September 25, 2018

वोट जो लाए बदलाव

By wmadmin123 - Wed Apr 16, 1:05 pm

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चुनाव का मौसम है, पांच साल बाद एक बार पिफर इस राष्ट्रीय ‘महापर्व’ में सोल्लास शरीक होने का अवसर। अपने-अपने क्षेत्रा में वोट देने के लिए हर किसी को उस पावन तारीख का इंतजार है जिस दिन वहां मतदान निर्धरित है। सबकी जुबान पर इन दिनों बस एक ही चर्चा ने हर गली, हर चैराहे पर ध्ूम मचा रखी है। कौन बनेगा देश का अगला प्रधनमंत्राी नरेंद्र मोदी, राहुल गांध्ी या कोई और? हर किसी के जेहन में यही सवाल कौंध् रहा है कि ‘खिताबी’ जीत का मुकुट पहन कौन-कौन उम्मीदवार सोलहवीं लोकसभा में सांसद की सीट पर बैठेंगे। किस पार्टी की बनेगी सरकार, कैसा होगा नया मंत्रिमंडल? परिणाम के कयास में सभी बेचैन हैं, सबकी ध्ड़कने तेज हैं।
अमीर भी यही बात कर रहे, गरीब भी इसी टाॅपिक पर बहस छेड़ जीत-हार का आकलन कर रहे हैं। कहीं भाजपा की लहर की वकालत की जा रही है, कहीं कांग्रेस की पुनः जीत का दावा ठोका जा रहा है। ‘विजयश्री’ का ख्वाब देखने वालों में अन्य दलों के उम्मीदवार भी पीछे नहीं। परिवर्तन की दुहाई के साथ कोई कांग्रेस की विपफलताएं गिना रहा है, कोई अपनी उपलब्ध्यिों का राग अलाप रहा है। कोई महंगाई, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, गैंगरेप और आतंक-नक्सलवाद की भयावह तस्वीर दिखा ‘सांपनाथ’ से भी बचने को आगाह कर रहा है और ‘नागनाथ’ को भी रिजेक्ट करने की बात कर रहा है। कहीं सब्जबाग दिखायेे जा रहे हैं, कहीं जमीन से जुड़ने का नाम लिया जा रहा है।
तख्ता पलट नया प्रधनमंत्राी चुनें अथवा उसी दल को एक और पांच साल देकर पिफर शासन करने का मौका दें जिसने पिछले चुनाव में दो तिहाई बहुमत से जीत हासिल की थी। इसी पफैसले के साथ हर मतदाता को आगे आना है और अपना कीमती वोट देकर इस अभियान को अंजाम तक पहुंचाना है। मतदान के दिन बूथ तक जाना है, मनपसंद उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह पर मारनी है वोट की चोट। अगर मतपत्रा के उम्मीदवार अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं तो पिफक्र की कोई बात नहीं। इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन में ‘नोटा’ ;छव्ज्।द्ध बटन है न, इनमें से कोई नहीं। सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने की सुविध। बड़ा काम, बड़ी जवाबदेही। आप चाहे ‘खास’ हों, चाहे ‘आम’ हों इससे क्या! वोट तो सभी को देना है। महिलाओं को भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना है, बुजुर्गों को भी अपने मताध्किार का इस्तेमाल करने का मौका नहीं गंवाना है।
