September 25, 2018

लोकसभा चुनाव के पूर्व सीमांचल में सियासी भूचाल

By wmadmin123 - Sat Mar 22, 12:19 pm

santosh kuswaha mlaआज की राजनीति सि(ांत सेवा और शुचिता की नहीं, बलिक सुविध, स्वार्थ और निजी लाभ के लिए ज्यादा है। किसी भी राजनीतिक दल का नेता, प्रतिनिधि इससे अछूता नहीं रह गया है। आया राम गया राम के पुराने जुमले आज भी विधमान हैं। विगत एक पखवाड़े से बिहार के सियासी हलकाें में रह-रह कर भूचाल आ रहा है, उससे यही प्रतीत होने लगा है कि पद, लिप्सा और चाटुकारिता के सारे रिकार्ड लोकसभा चुनाव की घोषणा के पूर्व ही टूट जायें तो कोर्इ आश्चर्य नहीं। इस टूटन ओर घुटन के लिए यदि सर्वाधिक कोर्इ जवाबदेह है तो वह हैं न्याय के साथ विकास का नारा देने वाले। यदि संवैधनिक पद पर विराजमान व्यकित ही संविधन की मर्यादा को भंग कर वैसे सुविधभोगी जन प्रतिनिधियों ;विधयकोंद्ध को दल-बदलने का प्रश्रय दे तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। इस पर तुर्रा यह कि वैसे दल बदलने वाले विधयकों का राज्य सरकार के मुखिया द्वारा खुलेआम स्वागत किया जाता है, ताकि उनकी गíी सुरक्षित रह सके तो इस ‘न्याय को क्या कहा जायेगा? राजनीति में सहिष्णुता और शालीनता सबसे बड़ी कसौटी होती है, किंतु आज के कथित वैसे राजनेता आलोचना-समालोचना से क्रु( होकर, मीडिया ;पत्राकारद्ध को धैंस देकर ‘सबक सिखाने की कलाबाजी दिखा रहे हैं, क्या यही लोकतंत्रा है? क्या पत्राकार वैसे नेताओं से भयभीत होकर कलम पकड़ना छोड़ दें? सवाल तो अनेक हैं, किंतु जवाब देगा कौन? जिस देश और प्रदेश में राजनीति के नाम पर सिपर्फ और सिपर्फ स्वार्थान्ध् होकर नीति का निर्धरण होता हो, राजनीति बयान दिये जायें और जनता मतदाता को मूर्ख मानकर ‘हंटर की राजनीति की जाने लगे तो वहां किससे और कितनी उम्मीद की जा सकती है? आज की तिथि में बिहार जिला मुख्यालय से लेकर प्रदेश की राजधनी तक जो राजनीतिक परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है, उसे लोकतांत्रिक परंपरा के लिए घातक ही कहा जा सकता है।
राजनीतिक भूचाल के झटके को सिपर्फ राजद ही नहीं महसूस कर रहा है या यह झटका प्रदेश की राजधनी तक सीमित नहीं है। इस आलेख में आज हम जिस क्षेत्रा की राजनीति की चर्चा करने जा रहे हैं, वह अत्यंत पिछड़ा ;आर्थिक एवं सामाजिक रूप सेद्ध क्षेत्रा है। पूर्व में भले ही इस क्षेत्रा में बड़े-बड़े मनीषी, विद्वान स्वतंत्राता संग्राम में आहूति देने वाले राष्ट्र सेवक रहे हों, लेकिन वर्तमान में ऐसे राजनेताओं का जमावड़ा है, जो अपने स्वार्थ की खातिर अपनो की बलि चढ़ा देने में उन्हें कोर्इ गुरेज नहीं है। यह तो पहले से ही संभावना व्यक्त की जा रही थी कि पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार और अररिया जिले में सत्ताधरी दल को ऐसे नेताओं की तलाश है, जो लोकसभा चुनाव लड़ने का माíा रखता हो। कटिहार में राम प्रकाश महतो ;राजद सरकार में मंत्राी रह चुके हैंद्ध अररिया में राजद से दल-बदल कर जदयू में प्रवेश पाने वाले विजय कुमार मंडल ;पूर्व राज्यमंत्राीद्ध तो पहले ही मिल चुके थे। लेकिन किशनगंज में, जहां मुसलमानों की संख्या बिहार के अन्य क्षेत्राों की अपेक्षा सबसे ज्यादा है, वहां सत्ताधरी दल जदयू में कोर्इ ऐसा नेता नहीं था, जो पूर्ण रूप से मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार के आगे नतमस्तक होकर उनकी सियासी