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राजनीति का खानदानीकरण

Posted By wmadmin123 On February 26, 2014 @ 8:31 am In आवरण कथा | No Comments

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राजतंत्रा में वंशवाद की परंपरा रही है। पहले राजा-महाराजा हुआ करते थे। राजा-महाराजाओं की संतान ही उनका उत्तराधिकारी होता था। भारत के आजाद होते ही देश में प्रजातंत्रा की स्थापना हुर्इ। राजा और जमींदारों का दौर समाप्त हो गया लेकिन उत्तराधिकार के मामले में ‘राजतंत्रा का ‘वंशवाद आज भी चलन में है। जबकि राजा-महाराजा के संबोध्न को भारतीय संविधन से भी हटा दिया गया। उíेश्य यही था कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बढ़ावा मिले। लोकतांत्रिक अधिकार आमलोगों के पास भी रहे। जो अधिकार पहले केवल अंग्रेजों और राजा-महाराजाओं के पास हुआ करते थे। लोकतंत्रा की स्थापना के बाद आम लोगों को वे सारे अधिकार मिले भी लेकिन इसके साथ ही देश में एक नए तरह का ‘राजतंत्रा भी पुषिपत और पल्लवित होता रहा। लिहाजा, सियासत में वंशवाद और परिवारवाद हावी हो गया। देश में शायद ही ऐसा कोर्इ दल होगा जो इससे अछूता रहा हो। यहां तक कि खुद को समाजवादी  कहने वाले राजनेता भी आज वंशवाद और परिवारवाद के सबसे बड़े संरक्षक बने हुए हैं। कहना न होगा, वंशवाद और परिवारवाद के विरू( सर्वप्रथम राममनोहर लोहिया ने आवाज उठायी थी। वंशवाद के विरू( आवाज उठाने का काम लोहिया के चेले आज भी कर रहे हैं। लेकिन वे अपने जीवन में इसपर अमल करने से परहेज करते हैं। बानगी के तौर पर लालू यादव, रामविलास पासवान या पिफर मुलायम सिंह यादव का नाम लिया जा सकता है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में मुलायम सिंह यादव से बड़ा राजनीतिक परिवार वर्तमान में किसी का नहीं होगा। इस वक्त मुलायम सिंह परिवार के करीब एक दर्जन सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं। इध्र लालू-रामविलास की कथा किसी से छुपी हुर्इ नहीं है। इन राजनेताओं के बीच भी अपनी संतान को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने तथा अपनी विरासत उन्हें सौंपने की जैसे एक अघोषित प्रतियोगिता छिड़ी हुर्इ है। यही कारण है कि राजनीति के ऐसे माहौल को देखकर नर्इ पीढ़ी यह कहने लगी है कि हम ‘राजतंत्रावादी लोकतंत्रा में जी रहे हैं। एक प्रसि( समाजशास्त्राी कहते हैं-’परिवारवाद की वजह से भारतीय राजनीति में कार्यशैली का विकास नहीं हो पाया है। प्रशासन या सरकार चलाने की शैली के व्यापक होने की बजाय उसमें संकीर्णता आर्इ है। परिवारवाद की वजह से आप पहले बेटे, पिफर परिवार और सबसे अंतिम में देश और समाज के हित को देखते हैं। राजनीति में नए विचारों, नर्इ कार्यशैली का प्रवाह परिवारवाद की वजह से नहीं आ पा रहा है।
वंशवाद की जब बात आती है तो देशभर के लोगों की पहली नजर नेहरू-गांध्ी परिवार पर पड़ती है। पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधनमंत्राी बने, पिफर उनकी बेटी इंदिरा गांध्ी प्रधनमंत्राी की कुर्सी पर काबिज हुर्इ। इंदिरा गांध्ी के बाद उनका पुत्रा राजीव गांध्ी भारत के वजीरे आला बने। अभी राजीव गांध्ी की पत्नी सोनिया गांध्ी और उनका पुत्रा राहुल गांध्ी कांग्रेस के क्रमश: अèयक्ष और उपाèयक्ष की कुर्सी पर विराजमान होकर देश को अपने मिजाज से हांक रहे हैं। इसके अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में और भी सैकड़ों ऐसे माननीय रहे हैं जो वंशवाद के नायक के रूप में जाने जाते हैं। ऐसे लोगों में बिहार से लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, डा. जगन्नाथ मिश्र, झारखंड से शिबू सोरेन, पंजाब से प्रकाश सिंह बादल, जम्मू कश्मीर से पफारूक अब्दुल्लाह, मुफ्रती मोहम्मद सर्इद, उत्तर प्रदेश से मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, महाराष्ट्र से बाल ठाकरे, शरद पवार, छगन भुजवल, तमिलनाडु से करूणानिधि, उड़ीसा से बीजू पटनायक, मेघालय से पीए संगमा, मèयप्रदेश से रविशंकर शुक्ला, दिगिवजय सिंह, हरियाणा से देवीलाल, वंशीलाल, भजनलाल, राजस्थान से वसुंध्रा राजे सिंधिया, छत्तीसगढ़ से मोतीलाल बोरा, अजित जोगी, हिमाचल प्रदेश से प्रेम कुमार ध्ूमल, आंध््र प्रदेश से एनटीआर सहित दर्जनों प्रमुख माननीयों के नाम शामिल हैं। इन माननीयों पर आरोप है कि इन्होंने वंशवाद को समृ( करने में अहम भूमिका निभार्इ है।
