रखंड जल रहा था। सर्वत्रा हिंसा और भटकाव का माहौल था। नक्सली आंदोलन के दौरान हिंसा-प्रतिहिंसा में प्रखंड के गांवों में करीब एक दर्जन लोग मारे जा चुके थे। नक्सलियों ने जिले के दो प्रमुख सर्वोदयी कार्यकर्ता को मौत का परवाना भेज कर हत्या की तारीख मुकर्रर कर दी थी। कुछ ऐसी ही विषम परिस्थिति में जेपी का मुसहरी में एक साल का प्रवास हुआ था। उन्होंने मुसहरी में ग्राम सभाओं का गठन कर खुद-मुख्तार गांव बनाने का एक अभिनव प्रयोग किया था। उन्होंने मुसहरी में घो”ाणा की थी-‘या तो यह काम पूरा होगा या मेरी हड~डी गिरेगी।’ जेपी के इस सपने को प्रदे’ा की सत्ता की चोटी पर बैठे उन्हीं के अनुयायियों ने चकनाचूर कर दिया है। उनके द्वारा गठित गzाम सभायें अपना अस्तित्व नहीं बचा सकी। इसकी वैध्ता का मामला 12 वर्”ाों से उच्च न्यायालय में लंबित है।

1970 में जून के प्रारंभ में जिले के दो वरि”ठ सर्वोदय कार्यकर्ताओं गोपालजी मिश्र और बदzी नारायण सिंह के नाम मौत का परवाना नक्सलियों ने भेजा था। 5 और 7 जून को उनकी हत्या की तारीख तय की गई थी। सर्वोदय कार्यकर्ता निर्मला दे’ा पांडे से पत्रा के माध्यम से जेपी को इस बात की सूचना मिली थी। वे उस समय उत्तराखंड की यात्राा पर थे। इस सूचना पर वे तत्काल मुजÝपफरपुर आये और कन्हौली खादी भंडार स्थित लक्ष्मी नारायण स्म‘ति भवन में अपने कुछ सर्वोदयी कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक की थी। चार दिनों तक विचार-विमर्’ा के बाद 9 जून 1970 को उन्होंने प्रखंड के नक्सल प्रभावित गांव सलहा-जलालपुर के मध्य विद्यालय में अपना पड़ाव डाल दिया। यहीं से उन्होंने गzाम दान और गzाम सभा के गठन की ’ाुरूआत की थी। इसी गांव की सभा में उन्होंने संकल्प लिया था-‘या तो यह काम होगा या उनकी हड~डी गिरेगी।’ जेपी बैकुंठपुर पंचायत के माधेपुर में पहली गzाम सभा का गठन किया।

करीब एक साल के मुसहरी प्रवास में जेपी के सलहा, नरौली, छपरा, मणिका, प्रहलादपुर, ’ोरपुर और जमालाबाद ;सभी मुसहरी प्रखंडद्ध में सात पड़ाव ;’िाविरद्ध बने। कुल 121 गzाम सभाओं का गठन कर गzाम स्वराज्य की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया। माधेपुर, ’ोरपुर, सुस्ता, बुध्नगरा राघो, डुमरी, मादापुर चौबे और मोमिनपुर को बिहार राज्य भूदान एक्ट 1965 के तहत कानूनी मान्यता दिलायी गयी। सभी 121 गzाम सभाओं को मिला कर मुसहरी प्रखंड स्वराज्य सभा गठित किया गया था, जिसके प्रथम अध्यक्ष महादेव पांडे ;अब स्वर्गीयद्ध एवं सचिव मंडले’वर तिवारी निर्वाचित हुए थे। गzाम सभा के गठन एवं उसके वैधनिक अध्किारों की बावत बताते हुए मंडले’वर तिवारी कहते हैं कि गzाम सभा की बैठकों में भूधरियों से एक बीघा में एक कट~ठा जमीन भूमिहीनों में बांटी जाती थी। दो एकड़ से कम जमीन वालों से जमीन नहीं लिया जाता था। यदि ऐसे कोई भूस्वामी जमीन दान करते भी थे तो वह जमीन उन्हें वापस कर दिया जाता था।

