September 23, 2018

मोतिहारी : मजबूरी में ढोएंगे जदयू का झंडा या फिर भाजपा में जाएंगे अवनीश?

By wmadmin123 - Fri Jul 25, 1:08 pm

हाल के दिनों में भगवा चोली उतार कर कथित ‘समाजवादियोें’ के ‘शागिर्द’ बने हिंदुवादी छवि के नेता अवनीश कुमार सिंह जब लोकसभा चुनाव 2014 में जदयू के टिकट पर हारे थे, तब उसके कुछ दिनों के बाद अवनीश कुमार सिंह के अत्यंत करीबी ‘सिपहसालार’ से हुई मुलाकात में उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर बातचीत हो रही थी। उसी दरम्यान उनके सिपहसालार ने जो बातें कही वह अवनीश कुमार सिंह के बारे में बहुत कुछ बयान करता है। उनका कहना था कि-‘अवनीश कुमार सिंह ने कभी झुक कर राजनीति नहीं किया है। अगर अवनीश सिंह में थोड़ा सा भी लचीलापन रहता तो आज राधमोहन सिंह कृषि मंत्राी नहीं होते।’ जबकि कहा जाता है कि ‘सियासत’ में व्यक्ति को ‘लचीलापन’ वह सब कुछ देता है, जिसकी कल्पना वह नहीं कर सकता। बावजूद इसके, अपने अक्खड़ स्वभाव के कारण भाजपा में राजनीतिक रुप से हमेशा हाशिये पर रहे अवनीश कुमार सिंह अब जदयू के अपने ‘आका’ का आशीर्वाद बनें रहने के प्रति आश्वस्त हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षा में पहले भाजपा छोड़ा, पिफर जदयू के टिकट पर पूर्वी चंपारण लोकसभा क्षेत्रा से भाग्य आजमाया और तीसरे नंबर पर रहे। भाजपा छोड़ने की अपनी गलती को महसूस करते हुए अब वे जदयू को मजबूत करने का बीड़ा उठाने को तैयार हैं। राजद-जदयू के गठबंध्न के अलावा भाजपा का अपने लिए लगभग बंद हुए दरवाजा के बाद अवनीश सिंह विकल्पहीन हो गये हैं। लिहाजा जदयू का झंडा ढ़ोना अब उनकी मजबूरी बन चुकी है। इन सबके बीच अवनीश सिंह को लेकर कई बातें सामने आ रही है। भाजपा में वापसी पर पार्टी के अंदर उनके विरोध्ी और पैरोकार दोनों सक्रिय हैं। लेकिन अवनीश सिंह के विरोध्ी पहले से ज्यादा सक्रिय और ताकतवर बनें हुए हैं, तो समर्थक वर्तमान समय में बिहार से लेकर दिल्ली तक के मोदीमय राजनीति के कारण अपनी सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। हालांकि जिले में उनके विरोध्यिों का मानना है कि अवनीश सिंह अब राजनीतिक नेपथ्य में चले गये हैं। सूत्रा बताते हैं अब वे विधनसभा चुनाव 2015 का इंतजार कर रहे हैं, ताकि पिफर से चुनाव लड़ कर विधनसभा पहुंच सके। लेकिन यह राह भी आसान नहीं दिख रहा है।
लगभग 35 वर्षों तक भगवा पार्टी की राजनीति की बदौलत विधयक रहे अवनीश कुमार सिंह के महत्वाकांक्षा को भाजपा के अंदर कभी उभरने नहीं दिया गया। जिसके लिए अवनीश सिंह सीध्े तौर पर राधमोहन सिंह को जिम्मेवार मानते हैं। लगभग एक साथ ही चंपारण भाजपा की राजनीति में कदम रखने वाले राधमोहन सिंह और अवनीश सिंह का बड़े भाई और छोटे भाई का राजनीतिक रिश्ता जिले के लिए एक मिसाल था। एक हीं राजनीतिक गुरु कैलाशपति मिश्र के सान्निध्य में सियासत शुरू करने वाले अवनीश सिंह जहां अपने अक्खड़ स्वभाव के कारण जिले की राजनीति तक ही सीमित रह गये, वहीं राधमोहन सिंह अपने लचीले व्यवहार के कारण पार्टी में एक मुकाम प्राप्त कर देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। लेकिन जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं की नजर में राधमोहन सिंह से ज्यादा अवनीश सिंह अपने कार्यकर्ता को तरजीह देते थे। बावजूद इसके अवनीश सिंह की सियासी गतिविध् िपार्टी में केंद्रीय नेतृत्व को प्रभावित करने में नाकाम रही। लेकिन राजनीति में जब ‘अहम’ का टकराव शुरू होता है तो रिश्तों में भी कड़वाहट आ ही जाती है, यही इन दोनों के साथ भी हुआ। चंपारण भाजपा में एक कहावत बड़ा मशहूर है कि राधमोहन सिंह एक ऐसे वट वृक्ष हैं, जिनके आसपास नेता रूपी अन्य कोई पेड़-पौध नहीं पनप सकता। शायद इसी वट वृक्ष की छांव में अपने राजनीतिक जीवन को अवनीश सिंह पनपता हुआ नहीं पा रहे थे। लिहाजा अपने राजनीतिक गुरू कैलाशपति मिश्र के देहावसान के बाद अपनी महत्वाकांक्षा को अमलीजामा पहनाने के लिए उन्होंने भाजपा छोड़ दी। पूर्व में भी कैलाशपति मिश्र ने अपने जीवन काल में ही अवनीश सिंह की पार्टी छोड़ने की मंशा को भांप कर उन्हें रोका था। भावावेश में आकर अवनीश सिंह ने भापजा छोड़ने की घोषणा की, तो उन्हें मनाने का प्रयास भी पार्टी द्वारा नहीं किया गया। जबकि उनके करीबियों का कहना है कि अवनीश सिंह को मनाने के लिए भाजपा ने सीतामढ़ी