October 21, 2017

लोक देवता राजा सलहेस

By wmadmin123 - Wed Mar 18, 10:32 am

ब्रह्राानंद ठाकुर

लोक देवता लोक संस्कृति और लोकास्था के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। संपूर्ण मिथिला सहित बजिजकांचल में रोग-शोक, दुख-दारिद्रय दूर करने एवं सुख-समृ(ि की कामना से आज भी विभिन्न क्षेत्राीय लोक देवताओं की पूजा-आराध्ना की परंपरा बदस्तूर कायम है। इन क्षेत्राीय लोक देवताओं में सोखा, बरहम बाबा, बन्नी मार्इ, कारिख, गहिल, सलहेस, अमर सिंह, केवल सिंह, बख्तौर भूर्इंया, बसावन बाबा आदि प्रमुख हैं। इनसे जुड़ी कथायें इनके लोक कल्याण के लिए समर्पित व्यकितत्व की कथा है। ऐसे ही एक लोक देवता हैं-राजा सलहेस। इन्हें श्र(ा और आदर से राजा जी भी कहा जाता है। गांव एवं छोटे शहर में बट अथवा पीपल के वृक्ष तले इनका स्थल ;गहबरद्ध बना होता है। दुसाध् जाति के होने के कारण मुख्य रूप से इन्हें दुसाधें का कुल देवता माना जाता है लेकिन मनौती पूरा होने पर अन्य जाति के लोग भी बड़ी निष्ठा और श्र(ा के साथ सलहेस की पूजा करते हैं। इस लोक देवता के जीवन से जुड़ी लोक गाथा आज भी जन-जन में प्रचलित है। सलहेस लोकगाथा को लोक महाकाव्य और लोक महागाथा के रूप में जन-जन में मान्यता प्राप्त है। कुछ यही कारण है कि इनकी पूजा में शास्त्राीय आडम्बर, नियम-परिनियम और संस्कृत के मंत्राो की जगह इनकी कथा गाने की प्रधनता होती है। सलहेस गाथा की कथा में राजा सलहेस के अतिरिक्त अनेक पात्राों का योगदान है जिसमें मोतीराम, बुध्ेसर, करिकन्हा, चूहड़मल, चन्देसर हजाम, मालिन, कुसमा, पुफलवंती आदि प्रमुख हैं। ऐसी मान्यता है कि राजा सलहेस दैवी गुणों से संपन्न एक अलौकिक पुरुष थे। इन्हें जनमानस में जाग्रत देवता का दर्जा प्राप्त है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि इनकी पूजा अथवा सुमिरन करने से तत्काल अभीष्ट की प्रापित होती है। बजिजकांचल के सुदूर दुर्गम स्थान में गडढे अथवा कीचड़ में बैलगाड़ी के पफंस जाने पर गाड़ीवान अनायास सलहेस को याद कर ज्यों ही ‘जय राजाजी पुकारता है तो ऐसा लगता है कि गाड़ी में जुते बैल में नयी उफर्जा का संचार हो गया हो और गाड़ी गडढे से बाहर निकल आती है। ऐसी धरणा जनमानस में आज भी बनी हुर्इ है। जय राजा जी कहते ही भक्तजनों का विश्वास बढ़ जाता है। उत्तर भारत विशेषकर बजिजकांचल और मिथिला के गांवों में जहां भी दस-पन्द्रह घर दुसाध् जाति के होते हैं वहां राजा सलहेस का गहबर निशिचत रूप से पाया जाता है। अधिकांश जगहों पर यह स्थान बरगद अथवा पीपल के पेड़ के नीचे मिटटी और पफूस का बना होता है। गहबर में मिटटी की बनी कुछ प्रतिमायें होती हैं, जिसमें राजा सलहेस हाथी पर बैठे होते हैं। इस हाथी को भौरानंद हाथी कहा जाता है। हाथी के कंध्े पर मंगला नामक महावत बैठा होता है। सलहेस के दायें भाग में भार्इ मोती राम और बायें भाग में भार्इ बुध्ेसर घोड़ा पर सवार रहते हैं। सलहेस के दोनों तरपफ डाली में पफूल लिए मालिन खड़ी रहती हैं। अंग रक्षक बतौर केवला-किरात हाथ में तलवार लिए खड़े