December 12, 2017

यौन-सम्बन्धों का कारण केवल संतानोत्पत्ति ही नहीं

By wmadmin123 - Wed Jul 22, 8:45 am

सुभाष चन्द्र झा

सेक्स क्या है ? सेक्स एक व्यापक विस्तृत विषय है, जिसे शब्दों में बांध् पाना मुश्किल है। प्रकृति को भला कौन बांध् सका है? स्त्राी-पुरुष के शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक सम्पूर्ण मिलन को ‘सेक्स’ कहा जा सकता है-जो निहायत निजी, व्यक्तिगत एवं गोपनीय मामला है। सेक्स जीवन की मूल जरूरत है जो शरीर, मन, भावनाओं की उत्तेजनाओं का शमन करता है।
सेक्स एक कोमल खूबसूरत भावना है, जो संसार के सभी स्त्राी-पुरूषों में विद्यमान है। सेक्स स्त्राी-पुरूष को एक-दूजे के प्रति एहसास के स्तर पर आकर्षित करता है। सेक्स समीपता है-जो अकेलेपन व तनाव को दूर करता है। सेक्स प्रकृति है जो स्त्राी-पुरूष के मिलन के बाद सृष्टि का विकास करती है। सेक्स एक भूख है और यह भूख प्रत्येक स्त्राी-पुरूष को अवश्य ही समयानुसार लगती है। सेक्स प्यार का स्त्रोत है, जो स्त्राी-पुरूष दोनों ही में पफूटता है। सेक्स एक इच्छा है, जो सहवास के बाद भी खत्म नहीं होती। सेेक्स एक कला है, जो स्त्राी-पुरूष को आनंद और सुख देती है। सेक्स एक आवश्यकता है, शरीर विज्ञान के अनुसार सेक्स स्त्राी-पुरूष के लिए आवश्यक है, तभी वे स्वस्थ रह सकते हैं। सेक्स एक ऊर्जा है, जो जीवन में आनंददायक पाॅवर देता है। सेक्स एक श्रम है जो तन और मन को आनंद व सकून देता है। सेक्स एक सुखद यात्रा है जो स्त्राी-पुरूष को चरम् सुख तक पहुंचाती है। सेक्स एक आनंद है, जो निरंतर प्यार की गारंटी देता है। सेक्स एक कैमेस्ट्री है जो अनेक प्रकार के केमिकल्स उत्पन्न करता है। सेक्स एक मैथ है, जो जोड़ने से बढ़ता है तथा घटाने से घटता है।
सेक्स ही सुखी एवं खुशहाल दाम्पत्य की आधर शिला है, क्योंकि सेक्स के प्रबल सम्मोहन के कारण ही स्त्राी-पुरूष के बीच परस्पर यौन-आकर्षण और अंततः यौन-मिलन होता है। प्रेम की उत्पत्ति सिपर्फ हृदय या मन में ही नहीं होती। स्त्राी-पुरूष के स्वस्थ तन में भी होती है। ज्यादातर पुरूषों को महिलाएं सेक्सुअली ही एट्रेक्टिव लगती हैं और औरत का सेक्स अच्छे-खासे मरदों को ध्राशायी कर सकता है।
सवाल है कि महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं? महिलाएं सेक्स सिपर्फ इसलिए करती हैं ताकि उनकी मैरिड लाइपफ में शांति बनी रहे, पति अपने सीमन बाहर निकाल सके, बिना वजह के माइग्रेन व सिरदर्द से मुक्ति मिल सके, बोरियत और ऊब दूर हो सके और यदा-कदा आध्यात्मिक एहसास हो सके। सच तो यह है कि महिलाएं उन खास इंटिमेट पलों को दिल की गहराइयों से महसूस कर लेना चाहती हैं। महिलाएं ऐसे पुरूषों पर ज्यादा आकर्षित होती हैं, जिनकी आवाज रौबदार हो, जो छैल-छबीला सुगठित हो और जिनके शरीर से मदहोश कर देनेवाली गंध् आती हो, जिसकी सेक्स-लाईपफ कमाल की हो, सेक्सुअल परपफाॅर्मेंस जादुई हो और जो अच्छा रोमांटिक लवर भी हो। महिलाओं की नजर में अध्किांश पुरूष अच्छे लवर साबित नहीं होते, जबकि महिलाएं रोमांस और पैैशन ही अध्कि पसंद करती हैं। पुरूष की हड़बड़ी, तेज़ी, उतावलापन और जल्दबाजी से बोर हो जाती हंै। पुरूषों का काॅनपिफडेंट नेचर, आत्मसम्मान भरा व्यक्तित्व महिलाओं को बहुत भाता है। जो स्वभाव से सरल, सीध्े हो, लेकिन जरूरत पड़ने पर अक्रामक रुख भी अपना सके ऐसे पुरूष के साथ वे खुद को प्रोटेक्टिव पफील करती हंै। पुरूषों के स्टाइल स्टेटमेंट और मैनेरिज्म की भी महिलाएं कायल होती हैं।
