October 21, 2017

लोक देवता वीर लोरिक

By wmadmin123 - Wed Jul 22, 10:12 am

ब्रह्मानंद ठाकुर

ग्रामीण अंचलों में लोरिक के जीवन से जुड़ी गाथा लोरिकायन के रूप में आज भी गाई जाती है। यह बात दीगर है कि गांवों में लोरिकायन गाने वाले लोग अब विरले ही मिलते हैं। भला हो मुजफ्रपफरपुर जिले के बंदरा प्रखंड अंतर्गत विष्णुपुर मेहसी गांव के 90 वर्षीय राध्े राय का जिन्होंने बीमारी की अवस्था में भी ‘लोक प्रसंग’ के इस संवाददाता के विशेष अनुरोध् पर लोरिकायन की कुछ पंक्तियां गा कर सुनाया-
‘आरे अन्हई के बेटा रहई ध्नई गोआर
ध्नई के बेटा बरखुब्बे राय खेलार
आ बरखुब्बे राय के जांघि
बालक लेलकई अवतार
बरका के नईया रहई लोरिक मनियार
छोटका के नईया रहई सेरूक जिमेंदार
अन्न मदे मरूआ ध्न ध्ेनु गाय
तिरिया मदे रध्किा पुरुख भगवान
‘देवता मदे दुरगा दोसर केकरनाम
ओढ़ना मदे कमली धेबिया घर न जाए।’
यह लोरिकायन बिहार की प्राचीनतम लोकगाथा है। वीर रस से परिपूर्ण इस लोकगाथा में इसके नायक लोरिक के जीवन से जुड़े प्रसंगों का लोकगायन की शैली में विस्तार से वर्णन किया गया है। संपूर्ण लोकगाथा लोरिक की वीरता और उसकी प्रेम कथा को अपने में समाहित किए हुए है। तो आइए, हम जानते हैं कि कौन थे लोरिक और क्या था उनका जीवन चरित्रा।
बिहार के गया जिले में रजौली के निकट एक गांव है-दुबौर। यह दुर्वासापुर का अपभ्रंश है। पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि कभी इसी गांव में दुर्वासा त्राफृषि का आश्रम था। इसी दबौर गांव में ग्वाला जाति के बरखुब्बा राय के दो पुत्रा हुए। इनका नाम था लोरिक और सेरूक। इनकी माता का नाम पफूलन था। रजौली से तीन मील दूर बौरी गांव में मेहरा नाम का एक यादव था जिसकी दो बेटियां थीं मांजरि और लुरिक। कापफी बचपन में ही मांजरि का विवाह लोरिक से कर दिया गया। गौना नहीं होने के कारण मांजरि अपने माता-पिता के साथ ही रहती थी।
उध्र, दबौर गांव में ही शिवध्र नाम का एक अन्य ग्वाला था जिसकी पत्नी का नाम चानन था। उस समय की स्थापित परंपरा के मुताबिक बचपन में ही चानन का विवाह शिवध्र से कर दिया गया था। लिहाजा, वह भी अपने मां-बाप के साथ ही रहती थी। जवान होने पर शिवध्र अपनी पत्नी चानन का गौना करा कर घर ले आया। इस बीच किन्हीं कारणों से शिवध्र देवी पार्वती के प्रकोप का शिकार हुआ और पार्वती ने शाप देकर शिवध्र को नपुंसक बना दिया। दांपत्य सुख से वंचित चानन और शिवध्र के संबंधें में दरार पैदा हो गयी। इन्हीं परिस्थितियों में चानन अपने पड़ोसी युवक लोरिक की ओर आकर्षित हुई और दोनों के बीच शारीरिक संबंध् स्थापित हो गया। आपसी प्रेम में अनुरक्त चानन एक रात अपना गहना-जेवर समेट लोरिक के साथ घर छोड़ दिया। शिवध्र यह अपमान सहन नहीं कर सका और दोनों की खोज में घर से निकल पड़ा। आखिरकार लोरिक और चानन दोनों उसकी पकड़ में आ गए। शिवध्र तो पहले से तैयार था ही, उसने लोरिक पर हमला कर दिया। दोनों में