October 21, 2017

रामभक्तों का यादव कार्ड

By wmadmin123 - Mon Nov 24, 12:40 pm

प्रधनमंत्राी नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को यह मालूम है कि बिहार की सत्ता में काबिज होना है तो यहां के जातीय समीकरण को दुरूस्त करना ही होगा। यूं भी, बिहार की चुनावी लड़ाई की यह कड़वी सचाई है कि यहां चुनावी बिसात जातीय आधर पर ही बिछायी जाती है। प्रायः सपफलता भी उसी को मिलती है जो इस गणित को दुरूस्त रखकर रणनीति बनाता है। इसी पृष्ठभूमि में भाजपा आगामी विधनसभा चुनाव ;वर्ष 2015द्ध में ‘यादव कार्ड’ खेलने की पूरी तैयारी कर ली है। सच तो यह है कि भाजपा, जदयू से गठबंध्न टूटने के बाद से ही इस मिशन पर काम करती रही है। पहले यादव समुदाय से आने वाले को ही विपक्ष का नेता बनाया गया। लिहाजा, नंदकिशोर यादव नेता प्रतिपक्ष बने। जबकि इस दौर में पूर्व मंत्राी पे्रम कुमार सहित बीजेपी के कई और नेता शामिल थे। इस मुतल्लिक पार्टी ने दूसरा कदम यह उठाया कि लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के बिहार प्रभारी ध्र्मेंद्र प्रधन थे, उन्हें पिछले महीने बदलकर एक यादव समुदाय से आने वाले नेता को बिहार का प्रभारी बना दिया। नए प्रभारी के रूप में भूपेंद्र यादव को सूबे की कमान सौंपी गई है। भूपेन्द्र यादव हरियाणा के मूल निवासी हैं तथा पिछले वर्ष राजस्थान से राज्यसभा के लिए चुने गए थे। भूपेन्द्र यादव के बाद अब यादव के एक और कद्दावर नेता रामकृपाल यादव को नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर यादव कार्ड के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाया है। अब हवा यह बनाई जा रही है कि यदि भाजपा सत्ता में आई तो रामकृपाल यादव मुख्यमंत्राी हो सकते हैं। अब यादव नेताओं की यह तिकड़ी ;नंदकिशोर यादव, भूपेन्द्र यादव, रामकृपाल यादवद्ध नरेंद्र मोदी के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मुस्तैदी से जुट गई है। उध्र, बिहार में भाजपा के यादव कार्ड खेलने की रणनीति से विपक्षी दलों के चेहरे पर चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही है। मध्ेपुरा के राजद सांसद पप्पू यादव ने बीजेपी के इस रणनीति पर अपने सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को खबरदार करते हुए नसीहत दी है कि-‘नरेंद्र मोदी जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग का पफार्मूला अपना रहे हैं उसी तरह लालू यादव को भी दरियादिली दिखानी चाहिए।’
बीजेपी के यादव कार्ड खेलने से सत्तासीन जदयू भी परेशान है। हालांकि इसके नेता अपने बयान में कोई पफर्क नहीं पड़ने की बात कहते हैं। बिहार सरकार के शिक्षा मंत्राी वृषिण पटेल के शब्दों में-‘बीजेपी जातिगत राजनीति की योजना बिहार में बना रही है, उनकी यह कोशिश कभी सपफल नहीं होगी।’ उन्होंने आगे कहा-‘रामकृपाल यादव के बारे में कहा जाता है कि वे लालू यादव के ‘हनुमान’ हैं। हमने तो लालू प्रसाद को ही पकड़ लिया है।’ शिक्षा मंत्राी ने कहा कि-‘बीजेपी में पहले नंदकिशोर यादव पिफर भूपेंद्र यादव और अब रामकृपाल यादव को जगह देकर बीजेपी ने अपने लिए एक खाई खोद ली है। यहां रामकृपाल की कृपा से भाजपा का भविष्य नहीं बनने वाला है बल्कि अब यहां अंतर्कलह बढ़ेगा।’