जिस गांव की कुल बालिग आबादी का 75 प्रति’ात लोग तथा कम से कम 51 प्रति’ात भूस्वामी गzामदान पफार्म पर हस्ताक्षर करने के बाद बीघा में एक कट~ठा जमीन निकाल देते थे, उस गांव में विध्वित गzाम सभा गठित होती थी। इन गzाम सभाओं के लिए सर्वानुमति से अध्यक्ष, सचिव और कार्यकारिणी समिति के सदस्यों का चयन किया जाता था। अदालत मुक्ति, न’ाामुक्ति, जुल्म-अत्याचारों पर नियंत्राण जैसे कार्यक्रमोंे के साथ-साथ रचनात्मक कार्य भी गzाम सभा करती थी। गzाम सभा का अपना को”ा था जिसमें किसान मन-सेरा अर्थात चालीस किलो में एक किलो तथा मजदूर महीने में एक दिन की मजदूरी जमा कर को”ा को सम‘¼ रखते थे। जरूरतमंदों को गzाम सभा 4 प्रति’ात सालाना ब्याज पर कर्ज देती थी। सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्”ाों का होता था। जेपी के मुसहरी प्रवास के दौरान गांवों में बिजली पहुंचाई गई। नलकूप लगे। गरीब किसानों की खेतों में ‘एवार्ड’ नामक संस्था से सैकड़ों चापाकल गाड़े गए। तम्बाकू की खेती के लिए जेपी ने बैंकों से कर्ज दिलवाया। स्वरोजगार के साध्न उपलब्ध् कराये गए। प्रारंभ में जेपी का यह कदम गzाम स्वराज्य की दि’ाा में सार्थक प्रयास माना जाता रहा। 1972 में मुजÝपफरपुर विकास मंडल की स्थापना हुई और जेपी उसके प्रथम अध्यक्ष बने। जीवनपर्यंत वे इसके अध्यक्ष बने रहे। इमरजेंसी के दौरान भी गzाम सभा की गतिविध्यिों पर इसका कोई दु”प्रभाव नहीं पड़ा। जेपी के मुसहरी प्रवास से पूर्व इस क्षेत्रा में नक्सली आतंक का जो माहौल था उसमें कमी आयी। इतना कुछ होने के बाद भी मुसहरी प्रणेता के बाद जेपी ने अपने को ठगा हुआ सा महसूस किया। इसका खुलासा उन्होंने मुसहरी प्रखंड के गzामदानी गांव के निवासियों के नाम अपने गांव सिताब दियारा से 25 अक्टूबर 72 को लिखे एक मार्मिक खुला पत्रा के माध्यम से किया। उस पत्रा में मुसहरी में किये गये अपने प्रयासों की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा कि उनके सारे प्रयास बेकार और नि”पफल हुए हैं। गzाम सभायें केवल कागज पर बनी है, जिसमें से बहुत कम ही कार्य’ाील हैं। गzाम सभा की ’ार्तें इनके बनने के बाद भी पूरी नहीं हुईं। गzाम को”ा की स्थिति भी अच्छी नहीं रही।

जिन लोगों को चापाकल और तम्बाकू की खेती के लिए कर्ज दिलवाया गया, उनमें से अध्किां’ा ने कर्ज की अदायगी नहीं की। पत्रा में उन्होंने आगे लिखा है कि जिन्हें विकास के लिए आर्थिक सहायता दिलायी गयी थी, वे ही लोग अपने कर्तव्य को पूरा करने में सर्वाध्कि उदासीन रहे। जो क्षेत्रा के पुराने नेता हैं वे उनके सामने या सभाओं में बातें तो बहुत बढ़-चढ़ कर करते रहे लेकिन पद की प्राप्ति और व्यक्तिगत लोभ आदि के सिवा उनमें से इक्का-दुक्का लोगों ने ही गzाम-स्वराज्य का कार्य किया है। उन्होंने आगे लिखा है कि जब मुसहरी में विकास का कार्य प्रारंभ कराया गया तो उनके कई सर्वोदयी साथियों ने उन्हें सलाह दी थी कि ऐसा करना उस अवस्था में ठीक नहीं है क्योंकि विकास के लोभ से गzामदान के समर्पण पत्रा पर लोग हस्ताक्षर कर देंगे। नाममात्रा के लिए गzाम सभा का गठन भी हो जाएगा। लेकिन जब उनका काम निकल जायेगा तो पिफर वे लोग नि”िक्रय हो जायेंगे। संभव