December 12, 2017

लालू-नीतीश या नरेंद्र मोदी, किसकी चलेगी लहर ः बेचैन हैं बाजीगर

By wmadmin123 - Fri Aug 21, 7:13 am

कमल आनंद

बिहार की सत्ता के लिए रणभेरी बज चुकी है। एक ओर जहां सत्ता पर काबिज जदयू का घर-घर दस्तक देने का कार्यक्रम जुलाई महीने के पहले सप्ताह से प्रारंभ है तो 25 जुलाई को मुजफ्रपफरपुर में ‘हर बिहारी का अध्किार विकसित और समृ( बिहार’ का सपना पूरा करने हेतु भाजपा की विशाल रैली को, जिसे परिवर्तन रैली की संज्ञा दी गयी है, में प्रधनमंत्राी नरेंद्र मोदी ने चुनावी शंखनाद करते हुए कथित महागठबंध्न के नेताओं की बखिया उध्ेड़ते हुए बिहार की समृ(ि के लिए केंद्र और राज्य के संबंधें में समानता लाने हेतु बिहार में भी एनडीए सरकार लाने का आम-अवाम से आह्वान किया है। उन्हेांने अपने संबोध्न में कहा कि राज्यों के विकास से ही देश समृ( होगा। उन्होंने कहा कि बिहार के नौजवान कापफी तेजस्वी हैं, वे अपनी तेजस्विता से पूरे हिन्दुस्तान को राह दिखाने की क्षमता रखते हैं।
प्रधनमंत्राी ने बिना नाम लिये लालू प्रसाद पर तंज कसते हुए कहा बिहार की ध्रती पर दोबारा जंगलराज कायम करने का जो प्रयास किया जा रहा है, उसे जनता कभी बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने अपने पुराने तेवर में उपस्थित जन समुदाय से संवाद स्थापित करते हुए कहा, बिहार में बदलाव होना चाहिए कि नहीं, नीति बदलनी चाहिए कि नहीं, बेरोजगारों को रोजगार चाहिए कि नहीं, गुंडागर्दी और अपराध् से मुक्ति चाहिये कि नहीं, सुख-शांति और समृ(ि चाहिए कि नहीं? यदि यह सब चाहिए तो एकबार बिहारवासी उन्हें सेवा का मौका दें। विकास के जो कार्य साठ सालों में नहीं हुए, उसे वह साठ महीने में पूरा कर दिखायेंगे। उन्होंने कहा कि जो लोग कहते रहे हैं कि बिहार में मोदी को घुसने नहीं देंगे, अगर दिल्ली ;केंद्रद्ध से नाता नहीं रखने वाले ऐसे लोग सरकार बनायेंगे तो बिहार का भला होगा क्या? उन्होंने श्रोताओं से यह भी सवाल किया कि ‘आपको दिल्ली से कंध्े से कंध मिलाकर चलने वाली सरकार चाहिए या केंद्र से लड़ाई करने वाली सरकार? नरेंद्र मोदी के भाषण और जन संवाद से यह तो स्पष्ट हो गया है कि बिहार का कायाकल्प करने हेतु वे आनेवाले दिनों में चुनावी संघर्ष को और धरदार बनायेंगे।
दूसरी ओर राज्य सरकार ‘बढ़ चला बिहार’ अभियान के तहत हर प्रखंड, हर गांव में रथ भेजकर ‘जन भागीदारी आ रहा आपके द्वार’ मिशन 2025 के द्वारा अपनी उपलब्ध्यिों के बखान करने में जुटी है। बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर राज्य सरकार अपने प्रचार को उफंचाई पर पहुंचाने में जुटी है। निश्चित रूप से यह रथ यात्रा एवं चैक-चैराहे पर लगाये गये होर्डिंग एक खास दल को लाभ पहुंचाने में सहायक होगा, क्योंकि बिहार में चुनाव का मौसम है और मौसमी पफलों की प्राप्ति ही इस सरकारी मिशन का लक्ष्य है।
आगामी सितंबर-अक्टूबर महीने में बिहार विधनसभा का चुनाव होना तय है। इन्हीं तीन महीने के अंदर बिहार के मतदाताओं को अपना भाग्य विधता चुनना है। यह तो अब तय है कि सत्ताधरी दल जदयू एवं उसके साथ जुड़ चुके राष्ट्रीय जनता दल एवं कांग्रेस के गठबंध्न का सीध मुकाबला मुख्यरूप से इस चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंध्न से होगा। पूर्व मुख्यमंत्राी एवं महादलित नेता जीतनराम मांझी की भाजपा के मंच पर सार्वजनिक उपस्थिति एवं प्रधनमंत्राी की उपस्थिति में उनके द्वारा दिये गये भाषण से यह स्पष्ट हो गया है कि वे भी एनडीए का हिस्सा बन चुके हैं। अर्थात अब बिहार में हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा ;हमद्ध भी एनडीए का बिहार में चैथा घटक बन चुका है। दूसरी ओर लालू प्रसाद को तानाशाह बताकर, राजद को अंगूठा दिखाकर मध्ेपुरा के सांसद राजेश रंजन उपर्फ पप्पू यादव ने कई महीने पूर्व अपनी नई पार्टी ‘जन अध्किार पार्टी’ का गठन कर लालू और नीतीश दोनों को ललकार रहे हैं। यह पहलीबार है कि पप्पू यादव लालू प्रसाद की मिट्टी पलीद करने के संकल्प के साथ बिहार की राजनीति में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
