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सीमांचल में अल्पसंख्यक राजनीति, कल, आज और कल

Posted By wmadmin123 On September 15, 2014 @ 8:33 am In विशेष रिपोर्ट | No Comments

सीमांचल में अल्पसंख्यक राजनीति का इतिहास कोई नया नहीं है। भारत पर आक्रमण करने वाले अहमद शाह अब्दाली ने जब पश्चिम ;पंजाबद्ध से भारतीय भूभाग पर कब्जा करते हुए पूरब में बंगाल की ओर रुख किया तो उनके साथ आये पफौजों का दस्ता, आला लश्करों के साथ आये अपफगान मूल के मुस्लिम और उनकी हरम की महिलाएं वापसी में उनके साथ न जाकर लूट की बची-खुची संपत्ति के साथ बंगाल, बिहार और उड़ीसा आदि राज्यों में बस गये और यहीं से इस क्षेत्रा में अल्पसंख्यक ;मुस्लिमद्ध राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ। लेकिन इसे विस्तार मिला मुगल शासन काल में। पूरब में ढाका ;अब बांग्ला देश मेंद्ध से लेकर पूर्णिया तक ऐसे ढेर सारे भग्नावशेष हैं, जो प्रमाणित करता है कि मुगल साम्राज्य के प्रारंभिक काल खंड से लेकर औरंगजेब के शासन काल तक सर्वाध्कि ध्र्मान्तरण और इस्लाम ध्र्म का प्रचार-प्रसार इस क्षेत्रा में हुआ। इसी की बदौलत दीर्घ काल तक मुगलों की यहां शासन व्यवस्था कायम रही। पूर्णिया के लालगढ़ का ऐतिहासिक किला, जो आज खंडहर में तब्दील है, का निर्माण मिथिला के तत्कालीन राजा कंस नारायण उपर्फ गणेश के पुत्रा जीतमल ने कराया था। उद्देश्य था नेपाल के आक्रमण से मिथिला के इस भू भाग की रक्षा करने का। इसी बीच मुगलों का आक्रमण हुआ। मुगल सेना से भयभीत होकर राजा जीतमल ने इस्लाम ध्र्म कबूल कर लिया और अपना नाम जलालुद्दीन रख लिया। भारत के प्रसि( इतिहासकार सर डाॅ. यदुनाथ सरकार ने औरंगजेब की शासन व्यवस्था पर लिखे अपने ऐतिहासिक पुस्तक में इसका जिक्र किया है। लेकिन उन्होंने यह भी संदर्भित किया है कि इस संबंध् में विशेष शोध् एवं अनुसंधन की जरूरत है। बातें जो भी हो, किंतु यह सच है कि इस क्षेत्रा में उस कालखंड में बड़े पैमाने पर ध्र्मान्तरण हुआ और मुगल साम्राज्य के विस्तार में उन्हीं ध्र्मान्तरित लोगों ने बड़ी भूमिका निभायी थी। इस्ट इंडिया कंपनी ;जिसे भारत में अंग्रेजी शासन व्यवस्था का स्तंभ माना जाता है, के आगमन के पूर्व तक मुगल शासकों का वर्चस्व कायम था और यही कारण है कि सीमांचल में आज भी किसी न किसी रूप में वर्चस्व कायम है। यह भी उल्लेख करने योग्य तथ्य है कि सीमांचल की वर्तमान अल्पसंख्यक राजनीति को बल मिला है बांग्लादेश से भाग कर आये लाखों की संख्या में मुस्लिम परिवारों के कारण, जिसे आज के राजनीतिज्ञ ‘घुसपैठिया’ की संज्ञा देते हैं। लोकतंत्रा में संख्याबल का तो महत्व होता ही है। वस्तुतः बांग्लादेश या पूर्वी बंगाल से भाग कर आये लोगों का मजहब ही नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति भी एक जैसी है। इसलिये लाख चाहने पर भी शासन-प्रशासन या सरकार देसी और विदेशी की पहचान कराने-करने मंे अबतक सक्षम नहीं है तो दूसरी ओर ‘सेक्युलर’ होने का बाना ओढ़े यहां की कुछ राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता उन घुसपैठियों को अपना वोट बैंक मानकर उन्हें नागरिकता प्रदान कराने से लेकर हर नागरिक सुविध उपलब्ध् कराने में शुरू से तत्पर रहे हैं। समान हित में यह भारी अपकर्ष साबित हो रहा है।