यूं प्रेम करना या प्रेम होना न तो कोई गुनाह है, न ही पाप। प्रेम से बढ़कर और हो भी क्या सकता है? लेकिन प्रेम केवल यौन-मिलन का ही नाम नहीं। सच्ची चाहत हो, तो दूर रहकर भी एक-दूसरे के सुखी-जीवन की कामना कर सच्चे प्यार को जीवित रखा जा सकता है। यह सच है कि जीवन में सुख की जरूरत है, पर यह कमजोरी तो नहीं बन सकती। भावनाओं पर काबू रखने के साथ त्याग और सहन करने की क्षमता होनी चाहिए। स्त्राी-पुरूष यदि एक-दूसरे के शरीर से प्रेम नहीं करते हैं – तो मन, हृदय या आत्मा से प्रेम करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। प्रेम की शुरूआत ही शरीर से होती है। दो आत्माओं के एक-दूसरे को देखने का कोई उपाय नहीं है। शरीर ही सबसे पहले शरीर को देखता है। स्त्राी यदि संपूर्णरूपेण स्त्रौणचित्त है और पुरूष में भरपूर पौरूषत्व है, तो दोनों ही एक-दूसरे के प्रेेम व मोह-पाश से, यौन-सम्पर्क से चाहकर भी बच नहीं सकते। प्रेम का आधर है सेक्स और सेक्स का आधर है प्रेम। शरीर और मन दोनों अलग-अलग सत्ता होने के बावजूद दोनों एक-दूसरे के आधर हैं। स्त्राी-पुरूष दिल लगाने का कोई मौका किसी भी उम्र में चूक नहीं सकते।
स्त्राी और पुरूष का पहला परिचय आंखों द्वारा ही होता है। आंखों की भाषा द्वारा ही वे एक-दूसरे के दिल में उतरते हैं। जो स्त्राी-पुरूष आंखों की मौन भाषा पढ़ लेते हैं, वे एक-दूसरे के हो जाते हैं। पुरूष के देखने के आकर्षक व कामुक अंदाज से स्त्राी के सारे शरीर में सिहरन, गुदगुदी तथा सनसनी-सी पफैल जाती है और उसके अंदर एक बेचैनीभरा कामावेग आंदोलित होने लगता है। आंखों से उत्तेजित हुई स्त्राी अपने पुरूष साथी के निकट और बिल्कुल ही निकट पहुंचने की कोशिश करती है। पुरूष स्त्राी के संवेदनशील व कामोत्तेजक अंगों पर अपनी गहरी, मुग्ध्, लोलुपताभरी कामुक दृष्टि डालकर उसे उत्तेजित कर सकता है।
विपरीत लिंगी प्राणियों में एक-दूसरे से यौन-सम्पर्क करने की इच्छा इतनी तीव्र होती है कि उस पर नियंत्राण नहीं रखा जा सकता। इसके लिए प्राणों की बलि चढ़ाने से भी वे नहीं हिचकते। हरा-भरा वृक्ष अमरबेल को अपने तन से लिपटाकर अपनी जीवनी-शक्ति की भेंट चढ़ा देता है और सूख-सूख कर जड़-मूल से नष्ट हो जाता है। जब नर मक्खी, मक्खियों की रानी से सेक्स करके उसे गर्भवती बना देता है, तो वह इस सेक्स-प्रसंग में ही अपनी जान से हाथ धे बैठता है। परवाना, शमां के आकर्षण के पफलस्वरूप अपने शरीर से ही नहीं, प्राणों से भी चला जाता है। स्त्राी-पुरूष में यदि शारीरिक-संबंध् बनाने की भूख न होती, तो न परिवार होता और न समाज। यौन-संसर्ग ही मनुष्य के जीवन में सरसता और आनंद का संचार करता है। इसी के कारण संसार में कोमलता और प्रेम-भावना का प्रसार-प्रचार होता रहा है। जब हम आनंद एवं कोमल भावनाओं के साथ-साथ परिवार और समाज की बात करते हैं, तो हम स्वीकार कर लेते हैं कि प्रणय-संबंधें के मूल में प्रजनन का भी स्थायी महत्व है, इसीलिए काम-भाव के पीछे ध्र्म-शास्त्रों की पूर्ण स्वीकृति रहती है। जीवन में जिन चार अलभ्य पदार्थों की आकांक्षा प्रकट की गई है और जिनके नाम ध्र्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं, उनमें काम का महत्वपूर्ण स्थान सदैव रहा है।