है कि छिप-छिप कर वे गzाम स्वराज्य का विरोध् करने लगेंगे। जेपी लिखते हैं कि तब उन्होंने अपने साथियों की उस सलाह को अस्वीकार कर दिया था। पर अब उनकी वह आ’ाा और वि’वास निराधर साबित हुआ है। उक्त पत्रा में गzाम सभा के प्रतिनिध्यिों से उन्होंने अनुरोध् किया था कि गzाम स्वराज्य में ही गzामवासियों की तमाम समस्याओं का समाधन निहित है। इसलिए इस पर पूर्ण समर्पण भाव से ईमानदारी और पारदर्’िाता के साथ कार्य करते रहने की जरूरत है।

मुसहरी प्रखंड के जिन सात माधेपुर, ’ोरपुर, मादापुर चौबे, मोमिनपुर, डुमरी, बुध्नगरा राघो और सुस्ता गzाम सभा को कानूनी मान्यता मिल चुकी थी, उसके दुर्दिन की ’ाुरूआत 1990 के बाद से ’ाुरू होती है। यह वह कालखंड है जब जेपी की अगुआई में बिहार छात्रा आंदोलन के गर्भ उत्पन्न नेताओं ने प्रदे’ा की सत्ता की बागडोर संभाली। लालू प्रसाद मुख्यमंत्राी बने। वे 74 के छात्रा आंदोलन की उपज थे। जेपी का देहांत हो चुका था किंतु मुसहरी की सात गzाम सभाओं में उनके गzाम स्वराज्य का कार्यक्रम चल रहा था। 1978 में बिहार गzाम दान एक्ट 1965 का सं’ाोध्न कर कानूनी मान्यता प्राप्त गzाम सभाओं को पंचायत से अलग अस्तित्व दिया जा चुका था। उक्त सं’ाोध्न के जरिये गzाम सभा को पंचायतों से उसके हिस्से की विकास रा’िा सीध्े स्थानांतरित करने का प्रावधन किया गया है। बताते हैं कि पंचायत परिसीमन के दौरान कानूनी मान्यता प्राप्त गzाम सभाओं के अध्यक्ष और सचिव ने अपनी गzाम सभाओं को स्वतंत्रा अस्तित्व में बनाये रखने की मांग की। मुसहरी के तत्कालीन प्रखंड विकास पदाध्किारी ने जिला पंचायती राज पदाध्किारी से इसकी अनु’ांसा भी कर दी। लोग नि’िचंत हो गये। 2001 में जब पंचायत चुनाव की अध्सिूचना जारी हुई तो पता चला कि एक्ट की अनदेखी कर इन सभी सात मान्यता प्राप्त गzामसभाओं को पंचायतों में ’ाामिल कर लिया गया है। इस तरह गzाम सभा का स्वतंत्रा अस्तित्व ही समाप्त हो गया। इसके बाद माधेपुर गzाम सभा के अध्यक्ष मंडले’वर तिवारी ने पटना उच्च न्यायालय में सीडब्लुजेसी 3463@2001 मंडले’वर तिवारी बनाम बिहार सरकार एक मामला दायर किया। प्रथम सुनवायी के दौरान उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाध्ी’ा ने इसपर अपना मंतव्य देते हुए कहा कि सरकार यदि अपने स्तर से इस मामले का निराकरण कर देती है तो कोर्ट इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। आज तक सरकार ने भी इस मामले का निराकरण नहीं किया। इस तरह जेपी के अनुयायियों ने ही गzाम सभा को अध्किार विहीन कर दिया। परिणाम सामने है-मुसहरी में जेपी के सपनांे का गzामस्वराज्य आज अपना अस्तित्व तला’ाने की जíोजहद में जुटा है। नरौली गzाम सभा के अध्यक्ष और मुसहरी में जेपी के सहयोगी रहे कामे’वर प्रसाद सिंह गzाम सभा को पंचायत में मिला देने से आहत हैं। वे कहते हैं गzाम स्वराज्य अपनी ’ाक्ति से चलती है। पंचायत का ’ाासन अच्छा नहीं है। सर्वत्रा भz”टाचार है। भz”ट सरकारें पंचायत को अध्किार दे रही हैं। यह अध्किार भी संपूर्ण नहीं है। वे कहते हैं