December 12, 2017

सियासी जंग में फिर जलवे दिखाएंगे सिने-सितारे

By wmadmin123 - Wed Apr 16, 12:54 pm

इस बार भी देश के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में कई सिने कलाकार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। बिहार भी इससे अछूता नहीं है। सूबे के दो संसदीय क्षेत्रा पटना साहिब और पश्चिम चंपारण में भाजपा, कांग्रेस और जदयू ने पिफल्म से जुड़े लोगों को उतारा है। पटना साहिब से शत्राुध्न सिन्हा भाजपा के उम्मीदवार हैं जबकि कांग्रेस ने श्री सिन्हा को चुनौती देने के लिए भोजपुरी के सुपर स्टार कुणाल को टिकट थमाया है। उध्र नीतीश के प्रत्याशियों की सूची में भी एक पिफल्मी चेहरा है, प्रकाश झा। ‘गंगाजल’ और ‘सत्याग्रह’ जैसे सुपर हिट पिफल्म देने वाले निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा पश्चिम चंपारण से जदयू के उम्मीदवार हैं। इसके अलावे बिहार से बाहर भी कई पिफल्मी कलाकार चुनावी जंग में हैं। ऐसे सिने कलाकारों में राजबब्बर, हेमा मालिनी, नगमा, जयाप्रदा, परेश रावल, मनोज तिवारी, रवि किशन, किरण खेर, गुल पनाग, मुनमुन सेन, संगीतकार बप्पी लहरी आदि का नाम प्रमुख है। हेमा मालिनी, किरण खेर, मनोज तिवारी, परेश रावल, बप्पी लहरी आदि कलाकार को जहां भाजपा ने टिकट दे रखा है वहीं राजबब्बर, नगमा, रवि किशन आदि कलाकार कांग्रेस के टिकट पर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। जयाप्रदा अजित सिंह की पार्टी रालोद से, मुनमुन सेन ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस से, गुल पनाग आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अलावा देश भर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में छोटे-बड़े पर्दें के स्टार, चुनाव में स्टार प्रचारक की भूमिका निभाने वाले हैं। इतना ही नहीं मतदाताओं को रिझाने के लिए पार्टियों के कार्यकर्ताओं के द्वारा अब प्रचार के लिए पिफल्मी सितारों को उतारने की मांग की जा रही है। अगर सब ठीक-ठाक रहा तो चुनाव लड़ रहे इन कलाकारों के अलावा शाहरूख खान, सलमान खान, माध्ुरी दीक्षित, जया बच्चन, अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, शिल्पा शेट्ठी, श्रीदेवी, राजा मुराद आदि पिफल्मी कलाकार विभिन्न दलों की ओर से प्रचार के लिए चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। पिफल्म तारिका मुनमुन सेन को टिकट देने से ममता बनर्जी को दो और स्टार प्रचारक मुफ्रत में ही मिल गए। दरअसल, मुनमुन सेन की दो बेटियां रीमा सेन और रायमा सेन बाॅलीवुड और टेलीवुड की स्थापित ग्लैमरस अभिनेत्रियां हैं। इसी तरह उड़ीसा में भी आध दर्जन से अध्कि पिफल्म और टीवी की दुनिया के सितारों ने विभिन्न दलों का दामन थाम चुनावी माहौल में रंग भरने में जुटा है।
कहना न होगा, सियासत में सिने जगत का पुराना रिश्ता रहा है। राजनीतिज्ञों के द्वारा सितारों की लोकप्रियता को अपने पक्ष में भुनाने का चलन देश के प्रथम प्रधनमंत्राी पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही रहा है। ये राजनीतिज्ञ सिने-सितारों की लोकप्रियता का इस्तेमाल कभी स्टार प्रचारक के रूप में करते रहे हैं तो कभी उन्हें ही चुनाव मैदान में उतारते रहे। सर्व प्रथम यह प्रयोग 1962 ई. में अटल बिहारी वाजपेयी के विरू( पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। उस चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी की हार हो गई थी। दरअसल, 1962 के आम चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर लोकसभा क्षेत्रा से खड़े थे। उस समय