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राजनीति में ‘गंदी बात’

Posted By wmadmin123 On April 16, 2014 @ 12:46 pm In राज्य | | No Comments

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पहले पिफल्मों से समाज बनता था इसलिए पिफल्मों की पटकथा या गीत-संगीत, प्रस्तोता हर विषय पर सतर्क दिखते थे कि गीत-संगीत हो या कथानक, प्रेरणादायक होने चाहिए मसलन, पिफल्में बनतीं थीं-प्यासा, दो आंखें बारह हाथ, आनन्द और गीत हुआ करते थे ‘मध्ुवन खुशबू देता है, सागर सावन देता है, जीना उसका जीना है जो औरों को जीवन देता है।’ तो नेता भी हुआ करते थे-लाल बहादुर शास्त्राी सरीखे किन्तु आज स्थिति बदली है। अब पिफल्म इन्डस्ट्री के पास विषयों का अभाव है। अब समाज को देखकर पिफल्में बनती हैं, जैसे-सूट आउट एट लोखण्डवाला, रागिनी एम एम एस, पफुकडे़े और गीत भी बनते हैं -‘तेरे डाॅगी को मुझ पर भोंकने का नहीं’ या ‘पानी पानी- सानी सानी’ इत्यादि। हां पिछले दो दशकों में गीतकारों ने निरर्थक गीत की विध को खूब प्रश्रय दिया, वह चाहे पिफल्म हेरा पफेरी का-‘मैं लड़का पों पों पों तूं लड़की पों पों पों’ हो या हिन्दुस्तानी पिफल्म का ‘टेलीपफोन घुन पर हंसने वाली’ या पिफर रेडी पिफल्म का ‘ढि़ंक चिका हो हो हो’, हो या पिफर ‘केन्दी पो’, केन्दी जेब इत्यादि हो। इन गीतों का अर्थ क्या स्वयं गीतकार भी बता पायेंगे? यकीनन नहीं। किन्तु ये सारे गीत सुपर हिट हैं। आशय स्पष्ट है। निरर्थक गीत समाज को भाने लगे हैं और जो समाज को भाता है वैसा आचरण करना नेताओं का स्वाभाविक लक्षण है। कहावत है न कि आप उतने ही अच्छे हो जितने अच्छे प्रतिनिध् िको आपने चुना है। ऐसे में दिग्विजय सिंह के अध्किांश निरर्थक बयान हों या बेनी प्रसाद वर्मा का बार बार पिफसलता जु़बान और पिफर भी इन्हें माननीय होने का गौरव यह तो स्पष्ट कर ही देता है कि हमें निरर्थक बातें पसंद आती हैं। यह हमारी पसंद का ही दोष है कि कोई भी नेता वर्तमान परिपेक्ष्य में सुधर की अपनी योजनाएं प्रस्तुत कर हमसे वोट नहीं मांगता बल्कि अपने प्रतिद्वंद्वियों पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के माध्यम से सस्ती लोकप्रियता का मार्ग चुनता है और इन विवादित बयानों में भी साल दर साल आरोही क्रम में वृ(ि हो रहा है।
जब 2009 में आडवाणी पीएम इन वेटिंग थे तो मोदी जी के प्रचार के क्रम में बयान आया -विदेशी बहू और हाईब्रिड राजकुमार। प्रतिउत्तर में लोगों ने वेटिंग को कन्पफरमेशन में तब्दील नहीं किया। पिफर जब सोनिया गांध्ी ने मोदी को मौत का सौदागर कहा तो वहां भी सोनिया गांध्ी को और कांग्रेस को नुकसान हुआ क्योंकि तब तक गाने में तो रस्ते से जा रहा था, भेलपुरी खा रहा था, तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं? सरीखे तक ही गाने आये थे। अब गानों का स्तर कुछ और गिरा है जो लोगों को पसंद भी आ रहा है। हाल ही में पिफल्म राजकुमार फ्रलाॅप होने के बावजूद अपने गीत एबीसीडी पढ़ ली