गzाम स्वराज्य पिता है तो पंचायत उसका पुत्रा। मात‘त्व-पित‘त्व गzाम के साथ है। हमंे स्वराज्य चाहिए और यह तभी संभव है जब हमें गलतियां करने का भी अध्किार मिले। गांध्ी ने भी कहा था कि गzाम स्वराज्य में गांव ही गलतियां पकड़ सकता है। वे आगे कहते हैं कि 1952 में दे’ा का संविधन लागू हुआ और उसमें गांव की चर्चा तक नहीं थी। यह कितना दुखद हुआ? उसके बाद 1992 में संविधन सं’ाोध्न कर पंचायतों को 29 अध्किार दिये गये जिसमेंे अब तक गिनती के कुछ अध्किार ही मिल पाया है। अगर यह सभी अध्किार गzाम’ाक्ति को मिल जाय तो गांवों का कायाकल्प हो जायेगा। सरकारें ऐसा करके अपने को निहत्था करना नहीं चाहती। अब गांव से ही सरकारी ’ाक्ति के प्रतिकार की ’ाुरूआत होनी चाहिए। इसके लिए सतत अहिंसात्मक आंदोलन की जरूरत है। जेपी के मुसहरी प्रयोग की विपफलता की बावत वे कहते हैं कि कोई भी अभियान न तो मरता है और न पूर्ण होता है। यह तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है। कभी न कभी हमें गzाम स्वराज्य की ओर लौटना ही होगा। मुजÝपफरपुर जिला सर्वोदय मंडल के सचिव कैला’ा ठाकुर ;नरौलीद्ध मुसहरी में जेपी के प्रयास से संबंध्ति अपना संस्मरण सुनाते हुए कहते हें कि नरौली कैंप पर जब जेपी ठहरे हुए थे तो घर से काWलेज आने-जाने के क्रम में वे उनके पास बैठा करते थे। वे बड़े प्यार से बातें करते थे। उनकी बातों से प्रभावित होकर वे तरुण ’ाांति सेना में ’ाामिल हुए। वे अक्सर उनसे युवा वर्ग के भटकाव के बारे में बातचीत करते थे। बाद में श्री ठाकुर छात्रा युवा संघर्”ा वाहिनी के सदस्य बने। जेपी इसके अध्यक्ष थे। श्री ठाकुर कहते हैं कि गांव-गांव घूमने के क्रम में जयप्रका’ा बाबू मजदूरों और किसानों को आमने-सामने बैठाकर चर्चा करते थे। प्रहलादपुर गंगापुर गzामसभा के मंत्राी उमा’ांकर सिंह कहते हैं कि उनके गांव में गzाम सभा का गठन 1972 में किया गया। जेपी तब प्रफस्टेड हो चुके थे। सारा कुछ नौटंकी बन कर रह गया। रघुवं’ा सिंह इस गांव के बड़े जमींदार थे। सात सौ बीघा जमीन थी। जेपी इस गांव मंे कैंप कर रहे थे। उन्होंने रघुवं’ा प्रसाद सिंह से मिलने का प्रयास किया लेकिन रघुवं’ा बाबू ने मना कर दिया। बाद में इनके ;उमा’ांकर जी केद्ध प्रयास से मुलाकात हुई। जेपी के व्यक्तित्व से रघुवं’ा प्रसाद सिंह प्रभावित तो हुए लेकिन बीघा कट~ठा नहीं दिये। बाद में कथित नक्सलियों ने रघुवं’ा प्रसाद सिंह की हत्या कर दी। इसी दौरान उमा’ांकर सिंह के छोटे भाई की हत्या पुलिस ने नक्सली होने के आरोप में कर दी थी। उमा’ांकर सिंह कहते हैं कि जेपी के सहयोगियों ने ही उनके सपनों को तोड़ा है और आज अपने स्वार्थ की रोटी सेंक रहे हैं। जेपी के रास्ते व्यवस्था परिवर्तन हो सकती थी, जो नहीं हुआ। मुसहरी प्रवास के अंतिम चरण में जेपी ने तरुण ’ाांति सेना के डीके विद्यार्थी को नक्सली नेता राजकि’ाोर के गांव गंगापुर जा कर गांव के विकास की योजना बनाने की जिम्मेवारी सौंपी थी। गंगापुर नक्सल पंथी आंदोलन का केंदz था। पूरा गांव पुलिसिया दमन का ’िाकार बना हुआ था। 35-40 किसान परिवार वाले इस गांव के एक दर्जन लोगों पर मामला दर्ज था। राजकि’ाोर सिंह गzाम सभा के विरू¼ थे। जेपी को जमींदार का दलाल कहा जाता था। राजकि’ाोर स्वयं को जेपी का पिट~ठु बनना नहीं चाहते थे। यहां भी विकास की योजना बनी और निर्माण के कुछ कार्य कराये गये। इसी बीच नक्सली नेता राजकि’ाोर सिंह और उनके साथी तस्लीम की भी हत्या कर दी गयी थी।