दिखार्इ देते हैं। गहबर में प्रत्येक दिन पूजा का कोर्इ नियम नहीं है। इनकी पूजा विभिन्न अवसरोें पर की जाती है। कुछ भगत ऐसे भी पाये गये हैं जो गहबर में प्रतिदिन ध्ूप-आरती किये बिना भोजन नहीं करते हैं। जिस किसी भी व्यकित की मनौती राजा सलहेस पूरा करते हैं, वह कापफी ध्ूम-धम से इनकी पूजा करते हैं। साल में एक बार दुसाध् जाति के लोग सामूहिक रूप से इनकी पूजा अवश्य करते हैं। पूजा में भगत की मुख्य भूमिका होती है जो प्राय: दुसाध् जाति का ही होता है। पूजा से पूर्व गहबर के चारो ओर कापफी सापफ-सपफार्इ की जाती है। पूजन सामग्री के रूप में खीर, गांजा, पीनी-तम्बाकू, खैनी, पान-सुपाड़ी, अरबा चावल, अड़हुल पफूल, ध्ूप, अगरबत्ती, जनेउफ, तुलसी का पत्ता की प्रधनता रहती है। इसके अलावे पूजा स्थल के पास लाठी और बेंत भी रखा जाता है। इन्हीं सामगि्रयों के साथ भगत राजाजी की पूजा शुरू करता है। पूजा के समय भगत प्राय: अर्(नग्न रहता है। वह जांघिया के उफपर लाल रंग का कछौटा पहन, कमर में घुंघरू बांध्, हाथ में बेंत लेकर मंडप में घूम-घूम कर खेलाने लगता है। इस क्रम में भगत के अन्य समाजी ढोल, झाल, मृदंग और करताल बजाते हुए संगत करते हैं। इस दौरान भगत के समाजी वाधयंत्राों के साथ सलहेस गाथा का गायन भी करते हैं। यह गायन पूजा के परंपरागत संस्कृत मंत्राों के विकल्प के रूप में होता है। पूजा दो दिनों तक होती है। प्रथम दिन कापफी भीड़ होती है। दूर-दूर से लोग इस अनुष्ठान को देखने आते हैं। दूसरे दिन कारणी के रूप में वैसे दुखी-पीडि़त लोग आते हैं जो अपनी पीड़ा और विपत्ति से छुटकारा पाना चाहते हैं। ऐसे लोगों को भगत पहले उन्हें हाथ में अक्षत और पफूल देता है पिफर बारी-बारी से उन्हें बुला कर उनकी समस्या के बारे में बताते हुए उसके समाधन का उपाय बताते हैं। ऐसे ही कुछ कारणियों ;मनौती पूरा होने की इच्छा रखने वालोंद्ध से भगत उनसे मनौती पूरा होने पर सलहेस की पूजा देने का वचन भी लेता है। यही कारण है कि मनौती पूरा होने पर अन्य जाति के लोग भी राजा सलहेस की पूजा पूरी श्र(ा और भकित भाव से करते हैं। कोर्इ-कोर्इ तो उनके पफूस के गहबर को पक्का भी बनवा देता है। सलहेस लोकगाथा को लोक महाकाव्य की संज्ञा दी जा सकती है। एक ऐसा लोक महाकाव्य जो प्राचीन काल से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मुखरित होती हुर्इ आज भी अपने मूल रूप में जीवित है, परलौकिकता नहीं लौकिकता के कारण। संपूर्ण सलहेस लोक गाथा वीर, श्रृंगार, करूणा, शांत और अदभुत, रसों से परिपूर्ण है। सलहेस लोक गाथा में जिन स्थानों की चर्चा है वे आज भी अपनी जगह कायम है। इससे पता चलता है कि यह कतर्इ काल्पनिक नहीं है। यह लोक गाथा मèयकालीन समाज की राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्था का जीवंत दस्तावेज माना जा सकता है। मौखिक परंपरा वाली इस लोक गाथा में तत्कालीन राजनीतिक सिथति, दंड विधन, वर्ण व्यवस्था, अंध्विश्वास, आम जनता के जीवन स्तर, महिलाओं की सिथति आदि की झलक मिलती है।
आइए अब हम जानते हैं कि कौन थे राजा सलहेस?