हालांकि, नरेंद्र मोदी की यह रणनीति कोई नई नहीं है। आज से करीब एक साल पूर्व 27 अक्टूबर 2013 को हुंकार रैली के दौरान पटना के ऐतिहासिक गांध्ी मैदान से उन्होंने यदुवंशियों को न्योता देकर इसकी शुरूआत की थी। न्योते का असर ऐसा हुआ था कि देश भर में इस मुद्दे पर गरमा-गरम बहस शुरू हो गई। हालांकि, उस समय लालू यादव जेल में थे और राजद में नेतृत्व को लेकर अंतर्विरोध् शीर्ष पर था। श्री मोदी ने तब कहा था-‘यदुवंशियों के राजा श्रीकृष्ण गुजरात के द्वारिका नगर में आ बसे थे। उसी द्वारिका से आशीर्वाद लेकर हम यहां आए हैं। अब यदुवंशियों की चिंता हम करेंगे।’ यादव के विशाल वोट बैंक पर नरेंद्र मोदी की पड़ी गि( दृष्टि से तब राबड़ी देवी बेचैन हो उठी थी। उन्होंने नरेंद्र मोदी के यादव प्रेम पर सवाल खड़़ा करते हुए कहा था-‘चुनाव के समय नरेंद्र मोदी को यदुवंशियों की याद आ रही है। वे इतने दिन कहां थे?’ लोकसभा चुनाव में बाबा रामदेव ने भी बिहार में यादवों को नरेंद्र मोदी से जोड़ने के लिए कापफी पसीने बहाये थे। कई यादव बहुल इलाकों में जा-जाकर लोगों से सीध संवाद किया था। भाजपा सूत्रा बताते हैं कि आगामी विधनसभा चुनाव में भी बाबा रामदेव यादवों को नरेंद्र मोदी और बीजेपी से जोड़ने के लिए भ्रमण करेंगे। यूं तो बाबा रामदेव का समाज के हर वर्गों में सम्मान है लेकिन खासकर यादवों के बीच उनकी पकड़ कापफी मजबूत बतायी जाती है। इध्र, अमित शाह की टीम यादवों की उस भावना को भी सहलाएंगे कि नीतीश ने अपने शासनकाल के दौरान यादवांे को हासिए पर ध्केल रखा था। व्यक्तिगत स्वार्थ में ये आज महागठबंध्न के तहत एक छतरी के नीचे आए हैं। सजायाफ्रता होने के कारण लालू यादव स्वयं चुनाव नहीं लड़ सकते लिहाजा, यदि नीतीश पिफर सत्ता में आ गए तो यादव पिफर हासिए पर ध्केल दिए जाएंगे। हालांकि, पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए ने ध्माकेदार कामयाबी हासिल की थी। लेकिन इसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि लालू यादव ने ही एनडीए को सबसे बड़ी चुनौती दी थी। बीजेपी को सबसे जयादा 29.4 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि 20.1 प्रतिशत वोट लेकर राजद दूसरे स्थान पर रहा। बीजेपी के रणनीतिकार मानते हैं कि आगामी विधनसभा चुनाव में भी लालू यादव भाजपा को मजबूत चुनौती दे सकते हैं। कहना न होगा, लालू यादव की मूल पूंजी ‘माई’ समीकरण अर्थात मुस्लिम-यादव का गठजोड़ है। इसी समीकरण के बूते वर्ष 1990 से लगातार 2005 तक वे पत्नी के साथ न केवल बिहार की सत्ता पर काबिज रहे बल्कि केंद्र की यूपीए वन की सरकार में भी मंत्राी बनकर सत्ता का सुख उठाते रहे। बिहार में मुसलमानों के 16 प्रतिशत वोट हैं जबकि यादव के 12 प्रतिशत।