इसके पूर्व कि हम आज की राजनीति को दर्शावें, स्वतंत्राता प्राप्ति से पूर्व और स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद के कुछ संदर्भों को रेखांकित करना उचित समझते हैं। स्वतंत्राता के पूर्व जब स्थानीय निकायों को स्वायत्तता देकर उसके पदधरियों को अंग्रेजी हुकूमत ने मनोनीत किया था तो उस समय भी अल्पसंख्यकों को तरजीह मिली थी। कटिहार लोकल बोर्ड के पहले चेयरमेन चैध्री मोहम्मद बक्श बनाये गये थे, जो एक बड़े जमींदार घराने से आते थे। आज भी उनके वंशज कटिहार शहर में ही निवास करते हैं। लेजिसलेटिव काउंसिल में जब भारतीयों को प्रतिनिध्त्वि देने की बात हुई तो इस क्षेत्रा से चंद्रदेई इस्टेट के हाजी जियाउर्रहमान को तत्कालीन कांग्रेस पार्टी ने नुमाइंदगी सौंपी थी। वहीं मरहूम हाजी जियाउर्रहमान के प्रथम आम चुनाव 1952 में अररिया विधनसभा क्षेत्रा से कांग्रेस के प्रथम विधयक भी निर्वाचित हुए थे। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए उनके ही चचेरे भाई मरहूम जमीलुर्रहमान कांग्रेसी नुमाईंदे के रूप में किशनगंज संसदीय क्षेत्रा से 1957 से 1977 तक प्रतिनिध्त्वि करते रहे। यही नहीं, इस राजनीतिक परिवार का स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद भी दीर्घकाल तक सीमांचल की राजनीति पर किस प्रकार का दबदवा था, यह जानना बेहद जरूरी है। जमील साहब के एक छोटे भाई मोईदुर्रहमान ने भी जोकीहाट, अररिया विधनसभा क्षेत्रा की वर्षों तक नुमाईंदगी की और कांग्रेस शासनकाल में बिहार सरकार में मंत्राी भी रहे। इसी प्रकार पूर्णिया जिले के वर्तमान डगरूआ प्रखंड के महमदिया इस्टेट के पूर्व जमींदार हाजी हसीबुर्रहमान जो समाजवादी विचारधरा से प्रभावित थे, पहले तो समाजवादी पार्टी ;पीएसपीद्ध के टिकट पर चुनाव लड़कर विधनसभा में बायसी और अमौर क्षेत्रा का प्रतिनिध्त्वि किया था तथा 1967 में दिवंगत महामाया प्रसाद सिन्हा के मंत्रिमंडल में विध् िमंत्राी का दायित्व भी संभाला था। किंतु बाद में संविद सरकार की विपफलता एवं समाजवादी पार्टियों में आये विघटन के पश्चात वे कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गये और 1977 के आम चुनाव में जब कांग्रेस को सर्वत्रा पराजय का सामना करना पड़ा था, उस समय वे पूर्णिया जिले के बायसी विधनसभा क्षेत्रा से कांग्रेस के विधयक चुने जाने वाले जिले के इकलौते विधयक थे। उन्होंने कांग्रेस से बगावत कर चुनाव के मैदान में उतरे निर्दलीय सैयद मोईनुद्दीन को शिकस्त दी थी। इस क्रम में महमदिया इस्टेट के एक अन्य पफरीक एवं हाजी हसीबुर्रहमान के चचेरे भाई मरहूम बदीउज्जमा साहब का उल्लेख करना आवश्यक है, जो थे तो एक किसान किंतु उन्होेंने भी राजनीति में स्थान पाने और बनाने की जुगत भिड़ाई, पूर्णिया विधनसभा क्षेत्रा से दो बार चुनाव भी लड़े लेकिन उन्हें सपफलता नहीं मिली। बाद में वे स्वतंत्राता संग्राम के समर्पित सेनानी एवं समाजसेवी दिवंगत पंडित यादव चंद्र झा के संपर्क में आये, जो उस समय गुलाबबाग कृषि उत्पादन बाजार समिति के संस्थापक उपाध्यक्ष थे। पं. झा की प्रेरणा से कृषि एवं कृषकों के उत्थान एवं विकास हेतु राजनीति से परे हट कर उन्होंने काम करना प्रारंभ किया और कृषक निर्वाचन क्षेत्रा से चुनाव जीत कर उत्तर बिहार की सबसे बड़ी मंडी एवं कृषि उत्पादन बाजार समिति के सम्मानित सदस्य होने का गौरव हासिल किया। लेकिन अब ये इतिहास की बातें हो गई हैं।