खूब जम कर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में शिवध्र द्वारा लोरिक पर आजमाए गए सारे दांव विपफल हो गए। शिवध्र पराजित होकर मैदान छोड़ भाग गया। इस तरह जब दोनों प्रेमियों लोरिक-चानन का मार्ग निष्कंटक हो गया तो दोनों घूमते-घूमते एक दिन पटना जिले के बारागांव पहुंचे जहां उनकी मुलाकात जुआपफर निवासी महपतिया से हुई। महपतिया जाति से दुसाध् और कापफी चालाक था। चानन की देह पर गहने देख कर उसे लालच हो आयी। महपतिया अव्वल दर्जे का जुआरी था सो उसने लोरिक को जुआ खेलने के लिए आमंत्रित कर दिया। इसके पीछेे उसकी मंशा थी कि जुआ में लोरिक के पराजित होने पर खूबसूरत चानन और उसके गहने पर वह अपना अध्किार कर लेगा। लोरिक और महपतिया ने जुआ खेलना शुरू किया। इस जुआ में लोरिक के पास जो कुछ भी था, वह सब दांव पर हार गया। इसी हताशा में उसने चानन को भी दांव पर लगा दिया। इस बार भी लोरिक हार गया। लोभवश महपतिया चानन को पकड़ कर जब अपने साथ ले जाना चाहा तो चानन ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि हालांकि यह ठीक है कि दांव पर चढ़ने के बाद वह हार चुकी है लेकिन उसके गहने को तो दांव पर नहीं लगाया गया। अभी उसके गहने बचे हुए हैं। इन गहनों को दांव पर लगा कर एक बार और जुआ खेला जाए। चानन के इस प्रस्ताव को महपतिया मान गया और अंतिम बार पिफर खेल शुरू हुआ। इस दौरान चानन अपने अश्लील हाव-भाव दिखा कर महपतिया का ध्यान बांटने लगी। महपतिया चानन पर बेतरह मोहित हो चुका था इस कारण उसके चित्त एकाग्रता समाप्त हो चुकी थी। लोरिक पूरी एकाग्रता से पाशा फेंक रहा था। अब हारने की बारी महपतिया की थी। खेल चलता रहा और महपतिया दांव हारता गया। इस तरह जुए में अब तक लोरिक जो कुछ भी हार चुका था जीत के दौरान सब कुछ पिफर से वापस पा लिया। अंत में महपतिया ने खुद को दांव पर लगाया तो लोरिक ने उसे भी जीत लिया। जब खेल खत्म हुआ तो चानन ने लोरिक से महपतिया की शिकायत करते हुए कहा कि जुए के दौरान वह उसे कामुक नजर से देख कर अश्लील इशारे कर रहा था। इसलिए उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए। लोरिक चानन की इस बात से सहमत होते हुए अपनी तलवार से महपतिया का सिर ध्ड़ से अलग कर दिया। इस तरह उसका शरीर तो वहीं पड़ा रहा लेकिन उसका सिर उसके गांव में जाकर गिरा। कहते हैं कि महपतिया के गांव में सिर रहित एक मूर्ति आज भी उस घटना की याद दिलाती है। इस घटना के बाद चानन के साथ लोरिक ने मुंगेर के लिए प्रस्थान किया। वहां वह हरदी गांव में पहुंचा जहां हरदी के राजा से उसकी लड़ाई हुई। इस लड़ाई में राजा हार गया। पराजित राजा ने कलिंग के राजा की सहायता से लोरिक की गिरफ्रतारी कराकर उसे काल कोठरी मंे बंद कर दिया। दुर्गा लोरिक की कुल देवता थी। लोरिक ने विपदा की इस घड़ी में दुर्गा को स्मरण किया। दुर्गा की कृपा से लोरिक कालकोठरी से आजाद हो गया। एक बार राजा से पिफर लड़ाई हुई जिसमें लोरिक