लेकिन आज वंशवाद की चर्चा हम सिपर्फ बिहार के संदर्भ में करेंगे। लोकसभा चुनाव आगामी कुछ महीनों के बाद होने वाला है। ऐसे में कर्इ राजनेता अपनी राजनीतिक विरासत अपनी संतानों को सौंपने के लिए तैयार दिखते हैं तो कर्इ खुद और अपने परिवार के लोगों के लिए एक टिकट के लिए बेचैन हैं। बात की शुरुआत राजनीतिक विरासत सौंपने संबंध्ी विषय को लेकर करते हैं। बिहार में इन दिनों राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव एवं लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के बेटे क्षेत्रा में सघन दौड़ा कर रहे हैं। दोनों सुप्रीमो ने अपने-अपने बेटे तेजस्वी यादव और चिराग पासवान को अघोषित रूप से पार्टी की कमान सौंप दी है। हालांकि इन दोनों पार्टियों में नेताओं का एक बड़ा तबका दोनों ‘राजकुमारों के लाचिंग से बेहद आहत हैं। इन नेताओं का मानना है कि परेशानी इससे नहीं है कि लालू और रामविलास के बेटे का पदार्पण राजनीति में हुआ है, बलिक निराश करने वाली बात यह है कि ये दोनों सुप्रीमो अपनी-अपनी पार्टी में अनेक वरिष्ठ एवं अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर अपनी संतानों को राजनीतिक विरासत सौंपी है। जबकि इन दोनों राजकुमारों को राजनीति की ‘ओनामासी की भी जानकारी नहीं है। इनकी योग्यता सिपर्फ यही है कि ये दोनों क्रमश: लालू यादव और रामविलास पासवान के पुत्रा हैं। खासकर लालू के पुत्रा तेजस्वी की अभी इतनी उम्र भी नहीं हुर्इ है कि वे लोकसभा चुनाव भी लड़ सके। लेकिन परिवारवाद का ही यह चमत्कार है कि पार्टी में जमीन से जुड़े बड़े-बड़े नेता लालू के ‘लाल के आगे खामोश रहते हैं। लालू के ‘लाल अर्थात तेजस्वी की पार्टी में अभी तूती बोलती है। राजद के छोटे-बड़े नेता और कार्यकर्ता लालू-राबड़ी जिंदाबाद के नारे लगाने के साथ-साथ अब तेजस्वी यादव जिंदाबाद के भी नारे लगा रहे हैं। गौरतलब है कि हाल में बीते 30 अक्टूबर 2013 को लालू यादव को चारा घोटाले में सजा हो जाने के बाद पार्टी की नर्इ जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से लालू की पत्नी राबड़ी देवी के हाथों में आ गर्इ है। श्रीमती देवी को यह जिम्मेदारी लालू की इच्छानुसार दिया गया है। हालांकि यह जिम्मेदारी संभालने से पहले ही राबड़ी देवी ने राजद कार्यकर्ताओं को यह संकेत दे दिया था कि अब वे अपने बेटे के सहयोग से पार्टी चलाएंगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था-’जिस तरह सोनिया गांध्ी अपने बेटे राहुल के साथ कांग्रेस चला रही हैं, उसी तरह वे भी पार्टी चलाएंंगी। उनके इस बयान के बाद पार्टी में नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्ध तेज हो गर्इ। रघुवंश सिंह और प्रभुनाथ सिंह जैसे नेताओं ने विरोध् में प्रतिक्रिया भी दी थी। रघुवंश सिंह ने कहा था ‘अपनी बात कहने की आजादी सबको है, राबड़ी जी भी अपनी इच्छा प्रकट कर रही थीं। जहां तक पार्टी की बात है इसे सब मिलकर चलाएंगे। लेकिन इससे कोर्इ पफर्क नहीं पड़ा।  