आकांक्षा को भी संतुष्ट करे और आगामी लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी होकर पफतह पा सके। वस्तुत: मुख्यमंत्राी एनडीए ;गठबंध्नद्ध तोड़ने से बहुत पहले ही सीमांचल में एक अल्पसंख्यक समुदाय के नेता की तलाश में थे, जो उनकी पार्टी को छोड़ कर राजद में पुन: शामिल हुए मो. तस्लीमुíीन का काट बन कर कार्य करे। यूं तो सत्ता की सरपरस्ती के लिए कर्इ पैसे वाले अल्पसंख्यक नेता जदयू में पहले से ही जुड़े हैं। लेकिन उनमें से कोर्इ भी ऐसा सर्वमान्य व्यकितत्व वाला नेता नहीं है, जो मो. तस्लीमुíीन या किशनगंज के वर्तमान कांग्रेसी सांसद मौलाना असरारूल हक काशमी के मुकाबले में खड़ा होकर चुनावी जंग में कामयाबी हासिल कर सके। यधपि वर्ष 2009 के चुनाव में जदयू के टिकट पर चुनाव लड़कर मौलाना काशमी को जबर्दस्त टक्कर देने वाले सैयद महमूद अशरपफ को जदयू के शीर्ष नेताओं ने इस बार अज्ञात कारणों से दरकिनार करने का काम किया है। इसी खोज के क्रम में मुख्यमंत्राी की नजर राजद के विधयक अख्तरूल र्इमान पर गयी। हाल में पटना में जिन 13 राजद विधयकों को अलग गुट के रूप में विधनसभा अèयक्ष उदय नारायण चौध्री ने मान्यता देकर सियासी भूकंप लाने का प्रयास किया था, उसमें अख्तरूल र्इमान का भी नाम शामिल है। ज्ञातव्य है कि उन 13 विधयकों में से नौ ने विधनसभा अèयक्ष के निर्णय को गलत करार देते हुए लालू प्रसाद की सरपरस्ती में राजद में बने रहने का संकल्प व्यक्त करते हुए अपने सुप्रीमो लालू प्रसाद के साथ राजभवन तक पैदल मार्च करते हुए गये थे। किंतु अख्तरूल र्इमान बुलाने के बावजूद पटना नहीं गये। जैसा कि उन्होंने किशनगंज में पत्राकारों के समक्ष कहा है, उससे अब यही प्रतीत होता है कि वास्तव में उन्होंने राजद छोड़ने का मन बना लिया है। दरअसल, सचार्इ यह है कि अख्तरूल र्इमान एक महत्वाकांक्षी युवा नेता हैं। पंचायती राज की राजनीति करते हुए किशनगंज से राजद टिकट पर विधयक बने। पिछले विधनसभा चुनाव में राजग के विरोध् के बावजूद नवसृजित कोचाधमन विधनसभा क्षेत्रा से पुन: राजद टिकट पर चुने गये तो उनकी महत्वाकांक्षा बढ़ती गयी। वे लगभग दो वर्ष पूर्व से ही लोकसभा चुनाव लड़ने का मंसूबा बांध् रहे थे। हालांकि उस समय तक उनका राजद के ही टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा थी। किंतु पेंच तब पफंस गया जब राजद ‘सुप्रीमो लालू प्रसाद ने कांग्रेस से गठबंध्न करने की घोषणा कर दी। वैसी सिथति में अख्तरूल र्इमान का राजद टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ना अनिशिचत हो गया, क्योंकि किशनगंज संसदीय क्षेत्रा पर संप्रति कांग्रेस का कब्जा है और सीटिंग-गेटिंग के आधर पर इस क्षेत्रा से कांग्रेस प्रत्याशी को ही यह सीट मिलना तय है। स्मरणीय है कि वर्ष 2009 के चुनाव में कांग्रेस को बिहार में दो ही क्षेत्राों में सपफलता
मिली थी। किशनगंज से मौलाना काशमी और सासाराम से लोकसभा अèयक्ष मीरा कुमार बमुशिकल कांग्रेस टिकट पर जीत सकी थी। वैसी परिसिथति में कांग्रेस का किशनगंज क्षेत्रा पर दावा तो बनता ही था।