आप ही नहीं, आपके क्षेत्रा के वे अन्य लोग भी देश की खातिर अपने मताध्किार का इस्तेमाल करने को बेताब हैं जिनके नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं। 7 अप्रैल से 12 मई तक देशभर में कुल नौ चरणों में होने वाले मतदान के लिए विभिन्न क्षेत्रों में चुनावी गतिविध्यिों और तैयारियों का हाल जुदा है। जहां शुरुआती चरणों में चुनाव होने हैं वहां का चुनावी तापक्रम आहिस्ता-आहिस्ता चढ़ता जा रहा है, वहीं का चुनावी माहौल अभी गरमाया नहीं है जहां मध्य और अंतिम चरणों में मतदान निर्धरित है। चुनाव आयोग की घोषणा के मुताबिक पूरे देश में वोटिंग 7, 9, 10, 12, 17, 24, 30 अप्रैल और 7 व 12 मई को होगी, जबकि 16 मई को नतीजों का ऐलान होगा। बिहार में 40 सीट के लिए 10 अप्रैल से 12 मई तक छह चरणों में मतदान होंगे। 16वीं लोकसभा के चुनाव के साथ ही तीन राज्यों में विधनसभा चुनाव भी होंगे। ये स्टेट हैं आंध््र प्रदेश, ओडिसा और सिक्किम।
चुनावी बिगुल बजने के बाद से पूरे देश के साथ बिहार में भी अब तक कई प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं। जिन-जिन सीटों के लिए नामांकन पत्रा भरे जा चुके हैं और मतपत्रों की स्क्रूटनी कर प्रत्याशी रिजेक्ट भी किये जा चुके हैं वहां चुनावी बयार रफ्रतार पकड़ने लगी है। चुनावी मैदान में कूद चुके प्रत्याशी प्रतिद्वंद्वियों को ‘ध्ूल’ चटाने के लिए ताल ठोकने लगे हैं। जहां नामांकन होना बाकी है वहां तो कइयों को अब तक टिकट ही नहीं मिला है। वे इसी जद्दोजहद में लगे हैं कि अंत-अंत तक टिकट जरूर मिल जाये। सपफलता उन्हें अब तक जरूर नहीं मिली है मगर वे हरगिज निराश नहीं। पार्टी से टिकट पाने का पूरा भरोसा है।
बिहार में पहले चरण के चुनाव के लिए प्रत्याशियों के प्रचार का जोर ‘शोर’ मचा क्षेत्रों में ‘हलचल’ बढ़ा रहा है। कहीं यह शोर परवान पकड़ चुका है, कहीं ‘रंग’ में ‘भंग’ में पड़ा है। आचार संहिता के दायरे में रहते हुए ही प्रचार करना किसी बड़ी ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं। प्रत्याशियों की हर चुनावी गतिविध् िपर चुनाव आयोग की पैनी नजर है। जरा भी पिफसले तो गये काम से। चेहरा देखे बिना ‘दोषियों’ पर चलना ही है आयोग का डंडा। मजाल है जो आचार संहिता का कोई उल्लंघन करे। कितने अब तक नप चुके हैं, कितनों पर खतरा मंडरा रहा है जो इसके अनुपालन को हल्के में ले उल्लंघन करने से बाज नहीं आ रहे। कोई देखे न देखे, चुनाव आयोग देख रहा है।
मतदाताओं को रिझाने के लिए विभिन्न दलों के उम्मीदवार वायदों का ‘पिटारा’ साथ लिये डोर टू डोर घूम रहे हैं। कहीं रोड शो कर रहे हैं, कहीं जनसंपर्क अभियान में जी-जान से लगे हैं। पार्टियों की चुनावी सभाएं भी बढ़ चली हैं। ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल करने के लिए प्रचार में कोई भी प्रत्याशी पीछे नहीं। हर की बस एक ही चाह यही है कि निकटतम प्रतिद्वंद्वी को कम से कम वोट मिले। इसी जुगत में सभी प्रत्याशी न दिन को दिन समझ रहे हैं, न रात को रात।