हम पहले भी लिख चुके हैं कि राजनीति में अल्पसंख्यकों का दबदवा इस क्षेत्रा में कोई नया नहीं है। लेकिन इन दिनों जिस प्रकार जाति-मजहब के नाम पर राजनीति में रस्साकसी देखी जा रही है वह चिंता का विषय अवश्य है। आज जब हम गत लोकसभा चुनाव में किशनगंज संसदीय क्षेत्रा के जदयू प्रत्याशी अख्तरूल इमान की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने काॅमी एकता मजहबी एकता के नाम पर बयान देकर चुनाव का मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए और कांग्रेस प्रत्याशी मौलाना असरारूल हक की जीत का रास्ता प्रशस्त किया तो यह कोई नई बात नहीं थी या खुलेेआम मजहबी एकता का नारा देने वाले वे इस क्षेत्रा के इकलौते नेता नहीं हैं। 1957 में जब कांग्रेस का संपूर्ण देश में वर्चस्व था, उस समय पूर्णिया जिले के ही आमौर विधनसभा क्षेत्रा से स्वतंत्रा प्रत्याशी के रूप में खड़े मरहूम मो. इस्माइल ने इसी प्रकार का नारा दिया था, बल्कि इससे भी बढ़कर उन्होंने अपने कौम को यह संदेश दिया कि अमौर में कांग्रेस की जीत का मतलब ‘मजहब’ पर खतरा! उक्त चुनाव में अमौर क्षेत्रा के विष्णुपुर गांव के निवासी प्रसि( विध्विेत्ता पं. कपिलेश्वर मिश्र को बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्राी स्व. श्रीकृष्ण सिंह की सिपफारिश पर कांग्रेस पार्टी ने टिकट दिया था। मुख्यमंत्राी की रुचि ने उस चुनाव को हाई प्रोपफाइल तो बना ही दिया था। इसके बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी स्व. पंडित कपिलेश्वर मिश्र लगभग ढाई सौ मतों से चुनाव हार गये। मजहबी एकता के नारे के आगे सब बौने साबित हुए थे। प्रसि( समाजसेवी एवं जीवन पर्यन्त कांग्रेस के प्रति समर्पित, जो अब अतिवृ( हो चुके हैं, रूद्रानंद मिश्र उपर्फ उपेन्द्र मिश्र उस चुनाव को याद करते हुए कहते हैं-‘सांप्रदायिकता को तो शुरू से बढ़ावा देने का काम नेताओं ने ही किया है अन्यथा मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों का जन्म ही नहीं होता। 1957 का वह आम चुनाव आज भी हमें बींध् रहा है। लोकतंत्रा की हत्या तो उसी समय से प्रारंभ हो चुकी थी।’ कपिलेश्वर मिश्र भले ही चुनाव में पराजित हो गये थे, लेकिन इसका सदमा इस क्षेत्रा के तमाम हिन्दू-मुसलमानों को लगा था। यही कारण था कि मो. इस्माइल दुबारा कभी इस क्षेत्रा से चुनाव नहीं जीत सके। उन्हें न तो पिफर मुसलमानों का साथ मिला न हिन्दूओं ने कभी उनपर विश्वास किया।’ हां, कपिलेश्वर मिश्र जी ने भी अपने उस गृह क्षेत्रा की राजनीति को तिलांजलि देते हुए अपने वकालत के पेशे की ओर ध्यान दिया और लगातार अठारह वर्षों तक पूर्णिया सिविल कोर्ट में पब्लिक प्रोसीक्यूटर की हैसियत से सेवा देने वाले पूर्णिया के ही नहीं, बल्कि तत्कालीन बिहार ;झारखंड समेतद्ध के इकलौते विध्ज्ञि बने। पीपी के पद से अवकाश प्राप्त करने के बाद उन्होंने न्यायालय कार्य को भी अलविदा कह दिया था।
