October 21, 2017

समाज पर कभी रहे न व्यक्ति की प्रधानता

By wmadmin123 - Fri Aug 21, 7:30 am

नंदकिशोर नंदन

15 अगस्त समीप आते ही मन में यह प्रश्न उमड़ने-घुमड़ने लगता है कि स्वतंत्रा देश की लोकतांत्रिक यात्रा ने देश की वंचित-शोषित जनता को क्या दिया है? अनेक योजनाओं-परियोजनाओं के माध्यम से गरीब देश की गाढ़ी कमाई की अकूत राशियां, जो अब तक खर्च की गई उससे क्या वे सपने साकार हुए, जो स्वाध्ीनता संग्राम के प्रेरक मूल्य भी थे? देश में व्याप्त गरीबी, अभाव, रोग, बेकारी और कृषकों की आत्महत्याओं के साथ ही दंगों में मारे जा रहे हजारों नागरिकों के परिवारों की बेबसी हमारे लोकतंत्रा और राजनीति की विपफलता ही नहीं, उसकी चतुर्दिक पतनशीलता की दारूण कथा बयान करती है। भारतीय लोकतंत्रा को चलाने वाली राजनीति का पतन उसी दिन शुरू हो गया था, जब नेहरू जैसे विचारक प्रधनमंत्राी ने अपने कतिपय भ्रष्ट मंत्राी को बचाना चाहा था। लेकिन उस समय का वह भ्रष्टाचार आज के सुरसा समान भ्रष्टाचारों के सामने तिनके बराबर था। बुराई छोटी हो या बड़ी, बुराई तो जहर समान होती है, वह व्यक्ति और समाज के सभी अंगों में ऐसे पफैलती है कि हमें उसका पता तब चलता है जब वह नासूर का रूप ले लेती है। भ्रष्टाचार भारतीय राजनीति और समाज का नासूर बन गया है। यह भयावह स्थिति क्यों बनी? इस पर मुक्त मन से विचार करना समय की एकांत अनिवार्यता है। भारतीय राजनीति से मूल्यों के प्रति निष्ठा और मानवीय संवेदना का पूर्णतया लोप, देश में व्याप्त सभी प्रकार की बुराइयों का प्रमुख कारण है। 1947 से 1955-56 तक पतन की गति कम थी। शायद उस समय तक राजनीति में स्वाध्ीनता-संग्राम की आग में तपे लोग पतन को यथासंभव थाम रहे थे। जैसे-जैसे उस पीढ़ी के लोग राजनीति से विरत होते गये या तिरोहित होते गये, वैसे-वैसे राजनीति में अवांछित तत्व प्रवेश करने लगे क्योंकि राजनीति से सेवा और त्याग की विदाई होने लगी और उसके स्थान पर सत्ता-लोलुपता और राजनीतिक वर्चस्व की महत्वाकांक्षा केंद्रीय कारक हो गई। पिफर हमारा जनप्रतिनिध् िकैसा हो? इसकी कोई प्रभावकारी शर्त या कसौटी भी नहीं रही। यह कितनी भयावह विसंगति है कि जनप्रतिनिध् िके लिए न कोई शैक्षणिक योग्यता शर्त हो और न ही उसके लिए कोई आचार संहिता? यदि हमारी संसद को कथित तौर पर अपराधें के आरोपी भी सुशोभित करते हैं तो यह लोकतंत्रा की ही विपफलता नहीं है, हमारी चुनाव प्रणाली की भी अक्षमता है। हमारे देश के शासकवर्ग विशेषकर राजनेता भली-भांति जानते हैं कि जिस दिन लोकतंत्रा की स्वच्छता एवं शक्ति के लिए चुनाव-आयेाग को मजबूत किया जायेगा, उसी दिन से हमारे अस्सी प्रतिशत जनप्रतिनिध् िजनप्रतिनिध् िहोने की क्षमता खो देंगे। देश एवं अपनी जनता से राजनीतिक दलों और नेताओं को इतना प्रेम कहां कि वे यह सब करने को तैयार हो जायें। कल्पना कीजिए कि आज गांध्ीजी चुनाव में खड़े हों तो उनका क्या हश्र होगा? विगत पांच दशकों में राजनीति और समाज में देा प्रकार की बुराइयां अमरबेल के समान बढ़ती चली गई है। पहली यह कि दूसरे का चोर चोर, हमारा चोर साध्ु। प्रश्न है कि आपके घर में सोने की कटोरी में जहर है तो क्या वह आपको नहीं मारेगा? इस कोन से देखें तो सारी राजनीतिक पार्टियां कमोबेश एक जैसी हैं। कल ही ट्रेन में भ्रष्टाचार को लेकर बात चली तो एक नौजवान ने कहा कि अपने भ्रष्ट मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को बचाने के लिए संसद में सारी ताकत झोंक देनेवाली मोदी सरकार कांग्रेस को भ्रष्टाचार के लिए किस मुंह से कोसेंगी? मुझे 2000 में ही सर्वकालिक मन्ना डे से यह सुनने को मिला था-‘किसी भ्रष्ट को कभी कोई सजा नहीं होगी। राजनीति पतितों की शरणस्थली है, सब चोर-चारे मौसेरे भाई हैं।’ उन्होंने यह भी कहा था-‘कभी-कभी मैं यह सोचता हूं कि यहां से ऐसी जगह चला जाउफं जहां से शोषित-पीडि़त-प्रताडि़त जनता की चीख-पुकार न सुनाई पड़े और न इन लोलुप राजनीतिज्ञाों और लोभी पूंजीपतियों तथा पतितों की गर्वोक्तियां पढ़ने को मिले।’ ऐ सुर-साध्क की यह अन्तर्वेदना देश के उन करोड़ों संवेदनशील बौ(िक लोगो ंकी भी अन्तर्वेदना है, जो इस स्वर्ग से सुन्दर देश को बेहद प्यार करते हैं। सभी क्षेत्रों में जनसेवा की शपथ लेने वाले भारतीयों में यह चेतना कब आयेगी कि वे नेता हों, डाक्टर हों, इंजीनियर हों, शिक्षक हों या और कुछ भी, उन्हें पहले मनुष्य होना है और मनुष्य के प्रति मनुष्य का दायित्व पूरा करना है।
आज सारी दुनिया में विकास का शोर मचा हुआ है। साल भर पहले दंगों के आरोपी नरेंद्र मोदी भी विकास का गुजरात माॅडल लेकर काॅरपोरेट के रथ पर सवार होकर विकास का ही सपना दिखलाकर सत्तासीन हुए थे, लेकिन उनके विकास में क्या वंचितों के लिए कोई जगह है? पहले 14 और बाद में 5 देशों की यात्राएं कर विकास का ढोल पीटने वाले प्रधनमंत्राी ने कभी किसानों-मजदूरों और गरीबों की कोई खोज-खबर ली? उनकी चिंता के केंद्र में किसान नहीं, काॅरपोरेट हैं या उनके भ्रष्ट मंत्राी, जिन्हें बचाना ही मानो सच्ची देश-सेवा हो। एक मनुष्य के रूप में सवा करोड़ मनुष्य के प्रति दायित्व जैसे गौणतम विषय बनकर रह गया हो। मानवीय संवेदना के गायक महान शायर जिगर का यह शेर बरबस याद आता है-
क्या कयामत है कि इस दौरे-तरक्की में जिगर
आदमी से आदमी का हक अदा होता नहीं।
बिहार के चुनाव को देखते हुए भी यह टिप्पणी प्रासंगिक है कि सभी राजनीतिक दल जिस तरह से एक दूसरे पर आरोपों की बौछार कर रहे हैं मानो वे दूसरों की तुलना में बिल्कुल बेदाग हों। मेरी समझ में सब एक जैसे ही भ्रष्ट और जन-विरोध्ी हैं। बिहार के पतन में सभी समान रूप से भागीदार हैं। बड़बोले भाजपाई हों या महागठबंध्न के नेता या नई पार्टी बनाकर चुनावी जंग में उतरने वाले नेता, किसकी चिंता के केंद्र में जनता नहीं, सत्ता है केवल सत्ता। यदि जनता उनकी चेतना में रची-बसी होती तो बिहार इस तरह बेहाल न होता। ये नेता किस आधर पर ताल ठोक रहे हैं। आज सब अपनी-अपनी तरह रथ निकाल रहे हैं और जनता तक पहुंचने के लिए पागलपन की हद तक बेचैन हैं। आखिर क्यों? इसलिए कि कुछ नहीं करके भी वोट पाना है क्योंकि भोली-भाली जनता दरवाजे पर देखकर द्रवित हो जायेगी। निस्संदेह हम बिहारियों ने हमेशा धेखा खाया है। जब सभी दलों के मान बराबर हो गये हैं तो क्यों नहीं हम बेहतर और बेदाग प्रत्याशी को ही वोट दंे? यह बन चुका मिथक लोकतंत्रा के लिए घातक सि( हो रहा है कि यह प्रत्याशी सबसे अच्छा है मगर वह नहीं जीतेगा, इसलिए उसे ही वोट दो जो जीते। परिणाम यह हो रहा है कि ध्न और बल से समर्थ बाहुबली ही हमारा प्रतिनिध्त्वि करने लगे हैं। नहीं, इस सोच को-जनता को तोड़ना होगा। तभी हमारा गणतंत्रा और लोकतंत्रा मजबूत होगा।
हम अंध्ेरे से और गहन अंध्ेरे की इस यात्रा में उम्मीद की डोर थामे चल रहे हैं कि कभी तो देश के कर्णधरों में यह चेतना आयेगी।
‘मनुष्य मांगता यही, यही मनुष्य मानता
कि हो समाज-राज में मनुष्य की समानता
स्वतंत्राता मिली हमें कि देश में सुराज हो
मनुष्य एक आज हो कि वर्ग एक आज हो
समाज के लिए समाज का अखंड राज हो
समाज पर कभी रहे न व्यक्ति की प्रधनता
कि हो समान-राज में मनुष्य की समानता।’;नेपालीद्ध त्र

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