नेपाल की तरार्इ में एक गांव है महिसौथा जहां दुसाध् जाति के एक महात्मा थे। उनका नाम था वाक मुनि। वे 12 वर्ष की कठोर तपस्या में लीन थे। इसी दौरान इन्द्र लोक से मायावती नाम की एक अप्सरा पफूल लोढ़ने के लिए यहां आयी। पफूल चुनने के क्रम में उनकी नजर साध्ना में लीन वाक मुनि पर पड़ी। मुनि के सुन्दर रूप को देख कर वह मोहित हो गयी। अपने हाव-भाव से मायावती ने मुनि का èयान भंग कर दिया। इस पर मुनि ने मायावती को शाप दिया कि जिस प्रकार तूने मेरी तपस्या भंग किया है उसी तरह तुझे अब इन्द्रपुरी में स्थान नहीं मिलेगा। तुझे अब मृत्युलोक में भटकना पड़ेगा। यह सुनते ही मायावती अंतर्नाद करते हुए मुनि से क्षमा याचना करने लगी। इस पर मुनि ने कहा कि मैंने जो शाप दिया है वह तो वापस नहीं हो सकता लेकिन मृत्यु लोक में तुम दिव्यशकित संपन्न तीन पुत्रा और एक पुत्राी की माता बनकर गौरव प्राप्त करोगी। तुम्हारा मत्र्यलोक में मंदोदरी नाम होगा। पहला बच्चा तुम्हे महिसौथा के कमलदल तालाब में पुरर्इन के पत्ते पर मिलेगा। तुम उसका नाम सलहेस रखना। बड़ा होकर वह दैवी शकित से संपन्न राजा बनेगा। उसका बड़ा नाम होगा। कलियुग में भी लोग उसकी पूजा करेंगे। इसके बाद दो पुत्रा और एक पुत्राी पैदा होगी। मझले का नाम मोती राम और छोटे पुत्रा का नाम बुध्ेसर रखना। बेटी का नाम बनसप्ती रखना। ये सभी सलहेस का अनुगामी होकर दुनिया में बड़ा नाम करेंगे। इतना कह कर मुनि अन्तघ्र्यान हो गये। इसके बाद मायावती को महिसौथा के कमलदल तालाब में पुरर्इन के पत्ते पर एक बच्चा मिला। यही बच्चा सलहेस हुए और अप्सरा मायावती मंदोदरी कहलायी। काल-क्रम से मंदोदरी ने दो लड़का और एक लड़की को जन्म दिया। मुनि के कथनानुसार मंझले का नाम मोती राम, छोटे का बुध्ेसर और लड़की का नाम बनसप्ती हुआ। इस तरह तीनों भार्इ ने मिलकर महिसौथागढ़ में अपना राज्य स्थापित कर लिया। बनसप्ती जादुगरनी बन गयी। कहा जाता है कि छ: महीना आगे-पीछे वह जानती थी। बनसप्ती का प्रेम विवाह सतखोलिया के राजा शैनी से हुआ। इससे उसे एक पुत्रा पैदा हुआ जिसका नाम करिकन्हा रखा गया। वह स्वभाव से बड़ा ही उदंड था। उध्र 12 वर्ष उम्र होने के बाद सलहेस की माता मंदोदरी को सलहेस के विवाह की चिंता होने लगी। इस बीच सलहेस ने महिसौथा में अपना विशाल राज्य स्थापित कर लिया। चौदह कोस में उसके राज्य का विस्तार हो गया। सलहेस के विवाह के लिए योग्य लड़की की तलाश होने लगी। पंडित और नार्इ अनेक राज्यों में घूम-घूम कर योग्य कन्या की तलाश करने लगे लेकिन सलहेस के योग्य कोर्इ लड़की नहीं मिली। आखिर अंत में मंदोदरी ने पंडित और नार्इ को बुला कर कहा कि बराटपुर के राजा बराट की एक पुत्राी है। बड़ी ही सुशील और संस्कारवाली। उसका नाम है सामरवती। जन्म लेते ही उसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि वह यदि विवाह करेगी तो महिसौथा गढ़ के राजा सलहेस से नहीं तो आजन्म कुंवारी ही रहेगी। इसलिए राजा बराट को सलहेस के सामरमती से विवाह का संदेश दे दीजिए। राजा बराट को लिखा विवाह के इस प्रस्ताव का पत्रा लेकर चन्देसर नाम का नार्इ महिसौथा से बराटपुर के लिए प्रस्थान किया। राजा बराट जाति से क्षत्रिय थे और स्वभाव से अत्यंत कठोर। नार्इ से विवाह संबंध्ी प्रस्ताव का पत्रा पढ़ते ही वह आग-बबुला हो गया और उसे जेल में डलवा दिया। इध्र महिसौथा राज में चन्देसर हजाम के वापस नहीं आने से लोगों की चिंता बढ़ गयी। मोतीराम ने माता दुर्गा को स्मरण किया और सारी बातें उन्हें विस्तार से बता दिया। दुर्गा ने तुरंत प्रकट होकर मोती राम को बता दिया कि राजा बराट ने चन्देसर हजाम को कैद कर लिया है तथा यह भी कहा कि सलहेस का विवाह राजा बराट की पुत्राी सामरवती से ही लिखा है। यह होकर रहेगा। इतना सुनते ही मोती राम का गुस्सा आसमान पर चढ़ गया। उसने अपने भांजा करिकन्हा को बुलवाया और बराटपुर के लिये प्रस्थान किया। रास्ते में एक साथ सात सौ घसवाहिनियां मिलीं। ये सब के सब जादुगरनी थी। सबों ने मोतीराम को अपने जादू के बस से परेशान कर दिया। बाद में मोतीराम से उन्हें परास्त होना पड़ा। इस तरह मोतीराम अपने भांजे के साथ बराटपुर पहुंचे। राजा बराट उनकी शकित के सामने अपने को कमजोर समझ कर हथियार डाल दिये। चन्देसर नार्इ को रिहा कर दिया। राजा बराट ने विवाह की सहमति दे दी। बारात सजा कर लाने के लिए मोतीराम अपने भांजे के साथ वापस महिसौथा आ गये। बीच का एक और घटनाक्रम इस लोकगाथा को विस्तार देता है। राजा हिनपति मोरंग के राजा थे। उनकी स्त्राी थी दुखी मालिन। इस मालिन की कोख से रेशमा, कुसुमा, दौना, तरगेना और पफूलवंती पांच बेटियां पैदा हुर्इ थी। सबसे बड़ी पफूलवंती थी। जन्म के साथ ही पफूलवंती ने सलहेस से विवाह करने का संकल्प लिया हुआ था। अब तक उसकी मुलाकात सलहेस से नहीं हुर्इ थी। दुर्गा की अराध्ना कर पांचो बहन सलहेस की तलाश में निकल पड़ी। वे सब भी जादू जानती थी। सलहेस की तलाश करते हुए वे सभी महुरावन में आ गयी जहां से मोती राम अपने भार्इ सलहेस की बारात सजा कर बराटपुर के लिए प्रस्थान करने वाला था। मोती राम ने सलहेस को भौरानंद हाथी पर सवार करा दिया और बारातियों को चेतावनी दे दी कि मोरंग की पांचों बहन मलिनिया भर्इया पर आंख लगाये हुए है इसलिए सावधन रहना। दिन रहते बारात बराटपुर पहुंच गर्इ। दरवाजा लगाने के लिए उचित समय आने के इंतजार में सभी बाराती आराम करने लगे। सलहेस अपने भौरानंद हाथी पर सवार थे।
