September 26, 2018

लीडर्स की लव स्टोरी

By wmadmin123 - Wed Mar 18, 10:01 am

किसी ने ठीक ही कहा है कि भरी जवानी का इश्क हो या उम्र की ढलान का इश्क, इश्क अपना रंग दिखाता जरूर है। बीते 16 जनवरी 2015 को मणिपुर के 77 वर्षीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्राी पफुंगजाथंग तेनसिंग अपने से 53 वर्षीया छोटी एक लड़की से शादी रचाई है। ;दोनों की तस्वीर दायें में है।द्ध थांगैया सांग नाम की यह लड़की पेशे से नर्स है और उसकी उम्र मात्रा 24 वर्ष है। बताया जाता है कि मंत्राी महोदय को इस बाला से इश्क हो गया था। इश्क का नशा इस कदर चढ़ा कि 77 वर्षीय परिवार कल्याण मंत्राी ने इस युवा नर्स को अपने परिवार का सदस्य बना लिया। मंत्राी तेनसिंग की यह दूसरी शादी है। इनकी यह नई दुल्हन चूड़ाचांदपुर जिले के न्यू लम्का निवासी टी.खामझाउ की पुत्राी हैं। मंत्राी महोदय ने यह शादी गुपचुप तरीके से नहीं की बल्कि बकायदा एक समारोह आयोजित कर एक दूसरे को जीवनसाथी के रूप में कबूल किया। मुख्यमंत्राी ओकराम इबोबी सिंह सहित कई गणमान्य व्यक्ति उस शादी समारोह में उपस्थित थे।
प्यार के बारे में कई तरह की बातें कही जाती है। कहा जाता है कि प्यार अंध होता है। प्यार जिसे हो जाता है उसे परिवार, समाज, देश-दुनिया की पिफक्र नहीं होती। प्यार जीवन के सूनेपन को रंगीन कर देता है। प्यार जीने का हौसला देता है। कई रंग हैं प्यार के। प्यार करने वाले आम और खास लोगों के अजीबो-गरीब किस्से दुनिया के सामने आते रहे हैं। लेकिन खास लोगों के प्रेम के किस्से जब आम होते हंै तो चर्चा जमकर होती है। बात सिपर्फ मणिपुर के परिवार कल्याण मंत्राी पफंुगजाथंग तेनसिंग और उनकी प्रेमिका की नहीं है। विश्व के रंगमंच पर कई ऐसे माननीय और माननीया के रंगीन प्रेम-प्रसंग प्रकाश में आये हैं जिसके प्रेम के किस्से लोगों ने मजे ले-लेकर सुना है। देश के कई माननीयों के प्रेम-प्रसंग की चर्चा हम आगे करेंगे। पहले बात शुरू करते हैं पुराने जनता दल परिवार को संभावित नेतृत्व देने वाले मुलायम सिंह यादव से।
मध्ेपुरा के राष्ट्रीय जनता दल के सांसद राजेश रंजन उपर्फ पप्पू यादव के जीवन के कई रंग हैं, उनमें से एक रंग है प्रेम का। सियासी जीवन से अलग कापफी दिलचस्प है इनकी प्रेम कहानी। प्रेमिका से पत्नी बनी रंजीत रंजन अब सियासत में भी पप्पू यादव की सहगामी बनी हुई हैं। रंजीत रंजन इन दिनों सुपौल से कांग्रेसी सांसद हैं। पप्पू को अपने प्रेम को पाने में बड़े पापड़ बेलने पड़े हैं। रंजीत रंजन सिख जाति से आती हैं और पप्पू यादव हिंदू जाति से। पहले तो रंजीत रंजन ने पप्पू यादव के प्रेम को ही नकार दिया था। इस प्रेम में एक समय ऐसा भी आया जब श्री यादव ने व्यथित होकर नींद की ढेर सारी गालियां खा ली तथा जान देने का प्रयास किया। अब बताया जा रहा है कि इनकी प्रेम कहानी पर पिफल्म बनने वाली है। इसके लिए बिहार के ही अमरनाथ झा ने पप्पू यादव की आत्मकथा -‘द्रोहकाल के पथिक’ की काॅपी राइट्स खरीद ली है। बीबीसी के साथ बातचीत में अमरनाथ झा ने कहा था-‘मैंने जब उनकी किताब पढ़ी तो मुझे इसमें पूरा पिफल्मी मेटेरियल दिखा। पिफल्म आर्ट के साथ-साथ एक बिजनेस भी है। पप्पू यादव की जिंदगी पिफल्मी हीरो की तरह रही है। इसमें बहुत खूबसूरत लव स्टोरी है। इसमें एक राॅबिनहुड छवि वाले राजनेता को पंजाब की एक सिख लड़की से इश्क हो जाता है। और वो बिना सोचे-समझे उनसे शादी करने का पफैसला कर लेता है। अमरनाथ झा ने बीबीसी को बताया कि उन्हें पप्पू-रंजीत को उनकी स्टोरी पर पिफल्म बनाने के लिए मनाने में थोड़ा वक्त लगा। सवाल उठता है कि रंजीत और पप्पू के प्यार की कहानी क्या है?