इतना ही नहीं 1970 के जून महीने में जिन दो सर्वोदय कार्यकर्ताओं को नक्सलियों ने मौत का परवाना भेजा था, उनमंे से एक स्वतंत्राता सेनानी सह सर्वोदय कार्यकर्ता गोपाल जी मिश्र को भी 9 जनवरी 1972 को नरसिंहपुर खादी भंडार से घर वापसी के क्रम मेंे उनके तेपरी गांव में गोली मार दी गई। आठ तह कपड़ों को छेदती हुई गोली उनकी पीठ में अंदर तक जाकर 8 टुकड़ों में बंट गयी थी। आWपरे’ान में गोली के 7 टुकड़े तो निकाल दिये गये लेकिन एक टुकड़ा रीढ़ में पफंसा रह गया था। कापफी समय बाद यही उनके पक्षाघात का कारण बना। यह घटना जेपी के मुसहरी छोड़ कर चले जाने के बाद घटी। पिफर भी श्री मिश्र पूर्व की तरह जेपी के कार्यक्रमों में सक्रिय रहे। लंबी बीमारी के बाद उनका निध्न हाल ही में 13 सितंबर को हुआ है।
मादापुर चौबे गzाम सभा के पूर्व अध्यक्ष जगन्नाथ पांडेय कहते हैं कि यहां का गzाम सभा पंचायत के अध्ीन होते हुए भी सक्रिय है। 30 अगस्त को इसके पदाध्किारियों का चुनाव कराया गया है। नियमित कार्य समिति की बैठक होती है। गzाम को”ा की स्थापना की गई है। गzाम सभा का बचत खाता खुला हुआ है। नियमित कार्य समिति की बैठक होती है। गzाम को”ा की स्थापना की गई है। गzाम सभा का बचत खाता खुला हुआ है। सार्वजनिक तालाब में मत्स्य पालन होता है। 50 हजार से अध्कि रा’िा बैंक में जमा है। इसके अलावे गzाम सभा के पास ’ाामियाना, कुर्सी, बर्तन आदि की दो लाख की परिसम्पति भी है। लेकिन यह गzाम सभा पंचायत से मिलने वाले सरकारी अनुदान से वंचित है। पूर्व मंत्राी अखिल भारतीय सर्वसेवा संघ, वाराणसी के पूर्व मंत्राी एवं मुसहरी प्रयोग में जेपी के निकटतम सहयोगी रहे अविना’ा चंदz सक्सेना मुसहरी में जेपी के प्रयोग के बारे में बताते हैं कि जो लोग मुसहरी में जेपी से जो सुविधयें चाहते थे उन्होंने वह सुविधएं बटोर ली और उसका दुरूपयोग किया। स्वार्थ का बोलवाला रहा। जागरण की जरूरत है लेकिन जगाने वाले को जागरूक रहना भी उतना ही जरूरी है। सर्वोदय मानवीय विचार धरा का ही दूसरा नाम है। इसी से सर्वांगीन विकास होगा। वे कहते हैं कि समाज में यु¼, ’ाो”ाण, अन्याय, बेरोजगारी, हिंसा और वि”ामता जब तक है, गzाम स्वराज्य तबतक प्रासंगिक रहेगा। कोई भी पार्टी इसका समाधन नहीं कर सकती। सत्ता के माध्यम से गzाम स्वराज्य कभी आ ही नहीं सकता। वे मानते हैं कि गzाम स्वराज पूंजीवाद का विकल्प है। इसके लिए सत्ता, संगठन, पैसा और बाहरी संगठन की जरूरत नहीं है। हमारा केवल यह प्रयास होना चाहिए कि हम गांव वालों में वि’वास पैदा करें, असहमति के बिंदुओं का परस्पर की सहमति से निबटारा करें। तभी अहिंसक गzाम सभा बनेगा। हिंसा के इस वातावरण में हिंसामुक्त नई सभ्यता की ’ाुरूआत गzाम स्वराज्य से ही होती। इस दि’ाा में लगातार प्रयास की जरूरत है। मुसहरी में जेपी ने इसी विचार को व्यवहार के रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास किया था।