भी श्री बिहारी की लोकप्रियता कापफी थी। अटल के विरोध् में एक महिला खड़ी थी जो बेहद आम परिवार से आती थी। दिल्ली से आने वाली सुुभद्रा जोशी नाम की उस महिला के पक्ष में पंडित नेहरू ने तब के बड़े पिफल्म स्टार बलराज साहनी को उतारा था। बलराज साहनी का जादू चला लिहाजा, अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गए। स्वतंत्रा भारत का राजनीतिक इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं। बाद के दिनों में ये पिफल्मी सितारे स्टार प्रचारक के साथ-साथ स्वयं भी एक प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने लगे। पिफल्मी दुनिया से राजनीति में आनेवाले सितारों की एक लंबी पफेहरिश्त है। जयललिता, एनटी रामाराव, वैजयंती माला, सुनील दत्त, नरगिस, ध्र्मेंद्र, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, राजेश खन्ना, जयाप्रदा, शत्राुघ्न सिन्हा, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, रेखा, जावेद अख्तर, शबाना आजमी, शेखर सुमन, संजय दत्त, राजबब्बर, रजनीकांत, चिरंजीवी आदि। इनमें से ध्र्मेंद्र, अमिताभ, गोविंदा जैसे कलाकार पिफल्म से राजनीति में तो आ गए लेकिन राजनीति मंे इन सबों का दिल नहीं लगा। बाद में अमिताभ ने कहा कि यह मेरे वश की बात नहीं है। गोविंदा ने राजनीति में आने के अपने पफैसले को जीवन का सबसे खराब पफैसला माना। ध्र्मेंद्र सांसद चयनित होने के बाद लोकसभा कार्यक्रम में प्रायः भाग नहीं लेते थे। उन्होंने कहा भी कि कलाकारों को राजनीति में नहीं आना चाहिए। उन्हें कलाकारी ही करनी चाहिए।
आंध््र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्राी स्व. एनटी रामाराव पिफल्म के रास्ते ही राजनीति में आए थे। वे आंध््र प्रदेश में कई वर्षों तक मुख्यमंत्राी के पद पर काबिज रहे। इसी तरह तमिलनाडु की मुख्यमंत्राी जयललिता भी तमिल पिफल्म की अभिनेत्राी के रूप में अपने कैरियर की शुरूआत की थी। 1972 में शिवाजी गणेशन के साथ रिलीज पिफल्म ‘पट्टीकडा पट्टीनामा’ को 1973 के सर्वश्रेष्ठ तमिल पिफल्म के लिए राष्ट्रीय पिफल्म पुरस्कार मिला। जयललिता तमिल पिफल्मों में स्कर्ट पहनने वाली पहली हीरोईन के रूप मंे भी जानी जाती हैं। ध्र्मेंद्र के साथ 1968 में एक हिन्दी पिफल्म ‘इज्जत’ भी की। तमिलनाडू के तत्कालीन मुख्यमंत्राी एमजी रामचंद्रन इन्हें राजनीति में लाए। हालांकि जयललिता इस बात से इनकार करती रही है। 1984 में राज्यसभा सदस्य बनी। एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद जयललिता खुद को उनका वारिस घोषित कर दी। सुनील दत्त कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े तथा लगातार 5 बार सांसद बने। उन्होंने मुंबई उत्तर-पश्चिम से 1984 के संसदीय चुनाव से अपनी राजनीति शुरू की थी। जब सुनील दत्त राजनीति में आए तो नरगिस भी सामाजिक कार्यों में अभिरुचि ज्यादा लेने लगी। कई उल्लेखनीय सामाजिक कार्य भी किए। नरगिस को उनके शानदार योगदान के लिए पद्मश्री सहित कई पुरस्कार से भी नवाजे गए। बाद में उन्हें राज्यसभा सदस्य भी बनाया गया। सुनील दत्त और नरगिस का इकलौता संदय दत्त तथा बेटी प्रिया दत्त भी राजनीति में आए। प्रिया तो लोकसभा पहुंचने में कामयाब हो गई लेकिन संजय दत्त जेल-वेल के चक्कर में चुनाव नहीं लड़ सके। संजय दत्त जब जेल से बाहर आए तो 2009 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा की। लेकिन देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उनपर चल रहे मुकदमे को स्थगित करने से मना कर दिया। लिहाजा, उन्हें अपना नाम वापस लेना पड़ा।