यह बात वर्ष 1991 की है। पप्पू यादव राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत पटना के बांकीपुर जेल में बंद थे। बांकीपुर जेल गेट के सामने एक छोटा सा मैदान था जो अध्ीक्षक के कमरे से दिखाई देता था। पप्पू यादव वहीं बैठकर मैदान में खेलते बच्चे को देखकर अपना बचपन याद किया करते थे। इनलोगों को खेलते देखना इन्हें अच्छा लगता था। कभी-कभी श्री यादव उन बच्चों को खिड़की के पास बुला कर उनके बीच ढेर सारे समोसे, मिठाईयां एवं टाॅपफी भी बांटते रहते थे। उन बच्चों से गप-शप किया करते थे। उन्हीं लड़कों में से एक विक्की भी था जो रंजीत रंजन के भाई हैं। बच्चों के चेहरे पर तैरती खुशी पप्पू यादव को कापफी सुकून देता रहा है। उसी दौरान पुर्णिया से कुछ लोग पप्पू यादव के पास पैरवी के लिए आए थे। पप्पू ने उनकी पैरवी कर दी और बदले में उन बच्चों के लिए खेल का सामान खरीदवा लिया। उन लड़कों से मिलने-मिलाने के क्रम में विक्की से पप्पू यादव की नजदीकी बढ़ी। उसी दौरान वह एक दिन पप्पू यादव को दिखाने के लिए अपना पफैमिली एलबम ले आया। न जाने क्यों, विक्की को पप्पू से कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया था। उसने श्री यादव को अपना टेलीपफोन नंबर भी दे रखा था ताकि कभी जरूरत पड़ने पर वे उसे बुला सकें। उसी एलबम में पप्पू यादव ने रंजीत की तस्वीर पहली बार देखी थी। रंजीत की उस तस्वीर ने पप्पू यादव पर इस कदर असर डाला कि वे उनके दीवाने हो गए। पप्पू यादव अपनी आत्मकथा में लिखते हैं-‘अगर मैं चित्राकार होता तो आज भी इतने वर्षों के बाद कैनवास पर उस तस्वीर का हू-ब-हू चित्रा पेंट कर देता। उनकी पहली तस्वीर टेनिस खेलती हुई थी। तस्वीर के प्रफेम में हल्के रंग का टेनिस बाॅल हवा में उछला हुआ था और उनका टेनिस रैकेट वाला हाथ हवा में लहरा रहा था। दूसरी तस्वीर में वह हरे रंग की बड़ी छींटदार सलवार सूट में थी। आंखों पर चश्मा लगाए हुई थी।’ उस तस्वीर की छाप पप्पू यादव के दिमाग पर बड़ा गहरा पड़ा। चूंकि श्री यादव को विक्की से उनका टेलीपफोन नंबर मिल गया था। लिहाजा, वे टेलीपफोन करने के लिए बेचैन थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि-‘मुझे लगा कि विक्की के टेलीपफोन नंबर का इस्तेमाल करने का समय आ गया। कितना सुखद संयोग था कि तस्वीर देखने से पहले लड़की का टेलीपफोन नंबर मिल गया था। लेकिन अगले दो-तीन दिनों तक मैं उसे टेलीपफोन करने का साहस नहीं जुटा पाया था। किसी पक्ष को लेकर मेरा साहस इतना कमजोर हो सकता था, मैंने ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था। मुझे लग रहा था कि कहीं विक्की कुछ गलत न सोचने लगे और उसे बुरा न लगे। उसका मेरे प्रति स्नेह मुझे निश्छल प्रतीत हो रहा था और मैं उसे किसी कीमत पर दुखी नहीं कर सकता था।’ हालांकि बड़ी हिम्मत जुटा कर पप्पू यादव ने पफोन किया और बाद में यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। टेलीपफोन पर पप्पू यादव को कभी विक्की से कभी रंजीत से तो कभी उनकी मां से बातें होती थी। पिफर वह दिन भी आ गया जब पटना उच्च न्यायालय ने इनके उफपर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून निरस्त कर दिया और लगभग साढ़े तीन महीने के बाद वे जेल से बाहर आए। जेल से निकलने से पहले ही उन्होंने मन बना लिया था कि जिस दिन जेल से बाहर निकलूंगा उसी दिन विक्की के घर जाउफंगा। बाहर निकलने के तीसरे दिन उन्होंने ढ़ेर सारी चाॅकलेट और केक की डलिया लेकर बिना सुरक्षा गार्ड के ;विधयक होने के कारण सुरक्षा गार्ड उपलब्ध् था।द्ध खुद से कार चलाते हुए रंजीत के घर पहुंच गए। हालांकि, उस दिन रंजीत से उनकी भेंट नहीं हुई क्योंकि वे टेनिस खेलने निकल गई थी।