इन्हीं सब कारणों से विधयक अख्तरूल र्इमान यदि जदयू के दामन थामने को तैयार हो गये हों तो इसमें भी कोर्इ आश्चर्य नहीं है। मौकापरस्ती के इस युग में अख्तरूल र्इमान के लिए इससे अच्छा और मौका क्या हो सकता था, जब खुद मुख्यमंत्राी या सत्ताधरी दल उन्हें आमंत्राण देता हो। हालांकि, अब तक यह तय नहीं है और न अधिकारिक तौर पर जदयू ने ही किशनगंज क्षेत्रा से उम्मीदवारी को लेकर कोर्इ बयान सार्वजनिक तौर पर दिया है। लेकिन किशनगंज जिला जदयू में र्इमान की उम्मीदवारी पर चर्चा के साथ बगावत की भी आंध्ी तेज हो गयी है। विगत 26 पफरवरी को किशनगंज जिला जदयू कार्यालय में आयोजित बैठक में जिस प्रकार से जदयू कार्यकर्ताओं ने विधयक र्इमान के जदयू में शामिल किये जाने या संसदीय चुनाव में संभावित प्रत्याशी बनाये जाने पर आक्रोश व्यक्त किया है, वह अभूतपूर्व नजारा ही कहा जा सकता है। बैठक में तय किया गया था कि ठाकुरगंज के विधयक नौशाद आलम के नेतृत्व में जदयू कार्यकर्ताओं का एक शिष्ट मंडल मुख्यमंत्राी से मिलकर कार्यकर्ताओं की भावना से उन्हें अवगत कराएगी। यधपि यह भी सच है कि मुख्यमंत्राी वैसे कार्यकर्ताओं की भावना या विचारों को तरजीह देंगे, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। हां, यदि अख्तरूल र्इमान अपने अन्य विधयकों की तरह पुन: लालू की शरण में चले जायें तो यह अलग बात है। लेकिन र्इमान शोकाज के संबंध् में पूछे जाने पर सिपर्फ इतना कहते हैं कि यह खबर उन्हें मीडिया के माèयम से मिली है,  पार्टी या किसी नेता का कोर्इ पत्रा या संदेश अब तक उन्हें नहीं मिला है। राजद छोड़ कर जदयू में शामिल होने के प्रश्न पर उन्होंने किशनगंज के पत्राकारों से कहा कि समय आने पर सब बता देंगे। अर्थ यह कि इसकी प्रबल संभावना है कि राजद से अलग होने वालों की पंकित में वह शामिल हैं।
दूसरी ओर पूर्णिया जिले में भी वर्तमान विधयकों में से कर्इ विधयकों के मन में भी महत्वाकांक्षा की खिचड़ी पकने लगी है। ये विधयक राजद के नहीं, बलिक भाजपा के हैं। चर्चा यह है कि बायसी ;पूर्णियाद्ध के भाजपा विधयक संतोष कुमार उपर्फ संतोष कुशवाहा जदयू के टिकट पर पूर्णिया लोकसभा क्षेत्रा से भाजपा के वर्तमान सांसद उदय सिंह के विरू( चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। हालांकि, अब तक न तो संतोष कुशवाहा ने खुद इसकी पुषिट की है और न भाजपा की ओर से ही कोर्इ आधिकारिक पुषिट की गयी है। लेकिन, संतोष कुशवाहा के खास समर्थक ही इस चर्चा को हवा देने का काम कर रहे हैं और कहने लगे हैं कि निर्णय अंतिम चरण में है। संतोष के समर्थकों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि खुद मुख्यमंत्राी ने संतोष कुशवाहा को बुलाकर पूर्णिया से जदयू टिकट पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया है। सचार्इ क्या है यह तो आने वाला वक्त बतायेगा लेकिन यह सच है कि विगत कर्इ महीने से विधयक संतोष कुशवाहा पार्टी के कार्यक्रमों में रुचि न लेकर अलग खेमा बनाकर पूर्णिया लोकसभा क्षेत्रा के कर्इ गांवों में अपनी उपसिथति दर्ज कराते देखे गये हैं। जातीय एवं निजी बैठकों में भाग लेकर उन्होंने अपनी आंतरिक अभिव्यकित को स्वर दिया है। उसी से कयास लगाया जाने लगा था कि वे किसी बड़ी सोच के तहत ही यह अभियान चला रहे हैं।