लालू यादव की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे पहले परिवार के लिए सोचते हैं और पिफर पार्टी के लिए। उनके इस मिजाज के चलते राजद के कई समर्थित कार्यकर्ता उनसे दूर होते चले गए। आज जिस रामकृपाल यादव के बूते बिहार में बीजेपी यादव कार्ड खेलने जा रही है उनकी पहचान संसदीय चुनाव से पूर्व तक लालू यादव के बेहद करीबी के रूप में की जाती थी। हर अच्छे-बुरे दौर में लालू के नजदीक रहने वाले रामकृपाल को उनका ‘हनुमान’ कहा जाता था। लेकिन सही बात यह है कि लालू यादव ने उनके साथ भेद-भाव भी खूब किया। रामकृपाल ने उनके साथ राजनीति का कापफी लंबा समय व्यतीत किया लेकिन लालू ने उन्हें कभी मंत्राी नहीं बनाया। न तो बिहार मंे और न ही केंद्र में। जबकि राजद यूपीए-1 का हिस्सा था और इनकी पार्टी से आध दर्जन मंत्राी थे। दरअसल, जमीनी स्तर से उठे रामकृपाल 1985-86 में पटना के उपमहापौर से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। 1992-93 में विधन परिषद के सदस्य बने। 1993-96 में संसदीय उपचुनाव में लोकसभा के सदस्य बने। 1996-97 में 11वीं लोकसभा तथा 2004-09 में 14वीं लोकसभा के सदस्य बने। जुलाई 2010 में इन्होंने राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण की। वर्तमान में पाटलिपुत्रा से भाजपा के सांसद हैं। बीते चुनाव में रामकृपाल राजद से बीजेपी मंे आए थे। रामकृपाल यादव पाटलिपुत्रा से टिकट चाहते थे लेकिन लालू यादव ने उनकी जगह पर अपनी बेटी मीसा भारती को उम्मीदवार बना दिया। लिहाजा, रामकृपाल बगावत कर भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने रामकृपाल को पटना के पाटलिपुत्रा से ही उम्मीदवार बना दिया। उन दिनों रामकृपाल लोगों को घूम-घूमकर यह बताते पिफरते थे कि वे ताउम्र लालू यादव की सेवा करते रहे, एक सच्चे सिपाही की तरह पार्टी के लिए जीते-मरते रहे लेकिन आज लालू प्रसाद ने उन्हें कैसे अपमानित किया है। यादव का एक बड़ा खेमा रामकृपाल के साथ आ गए। लिहाजा, वे मीसा भारती को हराने में कामयाब हो गए। दरअसल, रामकृपाल एक ऐसे नेता हैं जो बिहार की राजनीति की अच्छी समझ रखते हैं तथा जमीनी कार्यकर्ताओं में इनकी अच्छी पकड़ है। मंत्राी बनने के बाद श्री यादव कहते हैं-‘नरेंद्र मोदी ने एक दूध् बेचने वाले के बेटा को सम्मान दिया है। पार्टी ने जो मुझे जिम्मेदारी सौंपी है उसपर खड़ा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा।’
बीते संसदीय चुनाव में चार यादवों को बीजेपी ने टिकट थमाया था। सीवान से ओम प्रकाश यादव, उजियारपुर से नित्यानंद राय, मध्ुबनी से हुकूमदेव नारायण यादव तथा पाटलिपुत्रा से रामकृपाल यादव। बीजेपी के लिए सुखद बात यह रही कि इन चारों के चारों यादव प्रत्याशियों को जनता ने अपनी सर-आंखों पर बिठा लिया। सभी जीतकर लोकसभा चले गए। हालांकि, पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में हुकूमदेव नारायण यादव को मंत्राी बनाया गया था। इस बार भी उन्हें मंत्राी बनाए जाने की चर्चा थी। लेकिन अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने रामकृपाल यादव पर ज्यादा भरोसा किया। बीजेपी सूत्रों