कुछ दिनों के बाद एक टेनिस प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था जिसमें रंजीत भी प्रतिभागी थी। विक्की ने पप्पू यादव को यह बातें बतायी और उसने श्री यादव को मैच देखने के लिए आने का आग्रह भी किया। पप्पू यादव अपनी आत्मकथा में लिखते हैं-‘इससे पहले मेरी उनसे चार-पांच बार टेलीपफोन पर संक्षिप्त वार्ता हो चुकी थी लेकिन उनसे भेंट नहीं हो पाई थी बल्कि मैंने उन्हें देखा भी नहीं था। इसीलिए आज उन्हें और उनका खेल देखने के लिए कापफी उत्सुक था। मेरी उपस्थिति का पता आयोजकों को चला तो उन्होंने मुझे तथा मेरे साथियों के बैठने का समुचित प्रबंध् कर दिया था। उनकी तस्वीर देखकर और आवाज सुनकर जितना भी उनके बारे में अनुमान लगाया था वह उससे कहीं बढ़कर थीं। गजब की चुस्ती, पफुर्ती, चमक और रौनक थी उनमें। मैं तो बस देखता ही रह गया था। वे प्रतियोगिता में विजयी हुईं थीं और मैं उनसे अपने मन के हाथों परास्त हो चुका था। पुरस्कार ग्रहण करते वक्त जब वह मुस्कुराई थीं तो पहली बार मुझे ऐसा एहसास हुआ था कि ऐसा भी हो सकता है कि किसी की मुस्कान को मैं घंटों याद करता रहूं और वर्षों तक वह चित्रा की भांति मेरे मन-मस्तिष्क पर अंकित रहे।’
पिफर पप्पू यादव अक्सर उस टेनिस क्लब में पहुंच जाया करते थे जहां वो टेनिस खेला करती थी। कई बार टेनिस खेलकर घर जाती रंजीत का सड़कों पर इन्होंने पीछा भी किया। हालांकि रंजीत को इनकी ये हरकत नागवार गुजरती थी। लिहाजा, उन्होंने पप्पू यादव को ऐसा करने से कई बार मना भी किया और उन्हें डांट भी पिलाई। पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ में इस पूरे प्रकरण का विस्तार से वर्णन किया है। आत्मकथा में यह भी वर्णन है कि आखिर किस परिस्थिति में उन्होंने नींद की ढेर सारी गोलियां खा ली जिसके बाद उनके घरवालों को उन्हें पीएमसीएच में भर्ती करवाना पड़ा था। पप्पू यादव रंजीत के पीछे किस तरह भागते थे उसकी एक बानगी ‘द्रोहकाल का पथिक’ से लिया गया इस अंश में देखा जा सकता है। पप्पू लिखते हैं-‘मैं अपने संकल्प के अनुसार प्रयत्न जारी रखते हुए पुनः जा पहुंचा उनके टेनिस क्लब। किंतु आज मैं अपनी एम्बेस्डर कार से आया था और क्लब के बाहर कार लगाकर इंतजार करने लगा। यहां आने के पहले विक्की को पफोन करके पूछ लिया था और सुनिश्चित कर लिया था कि वो क्लब आईं थी। अब बस इंतजार था उनके बाहर निकलने का। मैंने डेशबोर्ड पर लगी इलेक्ट्राॅनिक घड़ी में समय देखा और सोचा अभी उनके बाहर निकलने में आध घंटा और बाकी था। मेरे पूर्वानुमान के मुताबिक ठीक आध घंटा के बाद ही वह बाहर निकली। आज वह साइकिल से आयी थी। मुझे अपने कार से आने पर खीझ हुई थी। अब मैं अपनी कार से उस साइकिल का पीछा कर रहा था। साइकिल की गति से कार का चलना कितना अस्वाभाविक और तमाशाई लगता है यह सोचकर मैंने अपनी कार को सामान्य गति से चलाकर उनको ओवरटेक करते हुए उनसे करीब एक किलोमीटर आगे सड़क के किनारे लगा लिया और उनके आने का इंतजार करने लगा। कुछ मिनट में वो मेरे सामने से मेरी ओर आ रही थी। उनकी भावाभिव्यक्ति से मैं समझ गया था कि वे मुझे पहचान गई थी। मैंने उन्हें रूकने का इशारा किया। किंतु नजदीक आकर मुझे नजरअंदाज करते हुए वह अपनी साइकिल से आगे निकल गई। मैं मुंह ताकता रह गया। एक-दो यात्रियों ने इस घटना को देखा और इस क्षणिक मनोरंजन दृश्य पर मुस्कुराते