पिफर राबड़ी के आवास पर पार्टी की बैठक हुर्इ उस बैठक में राबड़ी को नेतृत्व सौंपा गया। रेखांकित करने वाली बात यह है कि उसमें रघुवंश प्रसाद सिंह उपसिथत नहीं हुए थे। बैठक में उनकी अनुपसिथति को पार्टी में वंशवाद के विरू( उनके गुस्से के रूप में देखा गया। हालांकि 1997 में जब लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्राी थे और चारा घोटाले में उन्हें जेल जाना पड़ा था तब भी उन्होंने अपनी हाउफस वाइपफ राबड़ी देवी को ही मुख्यमंत्राी बनाया था। तब भी उन्होंने पार्टी के अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज कर दिया था। 25 जून 1997 का वह दिन आज भी बिहारवासी भूल नहीं पाए हैं। लालू यादव पशुपालन घोटाले के तहत अपनी गिरफ्रतारी की आशंका से बेचैन थे। उन्हें सूझ नहीं रहा था कि आखिर वे किसे मुख्यमंत्राी बनाएं? पार्टी में इस पद के प्रत्याशियों की एक लंबी कतार थी। रंजन यादव, अब्दुलबारी सिíीकी, जाबिर हुसैन, रघुनाथ झा आदि। उन तमाम नेताओं को दरकिनार कर लालू ने राजनीति से कोसों दूर रहने वाली पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्राी बनाया था। दरअसल, लालू की परेशानी यह है कि वे अपने परिवार के अलावे सत्ता के मामले में किसी और पर विश्वास नहीं करते। राजद सुप्रीमो की नजदीकियों की मानें तो उनकी इच्छा है कि अगला लोकसभा चुनाव राजद तेजस्वी के नेतृत्व में लड़े। इसके लिए वे जेल जाने से पहले पार्टी के कर्इ वरिष्ठ नेताओं से बात भी कर चुके हैं। वैसे भी तेजस्वी कुछ महीनों से सूबे में राजद को खड़ा करने के लिए पसीना बहा रहे हैं। राजद सूत्राों की मानें तो लालू यादव को सजा मिलने का एहसास पहले हो गया था। इसीलिए उन्होंने 11 सितंबर 2013 को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में तेजस्वी और तेज प्रताप को जहां युवा राजद की कमान सौंपी थी वहीं लगे हाथ पार्टी कार्यकर्ताओं को कार्यक्रम भी दे दिया था। लालू यादव ने लोकसभा चुनाव के लिए पंद्रह सदस्यीय चुनावी टीम भी बना चुके हैं। वे यह भी कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान यदि इस टीम को समन्वय की जरूरत पड़ी तो उसके संचालन की कमान राबड़ी देवी के पास रहेगी। इतना ही नहीं, यदि इस टीम को कोर्इ बड़े पफैसले लेने की आवश्यकता होगी तो इसकी स्वीकृति राबड़ी देवी से लेनी होगी। राबड़ी देवी भी बीते कुछ महीनों से अखबारों में दिखने लगी हैं। इतना ही नहीं लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती भी राजद के विभिन्न कार्यक्रमों में उपसिथत होने लगी हैं। दरअसल, राबड़ी, मीसा भारती और तेजस्वी, तेज प्रताप की सक्रियता लालू के उसी राजनीति का हिस्सा है। हालांकि तेजस्वी का लांचिंग तो पिछले विधनसभा चुनाव 2010 में ही लालू ने कर दिया था। लेकिन बड़ी हार ने उनके लांचिंग को बदमजा कर दिया। पिफर करीब ढ़ार्इ साल के बाद जब गांध्ी मैदान में राजद की परिवर्तन रैली हुर्इ तो उसमें भी लालू ने तेजस्वी, तेजप्रताप के साथ-साथ बेटी मीसा भारती को पार्टीसिपेट करवाया था।  तब विरोधियों ने इस मामले को कापफी तूल दिया था और राजद के कुछ वरिष्ठ नेता भी इससे खासे नाराज थे। उस समय पार्टी के बड़े नेताओं का इतना दवाब था कि गांध्ी मैदान से लालू के बेटों का भाषण अंतिम समय में टाल दिया गया। जगदानंद सिंह तो इतने गुस्से में थे कि वे मंच पर भी नहीं आए। हालांकि परिवर्तन रैली के दौरान लालू के बेटों को लांच करने की बात ने जब तूल पकड़ी तो बेटी मीसा भारती ने विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था-’मेरे दोनों भार्इयों को राजनीति में लांच करने की बात कहने वाले राजद को बदनाम करने की मंशा से बोलते हैं। मेरे दोनों भार्इ तेज प्रताप और तेजस्वी के बारे में यह कहा गया कि इन्हें रैली में लांच किया जाएगा। हमलोगों को लांच करने की क्या आवश्यकता है। हमलोग तो जन्म के साथ ही राजनीति में लांच हो गए हैं। घर में राजनीतिक गतिविधियां बचपन से ही देख रहे हैं। राजनीतिक परिवार से हैं तो राजनीति तो करेंगे ही। जहां तक चुनाव लड़ने की बात है तो जनता चाहेगी तो आने वाले समय में चुनाव भी लड़ लेंगे। पिफलहाल अस्पताल खोलकर जनता की सेवा करना चाहते हैं।