की जीत हुई। राजा मारे गये और नये राजा के रूप में लोरिक का राज्याभिषेक किया गया। इस तरह लोरिक और चानन ने कापफी समय तक हरदी में राज किया। इस अवध् िमें चानन ने एक पुत्रा को भी जन्म दिया। बहुत दिनों तक राजसुख भोगने के बाद एक दिन लोरिक और चानन ने अपने पुश्तैनी गांव जाने की योजना बनायी। जिस समय लोरिक ने अपना गांव दुबौर छोड़ा था उस समय उसकी विवाहिता पत्नी मांजरि कापफी छोटी थी। अब वह सयानी हो गयी थी और अपनी छोटी बहन लुरिक के साथ गांव में रहती थी। अब वह कापफी रूपवती हो गयी थी। घर की आर्थिक स्थिति कापफी दयनीय हो जाने के कारण दोनों बहनें गांव की अन्य महिलाओं के साथ दूध्-दही घूम-घूम कर बेचा करती थी। भरी जवानी में परित्यक्त का जीवन जी रही मांजरि अपनी सखियों समेत गांव की महिलाओं की नजर में उपहास का पात्रा बन गयी थी। इस कारण वह दुखी थी। इन्हीं परिस्थितियों में एक दिन लोरिक और चानन घूमते-घूमते मांजरि के मायके के गांव दुबौर जा पहुंचा। गांव पहुंच कर लोरिक यह जानने के लिए उत्सुक हो गया कि मांजरि जो कापफी बचपन में उसके साथ ब्याही गई थी, वह उसके प्रति अब निष्ठावान है या नहीं। उसने मांजरि की परीक्षा लेना चाहा। गांव में इस बात का प्रचार करा दिया गया कि कोई दूर देश के राजा गांव में आकर ठहरे हुए हैं। इस पर उस गांव की दूध्-दही बेचने वाली महिलायें और लड़कियां वहां जाने लगी। एक दिन मांजरि भी वहां गयी। चूंकि उसने विवाह के समय ही कुछ देर के लिए ही लोरिक को देखा था। तब वह नितांत बच्ची थी। मांजरि आज लोरिक को पहचान नहीं सकी लेकिन लोरिक ने उसे पहचान लिया। उसने उसकी अपने प्रति निष्ठावान होने की जांच के लिए एक उपाय सोचा। अपने शिविर में प्रवेश करने के मुख्य द्वार के पास अपनी एक धेती टंगवा दी। अब अंदर आने वाले लोग धेती को बिना लांघे नहीं आ सकते थे। उस दिन अन्य महिलायें तो उस धेती को लांघ कर शिविर के अंदर दाखिल हो गयी लेकिन मांजरि बाहर ही खड़ी रही। उसने अनुरोध् किया कि उस धेती को वहां से हटवा दिया जाय तब वह शिविर में आयेगी। लोरिक उसके इस अनुरोध् पर कापफी प्रसन्न हुआ। वह समझ गया कि जो इतनी मामूली बात पर भी इतना सजग है उसके सतीत्व को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता। इस तरह मांजरि लोरिक की परीक्षा मंे खड़ी उतरी। लोरिक उससे उसका सारा दूध्-दही खरीद लिया और बिना उसे कुछ भी बताये मूल्य के रूप में उसकी टोकरी मंे सोने-चांदी के गहने रख कर उफपर से अनाज रख कर मांजरि को दिलवा दिया। मांजरि घर वापस आयी और टोकरी का अनाज जब अलग रखने लगी तो उसमें गहने देख कर कापफी अचंभित हुई। उसकी बहन लुरिक ने समझा कि वह अपनी इज्ज्त गंवा कर यह गहने लायी है। लुरिक ने मांजरि को कापफी बुरा-भला भी कहा। मांजरि तो इस बात से पूरी तरह अंजान थी। दूसरे दिन दोनों बहन राजा के शिविर में पहुंची तब लुरिक ने लोरिक को देखते ही पहचान लिया। इस तरह रहस्य पर से पर्दा उठने के बाद लोरिक