हुए गुजर गए। मैं पफौरन अपनी कार में जा बैठा और जल्दी से रफ्रतार देकर उन्हें पुनः ओवरटेक करते हुए पिफर से आगे जाकर उनका इंतजार करने लगा। वो पिफर मेरी ओर आ रही थी। इसबार मुझे यहां पाकर आश्चर्य का भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट दिख रहा था। उनके इस बदलते हुए भाव को देखकर मैं अंदर ही अंदर आशान्वित हो उठा था। वो मेरे पास आई। मेरा अनुमान था कि इसबार बिना रूकने का इशारा किए ही वो स्वयं रूक जाएगी। लेकिन मेरा अनुमान गलत निकला। वो मेरे पास से गुजर गई जैसे मुझे पहचानती ही नहीं हो। मैंने मन ही मन कैलकुलेट किया कि उनका घर अभी भी दो किलोमीटर दूर है। अतः मैं दो बार और प्रयत्न कर सकता हूं और पुनः अगले एक किलोमीटर के बाद उनके रास्ते पर खड़ा था। पिफर वो आ रही थी। अपनी साइकिल पर सवार मंथर गति से हर बीतते पल में वो मेरे नजदीक आती जा रही थी। इसबार उनके चेहरे पर आश्चर्य के साथ-साथ मुस्कान का भी मिश्रण था। किंतु जैसे ही मुझसे सौ मीटर के रेडियस में उन्होंने प्रवेश किया उनका चेहरा भावहीन हो चुका था। मैंने मन ही मन कहा था कि आप स्पोट्र्स पर्सन से ज्यादा अच्छी अभिनेत्राी है। इसबार जैसे ही वो मेरे नजदीक आई तो मैंने सिपर्फ हाथ से रूकने का इशारा ही नहीं किया बल्कि अपने गंभीर और सरल स्वर में उन्हें आवाज देकर रूकने को कहा था और मजबूर होकर उन्हें साइकिल का ब्रेक दबाना पड़ा। इस क्रम में वो मुझसे करीब 10-15 मीटर आगे चली गई और मैं लपक कर उनके पास जा पहुंचा था। मेरे नजदीक जाने पर उन्होंने इशारे से मुझे कहा कि मैं पागल हूं क्या! और वह आगे अपनी राह पर चलती चली गई। अगले दिन पुनः पटना क्लब की पार्किंग में हमारी भेंट हो गई। और मेरे पहुंचते ही उन्होंने सर्द आवाज में ध्ीरे से कहा-‘आप क्या चाहते हैं, मैं खेल बंद कर दूं? सड़क पर नहीं निकलूं?’
‘नहीं! बिल्कुल नहीं!’ मैंने उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश करते हुए कहा था।
‘अगर आप सच में ऐसा चाहते तो यूं मेरा पीछा नहीं करते।’ उन्हें विश्वास दिलाने लायक उचित जवाब की तलाश में मैं तत्काल कोई उत्तर नहीं दे पाया और अगले कुछ क्षण खामोशी के रहे। हां, सड़क पर गुजरती मोटर गाडि़यों की आवाजें जरूर वातावरण को जीवंत किए हुए थी।
करीब 15 सेकेंड तक हमारे खामोश रहने के बाद उन्होंने पुनः बोलना शुरू किया। इसबार उनका स्वर कापफी नर्म था। उनकी मक्खन सी मुलायम आवाज मेरे कानों में घुलने लगी थी,-‘आपको पता है न मैं सिख हूं और आप हिंदू हैं।’ उनके इस अनुनयात्मक स्वर और उनके द्वारा कहे गए ये वाक्य-जिसका अर्थ मैं समझ गया कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मेरी भावना को स्वीकार कर लिया है किंतु परिस्थिति और हालात उन्हें रोक रहे थे। मुझे उस वक्त त्राफृषि कपूर पर पिफल्माए गए एक गाने का बोल याद आया था जो कुछ यूं था-‘वो अगर ना कहेगी तो मर जाउफंगा यारो और अगर वो हां कर दे तो भी खुशी से मर जाउफंगा यारो… ओम शांति ओम…..ओम शांति ओम। मेरी हालत खुशी से मरने जैसी ही थी। परिस्थिति के विरू( जीवन जीने का मेरे पास कापफी अनुभव था। इसीलिए मुझे इसकी चिंता नहीं थी। वो लगातार बोले जा रही थी। शुक्र है वो आंखें नीचे किए बोल रही थी नहीं तो उनकी स्पोट्र्स पर्सन वाली नजरें जो सामने वाले खिलाड़ी की नजरें पढ़ती रहती है जरूर मेरी नजरें पढ़कर मेरे मन की बातें भांप लेती। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, वो नजरें नीचे झुकाए समझाने के लिहाज से बोलती जा रही थी, ‘….मेरे पापा हेड ग्रंथी हैं। यह कभी नहीं हो सकता। मैं अमृत छकी हूं। मेरे परिवार, रिश्तेदार और मेरे ध्र्म के लोग कोई नहीं मानेंगे। आप अपने मन से यह बात निकाल दीजिए कि ऐसा हो सकता है। मेरे परिवार के लोग मार देंगे मुझे और मैं खुद भी अपने मां-पिताजी के खिलापफ सोच नहीं सकती… और मैं उम्र में भी आपसे बहुत छोटी हूं….आपसे 7-8 साल छोटी हूं। मेरा अपना करियर है, मुझे नेशनल खेलना है….इंटरनेशनल खेलना है…..और मैं अपने करियर के अलावा कुछ नहीं देखती…।’