वैसे लालू यादव पूर्व में अपने दोनों सालों साध्ू यादव और सुभाष यादव को सांसद तथा सरहज को पटना नगर निगम में पार्षद बना चुके हैं। देखना है कि तेजस्वी को बिहार की जनता किस रूप में लेती हैं। महिला राजद के प्रदेश सचिव छाया रानी कहती हैं-’अगर किसी परिवार पर यहां की जनता को भरोसा है तो इसमें बुरार्इ क्या है? प्रजातंत्रा में सबों को समान अधिकार है। किसी को इसीलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वे किसी नेता का बेटा है। खासकर तेजस्वी, तेजप्रताप और मीसा भारती में कापफी संभावनाएं हैं। दूसरी ओर तेजस्वी के पार्टी में मुखर होने के बाद राजद के कर्इ वरिष्ठ नेता आहत हंै लिहाजा, वे तेजस्वी को पचा नहीं पा रहे हैं। हालांकि राजद की ओर से तेजस्वी के पक्ष में यह कहा जा रहा है  कि युवाओं को आकर्षित करने के लिए उन्हें आगे लाया गया है।  लेकिन तेजस्वी का विरोध् करने वाले कहते हैं कि लालू यादव यदि युवाओं को सचमुच आकर्षित करना चाहते हैं तो उन्हें पार्टी के जमीन से जुड़े कर्इ नेताओं में से किसी एक को आगे लाना चाहिए था।
इध्र लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान परिवारवाद के मामले में लालू यादव से भी एक कदम आगे निकल गए। श्री पासवान अपने पुत्रा चिराग पासवान को लोजपा के संसदीय बोर्ड की कमान थमा दी। मजे की बात यह है कि चिराग को राजनीति का अनुभव नहीं है लेकिन वे अब पार्टी के अनुभवी नेताओं के भाग्य का पफैसला करेंगे। सचार्इ यह है कि लोजपा के अधिकांश नेता दिल से चिराग को पसंद नहीं करते। इनके सामने ये नेतागण और कार्यकर्ता बेशक ‘चिराग पासवान जिंदाबाद का नारा तो लगाते हैं लेकिन सामने से हटते ही अपनी नापसंदगी जाहिर करने लगते। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से लोजपा में शामिल हुए एक युवा नेता कहते हैं-’क्या करें, मजबूरी है। लोजपा में रहना है तो इसी संस्कृति के साथ रहना होगा। पार्टी सुप्रीमो को खुश रखना है तो चिराग पासवान का जिंदाबाद करना ही होगा। यूं भी रामविलास पासवान पर वंशवादऔर परिवारवाद का यह आरोप पहला नहीं है। श्री पासवान परिवारवाद को बढ़ावा देने के लिए मशहूर रहे हैं। इससे पूर्व वे अपने कर्इ सखा संबंधियों को पार्टी से जोड़कर उन्हें नेता बना चुके हैं। रामविलास पासवान ने अपने भार्इ पशुपति पारस को कर्इ बार विधयक बनाया। अपने दूसरे भार्इ रामचंद्र पासवान को सांसद बनाया। उनके मामा और ममेरे भार्इ भी विधयक और सांसद बने। पिछले विधनसभा चुनाव 2010 में पशुपति पारस और रामचंद्र पासवान सहित अपने दो-दो दामादों मृणाल और अनिल कुमार साध्ु को पार्टी का टिकट दिया था। यह अलग बात है कि पासवान के परिजन को जनता ने अस्वीकार कर दिया। अब सवाल चिराग का है। चिराग को जनता कितना स्वीकार करती है। कारण वालीवुड में बाजी हारने के बाद वे बिहार में राजनीति करने आए हैं। न उनके पास राजनीति का अनुभव है और न ही बिहार की राजनीति का मिजाज ही उन्हें पता है। बड़ा सवाल यह है कि ऐसे में चिराग, पार्टी को कितना दिशा दे पाएंगे। पिफलहाल, रामविलास पासवान चिराग के पीछे साये की तरह लगे रहते हैं। चाहे क्षेत्रा का दौड़ा हो या युवाओं का सम्मेलन, वे चिराग को अकेले नहीं छोड़ते। कुछ माह पूर्व तो वे चिराग को लेकर साबरमती आश्रम चले गए थे। वहां उन्होंने चिराग से सूत भी कटवायी। बताया जाता है कि रामविलास पासवान चिराग के लिए अपना हाजीपुर संसदीय क्षेत्रा भी छोड़ने वाले हैं। सूत्रा बताते हैं कि यदि वे हाजीपुर छोड़ते हैं तो वैसी सिथति में श्री पासवान जमुर्इ जा सकते हैं। अभी श्री पासवान अपने और बेटे के लिए दोनाें संसदीय क्षेत्राों का बराबर दौड़ा कर अपनी उपसिथति वहां दर्ज कराने में लगे हुए हैं। हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि यदि हाजीपुर के