कहा तो यह जाता है कि पप्पू यादव एनडीए का हिस्सा बनना चाहते हैं, लेकिन भाजपा एवं लोजपा के कतिपय नेता नहीं चाहते कि पप्पू प्रत्यक्षतः एनडीए का घटक बनें। इसके कई कारण गिनाये जाते हैं। हालांकि, पप्पू यादव इस मुद्दे पर अभी तक कुछ बोलने से परहेज ही कर रहे हैं। सच क्या है, कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह तो सच है कि राजग के संभावित घटक ‘हम’ नेता जीतनराम मांझी के पप्पू यादव शुरू से हिमायती रहे हैं और श्री मांझी भी इसे स्वीकार करने से गुरेज नहीं करते।
एक अन्य दल, जनता दल राष्ट्रवादी का विधनसभा चुनाव के पूर्व अभ्युदय एवं इसके राष्ट्रीय संयोजक अशपफाक रहमान का बिहार की सियासत में पांव पसारना एक नया संकेत दे रहा है। इसे कमतर आंकना सियासी भूल होगी। रहमान के मुहिम से भले ही भाजपा को कोई पफर्क नहीं पड़े, लेकिन कथित समाजवादियों एवं सेक्युलरवादी दलों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है। चर्चा तो यह है कि अशपफाक रहमान के चुनावी अखाड़े में आने से कथित महागठबंध्न के घटकों को ही नुकसान होगा, बशर्ते कि यह मुहिम महज चुनावी स्टंट न साबित हो।
इसी परिप्रेक्ष्य में बिहार की बदलती सियासत और राजनेताओं के बदलते तेवरों के बीच सीमांचल एवं संपूर्ण कोसी प्रक्षेत्रा के मतदाताओं में व्याप्त खामोशी पर चर्चा करना ज्यादा मुनासिब होगा। विगत लोकसभा चुनाव एवं उसके साथ हुए कतिपय विधनसभा चुनावों में बिहार का यही क्षेत्रा है, जहां भाजपा को सर्वाध्कि नुकसान उठाना पड़ा था। सीमांचल अर्थात पूर्णिया प्रमंडल के चार लोकसभा क्षेत्रों में से एक पर भी भाजपा को सपफलता नहीं मिली थी। बल्कि कहना यह उचित होगा कि भाजपा के जो तीन सांसद, कटिहार, पूर्णिया एवं अररिया संसदीय क्षेत्रा से विगत दो चुनावों में ;2004 एवं 2009द्ध भारी मतों से विजयी हुए थे, उन्हें 2014 के चुनाव में मतदाताओं ने सापफ नकार दिया। लेकिन किशनगंज क्षेत्रा से कांग्रेस के मौलाना अशरारूल हक दुबारा चुन लिये गये। भाजपा सांसदों की हार क्यों हुई, यह अलग मुद्दा है, लेकिन इससे नुकसान यहां के आम अवाम का ही हुआ, क्योंकि केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत एनडीए की सरकार बन गयी और इस क्षेत्रा का सरकार में प्रतिनिध्त्वि नहीं हो पाया। नतीजतन कोसी एवं पूर्णिया के क्षेत्रा में जिस गति से विकास की संभावना बन रही थी, उसपर ब्रेक तो लग ही गया। जो लोग सांसद बने, उनकी अपनी डपफली अपना राग है। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कुहरा पफटा तो स्थानीय निकाय विधन परिषद के चुनाव में डाॅ. दिलीप कुमार जायसवाल जो भाजपा के प्रदेश कोषाध्यक्ष हैं, दुबारा जीत हासिल कर भाजपा का परचम लहराया तो कटिहार में अशोक अग्रवाल ने भाजपा के समर्थन से दुबारा विजयी रहे। वहीं कौशिकी अंचल के सहरसा स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्रा से राष्ट्रीय जनतांत्रिक के एक घटक लोकजन शक्ति पार्टी की नूतन सिंह ने जीत हासिल कर यह साबित कर दिया कि महागठबंध्न में वह ताकत और क्षमता नहीं है कि इस क्षेत्रा में एनडीए को रोक सके। एक सच यह भी है कि इन क्षेत्रों में जदयू एवं राजद को पहले से ही अंदाजा था कि यहां से उनकी दाल नहीं गलने वाली। इसी सोच के वशीभूत दल बदलवा कर यहां से कांग्रेस के टिकट पर उम्मीदवारों को खड़ा किया गया, लेकिन महागठबंध्न की यह चाल शह

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