मैं चुपचाप सुनता जा रहा था और उनकी बातों से समझ आ रहा था कि उन्होंने हमारे संभावित रिश्ते के बारे में कापफी गंभीरता पूर्वक विचार किया था और लगभग हरेक पहलू पर अपने हिसाब से विचार किया था। तभी तो उनकी बातों में इतने सारे आयाम थे। जब उनकी बात पूरी हो गई तो मैंने संक्षिप्त किंतु दृढ भावनात्मक उत्तर दिया था-‘आप मेरी जिंदगी में पहली लड़की हैं और आखिरी होंगी। अब मेरे लिए संभव नहीं है कि मैं पीछे हटूं।’ प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने कहा-‘आप यदि आज के बाद आएंगे तो मैं गेम-वेम छोड़कर लुध्यिाना चली जाउफंगी।’ यह उनका अल्टीमेटम था लेकिन ऐसा कहते वक्त उनकी आंखों में आई नमी को मैंने देख लिया था।
घर जाकर उस दिन उन्होंने मुझसे जुड़ी सारी बातें अपनी मम्मी को बता दी। उनकी मां ने क्लब के अध्किारी से शिकायत की। क्लब के अध्किारी ने दरबान को विशेष ताकीद कर दी कि जो सदस्य नहीं है उनको अंदर नहीं आने दिया जाए। मैं उनके घर पफोन करता तो विक्की के अलावा और किसी से बात नहीं हो पाती। उनकी मां ने मुझे पफोन करने से मना नहीं किया था….शायद विक्की का मेरे प्रति लगाव देखकर या पिफर मेरे नाम से जुड़े किस्से और खबर के कारण। जो भी हो, वजह मैं समझ नहीं पाया। उनसे बात नहीं हो पा रही थी। उन्हें क्लब तक छोड़ने अब कभी उनकी मां तो कभी विक्की जाने लगा था।
मैं भावना के इस महाज्वर में तप रहा था। एक दिन मैं पिफर उनके क्लब चला गया। वहां के दरबान ने मुझे रोका तो मैंने एक जोर की घुड़की उसे दी। मैं लालबत्ती वाला एम्बेस्डर में बैठा था इसीलिए शायद मेरी घुड़की का गहरा असर हुआ था उसपर। उसने सैल्युट करते हुए मुझे जाने दिया तो मैंने एक सौ का नोट उसे पकड़ाया और वह खुश हो गया।
मुझे क्लब में देखकर वे खेल बीच में छोड़कर बाहर चली गई। मैंने उनका पीछा नहीं किया। क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वहां के और लोगों को इस बात का एहसास हो जाए कि वो मेरी वजह से अचानक खेल छोड़कर चली गई थी। लेकिन अब तक शायद क्लब के सारे लोग हमारे बारे में जान चुके थे।
उन्होंने क्लब आना और बाहर निकलना बंद कर दिया था। मुझे यह सोचकर बहुत बुरा लगा कि मेरी वजह से उनके जीवन में इतना बड़ा गतिरोध् आ गया। वाकई मैं संवेदनहीन प्राणी हूं जो उनकी समस्या के बारे में नहीं सोच रहा हूं कि हमारे संबंध् को लेकर वो अपने मां-पिताजी का सामना कैसे करेगी। मुझे क्या हक है उनका करियर, उनका जीवन बरबाद करने का। मुझे अपने इस स्वार्थी आचरण से घृणा होने लगी। उनके बिना मेरे लिए अपना जीवन अकल्पनीय था और उनके लिए विशेषकर उनकी परिस्थिति के लिए मैं अस्वीकार्य था। मैं भवावेश की चरम अवस्था से गुजर रहा था। आत्मग्लानि और भावनात्मक हताशा में मेरा जीवन मुझे निरर्थक लगने लगा था कि उनके बिना मैं जी नहीं सकता और वो मेरी हो नहीं सकती तो पिफर मैं जियूं क्यों और कैसे? इस सोच के परिणाम में मुझे अपने जीवन का अंत करने पर विवश कर दिया था और एक रात मैं ढेर सारी नींद की दवाई खाकर सो गया ताकि अगली सुबह उठने की जरूरत ही न पड़े।