उध्र महुरावन में पांचों मलिनिया सो रही थी कि देवी दुर्गा ने उसे सपने में बता दिया कि जिस सलहेस से विवाह के निमित्त तुम प्रतिज्ञा किये हुए हो उसे मोतीराम राजा बराट की पुत्राी से विवाह कराने के लिये ले जा रहा है। जैसे ही बराट की पुत्राी से सलहेस का विवाह हुआ, तुम्हारी मनोकामना ध्री रह जाएगी। अभी सभी बाराती बराटपुर के मैदान में आराम कर रहे हैं। यह सुनते ही पांचों बहन बराटपुर पहुंच गयी। मोतीराम, करिकन्हा समेत सभी बाराती नींद में बेसुध् थे। पांचों बहन ने जादू के बल पर सलहेस को सुग्गा बना दिया और पिंजड़ा में लेकर भाग चली। इस बीच बारातियों की जब नींद खुली तो भौरानंद हाथी पर सलहेस को न पाकर तरह-तरह की चर्चा होने लगी। मोतीराम ने इस घटना को दुर्गा की करतूत मानते हुए घोड़े पर सवार होकर उनका पीछा करना शुरू कर दिया। उसने जब दुर्गा को स्मरण करते हुए अपने भार्इ के बारे में पूछा तो दुर्गा ने उसे बताया कि पांचों मलिनिया सलहेस को लेकर ठेंगटी गांव में पहुंच गयी है। मोतीराम जब वहां पहुंचा तो पांचों मलिनियां सलहेस को खीर बनाकर बरगद के घोंघड़ में रख कर स्वयं नटिन का रूप धरण कर एक जगह बैठ गयी। मोतीराम ने जब सलहेस के बारे में पूछा तो पांचों बहनों ने अपनी अनभिज्ञता जतायी। इसके बाद उसका उग्र रूप देख कर मार-पीट के डर से सलहेस को उसके असली रूप में लाकर उसके हवाले कर दिया। इसके बाद मोतीराम सलहेस के साथ बराटपुर आये और राजा बराट की पुत्राी से उसका विवाह हुआ। विवाह की रात में कोहबर घर से पिफर पांचों मलिनियां जादू के बल पर सलहेस को चुरा ले गयी। अंत में सामरवती ने यह विश्वास दिला कर उनसे सलहेस को मांग लिया कि जैसे ये हमारे पति हैं वैसे तुम्हारे भी पति हैं। मायके से ससुराल महिसौथा जाने के तुरंत बाद मैं अपने स्वामी को तुम्हारे पास मोरंग भेज दूंगी। सामरवती के ऐसा विश्वास दिलाने के बाद पांचाें बहनों ने सलहेस को असली रूप में सामरवती को वापस कर दिया और वे सब महिसौथा वापस आ गये। सलहेस के बाद मोतीराम और बुध्ेसर का भी विवाह हुआ। सलहेस को जब सामरवती द्वारा पांचों बहन मालिन को दिये गये वचन के बारे में मालूम हुआ तो वह उत्तराखंड राज के राजा भीम सेन के यहां नौकरी करने चला गया।
इस बीच महिसौथा गढ़ में सलहेस की याद में उदासी छा गयी। एक दिन राजा भीम सेन के राज में नौकरी करते हुए पफुर्सत के समय में सलहेस कदम्ब गाछ के नीचे बांसुरी बजा रहे थे कि पेड़ पर बैठा एक सुग्गा सीता-राम-सीता-राम करने लगा। वे उस सुग्गे को पहचान गये। वह महिसौथा का उनका प्यारा सुग्गा हिरामन था। वह पेड़ से उतर कर उनके पास आया और महिसौथा गढ़ का सारा हाल सुनाने लगा। कहा कि उनके वियोग में मां, भार्इ, सामरवती और महिसौथा गढ़ का बुरा हाल है। इतना सुनकर सलहेस वापस महिसौथा आ गये। इसके बाद बंगाल के तीसीपुर के क्षत्रिय राजा की बेटी कुसुमावती से मोतीराम और श्यामल गढ़ के राजा श्याम सिंह की पुत्राी श्यामलवती से विवाह होती है। इस अन्तर्जातीय विवाह