राजनीति का वर्तमान परिप्रेक्ष्य भी कम रोचक नहीं है। गत लोकसभा चुनाव में सीमांचल के चार लोकसभा क्षेत्रों में से तीन पर अल्पसंख्यक समुदाय के ही प्रतिनिध् ि;सांसदद्ध का चुना जाना इस बात को प्रमाणित करता है कि सीमांचल की राजनीति पर आज भी अल्पसंख्यकों की पकड़ उतनी ही मजबूत है, जिस प्रकार कांग्रेस या मिलीजुली सरकार के जमाने में हुआ करती थी। अररिया से मो. तस्लीमुद्दीन ;राजदद्ध, किशनगंज से मौलाना असरारूल हक ;कांग्रेसद्ध एवं कटिहार से शाह तारिक अनवर ;राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टीद्ध की जीत ने भविष्य में होने वाले विधनसभा चुनाव के राजनीतिक दांव-पेंच के संकेत तो दे ही दिये हैं। यह संकेत केवल भाजपा के लिए ही नहीं है, बल्कि सत्ता में बैठे सेक्यूलरिज्म की राजनीति करने वाले उन तमाम दलों के लिए भी खतरे की घंटी है, जो अपने-अपने दलों से अपने लोगों को अपनी राजनीतिक वर्चस्व के लिए स्थापित करना चाहते थे या, अभी भी चाहत रखते हैं। सम्प्रति किशनगंज जिले में चारो विधनसभा क्षेत्रा पर अल्पसंख्यक समुदाय के ही विधयक हैं। अररिया जिले में जदयू के टिकट पर पिछले चुनाव में जोकीहाट से राजद सांसद तस्लीमुद्दीन के सुपुत्रा सरपफराज आलम चुनाव जीते तो उनके चिर प्रतिद्वंद्वी रहे मंजर आलम को नीतीश कुमार ने मुआवजे में विधन परिषद का सदस्य बना दिया था। अररिया से लोजपा टिकट पर चुनाव जीतकर विधनसभा में दाखिल होने वाले बाहुबली नेता जाकिर अनवर लोजपा के एनडीए में शामिल होने से क्रू( होकर जदयू में शामिल हो गये। जबकि पफारबिसगंज, सिकटी, नरपतगंज तथा रानीगंज ;सु.द्ध पर संप्रति भाजपा का कब्जा है।
कटिहार जिले में संप्रति एक भी अल्पसंख्यक विधयक नहीं हैं। बलरामपुर से दुलालचंद गोस्वामी निर्दलीय विधयक के रूप में निर्वाचित होकर जदयू की वर्तमान राज्य सरकार में श्रम संसाध्न मंत्राी हैं। मनिहारी ;सु.द्ध से पूर्व नौकरशाह मनोहर प्रसाद सिंह विधयक हैं। कदवा विधनसभा क्षेत्रा से भाजपा के भोला राय, बरारी विधनसभा क्षेत्रा से विभाष चंद्र चैध्री, कोढ़ा ;सु.द्ध से महेश पासवान तो कटिहार से भाजपा के तारकेश्वर प्रसाद विधयक हैं। तारिक अनवर की जीत से उत्साहित उनके तमाम समर्थक इसबार इन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। खासकर मरहूम तत्कालीन विधयक मुबारक हुसैन ;मनिहारीद्ध के सुपुत्रा हामिद मुबारक जोर-शोर से चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं। वे कटिहार या बरारी से चुनाव लड़ सकते हैं क्योंकि इन दोनों ही क्षेत्रों में उनकी जाति के मतदाताओं की संख्या सर्वाध्कि है। हामिद मुबारक मुस्लिमों में भटिया समुदाय से आते हैं। यदि हामिद कटिहार विधनसभा क्षेत्रा से चुनाव लड़ने की ठानते हैं, तो वैसी परिस्थिति में जदयू टिकट पर संसदीय चुनाव हारने वाले प्रोपफेसर राम प्रकाश महतो क्या करेंगे? कदवा विधनसभा क्षेत्रा में भी कई तारिक समर्थक नेता ताल ठोंक रहे हैं। बलरामपुर में श्रम मंत्राी श्री गोस्वामी को अपने चिर प्रतिद्वंद्वी माकपा ;मालेद्ध के महबूब आलम से पुनः संघर्ष करना पड़ सकता है। हां, सुरक्षित क्षेत्रों में अल्पसंख्यक प्रत्याशी खड़े नहीं हो सकते। किंतु वहां भी किसी अपने चहेते को वोट तो दिलवा सकते ही हैं। कोढ़ा क्षेत्रा के भाजपा विधयक के विरू( अभी से अल्पसंख्यक समुदाय के नेता मोर्चाबंदी में लगे हैं।