मैं नियमित सुबह के साढ़े चार बजे उठने वाला व्यक्ति था। मेरे साथ रहने वाले लोग खासकर नौकर जो घर के काम में मदद करते थे, उन्हें मेरी आदत के अनुसार जीना पड़ता था। उस सुबह जब मैं सात बजे तक नहीं उठा तो लोगों को आश्चर्य हुआ और मेरे मित्रा लोग मेरे कमरे में आए। मैं बेसुध् पड़ा था। मरा नहीं था। शायद गोलियों की मात्रा कम हो गई थी। आत्महत्या का मेरा प्रयास विपफल हो गया था। मुझे तत्काल पीएमसीएच ले जाया गया। वहां के चिकित्सक जांच परीक्षण करके समझ गए थे कि मैंने क्या किया था। उन्होंने मेरे पापा और खास दोस्तों को ही यह बात बताई। यह बात विक्की को भी पता चल गई थी और विक्की के माध्यम से उन्हें भी।
पता चलते ही वो अपने कदमों को पीएचसीएच आने से रोक नहीं पायी थी। विक्की भी उनके साथ था। मुंगेर का मेरा एक साथी पंकज उनको साथ लेकर आया था। पंकज को रंजीत जी अपना भाई मानती थी। उस दिन साथ में उनकी मां भी आई थी। मैं अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा उनका भाषण सुनकर मन ही मन आनंद ले रहा था। वह कह रही थी-‘यह आपने ठीक नहीं किया। आप अपने पेरेन्ट्स को भी कष्ट दे रहे हैं और मेरे पेरेन्ट्स को भी कष्ट दे रहे हैं।’ मैं अपलक उन्हें देखते हुए उनकी बात सुन रहा था। आज मैं बहुत खुश था। अगले दिन मुझे वहां से छुट्टी मिल गई थी। अखबार वालों को भनक भी नहीं लगी थी।’
लेकिन इतना होने पर भी वो अब भी पफोन पर बात करने से कतराती थीं और मिलना तो संभव ही नहीं था। विक्की से मेरी बात और भेंट अब पहले से ज्यादा होने लगी थी। वह मेरे निवास पर प्रायः आ जाया करता था। विडियो कैसेट्स पर विडियो होम सर्विस कैसेट से वह ढेर सारा सिनेमा देखता था। उसका यह सिनेमा प्रेम एक और बड़ा कारण था कि वह मेरे पास आया था। क्योंकि मेरे यहां बिना किसी रोक-टोक के वह सिनेमा देख सकता था।
वह घर जाकर मेरे बारे में जरूर ही अपनी बहन को बताया करता होगा। इसलिए अपने मन की व्यथा-कथा मैं उसे बताया करता था और विक्की के सहयोग से एक दिन वह मुझसे बाहर मिलने के लिए तैयार हो गई थीं। मेरे बार-बार आग्रह करने पर विक्की उन्हें समझाकर अपने साथ लाया था।
पटना में एक नया रेस्त्रां खुला था। वहीं हम लोगों ने कोल्ड काॅपफी पी थी। उन्होंने आहिस्ते-से कहा था, ‘आप जिद पर अड़े हुए हैं….।’
मैंने कहा ‘मेरे लिए वापस होना संभव नहीं है। मुझे बस आपकी स्वीकृति की आवश्यकता है। पिफर मैं सब संभाल लूंगा।’
उन्होंने कहा, ‘मैं अपनी खुशी के लिए अपने परिवार को कष्ट नहीं दे सकती….’ उनकी ये बातें मेरे लिए शहद से अध्कि मीठी थ्ीं। उन्होंने आगे कहा, ‘….मेरे हां कहने से कोई पफर्क नहीं पड़ता….’ मेरे लिए इतना कापफी था और मैंने मन ही मन कहा, ‘पफर्क पड़ता है, बहुत पफर्क पड़ता है। अब मैं आपकी भावना समझ गया। अब सब ठीक हो जाएगा।’
इध्र, पप्पू यादव को अपने माता-पिता शांति प्रिया और चंद्र नारायण प्रसाद की ओर से रंजीत से शादी करने की सहमति मिल गई लेकिन मुश्किल रंजीत के परिवारवाले की ओर से ही थी। रंजीत के परिजन इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे। रंजीत ने पप्पू यादव को बताया था कि उनकी शादी के लिए चंडीगढ़ में रहने वाले भाई और दिल्ली में रहने वाले उनके जीजाजी की सहमति अनिवार्य है। पप्पू यादव ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-‘मैं चंडीगढ़ जाने की तैयारी करने लगा। वहां के तत्कालीन राज्यपाल ध्निकलाल मंडल का बेटा मेरे भाई की तरह था। मेरे ठहरने