मुजÝपफरपुर विकास मंडल के सचिव रमे’ा पंकज का मानना है कि जेपी का मुसहरी प्रयोग सत्ता के ’ाीर्”ा पर बैठे उन्हीं के कुछ अनुयायियों के कारण विपफल हुआ है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि जेपी प्रयोग ध्र्मा व्यक्ति रहे हैं। पूरी जीवन यात्राा उनकी इस वि’ो”ाता का उदाहरण है। मुसहरी में जेपी तब आये जब यहां नक्सली आंदोलन अपने चरम पर था। उन्होंने इसके ेकारणों की तला’ा की और गzाम स्वराज को इसका समाधन बताया। 1970 से 1973 तक गzाम स्वराज्य और पिफर 74 मेंे व्यवस्था परिवर्तन का नारा उन्होंने दिया। यूथ पफाWर डेमोक्रेसी का आह~वान इसी की एक कड़ी थी। बड़े पफलक पर काम करने का यह मतलब नहीं है कि छोटे काम को रोक दिया गया। मुसहरी में विकास को प्राथमिकता दी गयी। वे मानते हैं कि गzाम स्वराज्य से ही गांव में सार्वभौमिकता दी गयी। और इसी से गांव में सार्वभौमिकता कायम होगी। राजनीतिक पार्टियां व्यवस्था परिवर्तन की औजार नहीं बन सकती है। मुसहरी के युवा जिला पार्”ाद मुक्ते’वर प्रसाद सिंह कहते हैं कि जेपी उनके जन्म से पहले मुसहरी में आये थे। उन्हें उनको देखने-जानने का मौका नहीं मिला। पुस्तकों एवं मुसहरी में उनके सहयोगियों के माध्यम से जितनी जानकारी मिली है उससे यही कहा जा सकता है कि मुसहरी का नक्सली आंदोलन मजदूर और भू स्वामियों के द्वंद्व का प्रतिपफल था। यह जेपी ही थे कि उस माहौल में मजदूरों को उन्होंने सम्मान दिलाया। जिन नक्सलियों ने भूस्वामियों के अत्याचार से त्रास्त होकर हथियार उठाया था उन्हें अहिंसा का रास्ता दिखाया। जेपी के कारण ही मुसहरी में विकास की रो’ानी आई। मुसहरी के वही सारे लोग जिनके कारण क्षेत्रा में नक्सली गतिविध्यिां पनपी थीं, जेपी के कार्यक्रमों में ’ाामिल हो गये। रूप तो बदला, चरित्रा नहीं बदला। आज उन्हीं के वं’ाज ठेकेदार और भू-मापिफया बने हुए हैं। यही स्थिति नक्सलवाद पैदा करती है।

मुसहरी प्रखंड रा”ट्रीय जनता दल अध्यक्ष राजहंस यादव अपने पैत्रिाक गांव बैकुंठपुर में मकान बनवा रहे थे। पत्नी सु’ाीला देवी पंचायत की मुखिया हैं। जेपी के बारे में पूछने पर सवालिया लहजे में कहा-‘कौन जेपी? अरे जाइए, छोड़िए अब उनकी क्या जरूरत रह गयी है? पूरा महकमा भz”टाचार में डूबा है। जन्म प्रमाणत्रा से लेकर म‘त्यु प्रमाण पत्रा बनवाने तक में पैसा लगता है।’

प्रखंड राजद अध्यक्ष काफी अकड़ में अपनी बात कह रहे थे। मैं भौंचक हो कर अपने साथी डीके विद्यार्थी की ओर देखने लगा। आगे कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। यह सोच कर चलता बना कि जेपी ने जिस दल को पैदा किया उसी दल के लोग जेपी के प्रति कैसा द‘”िटकोण रखते हैं? हमारे महापुरु”ाों की क्या यही नियति है?

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