कार्यकर्ता रामविलास को ही हाजीपुर से लड़ने के लिए दबाव बनाया तो चिराग जमुर्इ जा सकते हैं। पिफलहाल सूबे के लोगों की नजर लगी हुर्इ है कि रामविलास का ‘चिराग राजनीति की आंध्ी को किस तरह झेलते हैं। उध्र रामविलास पासवान को अपने बेटे की योग्यता पर पूरा भरोसा है। श्री पासवान कहते हैं-’हर कोर्इ महान बनना चाहता है, लेकिन वो यह भी चाहता है कि उनकी संतान का उससे भी बड़ा नाम हो। अभी चिराग को लोग मेरे नाम से जानते हैं लेकिन मुझे खुशी होगी कि कल लोग यह कहें कि ये रामविलास पासवान चिराग पासवान के पिता हैं। करीब 35 साल पहले 1969 में श्री पासवान खगडि़या जिले के अलौली का विधयक बनकर अपनी राजनीति की शुरूआत की थी। ये 1977 र्इ., 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 र्इ. में लोकसभा तथा 2010 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसमें से 1984 के लोकसभा चुनाव में इन्होंने हाजीपुर से जीत का विश्व रिकार्ड बनाया था।
राजनीति में वंशवाद को प्रोत्साहित करने वालों की कमी नहीं है। मुजफ्रपफरपुर के जदयू सांसद जय नारायण निषाद भी परिवारवाद को आगे बढ़ाने के लिए बेचैन हैं। बताया जाता है कि श्री निषाद इस बार खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे। वे भाजपा से अपने पुत्रा के लिए टिकट के जुगाड़ में हैं। पतोहु पहले से ही हाजीपुर के नगर परिषद में पार्षद हैं। परिवारवाद को आगे ले जाने वालों में बिहार के मुख्यमंत्राी डा जगन्नाथ मिश्र का भी नाम प्रमुखता से लिया जाता है। डा मिश्र का पुत्रा नीतीश मिश्र इन दिनों नीतीश सरकार में ग्रामीण विकास मंत्राी की कुर्सी पर काबिज हैं। जगन्नाथ मिश्र के बड़े भार्इ ललित नारायण मिश्र केंद्र में प्रभावशाली मंत्राी हुआ करते थे। उनकी हत्या हो जाने के बाद डा. मिश्र को मुख्यमंत्राी की गíी मिली थी। ललित नारायण मिश्र के पुत्रा विजय कुमार मिश्र भी एक बार दरभंगा से सांसद तथा कर्इ बार विधयक बन चुके हैं। वर्तमान में श्री मिश्र जाले से भाजपा के विधयक हैं। अब विजय मिश्र अपने पुत्रा त्राफृषि मिश्रा को चुनावी मैदान में उतारना चाहते हैं। जब भाजपा ने श्री मिश्र को ऐसा कोर्इ आश्वासन नहीं दिया तब विजय मिश्र ने भाजपा विधयक रहते हुए नीतीश का गुणगान करना शुरू कर दिया। हालांकि उनके द्वारा ऐसा करने पर कापफी बवाल भी मचा। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि मुख्यमंत्राी नीतीश से विजय मिश्र को अपने बेटे के लिए विधनसभा चुनाव में टिकट का आश्वासन दिया है। उध्र भाजपा के पूर्व प्रदेश अèयक्ष डा. सीपी ठाकुर भी परिवारवाद के बड़े पैरोकार हैं। अपने पुत्रा विवेक ठाकुर को विधनसभा चुनाव 2010 में टिकट नहीं मिलने पर डाक्टर ठाकुर ने गुस्से में बिहार के प्रदेश अèयक्ष के पद से इस्तीपफे तक की पेशकश कर दी थी। बताया जाता है कि सीपी ठाकुर तभी माने जब उन्हें इस बात का आश्वासन मिला कि उनके बेटे को विधन परिषद के लिए चुन लिया जाएगा। आज की तिथि में विवेक ठाकुर विधन परिषद सदस्य हैं। पूर्व मुख्यमंत्राी भागवत झा आजाद के पुत्रा कीर्ति झा आजाद वर्तमान में दरभंगा से सांसद हैं। कीर्ति झा आजाद भी परिवारवाद की ही उपज बताये जाते हैं। कहा जाता है कि कीर्ति आजाद के पिता भागवत झा आजाद एवं अटल बिहारी वाजपेयी एक दूसरे का कापफी सम्मान करते थे। वे दोनों मित्रा थे। श्री वाजपेयी ने ही कीर्ति झा आजाद को दरभंगा से भाजपा का टिकट दिलाया था। वंशवाद को प्रोत्साहित करने वाले लोगों की सूची यहीं समाप्त नहीं होती, राजद के शकुनी चौध्री लालू-राबड़ी राज में मंत्राी हुआ करते थे। शकुनी चौध्री के बेटे सम्राट चौध्री वर्तमान में राजद के मुख्य सचेतक हैं। ये वही सम्राट चौध्री हैं जिनकी उम्र को लेकर तब कापफी बवाल मचा था जब ये राबड़ी सरकार में मंत्राी थे। उस समय सम्राट चौध्री को उम्र के मामले में बर्खास्त भी किया