का इंतजाम भी उसी ने किया था। रविवार का दिन था। मैं चंडीगढ़ उनके भाई के घर पहुंचा मेरे साथ मेरे दोस्त भी थे। भोजन में पड़ोसे गए व्यंजनों से तथा उनकी बातों से हमें एहसास हो गया था कि हमारे आने का मकसद वे अच्छी तरह जानते थे। उनके स्वागतीय व्यवहार से हमें कापफी राहत और खुशी महसूस हो रही थी क्योंकि हमें लग रहा था कि सब जानकारी होने के बाद इतनी खातिरदारी का अर्थ हुआ कि इन्होंने हमारे रिश्ते को स्वीकार कर लिया है। लेकिन बहुत जल्द ही पता चल गया कि हमारी राहें आसान नहीं थी। उन्होंने जितने प्यार और सम्मान से खातिरदारी की थी उतने प्यार और सम्मान के साथ समझा भी दिया कि हमें उस बात को वहीं खत्म कर देनी चाहिए। बुझे मन से मैं राजभवन होते हुए दिल्ली वापस आ गया।’
श्री यादव ने पिफर भी हिम्मत नहीं हारी। हालांकि चंडीगढ़ में मिली विपफलता के बाद वे थोड़े मायूस जरूर हो गए थे। पप्पू यादव को बताया गया था कि रंजीत के दिल्ली वाले जीजाजी अगर किसी तरह उनके पक्ष में आ गए तो यह काम कापफी आसान हो जाएगा। लेकिन रंजीत ने पप्पू को यह भी बता दिया था कि उनके दिल्ली वाले जीजा जी कापफी ‘दूसरे किस्म’ के आदमी हैं। इसीलिए उन्हें ध्ैर्य, समझदारी और थोड़ी चालाकी से काम लेना होगा। पप्पू यादव ‘द्रोहकाल का पथिक’ में इस मुतल्लिक लिखते हैं-‘रंजीत के जीजाजी ने हमें करोलबाग की अपनी दुकान पर ही बुलाया था। हमने सोचा था कि किसी बढि़या होटल के रेस्तरां में या पिफर काॅपफी हाउस में नहीं तो अपने घर पर वे हमें मिलने के लिए बुलाएंगे। आखिरकार मैं उनका होनेवाला साढ़ू था। अपने इस ख्याल पर मैं स्वयं मुस्करा उठा था।
खैर, हम अगले दिन तय समय पर करोलबाग पहुंचने के लिए चल पड़े। हम तीन चमचमाती कारों से अपने होने वाले साढ़ू भाई से मिलने जा रहे थे।
करोलबाग में मुझे कहीं भी बाग नजर नहीं आया। अगर कोई चीज थी या तो बस ध्ूल, कार और खरीद-बिक्री करते लोगों से अटी-पड़ी सड़क। भीड़ इतनी कि यहां आदमी दस कदम सीध नहीं चल सकताऋ दूसरे-तीसरे कदम पर ही कोई पफेरीवाला, खुदरा विक्रेता, कार, साइकिल रिक्शा, मोटर साइकिल, ठेला या सांढ़ कुछ भी उसके सामने आ सकता है। ऐसी सड़क पर हम अपनी तीन कारों के कापिफले के साथ उनकी विशाल दुकान पर पहुंचे। यह हमारी पहली मुलाकात थी, लेकिन इसके बावजूद हमने एक-दूसरे को पहचान लिया। दिखने में तो वे भद्र लग रहे थे, लेकिन हमारी भेंट-वार्ता के पहले स्वागत-संबोध्न में ही उन्होंने अपनी भावाभिव्यक्ति स्पष्ट कर दी। उन्होंने अपने चेहरे पर आरोपित मुस्कान भी नहीं आने दी, उनका वास्तविक तिरस्कार-भाव ही उनके चेहरे से प्रकट हो रहा था। बातचीत के दौरान मेरे साथी मित्रा ने उनसे कहा ‘ये बिहार विधनसभा के सदस्य हैं…’
उन्होंने मेरे मित्रा को बीच में ही काटते हुए कहा, ‘तो?’ पूरे अक्खड़पन से कहे गए इस ‘तो’ से उनका निहितार्थ स्पष्ट हो गया। उनके कहने का मतलब था कि तुम विधयक हो तो अपने घर में रहो। यहां क्यों झख मारने आए हो।
मेरे दोस्त ने बिना किसी प्रतिक्रिया के बात को संभालने की कोशिश करते हुए कहा, ‘ये सबसे कम उम्र के निर्दलीय विधयक चुने गए हैं…’