ज्ञातव्य है कि पूर्णिया के भाजपा सांसद उदय सिंह ने वर्ष 2010 के विधनसभा चुनाव के वक्त आननपफानन में जिन दो व्यकितयों को भाजपा में शामिल कराकर टिकट दिलाने की पुरजोर कवायद की थी, उसमें अमौर विधनसभा क्षेत्रा के पूर्व राजद विधयक सबा जपफर और कसबा विधनसभा क्षेत्रा से दो बार चुनाव लड़कर पराजित होने वाले संतोष कुमार उपर्फ संतोष कुशवाहा ही थे। ज्ञातव्य है कि दोनों ही विधनसभा क्षेत्रा किशनगंज संसदीय क्षेत्रा का हिस्सा है और दोनों ही क्षेत्रा अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रा है। अमौर में तो सवा जपफर पहले भी विधयक रह चुके थे, लेकिन बायसी विधनसभा क्षेत्रा मेें किसी हिंदू या भाजपा की जीत अभूतपूर्व थी। बायसी विधनसभा के गठन के बाद से वर्ष 2010 के चुनाव के पूर्व तक किसी हिंदू प्रत्याशी के विजयी होने की कल्पना भी किसी ने न की होगी। मुसिलम समुदाय के तीन सशक्त उम्मीदवारों, कांग्रेस के निसार अहमद, राजद के हाजी अब्दुस सुबहान और जदयू टिकट से वंचित निर्दलीय सैयद रूकनुíीन के बीच मुसिलम वोट का जबर्दस्त बंटवारा और हिन्दू मतदाताओं की एकजुटता के कारण संतोष कुशवाहा अप्रत्याशित रूप से उस चुनाव में सपफल रहे थे। यहां भी पूर्णिया के सांसद उदय सिंह एवं भाजपा के तत्कालीन जिलाèयक्ष संजीव नंदन सिंह के कूट कौशल से संतोष को जनसमर्थन प्राप्त हुआ और कार्यकर्ताओं के पुरजोर प्रयास से जीत पर मुहर लगी थी। लेकिन संतोष अपने विधयकी कार्यकाल में न तो उन कार्यकर्ताओं की नजर में खरे उतरे न ही उन मतदाताओं को संतुष्ट कर सके हैं, जिन्होंने उन से क्षेत्रा के विकास की उम्मीदें पाल रखी थी। संतोष कुशवाहा को भाजपा कार्यकर्ताओं से मतलब चुनाव जीतने तक ही रहा। उनके इर्द-गिर्द वैसे लोग लामबंद हो गये, जो एक समय में या तो पूर्णिया के तत्कालीन सांसद पप्पू यादव के करीबी थे या राजद के समर्थक हैं। भाजपा समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं से दूरी बढ़ती ही गयी। ठेकेदार, बिचौलिये एवं स्वार्थी तत्वों की घेराबंदी ने न केवल उन्हें पार्टी से दूर किया, बलिक आमजनों से भी वह अपने क्षेत्रा में कट से गये हैं। यही कारण है कि वे बायसी विधनसभा क्षेत्रा से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं परंतु इससे भी बड़ा कारण है पदलिप्सा। वैसी सिथति में भाजपा का त्याग कर यदि उस व्यकित के ही माथे पर हाथ डालने की जुगत भिड़ा रहे हैं, जिनके चलते वे विधयक की कुर्सी पर अप्रत्याशित रूप से जा बैठे तो इसमें उनका कोर्इ दोष नहीं है, बलिक वैसे व्यकितयों की सोच का दोष है जो भाजपा के सि(ांतों पर आरूढ़ रहने की उनसे अपेक्षा पाले हुए थे।
हां, संतोष कुशवाहा के जदयू में शामिल होकर लोकसभा प्रत्याशी बनने की चर्चा से जदयू के पुराने और समर्पित कार्यकर्ता अवश्य बौखलाये हुए हैं। इससे पूर्व यहां सिपर्फ लेसी सिंह का नाम चर्चा में था जो ध्मदाहा विधनसभा क्षेत्रा की विधयक हैं और आज की तिथि में सीमांचल में उनसे कíावर और समर्पित एक भी नेता, शायद नहीं है। उन्हें मुख्यमंत्राी का करीबी भी माना जाता है। वैसी सिथति में सिपर्फ ‘बैकवर्ड कार्ड खेल कर पूर्णिया प्रमंडल के तीन लोकसभा क्षेत्रा में यदि पिछड़े वर्ग के प्रत्याशियों का नाम जदयू द्वारा आगे किया जाता है, तो निशिचत रूप से जदयू की नीतिगत भूल होगी। इसलिए जदयू के कार्यकर्ताओं में विद्रोह पनपना प्रारंभ हो गया है।