में संघर्ष, जादू-टोना और दाव-पेंच सलहेस लोक गाथा को लोक प्रियता प्रदान करता है। सामंती समाज व्यवस्था में जातिगत आधर पर जो द्वन्द्व था वह इस लोक गाथा में स्पष्ट दृषिटगोचर होता है। यह लोक गाथा उस समय मोड़ लेती है जब सलहेस की पत्नी सामरवती पांचो बहन मलिनियां को दिये अपने वचन की याद दिलाते हुए स्वामी सलहेस से कहती है कि वह वचन पूरा करने के लिए उन्हें मोरंग जाकर उनसे मिलना चाहिए। वह कहती है कि जिस रात मेरे कोहबर से आप को चुरा लिया गया था उस दिन इसी शर्त पर मालिन से मैं आपको मांग लायी थी कि गौना के बाद मैं आपको उन्हें सौंप दूंगी। मैं वचन हार चुकी हूं। इसलिए आप वह वचन पूरा कीजिए। इसी बात पर सलहेस मोरंग के लिए प्रस्थान करते हैं। साथ में है वही हिरामन सुग्गा जो भूत-भविष्य सब जानता है। मोरंग पहुंच कर परबा पोखर पर वे लोग ठहर जाते हैं। यहां देवी दुर्गा पिफर एक बार करिश्मा करती है। पहर रात रहते दुर्गा भोर होने का आभास कराकर पफूलवंती को पोखर में स्नान कराने के लिए भेज देती है। इध्र हिरामन की सलाह पर सलहेस पोखर में भरपूर मात्राा में सिंदूर डाल कर एक किनारे बैठ जाते हैं। ज्योंही पफूलवंती पोखर में प्रवेश कर पानी छींटा मुंह पर देती है कि संपूर्ण माथा सिंदूर के रंग से लाल हो जाता है। इसके बाद तो हंगामा हो गया कि कोर्इ छल से पफूलवंती की मांग में सिंदूर डाल दिया। बात पफूलवंती के पिता राजा हिनपति तक पहुंचती है। पफूलवंती पंडित के भेष में बैठे सलहेस को नहीं पहचान पाती है। राजा के सिपाही सलहेस को गिरफ्रतार कर जेल में डाल देते हैं। यहां पिफर देवी दुर्गा एकबार सहायक बनती है और सलहेस के मोरंग में गिरफ्रतार होने की खबर महिसौथा गढ़ पहुंच जाती है। यहां से मोतीराम और भांजा करिकन्हा दोनों मोरंग पहुंचते हैं। पहले राजा हिनपति के पुत्रा करण सिंह और मोतीराम के बीच यु( में करण सिंह मारे जाते हैं। अब बारी हिनपति की आती है तो पफूलवती बीच बचाव करते हुए मोतीराम से कहा कि मैं आपकी ध्र्म की भाभी हूं। इस पर मोतीराम राजा हिनपति की जान बख्श देते हैं। राजा हिनपति सलहेस को आजाद कर देते हैं। इसके बाद मोरंग की पांचो बहनें राजा सलहेस के दर्शन के लिए महिसौथा गढ़ आकर दुर्गा से आग्रह करती है कि वे उनका दर्शन किसी तरह करा दें। रेशमा, कुसमा, दौना, तरेगना और पफूलवंती पांचों बहनें यह संकल्प लेती है कि यदि उन्हें सलहेस के दर्शन नहीं हुए तो वे एक साथ विष खाकर जान दे देंगी। इस पर दुर्गा उन्हें मानिकदह पोखर पर आकर इंतजार करने को कह कर सलहेस को भी उस पोखर पर आने के लिए प्रेरित करती है। सुग्गा हिरामन यहां भी यह कहते हुए सलहेस को सावधन करता है कि वहां जाने पर जादुगरनी मालिनें आपको पिफर सुग्गा बनाकर पिंजड़ा में कैद कर लेगी।