काम-भावना का प्रभाव सर्वसाधरण पर ही नहीं पड़ता, बल्कि बड़े-बड़े त्राफृषि मुनि, त्यागी-तपस्वी-योगी भी इसके प्रभाव और इसकी चपेट तथा कामाकर्षण से मुक्त नहीं रहे। विश्वामित्रा मेनका के सौन्दर्य से सम्मोहित होकर अपने दीर्घकालीन तप से सहज ही विचलित हो गए थे। महर्षि नारद ने एक बार अपनी गहन तपस्या से कामदेव को पराजित कर दिया था, और वही नारद एक राज-कन्या पर मुग्ध् होकर उससे विवाह करने को लालायित हो उठे थे।
प्रबल विस्पफोटक इस यौनाकर्षण से स्त्राी-पुरूष कोई भी बच कर नहीं रह सकता। विपरीत सेक्स की ओर यौनाकर्षित होना स्त्राी-पुरूष का सहज स्वाभाविक शरीर-ध्र्म है। जब मनुष्य उसकी ओर आकर्षित हो जाता है, तो वह उसे अपना कर एक मन दो शरीर ही नही होना चाहता, बल्कि वह जल्दी-से-जल्दी दोनों शरीरों को परस्पर गूंथ कर उस अद्भुत परम आनंद को प्राप्त करना चाहता है, जिसे ‘सेक्स लाईपफ’ कहा जाता है। यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या स्त्राी-पुरूष केवल संतान की प्राप्ति के लिए ही यौन-संबंध् स्थापित करते हैं? यदि ऐसा है, तो विवाह से पूर्व या पिफर विवाहेत्तर यौन-संबंध् क्यों स्थापित किए जाते हैं? पर-स्त्राी गमन अथवा पर-पुरूष सहवास की घटनाएं क्यों होती हंै? पुरूष वेश्या के द्वार क्यों खटखटाते हैं? स्त्रिायां पुरूष-वेश्या ;जिगालोद्ध की खोज में क्यों रहती हैं? लिव-इन-रिलेशनशिप में आखिर होता क्या है? विवाहित स्त्राी-पुरूष के जोड़ांे के बीच वाइपफ स्वापिंग क्या बला है? बलात्कार की घटनायें क्यों घटती हैं? इन उदाहरणों से स्वतः सि( होता है कि यौन-संबंधें का कारण केवल संतानोत्पत्ति नहीं है।
जिस प्रकार मनुष्य को भोजन, वस्त्रा और आवास की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार उसे शारीरिक भूख मिटाने की भी जरूरत महसूस होती है। सच तो यह है कि वस्त्रा और निवास-स्थल से भी अध्कि बलवती शारीरिक भूख होती है। पाषाण काल में जब मनुष्य बिल्कुल निर्वस्त्रा रहता था, उसके पास रहने के लिए कोई घर नहीं था, तब भी वह यौन-समागम करता ही था। स्पष्ट है विपरीत सेक्स के साथ यौन-संसर्ग करने की इच्छा सृष्टि के आरंभ से रहती आई है।
यौन-संसर्ग से वंचित रहकर अखण्ड ब्रह्मचर्य पालन करने की शिक्षा देना कोरा पाखंड और प्रवंचना ही प्रतीत होती है। कोई भी इस प्राकृतिक शारीरिक भूख को दबा कर नहीं रख सकता। सेक्स की अतृप्ति का ही परिणाम है – चिड़चिड़ापन, बात-बात पर बिगड़ जाना, अकारण क्रोध्, किसी काम में मन न लगना, सदैव उदास रहना, संकल्प शक्ति दुर्बल पड़ जाना। विवाहित युवतियां, जिनके पति उनकी काम-वासना को तृप्त करने में असमर्थ रहते हैं, हिस्टीरिया जैसे रोग की शिकार हो जाती हंै। प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी को जो अंग प्रदान किए हैं, वह उनका सही और निरंतर उपयोग-प्रयोग चाहती है। जिस अंग का दीर्घकाल तक अथवा बिल्कुल उपभोग नहीं किया जाता, वह निष्क्रिय हो जाता है। उनमें किसी काम को करने की शक्ति नहीं रह जाती। जो पुरूष नैतिक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे प्रारंभ में स्त्राी-समागम के सर्वथा अनुपयुक्त साबित होते हैं।