गया था। बिहार में वंशवाद को आगे ले जाने वालों की सूची यहीं समाप्त नहीं होती। ऐसे लोगों की सूची में शामिल हैं बाहुवली एवं पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह। प्रभुनाथ सिंह ने अपने छोटे भार्इ केदारनाथ सिंह को बनियापुर का विधयक बनवा दिया। केदारनाथ सिंह भी राजद में ही हैं। प्रभुनाथ सिंह के एक बहनोर्इ गौतम सिंह ‘सुशासन बाबू की सरकार में गन्ना मंत्राी हैं। उध्र घोसी से जदयू के विधयक राहुल शर्मा जहानाबाद के जदयू सांसद डा. जगदीश शर्मा के पुत्रा हैं। राहुल से पहले इसी सीट पर डा जगदीश शर्मा की पत्नी भी काबिज हुर्इ थी। अब जरा पीछे मुड़कर देखते हैं। केबी सहाय पूर्व में बिहार के मुख्यमंत्राी हुआ करते थे। केबी सहाय के पुत्रा रामबाबू सहाय एमएलसी की कुर्सी पर काबिज हुए। बिहार के एक और मुख्यमंत्राी केदार पांडेय हुए। केदार पांडेय की पत्नी कमला पांडे भी एमएलए बनीं। ;विस्तार से देखें : पशिचम चंपारण से आर्इ पवन कुमार पाठक की रिपोर्टद्ध सूबे के प्रथम मुख्यमंत्राी डा श्रीकृष्ण सिंह का परिवार भी किसी से पीछे नहीं है। उनका न केवल बेटे राजनीति में आए बलिक पोता भी परिवारवाद का हिस्सा बने हुए हैं। चंद्रशेखर सिंह काबीना के एक सदस्य हुआ करते थे बंदीशंकर सिंह। बंदीशंकर सिंह की पहचान श्री बाबू के पुत्रा के रूप में की जाती है। वर्तमान में श्री शंकर के बेटे हीरा सिंह नीतीश के साथ हैं। जदयू से पहले हीरा सिंह कांग्रेस में थे। बिहार के एक मुख्यमंत्राी हुआ करते थे दारोगा राय। स्व. राय के पुत्रा और पत्नी राजनीति में आए। पुत्रा चंदि्रका राय राबड़ी-लालू सरकार में मंत्राी भी बने। पूर्व मुख्यमंत्राी के परिजनों के राजनीति में आने की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। पूर्व में मुख्यमंत्राी रहे सरदार हरिहर सिंह के परिवार का राजनीति में हस्तक्षेप को भी परिवारवाद के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। झारखंड विधनसभा के अèयक्ष रहे स्व. मृगेन्द्र प्रताप सिंह सरदार हरिहर सिंह के बड़े पौत्रा थे और बिहार विधनसभा के वर्तमान उपाèयक्ष अमरेंद्र प्रताप स्व. मृगेन्द्र प्रताप के छोटे भार्इ हैं। इतना ही नहीं पूर्व मुख्यमंत्राी चंद्रशेखर सिंह का परिवार भी इसमें पीछे नहीं रहा। श्री सिंह की पत्नी मनोरमा सिंह कांग्रेस के टिकट पर संसद जा पहुंची। वे बांका से चुनकर गयी थीं। पूर्व मुख्यमंत्राी कपर्ूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर नीतीश सरकार में मंत्राी थे। पूर्व मुख्यमंत्राी रामसुंदर दास ने भी अपने बेटे संजय कुमार को विधयक बनाकर इस परिपाटी को आगे बढ़ाने में सपफल भूमिका निभार्इ है। तस्लीमुíीन ने अपने बेटे सरपफराज आलम को जदयू का विधयक बनवा दिया। पूर्व विधयक मुन्ना शुक्ला ने पत्नी अन्नु शुक्ला को जदयू का विधयक बनवाया, सतीश पांडे ने अपने बेटे अमरेंद्र पांडे को जदयू का विधयक बनवाकर वंशवाद की राजनीति को प्रोत्साहित करने में सार्थक भूमिका निभार्इ। बिहार सरकार में जल संसाध्न मंत्राी विजय कुमार चौध्री को भी राजनीति विरासत में ही मिली है। श्री चौध्री के पिता जगदीश प्रसाद चौध्री कांग्रेसी थे और वे समस्तीपुर जिले के दलसिंहसराय विधनसभा क्षेत्रा से दो-दो बार विधयक बने थे। हालांकि विजय कुमार चौध्री अपने कैरियर की शुरूआत स्टेट बैंक आपफ इंडिया में पीओ के रूप में किया था लेकिन पिताजी की मृत्यु के बाद वे सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आ गए। अपनी राजनीतिक पारी की शुरूआत विजय चौध्री ने कांग्रेस से ही की थी। कांग्रेस के टिकट पर ही दलसिंहसराय विधनसभा क्षेत्रा से लगातार तीन बार विधयक बने। वर्ष 2005 में वे जदयू से जुड़ गए।