बहुत, अच्छी बातें कर ली बहुत, अब करूंगा तेरे साथ गंदी बात-गंदी बात-गंदी बात, चर्चा में रहा । गीत भी सुपर हिट रहा। हमारे नेताओं ने भी गंदी बातों का प्रयोग जम कर किया, चाहे वे दिग्विजय सिंह एवं बेनी प्रसाद वर्मा द्वारा मुलायम सिंह यादव के लिए अपशब्दों के प्रयोग हों अथवा वे नितिन गडकरी या मुख्तार अब्बास नकबी हों जु़बान सबकी पिफसलती रही है। सपा सांसद नरेश अग्रवाल का 2013 के नवम्बर में दिये गये बयान से पूरा देश शर्मसार हुआ और जब शिव सेना प्रमुख उ(व ठाकरे ने ए के एंटनी को हिजड़ा कहा तो पूरा देश लज्जित हुआ। मणिशंकर अÕयर का बयान इस सदी में चाय वाला प्रधनमंत्राी बन सकता, वह कांग्रेस मुख्यालय पर चाय की स्टाल लगा ले। सांप बिच्छू की तरह हैं नरेन्द्र मोदी जैसे बयान भी अनुचित हैं और भी जब सलमान खुर्शीद ने मोदी को नपुंसक कहा तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांध्ी ने भी अपने नेताओं को ऐसे बयानो से परहेज करने की हिदायत दी। किन्तु जब चुनाव नजदीक आते हैं तो नेताओं की बदजुबानी बढ़ने लगती है। चुनाव आयोग इन नेताओं के भाषणों के क्लिप खंगालने में लगा है और ये आग उगलने वाले नेता माननीय बनकर संसद या विधनसभा में पहुंच जाते हैं जिसका प्रमाण है 15 वीं लोकसभा चुनाव से पूर्व वरुण गांध्ी का हालिया भाषण एवं अभी मार्च 2014 में 16 वीं लोकसभा में प्रवेश की कामना के संग बेलगाम हुए सहारनपुर लोकसभा क्षेत्रा से कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद का भाषण जिसमें मसूद ने नरेन्द्र मोदी के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कही है।
इससे पूर्व पफरवरी 2014 में ही नेताओं की बदजुबानी रोकने हेतु माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका स्वीकार कर ली थी जिसमें इन नेताओं की पिफसलती जुबान एवं व्यकितगत टिप्पणी न करने की बावत प्रावधन की मांग है। बहरहाल नेताओं की पिफसलती जुबान की औषध् िआम मतदाताओं के हाथ में ही है। जैसे इन गंदी बात वाले गाने यदि न सुने जाएं तो ये गाने नहीं बनेंगे। इसी प्रकार ऐसे बयान वाले नेताओं को अगर न चुना जाए तो ये नेता भी बदजुबां नहीं होंगे लेकिन इनकी बदजुबानियों पर लोग तालियां बजाते हैं। चुनाव आते ही समाज विभिन्न पार्टियों के रंग में रंग जाता है। राहुल, मोदी, केजरीवाल के समर्थन, विरोध् में एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी का दुश्मन हो जाता है। शायद इसीलिए चुनाव आते ही भ्रष्टाचार के सभी आरोपी पार्टियों के पुनः चहेते हो जाते हैं। आदर्श सोसायटी घोटाले के आरोप से घिरे अशोक चैहान जिनके क्लीन चिट देने पर राहुल गांध्ी खपफा हो गये थे आज पुनः कांग्रेस के प्रत्याशी हैं वहीं यदुरप्पा आज मोदी को भाने लगे हैं। हां, हमारे नेता इस चुनाव में मन क्रम वचन हर प्रकार से गंदी बातें कर रहे हैं। डर मैं रहा हूं कि कहीं ये गंदी बातें पिफर से सुपर हिट न हो जाएं।


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