जहां तक विवाह एवं यौन-जीवन का संबंध् है, आदिकाल में यह जीवन सर्वथा स्वच्छंद और सब प्रकार के बंध्नों से मुक्त था। स्त्राी-पुरूष पर ऐसे सामाजिक बंध्न नहीं थे। प्राचीन काल में मातृकुल-मूलक परिवार होते थे, विवाह-प(ति का नामो-निशां तक नहीं था। कोई भी पुरूष किसी भी स्त्राी से उसी प्रकार संभोग कर सकता था, जिस प्रकार आजकल पशु-पक्षी अपने विपरीत सेक्स के पशु-पक्षियों के साथ यौनाचार कर सकते हैं। एक पुरूष एक स्त्राी का विधन सभ्यता के साथ ही विकसित होता गया। उन दिनों इस विधन के निर्माण के बाद भी स्वच्छंद यौनाचार की समय-समय पर उत्सवों, मेलों तथा समारोहों के नाम पर छूट दे दी जाया करती थी। प्राचीन यूनान में कामदेव की पूजा का उत्सव बड़ी ध्ूमधम से मनाया जाता था। इस उत्सव को मनाने के लिए संभ्रान्त परिवारों के स्त्राी-पुरूष श्रृंगार करके सड़कों पर मदिरापान करते हुए निकलते और उन्मुक्त रूप से एक-दूसरे का अलिंगन चुम्बन करते थे, पिफर उपवन-वाटिकाओं में जाकर मनचाहे साथी के साथ सेक्स करते थे। उस समय कोई किसी को भी सेक्स के लिए चुन लेता था, किसी पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध् नहीं था।
आज भी भारत की अनेक आदिवासी जातियों में उन्मुक्त सेक्स की प्रथा विद्यमान है। अनेक पहाड़ी जातियों में बहुपत्नित्व एवं बहुपतित्व की प्रथा प्रचलित है। यौनाकर्षण तथा यौन-संभोग का प्रश्न किसी जाति, देश, ध्र्म, आयु के साथ बंध हुआ नहीं होता है। चाहे किसी भी देश का निवासी हो, वह स्त्राी-संभोग के बिना नहीं रह सकता। मनुष्य ही क्यों, त्राफृतु-विशेष में पशु-पक्षी भी अपने साथी की खोज में व्याकुल दिखाई देते हैं। महाभारत काल में कुरू नरेश वृ( शांतनु एक ध्ीवर की कन्या के पीछे दिवाने हो गए थे। आज भी यूरोप-अमेरिका में स्कूल-काॅलेज जानेवाली छात्राएं बहुत बड़ी संख्या में विवाह से बहुत पहले ही यौन-संभोग के महासुख से भलीभांति परिचित हो चुकी होती हैं। बेमेल विवाहों से यौन-सुख मिलता ही नहीं है। प्रौढ़ पुरूष की आयु ऐसी नहीं होती कि नववध्ू की चरमोत्कर्ष की ओर बढ़ती हुई कामवासना को तृप्त कर सके। यदि वह कुछ दिन तक तृप्त करने में समर्थ हो भी जाए, तो भी कुछ समय बाद ढ़लती हुई आयु के चलते यौवनमय युवती की आकांक्षाओं और वासनाओं के साथ कदम-ताल मिलाकर नहीं चल सकता। परिणाम यह होता है कि यौन-असंतुष्ट स्त्राी दूसरे पुरूष की ओर देखने को विवश हो जाती है, जिससे दाम्पत्य -जीवन कलहपूर्ण बन जाता है, परिवार नष्ट हो जाता है। यौन-दृष्टि से ऐसे विवाह के सपफल होने का प्रश्न नहीं उठता।