कांगे्रस नेता एवं पूर्व विधन पार्षद समीर कुमार महासेठ को भी राजनीति विरासत में ही मिली थी। इनके पिता राजकुमार महासेठ बिहार के कैबिनेट मंत्राी हुआ करते थे। राजकुमार महासेठ के पिता भी राजनीति में ही थे। समीर महासेठ के दादा रामअवतार महासेठ अपने समय में मध्ुबनी नगरपालिका के चेयरमेन हुआ करते थे। समीर महासेठ के पिता राजकुमार महासेठ ने भी राजनीति की शुरूआत मध्ुबनी नगरपालिका से ही की थी। बिहार सरकार में कैबिनेट मंत्राी बाद में बने। समीर महासेठ 2003 में विधन परिषद के सदस्य चुने गए। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांगे्रस के टिकट पर सीतामढ़ी संसदीय क्षेत्रा से चुनाव लड़ा जिसमें वे दूसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस संगठन में 2009 से 2011 तक उन्होंने बिहार प्रदेश कांग्रेस के महासचिव की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद सूबे के व्यवसायिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अèयक्ष भी बनें। वर्तमान में स्पेशल ओलंपिक के बिहार के अèयक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे श्री महासेठ 2013 में कांग्रेस प्रमंडलीय कोर्डिनेशन कमिटी के सदस्य भी बनाए गए। भारत सरकार द्वारा गठित राज्य स्तरीय निगरानी एवं अनुश्रवण समिति के भी सदस्य हैं। गौरतलब है कि इस समिति का कार्य केंद्र प्रायोजित योजनाओं की निगरानी व अनुश्रवण करना है।
इध्र कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं पूर्व सांसद डा. शकील अहमद भी वंशवाद की राजनीति की ही उपज हैं। डा. अहमद की तीन पीढि़यां कांग्रेस से जुड़ी रही हंै। पिता शकुर अहमद को भी राजनीति विरासत में ही मिली थी। दरअसल, शकील अहमद के दादा 1935-37 में कांग्रेस के विधयक हुआ करते थे। दादाजी ने विधयक की कुर्सी तब मुसिलम लीग के उम्मीदवार को हरा कर हासिल की थी। तब के समय में मुसिलम लीग के उम्मीदवार को हराना साधरण बात नहीं थी। पिता शकुर अहमद बिहार विधनसभा के अèयक्ष भी रहे। वे 23 वर्षों तक विधयक रहे। स्वयं शकील अहमद प्रदेश और केंद्र सरकारों में मंत्राी एवं बिहार कांग्रेस के प्रदेश अèयक्ष भी रह चुके हैं। वर्तमान में श्री अहमद कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।
उध्र कांग्रेस नेता मदन मोहन झा को भी राजनीति विरासत में मिली है। 1985 से 1995 तक विधयक रहे मदन मोहन झा पूर्व मंत्राी स्व. डा. नागेन्द्र झा के पुत्रा हैं।
प्रदेश कांग्रेस के वर्तमान अèयक्ष अशोक चौध्री भी परिवारवाद की राजनीति के ही उपज हैं। श्री चौध्री पूर्व मंत्राी महावीर चौध्री के बेटे हैं। अशोक चौध्री राबड़ी सरकार में कारा राज्य मंत्राी की कुर्सी पर आसीन हुए थे। ये वर्ष 2000 में बरबीघा से विधयक चुने गए। गौरतलब है कि बरबीघा से ही इनके पिता महावीर चौध्री भी विधयक हुआ करते थे। श्री चौध्री दलित समुदाय से आते हैं। दलित वर्ग से ही आने वाले एक और कांग्रेसी नेता डा. अशोक राम को भी राजनीति विरासत में ही मिली है। इनके पिता बालेश्वर राम पूर्व में केंद्रीय मंत्राी हुआ करते थे। अशोक राम कर्इ बार सिंघिया विधनसभा क्षेत्रा से विधयक भी बनें। हालांकि पिछले विधनसभा चुनाव में टिकट वितरण को लेकर इनपर अंगुलियां भी उठी थी। कर्इ कांग्रेसियों ने इनपर यह आरोप लगाया था कि इन्होंने कांग्रेस का टिकट बेचा है। अशोक राम पूर्व में बिहार में हुए युवा कांग्रेस अèयक्ष के चुनाव में अपने पुत्रा अतिरेक कुमार को भी उतारा था लेकिन बेटे को युवा अèयक्ष नहीं बनवा सके। इनके बेटे को युवा कांग्रेस में महासचिव पद से ही संतोष करना पड़ा।
पूर्व कांग्रेसी विधयक तारकेश्वर प्रसाद सिंह का राजनीति में पदार्पण 1995 में इनके भार्इ और मसरख के विधयक अशोक सिंह की हत्या के बाद हुआ था। तारकेश्वर प्रसाद सिंह 1995 में इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए थे। 1996 के विधनसभा उपचुनाव तथा 2005 के विधनसभा चुनाव में ये निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधनसभा पहुंचे थे एवं वर्ष 2000 में राजद के टिकट पर विधयक बने।