उम्मीदवारों की ‘रिझाई’ से रत्ती भर भी प्रभावित हुए बिना मतदाता भी ‘तू डाल-डाल तो मैं पात-पात’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। प्रायः क्षेत्रों में ऐसे वोटरों की संख्या तादाद में है जिन्होंने खामोशी की चादर ओढ़ जुबान पर ताला जड़ दिया है। चाहे कुछ भी हो मतदान से पहले खामोशी हरगिज नहीं तोड़ेंगे। ऐसा लगता है मानो उन्होंने यही ठान लिया है कि वे ऐसे किसी ‘बंध्न’, ‘दबाव’, ‘प्रलोभन’ अथवा ‘बहकावे’ में नहीं आयेंगे जिससे कि स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव पर असर पड़े। न बड़े से बड़े ‘सब्जबाग’ पर लार टपकानी है, न किसी के डराने-ध्मकाने से घबराना है।
किसे वोट देना है, किसे ठुकराना है यह तय करना हर उस मतदाता का खुद का पफैसला है जिसे कोई बदल नहीं सकता। जिस किसी ने अगर यही इरादा कर रखा है कि वह कांग्रेस-राजद गठबंध्न को ही हर हाल में वोट देगा, वह भला अन्य की क्यों बात करे। कोई भाजपा-लोजपा-रोलोसपा से प्रभावित है तो कोई जेडीयू-सीपीआई गठबंध्न पसंद कर रहा है। बहुत ऐसे भी हैं जो आम आदमी पार्टी को वोट देंगे, बाकी बचे अन्य को भी वोट देने वालों की कमी नहीं। किसे बहुमत मिलेगा, किसका सूपड़ा सापफ होगा विभिन्न पार्टियां भले ही अभी से एक दूसरे के बारे में भविष्यवाणी कर रहे हों, मगर चुनाव परिणाम ही सही तस्वीर पेश करेगा। कितने प्रत्याशी रिकार्ड मतों से जीतेंगे कितनों की जमानत जब्त होगी 19 मई को सभी जान जायेंगे।
कई मायनों में इस बार का लोकसभा चुनाव खास है। एक तो लाखों की संख्या में ऐसे युवा वोटर हैं जो बालिग होने के बाद पहली बार वोट देंगे, दूसरे पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार युवा उम्मीदवार ज्यादा हैं जो अपने नये नजरिये के साथ देश की तरक्की का प्लान बना चुके हैं। सबसे खास इस बार के लोकसभा चुनाव में ईवीएम में ‘नोटा’ ;नन आॅपफ द एबवद्ध बटन दबाने की सुविध का इंतजाम किया जाना है। इससे पूर्व विगत दिनों हुए दिल्ली विधनसभा के चुनाव में ‘नोटा’ बटन का इस्तेमाल वहां के मतदाताओं ने किया था। अगर मतपत्रा में अंकित एक भी उम्मीदवार किसी मतदाता को पसंद नहीं है तो उसे पूरी आजादी है कि ऐसे में वह ‘नोटा’ बटन दबा ‘इनमें से कोई नहीं’ च्वाइस पर मुहर लगाये।
अगर किसी संसदीय क्षेत्रा में ‘नोटा’ वोट का प्रतिशत पड़े हुए वोटों की तुलना में 30 या उससे अध्कि होता है तो आयोग उस क्षेत्रा का चुनाव इनवैलिड कर देगा। ऐसे में अगर राजनीतिक दलों ने वोटरों की मांग, उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप विभिन्न क्षेत्रों में सही उम्मीदवार को चुनाव मैदान में नहीं उतारा तो बहुत मुमकिन है कि इस बार कई मतदाता ‘नोटा’ बटन दबा सभी को रिजेक्ट कर देंगे। जिन दलों के उम्मीदवार चुनाव मैदान में कूद जोर आजमाइश कर रहे हैं उनकी छवि, उनका बायोडाटा वोटरों से छिपा नहीं। अगर ‘नोटा’ के प्रहार से इन्हें बचना है तो उन्हें वोटरों की नाराजगी दूर करने के लिए वह सब करना होगा जो वे चाहते हैं।