इस संसार में सेक्स सबसे अध्कि प्रभावशाली शक्ति है। यौन-संबंध् का अर्थ केवल काया का मिलन ही नहीं है, इसके पफलितार्थ बड़े व्यापक होते हैं, जो मन को प्रभावित करने के साथ-साथ संपूर्ण जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इससे तीसरे प्राणी का जन्म भी हो सकता है, जिसकी मर्यादा, अस्तित्व, भलाई-बुराई, यौन-संबंध् की वैद्यता-अवैद्यता पर बहुत अध्कि निर्भर रहती है।
सेक्स की भूख मनुष्य और पशु दोनों में ही समान रूप से होती है, लेकिन मनुष्य में विचार करने की क्षमता होती है, जबकि पशु में इसका सर्वथा अभाव होता है। कुत्ता, जिस कुतिया को देखता है, उसी के पीछे काम-विह्वल होकर दौड़ पड़ता है। किसी सुंदर वस्तु को देखकर उसकी ओर आकर्षित होना मनुष्य का स्वभाव है और जिसकी ओर वह आकर्षित होता है, उसे वह प्राप्त करना चाहता है, किंतु नैतिकता की दृष्टि से उसे प्राप्त करना चाहिए या नहीं, यहां विवेक की जरूरत होती है। इसी विवेक का अंकुश अपनी सेक्स-भावना पर प्रत्येक स्त्राी-पुरूष को लगाना चाहिए। यदि उसमें वह सपफल हो जाता है, तो उसका स्वयं का और समाज का चरित्रा बहुत उफंचा उठ जाता है, अन्यथा उसे बहुत-सी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। विवाह से पूर्व यौन-संबधें से सर्वथा बचना चाहिए। इस प्रकार के संबंध् तभी स्थापित करने चाहिए, जब आगेे चलकर परस्पर विवाह करने का पक्का निश्चय हो।
यह सही है कि आज के वैज्ञानिक युग में अनेक गर्भ-निरोध्क प्रसाध्न उपलब्ध् हैं और उनका उपयोग भी होता है, पिफर भी भावनात्मक खतरा तो है ही। युवक-युवतियां सेक्स-आकर्षण के पफलस्वरूप शारीरिक संबंधें से बचें। मैंने पूर्व मंे भी कहा है कि सेक्स का मुख्य उद्देश्य संतानोत्पत्ति नहीं है। बिना स्त्राी-पुरूष संसर्ग के भी बच्चे उत्पन्न किए गए हैं। तो क्या कभी यह संभव है कि स्त्राी-पुरूष का यौनाकर्षण या सेक्स समाप्त हो जाएगा? जीवन की कृत्रिम उत्पत्ति का प्रचलन हो जाने पर भी सेक्स का स्थान यथावत् बना ही रहेगा।
स्त्राी हो या पुरूष उसे बाहरी सुन्दरता प्राप्त हो, परन्तु उनमें आंतरिक सौन्दर्य या चरित्रा की सुन्दरता-पवित्राता का अभाव हो, तो उनका व्यक्तित्व कभी आकर्षक नहीं हो सकता। वास्तविक सौन्दर्य तो गुणों से ही प्रतीत होता है, न कि बनावटी दिखावे से। आज के पैफशनपरस्त तेज रफ्रतार जीवन में स्त्राी-पुरूष चारित्रिक पतन की तरपफ दु्रत गति से आंखें मूंद कर दौड़े जा रहे हैं। जिध्र नजर डालें, उध्र ही आध्ुनिकीकरण के नाम पर स्त्राी-पुरूष के चारित्रिक पतन के नए-नए तल बनते हुए दिख रहे हैैं। एक तरपफ कामवासना की अध्किता ने स्त्राी-पुरूष के मन को विकृत-व्यथित करके बेचैन, अस्थिर, असहज और अशांत कर दिया है, तो दूसरी तरपफ क्रोध् एवं अहंकार ने नैतिक-बु(ि पर काला परदा डाल दिया है। गर्भपात जैसे विषय भी आज मामूली-सी बात बन कर रह गई है। सच तो यह है कि चरित्रा सुन्दर नहीं होगा, तो चित्रा ;शरीरद्ध सुन्दर हो ही नहीं सकता।