वे हमारी बातों से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हो रहे थे, बल्कि उनके चेहरे पर खिन्नता उभर रही थी। इस भेंट-वार्ता की शुरूआत ही बड़ी अटपटी-सी थी। हम लोग उनकी दुकान के बगल में सड़क के किनारे खड़े होकर बातें कर रहे थे। वे हमें जल्द-से जल्द टरकाना चाह रहे थे और हम थे कि उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं हो रहे थे। शायद इसी वजह से अब उनके चेहरे पर खिन्नता का भाव झलकने लगा था। जबकि मेरा दोस्त, मेरी उपलब्ध्यिां गिनाकर रौब जमाने की कोशिश कर रहा था। यह उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। उन्होंने मेरे दोस्त की बात पूरी होने से पहले ही व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब दिया, ‘तो जाकर गिनीज बुक में नाम लिखाइए…हमसे आप लोग क्या कहना चाह रहे हैं असल मुद्दे की बात कीजिए।’
मेरा दोस्त समझ गया कि वे बिजनेसमैन थे और ध्ंध-व्यवसाय में हर पल का मोल होता है और हम लोग इन सरदार जी का समय खोटा कर रहे थे। अतः मेरे मित्रा भी अब बिना किसी भूमिका के सीध्े-सीध्े असली मुद्दे पर आ गए। उन्होंने मेरे विवाह प्रस्ताव की औपचारिक घोषणा कर दी, ‘हमारे विधयक श्री राजेश रंजन जी आपकी साली सुश्री रंजीत कौर को पसंद करते हैं। अतः इन दोनों के विवाह के संबंध् में आपकी अनुमति और सहयोग की अपेक्षा है।’
मेरे मित्रा ने बिल्कुल सीध्े और सध्े स्वर में एक सांस में, हमारे विवाह का औपचारिक प्रस्ताव उनके सामने रखा था। मुझे तो अपने मित्रा का यह नाटकीय रूप देखकर बड़ी जोर की हंसी आई थी। किंतु मैं अपनी हंसी को दबाकर गंभीर बना रहा। इस बार उन्होंने मेरे मित्रा को बात पूरी करने दी थी, लेकिन दो सेकेंड के गंभीर मौन के बाद जीजाजी एकदम से पफट पड़े। ऐसा लगा मानो मेरे दोस्त ने बम की लुतरी में आग लगा दी हो और दो सेकेंड में उस लुतरी ने बम को डटोनेट कर दिया था। उन्होंने तिरस्कार के लहजे में कहा,‘आपके विधयक दोस्त को माध्ुरी दीक्षित पसंद आ जाएगी तो आप उसके पास शादी का प्रस्ताव लेकर चले जाइएगा।’ उनके इस सवाल में चुनौती का स्वर भी शामिल था।
निरूत्तर होकर हम लोग वहां से वापस लौट आए। पूरे रास्ते जेहन में गालिब की पंक्तियां गंूजती रहीं, जो उस वक्त हमारे ही लिए बिल्कुल सही बैठ रही थीं-‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले….बहुत निकले मेरे अरमां, मगर पिफर भी कम निकले…’
पिफर भी हमारे अरमानों के पंख अभी कटे नहीं थे। यूं हार मानना मेरी पिफतरत नहीं रही। सो, मैंने अपना प्रयास जारी रखा।’
तभी किसी ने पप्पू यादव को सलाह दी कि यदि कांग्रेस नेता एसएस अहलूवालिया चाहेंगे तो यह बात बन सकती है। उस समय श्री अहलूवालिया राज्यसभा के सदस्य हुआ करते थे। श्री यादव अहलूवालिया के पास पहुंच गए। अहलूवालिया ने आश्वासन दिया कि वे कुछ जरूर करेंगे। आखिर में उनका प्रयास रंग लाया। हालांकि इस रिश्ते को समाप्त करने के लिए रंजीत के परिवारवालों की ओर से यह शिगुपफा भी छोड़ा गया था कि यह शादी तब तक संभव नहीं है जबतक पप्पू यादव सिख ध्र्म नहीं अपनाएंगे तथा गुरु गोविंद सिंह के द्वारा शुरू किए गए पांचों नियमों का पालन नहीं करेंगे। पप्पू यादव ने उनकी शर्तें मान ली। अब उन लोगों के पास कोई चारा नहीं बचा था। लिहाजा, इस विवाह पर उन्हें स्वीकृति देनी पड़ी। रंजीत के माता-पिता तो राजी हो गए लेकिन उनके कई परिजन का विरोध् जारी रहा। पिफर आनन-पफानन में पप्पू यादव ने रिंग सेरेमनी का कार्यक्रम भी तय करवा लिया और अपने एक दोस्त के होटल में मीडिया और अन्य लोगों की नजरों से दूर रखकर इसे अंजाम भी दे दिया। पिफर पफरवरी 1994 में बड़े ध्ूम-धम के साथ पप्पू यादव और रंजीत रंजन परिणय सूत्रा में बंध् गए। पप्पू यादव और रंजीत रंजन को एक बेटी और एक बेटा है। बेटा सार्थक रंजन दिल्ली अंडर 19 टीम के उप कप्तान हैं जबकि बेटी दिल्ली में पढ़ती है।

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