राजा सलहेस प्रतिदिन मानिकदह में स्नान कर वहां से पफूल लाकर अपने इष्ट देवता की पूजा करते थे। सो इसमें किसी तरह का व्यतिक्रम करना वह नहीं चाहते थे। इसलिए हिरामन की सलाह पर वे पंडित का भेष धरण कर मानिकदह पहुंच गये। वहां वे देखते हैं कि स्नान करने वाले सभी पांचो धर को पहले से मालिन युवतियां छेके हुए है। वे उनसे एक धर खाली कर देने का अनुरोध् करते हैं। इस पर पंडित भेषधरी सलहेस से वे कहती हैं कि हम लोग सलहेस से मिलने की प्रतीक्षा में यहां बैठी हैं। इस पर सलहेस कहते हैं कि हम तो ब्राह्राण हैं। स्नान करके पूजा करने जाना है। इसलिए एक धर छोड़ दो। तुम्हारा सलहेस तो महिसौथा में बैठा हुआ है। एक बार पिफर पांचाें बहन मालिन ठगी जाती है। दुर्गा को भला-बुरा कहने लगती है। इस पर दुर्गा भेद खोलते हुए कहती है कि वह जो पंडित था वही तुम्हारा सलहेस था। इसके बाद चन्द्र ग्रहण के अवसर पर जब सलहेस मानिकदह में स्नान करने आते हैं तो वहां पहले से डेरा जमाये हुए पांचो बहनें गहरी नींद में सो रही थीं। दुर्गा ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि चन्द्र ग्रहण के अवसर पर तुम्हें निशिचत रूप से सलहेस से भेंट होगी। दुर्गा की कृपा से उन सबों की नींद टूटती है और उन्हें सलहेस के दर्शन हो जाते हैं। इन पांच बहनों का सलहेस से चिर प्रतिक्षित मिलन इस लोक गाथा का सर्वाधिक कारूणिक पक्ष माना जाता है। मिलन के बाद जब पांचो बहनें यह कहती हंै कि आपसे विवाह की प्रतीक्षा मेें मैंने मां-बाप को छोड़ दिया। मोरंग में विवाह के लिए बने मंडप को ठुकराया, सखी-सहेलियों की बातें नहीं मानी और अपने पिता के घर को लात मार कर चली आयी। अब मेरा वयस भी बीत चुका है। बाल पक गये। दांत टूट चुके हैं। अब मेरी जिंदगी का क्या होगा? हमारा नाम कैसे चलेगा, अरे निर्मोही। मेरी आश तो पूरी कर दो। उनके इस कथन पर दिव्यशकित संपन्न सलहेस ने कहा-’यह सतयुग है। इसके बाद कलियुग आयेगा। हमारे साथ तुम्हारी भी पूजा घर-घर में होगी। मेरे दाहिने भाग में भार्इ मोतीराम और साथ में बुध्ेसर रहेगा। तुम हमारे बायें भाग में रहोगी और इसी रूप में लोग हमारी पूजा करेंगे। गहबर में हाथी पर सवार राजा सलहेस की प्रतिमा के दोनों ओर पफूलों से भरी डाली हाथ में लिए जो मालिन खड़ी दिखार्इ देती है वह वही मालिन है। महिसौथा गढ़ से 6-7 मील दूर आज भी राजा सलहेस की पफुलवाड़ी का अवशेष कायम है जहां जूर-शीतल के अवसर पर विशाल मेले का आयोजन होता है। कुल मिला कर राजा सलहेस की कहानी अपने मान-सम्मान और अधिकार के लिए संघर्षरत समाज के अंतिम जन की कहानी है। यही कारण है कि अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरू( आजीवन संघर्षरत, दैवी शकित संपन्न सलहेस की आज भी पूरी निष्ठा के साथ पूजा की जाती है। त्र

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