स्त्राी-पुरूष की पहचान ही प्रेम से है। प्रेम अर्थात् आनंद की अभिव्यक्ति। जीवन प्रेम का नाम है, पाप का नहीं! परन्तु आज का समय वासना-प्रधन प्रेम का है, जो सामाजिक अपराध् है। स्त्राी-पुरूष के बीच ईमानदारी, वपफादारी, विश्वास, पारदर्शिता जैसे तत्वों का एक-दूसरे से भावनात्मक जुड़ाव होना प्रेम है। तभी रिश्तों मे एक स्थायित्व आता है। बदलते समय में स्त्राी-पुरूष के मन-मिजाज, दिल-दिमाग, दृष्टिकोण, प्राथमिकताएं तथा मूल्य पूरी तरह बदल चुके हंै। सब कुछ पफटापफट और डिजिटल तरीके से होने लगा है। प्रेम कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो किसी सर पर थोप दी जाय, यह दिल की बात है। प्रेम के साथ प्रजनन स्त्राी-पुरूष की जैविक जरूरत है। प्यार एक व्यक्तिगत चीज है, इसका दिखावा नहीं किया जाता। एक ऐसा पावन और पवित्रा रिश्ता है, जो दो दिलों को ही नहीं, जिंदगियों का पफैसला करता है। कहा जाता है, प्यार अगर सच्चा है, तो खुदा को भी झुकना पड़ता है। आज के स्त्राी-पुरूष को प्यार की मर्यादा का कतई ज्ञान नहीं, उनकी नजर में दूसरों को दिखाकर प्यार जताना ही प्यार होता है। जब आप किसी से प्यार करते हैं, तो उसका एहसास शब्दों में अभिव्यक्ति से परे होता है। यह प्यार झलकता है-हमारे व्यवहार में, प्रेमास्पद की हर जरूरत को पूरा करने की हमारी चाहत में। प्यार का रिश्ता जब इतना गहरा है, तो उसे जताने के अंदाज में भी उतनी ही गहराई होनी चाहिए। बदलते दौर के साथ प्रेम की परिभाषा भी बदल चुकी है और इजहार करने के तरीके भी बदल चुके हैं। भावनाओं की खुशबू के बिना सेक्स हो सकता है, प्यार नहीं। आज प्रेम का ट्रैंड बदला है। सोसायटी पफास्ट मूविंग हो गई है। लेडीज का सोशलाईजेशन हद से ज्यादा बढ़ गया है। उनका पफोकस खुद पर ज्यादा हो गया है। इस असार संसार में सार प्रेम है, सेक्स नहीं।
सेक्स अैर प्रेम एक बात है? विवाह और प्यार एक बात है? विवाह करने से होता है, प्यार अपने आप होता है। कोई किसी से प्यार करता है, तो वह उससे विवाह भी करता है? स्त्राी-पुरूष आपस में रजामंदी से सेक्स करते हैं, तो क्या वहां प्रेम सचमुच उपस्थित रहता है? वीमन लीब के जमाने में स्त्रिायां अपनी मरजी को तरजीह देने लगी हैं, सेक्स की भरी नदी जैसी अपनी ही पूर्णता से अदृश्य की ओर वेग से बहती जा रही हैं। कलियुग है यह, यहां बु(ि ही पलटी हुई है। संग्रह और लोभ के लिए भ्रष्ट मोह का ही वास है। यहां परस्पर लाभ के लिए दैहिक मिलन होते हैं। आज भावनात्मक प्यार की जगह दैहिक प्यास बलवती है, जिसकी पूर्ति में संतानोत्पत्ति का दूर-दूर तक कोई संबंध् नहीं होता है।
इस युग में पितृत्व तथा मातृत्व के लिए इच्छा पृष्ठभूमि में चली गई है। इसकी तुलना में सुख की प्राप्ति के लिए संभोग की इच्छा प्रबल होती जा रही है। यदि स्त्राी-पुरूष केवल संतान प्राप्ति के लिए ही सेक्स करते हैं, तो गर्भ स्थित हो जाने के बाद संभोग की क्रिया समाप्त हो जानी चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं होता। गर्भवती स्त्राी के साथ पुरूष संभोग करता रहता है और वास्तविक प्रजनन के कुछ दिन पूर्व तक यह क्रम जारी ही रखता है। संभोग का एकमात्रा उद्देश्य इससे प्राप्त होनेवाले नैसर्गिक सुख को स्वयं प्राप्त करना और स्त्राी को प्राप्त करवाना है।त्र;लेखक मुजफ्रपफरपुर के अपर समाहर्ता सह जिला दण्डाध्किारी हैं)

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