लोकसभा क्षेत्रा से चुनाव लड़ने का आॅपफर उन्हें दिया था, क्योंकि एक बार वह सीतामढ़ी से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे जिसमें उनकी हार हुई थी। लेकिन मोतिहारी लोकसभा क्षेत्रा से चुनाव लड़ने के लिए भीष्म प्रतिज्ञा कर चुके अवनीश सिंह ने जदयू ज्वाइन कर लिया और नीतीश कुमार के विकास माॅडल के बूते एमपी बनने के सपने देखने लगे। इध्र, जदयू में आने के बाद जब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ तब तक कापफी देर हो चुकी थी। क्योंकि बिना कैडर वाली जदयू के टिकट पर वे चुनाव भी हार गये साथ ही भाजपा के टिकट पर चिरैया विधनसभा क्षेत्रा से विधयक रहे अवनीश सिंह की विधयकी भी चली गयी। इस परिस्थिति में खुद को लुटे हुए पा रहे अवनीश कुमार सिंह को नीतीश कुमार ने थोड़ा संबल दिया। बिहार में एनडीए शासन के दौरान विधनसभा में शून्य काल के सभापति के रूप में पहली बार लालबत्ती का स्वाद चख चुके अवनीश सिंह को भरोसा मिला कि उनकी गाड़ी पर लगा लालबत्ती नहीं उतरेगा।
अपने 35 वर्षों के विधयकी जीवन में पहली बार मिली लालबत्ती के बने रहने की उनकी आस बरकरार रही। लिहाजा, विधनपरिषद् के खाली पड़े सीट पर मनोनयन के साथ हीं मंत्राी पद मिलने की उनकी आशा जग गयी थी। लेकिन पार्टी द्वारा जारी किये गये लिस्ट से उनका नाम नदारत था, तो मंत्राी पद मिलने की संभावना भी खत्म हो गयी। दरअसल, बागियों का प्लेटपफाॅर्म बन चुके जदयू ने दूसरे दल से आये लगभग सभी नेताओं को एडजस्ट कर दिया, तो बिहार में राज्यसभा की खाली हुई तीन सीटों के लिए होने वाले उप चुनाव पर अब उनकी नजरें गड़ गयी। पार्टी ने राज्यसभा उप चुनाव में भी उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं बनाया। लिहाजा उनमें मायूसी छाने लगी और उस दिन को कोसने लगे, जब भाजपा छोड़ने का उन्होंने निर्णय लिया था। बावजूद इसके नीतीश कुमार के बातों के प्रति उनका भरोसा अभी भी कायम हैं। अब तो यही एक रास्ता बचा है कि अब उन्हें किसी आयोग का अध्यक्ष बना कर उन्हें लालबत्ती दे दिया जाये। संभव है कि इस आलेख के छपने तक अवनीश सिंह को बीस सूत्राी का उपाध्यक्ष अथवा किसी आयोग का अध्यक्ष बना कर उन्हें लालबत्ती से नवाज दिया गया हो। इतना पापड़ बेलने के बाद अब अवनीश सिंह को केवल आगामी विधनसभा चुनाव का ही आसरा बचा हुआ है, ताकि उसे जीत कर वे अपने राजनीतिक भविष्य पर लग रहे ग्रहण को हटा सके जो जदयू और राजद के बीच बनें नये गठबंध्न की स्थिति में मुश्किल दिखायी दे रहा है। क्योंकि जिस चिरैया विधनसभा क्षेत्रा से उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत कर लक्ष्मी नारायण यादव के यादवी किला को ध्वस्त किया था, उस पर लोकसभा चुनाव के साथ हुए उप चुनाव में राजद के लक्ष्मी नारायण यादव ने पुनः कब्जा कर लिया है, तो अवनीश सिंह के परंपरागत ढाका विधनसभा सीट पर जदयू नेता पफैसल रहमान का अपना दावा है। मोतिहारी विधनसभा क्षेत्रा राजद का परंपरागत सीट है तो गठबंध्न की स्थिति में यहां भी उनका दाल गलना मुश्किल दिख रहा है। मगर इन सबके बीच यह खबर भी उड़ी कि अवनीश सिंह ने लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार प्रभारी रहे केंद्रीय मंत्राी ध्र्मेंद्र प्रधन तथा भाजपा में एक ताकतवर नेता के रूप में उभरे अमित शाह से मुलाकात की है, जिस बात से अवनीश सिंह इंकार कर रहे हैं। लेकिन अवनीश सिंह का दुबारा भाजपा में वापसी की राह आसान नहीं दिख रही है। क्योंकि पग-पग पर भाजपा में उनके विरोध्ी उनके रास्ते को रोकने के लिए तैयार बैठे हैं। साथ हीं उनके सबसे बड़े पैरवीकार कैलाशपति मिश्र अब इस दुनिया में नहीं हैं। इस परिस्थिति में मन मसोस कर ही सही जदयू में रहना अब उनकी मजबूरी बन
गयी है।
बहरहाल, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण भाजपा छोड़ जदयू की राजनीति अवनीश सिंह के लिए अब भारी पड़ रही है और नये सियासी समीकरण में उनके राजनीतिक भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगता दिखलायी पड़ रहा है। अब देखना यही है कि अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कभी हार नहीं मानने वाले ‘बाहुबली’ अवनीश कुमार सिंह का सियासी रुप से चल रहे गर्दिश के दिन कब खत्म होते हैं। जिसका उनके समर्थकों को भी बेसब्री से इंतजार है।त्र

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