चुनाव आयोग ने इस बार के संसदीय चुनाव में ‘नोटा’ बटन ईवीएम के बोर्ड में सबसे निचली पायदान पर इसलिये उपलब्ध् कराया है ताकि कोई उम्मीदवार अगर बाहुबली है, दबंग है अथवा अपराध्ी रह चुका है तो बिना किसी झिझक अथवा देर लगाये मतदाता ‘नोटा’ बटन दबा सकता है। इस च्वाइस ने मतदाताओं को उस दुविध में पड़े रहने से मुक्त कर दिया है जिसके कारण उन्हें ‘सांपनाथ’ अथवा ‘नागनाथ’ में से किसी एक को न चाहते हुए भी चुनना पड़ता था। अब जबकि इस बार ईवीएम में ‘नोटा’ बटन है तो ‘सांपनाथ’ भी रिजेक्ट हो जायेंगे और ‘सांपनाथ’ भी जीत नहीं सकेंगे। इन दोनों सर्पों के चलते अन्य उम्मीदवारों की भी लुटिया डूब सकती है।
चुनाव आयोग ने नोटा बटन का प्रचार बढ़-चढ़कर कर रखा है। शहरों में तो इसके प्रति जागरूकता कापफी बढ़ी है मगर ग्रामीण क्षेत्रों में उतनी जागरूकता नहीं आयी है जितनी तैयारी की जा चुकी है। इसके लिए सबसे ज्यादा गांवों में अशिक्षा और साक्षरता दर में कमी को कारण माना जा रहा है। शहरों में हालांकि गांवों के मुकाबले नोटा के प्रति जागरूकता में तेजी आयी है मगर अभी भी परिणाम शत-प्रतिशत नहीं निकला है। दिल्ली विधनसभा के चुनाव में वहां के मतदाताओं ने नोटा बटन दबा कई क्षेत्रों में वहां का चुनाव रद्द करने का खतरा बढ़ा दिया था क्योंकि पड़े हुए वोटों के मुकाबले ‘नोटा’ का प्रतिशत बहुत कम अंतर से तीस प्रतिशत आंकड़ा को छूने से बच गया।
विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस बार भी बाॅलीवुड की कई नामचीन हस्तियों को अपना प्रत्याशी बनाया है। ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी जहां भाजपा के टिकट पर मथुरा से चुनाव लड़ रही हैं, वहीं जयाप्रदा राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर बिजनौर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में हैं। इनके अलावा चुनाव लड़ रहीं अन्य छह अभिनेत्रियां हैं नगमा, मुनमुन सेन, किरणखेर, गुल पनाग, संध्या राय और रमैÕया। इन महिला सितारों के अलावा पुरुष पिफल्मी सितारे भी इस चुनाव में सांसद बनने के लिए भाग्य आजमा रहे हैं। ये हैं शत्राुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, मनोज वाजपेयी, राज बब्बर, बप्पी लाहिड़ी, परेश रावल, महेश मांजरेकर, जाॅय बनर्जी, रवि किशन बाबुल सुप्रियो, विश्वजीत प्रधन और कमाल आर खान।
इस बार भले ही भारतीय जनता पार्टी के अलावा किसी अन्य दल ने प्रधनमंत्राी पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है, मगर नरेंद्र मोदी के विरु( कांग्रेस प्रत्याशी राहुल गांध्ी ही मुख्य मुकाबले में हैं। पूरे देश में हर जगह नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांध्ी की ही लहर दिख रही है। इसके अलावा नीतीश कुमार के चैथे मोर्चे में उनके अलावा मुलायम सिंह यादव ही नहीं कई अन्य पीएम उम्मीदवार हैं जिन्हें जीत का भरोसा है। देखना है भारतीय मतदाता नरेंद्र मोदी के रूप में किसी बुजुर्ग के हाथों देश की बागडोर सौंपते हंै अथवा राहुल गांध्ी के रूप में एक युवा को यह जिम्मेदारी निभाने का मौका देते हैं। देर किस बात की है। चुनाव होने दीजिये और इंतजार कीजिये 19 मई का जिस दिन शाम होते-होते तक इस सवाल का जवाब मिल जायेगा।

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