की मानें तो इस मुतल्लिक अमित शाह और सुशील मोदी के बीच कई दौर की बातचीत भी हुई। दरअसल, अमित शाह बिहार में जिस अभियान पर निकले हैं उसमें उन्हें एक ऐसे कद्दावर यादव नेता की आवश्यकता थी जो लालू यादव को उन्हीं की भाषा में जवाब दे सके। बिहार से आने वाले चारों सांसदों ने बेशक ऐसा व्यक्तित्व रामकृपाल यादव का ही है। उफपर से इन्होंने नरेंद्र मोदी के उस छवि को चुनाव में बेहद सपफलतापूर्वक पेश किया था कि वे ;नरेंद्र मोदीद्ध चाय बेचने वाले पिछड़े वर्ग से आने वाले गरीब के बेटे हैं।
अमित शाह बीजेपी में मजे हुए रणनीतिकार माने जाते हैं। उन्हें पता है कि बिहार में सत्ता में आने के लिए एक ओर जहां लालू यादव को केंद्र में रखकर रणनीति बनानी होगी तो दूसरी ओर नीतीश को भी मजबूती के साथ जवाब देना होगा। बीते 09 नवंबर 2014 को प्रधनमंत्राी नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिपरिषद का पहला विस्तार किया तो बिहार से तीन उन्हीं सांसदों को शामिल किया गया जो उनकी रणनीति पर खड़े उतरते दिखे। रामकृपाल यादव के अलावा बिहार से राजीव प्रताप रूडी और गिरिराज सिंह को भी मंत्राी बनाया गया है। दरअसल, रामकृपाल यादव की तरह राजीव प्रताप रूडी ने भी लालू यादव के कुनबे का सपफाया किया था। रामकृपाल यादव ने लालू की बेटी मीसा भारती को पटना के पाटलिपुत्रा से हरा कर लोकसभा पहुंचे तो राजीव प्रताप रूडी सारण में लालू प्रसाद की पत्नी तथा पूर्व मुख्यमंत्राी राबड़ी देवी को हराया था। दोनों सीट लालू यादव के लिए प्रतिष्ठा की सीट थी। इसके लिए लालू के साथ उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने भी प्रचार में खुद को झोंक दिया था। मीसा भारती की जीत का रास्ता आसान करने के लिए तो लालू यादव जेल में बंद कुख्यात रीतलाल यादव के यहां चले गए और उसे राजद का महासचिव भी नियुक्त कर दिया। कहना न होगा, रीतलाल यादव ने भी पाटलिपुत्रा से ही चुनाव लड़ने की घोषणा की थी जिससे लालू सशंकित थे। उन्हें तब लगा था कि कहीं रीतलाल मीसा के रास्ते का पत्थर न बन जाए। तब चर्चा इस बात की भी कापफी हुई थी कि लालू यादव ने आगामी विधनसभा में रीतलाल की पत्नी को टिकट देने का वादा किया है। जहां तक गिरिराज सिंह की बात है जब वे नीतीश सरकार में मंत्राी थे तब भी नरेंद्र मोदी के सवाल पर नीतीश को आंखें दिखाते रहते थे। नीतीश के विरू( आग उगलते रहते थे। माना जा रहा है कि उन्हें मंत्राी बना कर कार्यकर्ताओं का मनोबल और उफंचा किया गया है।
इध्र, नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति की गंभीरता को भांप कर लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के चेहरे पर परेशानी की लकीरें बढ़ गई है। नवंबर के पहले सप्ताह में दिल्ली में मुलायम सिंह यादव के आवास पर ‘जनता परिवार’ से जुड़े दलों की बैठक हुई। जिसमें लालू-नीतीश और मुलायम सिंह इस बात पर सहमत थे कि गठबंध्न के बदले इन दलों के विलय पर विचार करने का समय आ गया है। त्र

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