हिंदी पिफल्म जगत के महानायक अमिताभ बच्चन भी लोकसभा के माननीय सदस्य रह चुके हैं। श्री बच्चन राजीव गांध्ी के कहने पर राजनीति में आए थे। राजीव ने अमिताभ को इलाहाबाद से चुनाव लड़ाया तथा तबके राजनीति के बड़े ध्ुरंध्र हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे शख्सियत को ध्ूल चटा दिया था। अमिताभ केअमर सिंह से भी कापफी मध्ुर संबंध् रहे हैं। अमर सिंह के कहने पर ही अमिताभ की पत्नी जया बच्चन मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली तथा सांसद भी बनी।
राजीव गांध्ी ने वैजयंती माला को 1989 के चुनाव में कांग्रेस का टिकट दिया था। श्रीमती माला करीब डेढ़ लाख वोटों से विजयी हुई थी। इसके बाद वे राज्यसभा भी गईं। उध्र पिफल्मी दुनिया की ड्रीम गर्ल हेमामालिनी और पति ध्र्मेंद्र भी सियासत में किस्मत आजमाते रहे हें। हेमा मालिनी को भाजपा ने इस बार भी मथुरा से प्रत्याशी बनाया है। इससे पहले हेमा जहां बीजेपी के कोटे से राज्यसभा सदस्य रह चुकी हैं वहीं ध्र्मेंद्र भी राजस्थान के बीकानेर संसदीय क्षेत्रा से चुनकर लोकसभा के माननीय सदस्य बन चुके हैं।
इध्र पिफल्मी तारिका जयाप्रदा भी बाॅलीवुड के रास्ते संसद तक पहुंच चुकी हैं। ये 2004 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर रामपुर संसदीय क्षेत्रा से लोकसभा गई थी। इससे पूर्व 1996 में चंद्रबाबू नायडू ने आंध््रप्रदेश का प्रतिनिध्त्वि करने के लिए राज्यसभा में भेजा था। हालांकि जयाप्रदा राजनीति में 1994 में ही आ गई थी। एनटी रामाराव ने उन्हें तेलगू देशम में लाया था। लेकिन बाद के दिनों में जब तेलगू देशम पार्टी में बगावत हुई और एनटी रामाराव के दामाद चंद्र बाबू नायडू पार्टी में एक अलग शक्ति बनकर उभरे तो जयाप्रदा चंद्रबाबू नायडू के खेमे में शामिल हो गई थी। हालांकि बाद में चंद्रबाबू नायडू से भी जयाप्रदा के मतभेद हो गए। लिहाजा, तेलगू देशम पार्टी को छोड़ वे समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई। चूंकि जयाप्रदा अमर सिंह के प्रभाव के कारण समाजवादी पार्टी में शामिल हुई थी लेकिन अमर सिंह के समाजवादी पार्टी से बाहर आने के कारण जयाप्रदा भी सपा से बाहर आ गई। बीते कुछ दिन पूर्व जयाप्रदा और अमर सिंह अजित सिंह की पार्टी रालोद में शामिल हुए हैं।
इसी तरह विनोद खन्ना का भी राजनीति से गहरा संबंध् रहा है। वे 2002 में केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्राी के पद पर भी काबिज हो चुके हैं। विनोद खन्ना 1998 के चुनाव में पहली बार भाजपा के टिकट पर पंजाब के गुरदासपुर संसदीय क्षेत्रा से चुनाव जीते। 1999 में तथा 2004 में भी उन्होंने भाजपा को ‘पफीलगुड’ करवाया तथा जीतकर संसद पहुंचे। लेकिन 2009 के चुनाव में विनोद खन्ना सपफल नहीं हो सके। इसी तरह गोविंदा भी 2004 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे। वे उत्तरी मुंबई संसदीय समर को पफतह कर सांसद बने थे। हालांकि बाद में उन्होंने कहा कि यह पफैसला उनके जीवन का सबसे खराब पफैसला था। उनके अनुसार राजनीति में बैकग्राउंड के बिना वहां रहना कापफी मुश्किल है।
पिफल्मी कलाकारों के राजनीति में आने के सवाल पर समय-समय पर बवाल भी खड़े होते रहे हैं, जिसका जवाब संब( पक्ष अपनी-अपनी सुविध के अनुसार देने में कोई कोताही नहीं करते। इस बार भी पूरे देश की निगाहें इस बात पर लगी हुई है कि ये सितारे अपनी लोकप्रियता को वोट में किस हद तक परिणत कर पाते हैं। कितनी संख्या में ये सिने कलाकार लोकसभा पहुंच पाते हैं। इसका जवाब आने वाले कुछ दिनों में मिल जाएगा।

Leave a Reply

Powered By Indic IME