मांजरि को अपने घर ले आया और दोनों पत्नियों के साथ आनंद से रहने लगा। एक दयालु और न्याप्रिय राजा के रूप में उसने अपने राज्य रजौली के बंजर पहाड़ी क्षेत्रा को कृषि के योग्य बनाया। उसके इस अभियान में बंजर पड़ी ध्रती में नाना तरह की पफसलें उपजायी जाने लगी। पूरा राज्य श्री संपन्न हो गया। और यही उनके दुर्भाग्य का कारण बना। बंजर भूमि के खेती में उपयोग होने से पशु, पक्षी और सभी जंगली जीव-जंतु परेशान हो गये। उन्हें अपने निवास स्थान से विस्थापित होना पड़ा। अचानक आयी इस विपदा से परेशान होकर एक दिन वे सभी इंद्र भगवान के दरबार में जाकर उनसे शिकायत कर दी कि बंजर जमीन को खेती योग्य बना कर लोरिक उन्हें उनके आवास से विस्थापित कर दिया है। इस तरह जंगली जीवों की इस शिकायत की जांच के बाद देवराज इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में लोरिक पूरा ईमानदार और जनकल्याण के लिए समर्पित है। पिफर भी जंगली जीवों की सहायता तो करनी ही होगी। इंद्र ने देवी दुर्गा से सलाह करने के बाद लोरिक को पाप का भागीदार बनाने का उपाय निकाला ताकि उसे दंडित किया जा सके। इसी उपाय के तहत एक दिन दुर्गा लोरिक की पत्नी चानन का भेष धरण कर खाना लेकर लोरिक के पास पहुंची। लोरिक इंद्र के इस षडयंत्रा को समझ नहीं पाया। चानन भेषधरी दुर्गा को अपनी पत्नी समझ लिया। कपट भेष में आयी दुर्गा के सौंदर्य के वशीभूत होकर लोरिक मोहित हो गया। उनकी नजर में चानन भेषधरी दुर्गा कापफी सुंदर लगने लगी। लोरिक ने भोजन की थाली की ओर देखा तक नहीं और उस नारी को आलिंगन पाश में बांध् लेना चाहा। इस पर दुर्गा लोरिक के गाल पर थप्पड़ मारते हुए अंतध्र्यान हो गयी। इस घटना से लोरिक समझ गया कि उससे अनजाने में जघन्य पाप हो गया है। पाप तो आखिर पाप होता है चाहे वह अनजाने में हो या जानबूझ कर किया गया हो। इस पाप से मुक्ति के लिए लोरिक ने भगवान शिव की नगरी बनारस ;काशीद्ध में प्राण त्यागने का निश्चय किया। वह अपने सभी सगे-संबंध्यिों के साथ बनारस आया। यहां आकर भक्तिपूर्वक पूजा प्रारंभ की और सपरिवार पत्थर में तब्दील हो गये। आज भी बनारस के मणिकर्णिका घाट पर पत्थर की वे मूर्तियां वीर लोरिक के शौर्य और पराक्रम की जीवंत दस्तावेज है। लोरिक गाथा में कई मुख्य पात्रों का भी उल्लेख हुआ है जिसमें धेबराजन ;गुरुद्ध, बंठा चमार ;दोस्तद्ध,, सेवाचंद ;राजाद्ध, बारूक ;पहरेदारद्ध, होरिला ;पुत्राद्ध मुख्य है। इस लोक गाथा में इन सभी पात्रों की अहम भूमिका है। आज के तेजी से बदल रहे परिवेश में ये लोक गाथा में जनमानस से पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। कभी यह एक पीढ़ी के माध्यम से दूसरी पीढ़ी होते हुए मौखिक रूप से ग्रामीण अंचलों में विद्यमान थी। आज कापफी तलाश करने के बाद भी इनके बारे में बताने वाले लोग नहीं मिलते। ऐसी लोक कथाओं का संरक्षण करना आवश्यक है।

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