राजपूत विरादरी से आने वाली श्यामा सिंह  विशु( रूप से राजनीति में व्याप्त परिवारवाद के साक्षात उदाहरण हैं। श्यामा सिंह की मां माध्ुरी सिंह पूर्व में पूर्णिया की सांसद हुआ करती थी। श्यामा सिंह स्वयं भी 1999 में औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्रा से कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंची थी। इनके दो भार्इ हैं-उदय सिंह जो भाजपा तथा दूसरा भार्इ एनके सिंह जदयू के सांसद हैं। श्यामा सिंह का दूसरा परिचय भी है। ये नागालैंड के राज्यपाल निखिल कुमार की पत्नी हैं तथा पूर्व मुख्यमंत्राी स्वर्गीय सत्येंद्र नारायण सिंह की पतोहू भी। श्यामा सिंह 1999 में औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्रा से चुनाव जीतकर 2004 में पति निखिल कुमार के लिए अपनी उम्मीदवारी छोड़ दी। 2001 में निखिल कुमार इसी सीट से विजयी हुए लेकिन 2009 के चुनाव में बुरी तरह हार गए। पिफर कांग्रेस नेतृत्व ने भारतीय पुलिस सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी निखिल कुमार को नागालैंड का राज्यपाल बना दिया। ;विस्तृत जानकारी के लिए देखें : पूर्णिया से आर्इ कमल आनंद की रिपोर्ट-राजनीतिक दलों में वंशवादी परंपराद्ध।
पूर्व कांग्रेसी विधयक अवध्ेश कुमार सिंह पर भी वंशवाद को प्रोत्साहन देने का आरोप लगाया जाता रहा है। श्री सिंह दो-दो बार विधयक चुने गए। 2005 में दो बार विधनसभा चुनाव हुआ था। पफरवरी और नवम्बर में। पफरवरी में अवध्ेश कुमार सिंह को टिकट से बेदखल कर दिया गया था। वे निर्दलीय चुनाव लड़ गए और जीत भी गए। हालांकि चुनाव जीतने के बाद वे पुन: कांग्रेस में शामिल हो गए। पिफर 2005 में ही नवंबर में विधनसभा चुनाव हुआ उसमें भी अवध्ेश कुमार सिंह विजयी हुए। सदानंद सिंह की मंडली में अवध्ेश कुमार सिंह को 1998 और 2005 में वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया। कुछ वर्ष पूर्व बिहार में हुए युवा कांग्रेस के अèयक्ष के चुनाव में उन्होंने अपने पुत्रा शशि शेखर को भी उतारा था। यह अलग बात है कि शशि शेखर युवा कांग्रेस के अèयक्ष नहीं बन सके। ललन कुमार उनकी एक न चलने दी। अंत में शशि शेखर को प्रदेश के महासचिव पद से ही संतोष करना पड़ा। बिहार में वंशवाद को बढ़ावा देने वाले लोगों की सूची यहीं समाप्त नहीं होती। पूर्व केंद्रीय मंत्राी कांति सिंह अपने पति केशव सिंह को पीरो से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ा चुकी हैं। इतना ही नहीं कांति सिंह के भार्इ राजेन्द्र सिंह जिलापरिषद का चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें उनकी जमानत जब्त हो गर्इ थी। नीतीश मंत्रिमंडल के मंत्राी नरेंद्र सिंह के दो बेटे भी विधयक हैं। अजय प्रताप जो जमुर्इ के विधयक हैं तथा सुमित कुमार सिंह चकार्इ के विधयक। सुमित कुमार सिंह पहले झामूमो के टिकट पर चुनाव जीता था लेकिन बाद में वे जदयू में शामिल हो गए। जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार ;कांग्रेसद्ध, पूर्व मंत्राी तुलसी मेहता के पुत्रा एवं राजद के पूर्व सांसद आलोक मेहता, पूर्व मंत्राी शकीलुर्र रहमान के पुत्रा पफैसल आलम ;जदयूद्ध, स्व. जगमातो देवी के पुत्रा अजय सिंह व उनकी पत्नी कविता सिंह, जदयू विधयक कौशल यादव और पूनम यादव ;दोनों पति-पत्नी हैंद्ध, पूर्व राजद सांसद स्व. उमाशंकर सिंह के बेटे जितेन्द्र स्वामी, पूर्व केंद्रीय मंत्राी एवं कांगे्रसी नेता एमए पफातमी के बेटे पफराज पफातमी, राजद नेता रघुनाथ झा के बेटे अजित कुमार झा , राजद नेता जगदानंद सिंह के बेटे सुधकर सिंह, बाहुबली आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद वंशवाद की राजनीति के साक्षात उदाहरण हैं। त्र


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