अररिया जिले का अलग ही नजारा है। अररिया क्षेत्रा से लोजपा के टिकट पर जीते जाकिर अनवर ‘बैरागी जो अपनी पार्टी के उपाèयक्ष भी थे, उन्होंने पासवान के द्वारा भाजपा से गठबंध्न कर लिए जाने के कारण पार्टी और पद से इस्तीपफा दे दिया तथा नीतीश का तीर थाम लिया।  उन्होंने लोजपा के राष्ट्रीय अèयक्ष राम विलास पासवान को अवसरवादी, सि(ांतविहीन नेता बताते हुए कहा कि पासवान वंशवाद और परिवारवाद पृष्ठ पोषक हैं। उध्र, सबसे विकट परिसिथति में पफंसे हैं इस क्षेत्रा के वयोवृ( नेता मो. तसलीमुíीन। जदयू से नाता तोड़ने के बाद वे राजद में अवश्य शामिल हो गये लेकिन लालू प्रसाद के चारा घोटाले में सजायाफ्रता होने के बाद और राजद में नये नेतृत्व के उभार के बाद से उन्होंने चुप्पी साध् रखी है। इसकी वजह भी है, बढ़ती आयु एवं परिवर्तित राजनैतिक शैली में वे अपने को या तो ढाल नहीं पा रहे हैं, या पिफर अपने शाहजादे सरपफराज आलम के जदयू विधयक होने के कारण तत्क्षण विस्पफोटक बयान देने से बच रहे हैं या उन्हें न बोलने के लिए बाèय किया जा रहा है, कहा नहीं जा सकता। मो. तसलीमुíीन चार बार किशनगंज लोकसभा क्षेत्रा से प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और केंद्र सरकार में दो-दो बार राज्य मंत्राी पद पर आसीन रहे हैं। किंतु राजद और कांग्रेस में चुनावी गठबंध्न होने के कारण उनका किशनगंज संसदीय क्षेत्रा कांग्रेस के खाते में चला गया है। लिहाजा, वे अब वहां से चुनाव नहीं लड़ सकते। लालू यादव ने अब उन्हें अररिया लोकसभा क्षेत्रा से चुनाव लड़ने के लिए टिकट थमाया है।
राजनीति के बदलते परिदृश्य में लोकसभा चुनाव की घोषणा और नामांकन की तारीख निर्धरित होने तक भी राजनीतिक दलों में तोड़-पफोड़ और रस्साकशी जारी रहेगी यह तय है। अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि इस चुनाव में भाजपा गठबंध्न और जदयू के बीच ही मुख्य मुकाबला होगा, लेकिन यूपीए, खासकर राजद को नकारा नहीं जा सकता। सीमांचल के चार लोकसभा क्षेत्राों में से दो पर भाजपा को यूपीए से ही मुख्य मुकाबला होने की पुरजोर संभावना है। कटिहार में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के तारिक अनवर और भाजपा के निखिल कुमार चौध्री पुन: आमने सामने होंगे। लेकिन किशनगंज सीट से भाजपा का कौन प्रत्याशी कांगेेस के वर्तमान सांसद असरारूल हक काशमी के विरू( मैदान में दिखेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। हालांकि चर्चा में दिलीप जायसवाल सबसे उफपर हैं।
लोकसभा चुनाव के पूर्व बिहार और सीमांचल में चल रही राजनीतिक बवंडर कहां जाकर थमेगा, यह कहना तत्काल मुशिकल है, लेकिन यह आंध्ी 2015 में संभावित विधनसभा चुनाव तक चलेगी यह तय है। इस आंध्ी में कौन कहां ध्राशायी होगा और किसकी पताका आसमान में लहरायेगी, यह तो लोकसभा चुनाव का परिणाम ही बतायेगा। लेकिन बड़बोलेपन और राजनीतिक वातावरण को दूषित करने वाले वैसे नेताओं को मतदाता और जनता सबक जरूर सिखायेगी, जिन्होंने निहित स्वार्थ के कारण जनता द्वारा गठबंध्न सरकार ;एनडीएद्ध चलाने की इच्छा का अपमान किया है। कहने का सापफ मतलब यह है कि मतदाताओं  ने बिहार या सीमांचल में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंध्न को लोकसभा एवं विधनसभा चुनावों में वोट दिया था न कि नीतीश कुमार या जदयू को। जिस सांप्रदायिकता को मुíा बनाकर सूबे की सरकार के मुखिया नीतीश कुमार एकला चलो की नीति पर तोड़पफोड़ की सियासत को अपनी सपफलता मानकर आगे बढ़ रहे हैं, वह उनके लिए और उनकी पार्टी के लिए विनाशकारी सि( हो सकती है। पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत युवा मतदाता राज्य की वर्तमान राजनीति और व्यवस्था को कूड़ेदान में उठाकर पफेंकने की बातें कहने लगे हैं, राजनीतिक विश्लेषकों का ऐसा कहना है। त्र

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