जहां तक पूर्णिया जिले में अल्पसंख्यकों की राजनीति का सवाल है, वह तो बहुत स्पष्ट है। जिले पूर्वी क्षेत्रा अमौर में इस वक्त भाजपा के सबा जपफर काबिज हैं तो बायसी विधनसभा क्षेत्रा से लोकसभा के साथ हुए उपचुनाव में राजद के हाजी अब्दुस सुबहान पिफर एकबार चुनाव जीत गये थे। उन्हें 2010 के विधनसभा चुनाव में भाजपा के संतोष कुशवाहा ने हराया था। संतोष कुशवाहा के भाजपा छोड़कर जदयू टिकट पर पूर्णिया संसदीय क्षेत्रा से चुनाव लड़ने और जीतने की वजह से उपचुनाव हुआ और पुनः इस क्षेत्रा पर हाजी सुबहान काबिज हो गये। अमौर और बायसी किशनगंज संसदीय क्षेत्रा का हिस्सा है और एक अन्य दृष्टि से आप कह सकते हैं कि किशनगंज संसदीय क्षेत्रा के कुल छः विधनसभा क्षेत्रा पर इस वक्त अल्पसंख्यक समुदाय के विधयकों का ही कब्जा है।
पूर्णिया जिले के कसवा विधनसभा क्षेत्रा पर वर्षों बाद 2010 में अल्पसंख्यक समुदाय का एक युवक आपफाक आलम कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर विधनसभा में दाखिल हुआ। इसके पूर्व भी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में अस्सी और नब्बे के दशक में मोहम्मद यासीन और सैयद गुलाम हुसैन कसबा विधनसभा क्षेत्रा से एकाध्कि बार चुनाव जीतने में सपफल रहे थे। यूं तो एकबार विधनसभा के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय राम नारायण मंडल, स्व. जय नारायण मेहता जैसे दिग्गजों को इसी क्षेत्रा से प्रतिनिध्त्वि करने का मौका हासिल हुआ, लेकिन तब की राजनीति की दशा और दिशा दूसरे प्रकार की हुआ करती थी। आपफाक आलम कांग्रेस के पूर्व पप्पू यादव जिस पार्टी में रहे, उस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते रहे थे। अर्थात कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ने और लड़ाने की कमान मध्ेपुरा के वर्तमान सांसद पप्पू यादव या उनके नुमाईंदे ही संभालते रहे। आपफाक आलम ने बहुत मामूली अंतर से भाजपा के तत्कालीन विधयक प्रदीप दास को हराया था। आनेवाले विधनसभा चुनाव में क्या पिफजां बनती है, यह तो वक्त बतायेगा, लेकिन ‘महागठबंध्न’ का असर तो यहां कांग्रेस प्रत्याशी के लिए वरदान ही साबित होगा। हालांकि, पहले भी ‘महागठबंध्नी तत्वों’ के कारण ही आपफाक आलम चुनाव जीतने में कामयाब हो सके थे।
यूं तो अल्पसंख्यक समुदाय को प्रत्याशी बनाने की जहां तक बातें हैं, उसमें कांग्रेस ने ही पिछले विधनसभा चुनाव में अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। डा. मोहम्मद इर्शाद खान ध्मदाहा विधनसभा क्षेत्रा से कांग्रेस प्रत्याशी बनाये गये थे तो रूपौली से एक अन्य अल्पसंख्यक उम्मीदवार मो. आशिपफ चुनाव लड़े। लेकिन उक्त चुनाव में तत्कालीन एनडीए प्रत्याशी होने के कारण ध्मदाहा में जदयू की लेसी सिंह एवं रूपौली विधनसभा क्षेत्रा में जदयू की ही बीमा भारती ने पफतह पायी थी। आगत विधनसभा चुनाव में महागठबंध्न के कारण इन दोनों ही विधयकों को न तो राजद से खतरा है और न ही कांग्रेस से। लेकिन इसका कतई यह अर्थ न ही निकाला जाना चाहिए कि इन क्षेत्रों से कोई अल्पसंख्यक उम्मीदवार चुनाव लड़ने आयेगा ही नहीं। अभी हाल में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय राज्यमंत्राी उपेन्द्र कुशवाहा पूर्णिया प्रमंडल के दौरे पर आये थे। सरकारी कार्यक्रम प्रधनमंत्राी जन-ध्न योजना की शुरूआत यहां उन्होंने ही की, यह प्रधनमंत्राी नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है। किंतु इसके साथ ही उन्होंने पूर्णिया प्रमंडल में एनडीए के साथ-साथ अपनी पार्टी के संगठनात्मक पहलू के साथ आसन्न विधनसभा चुनाव में संभावनाओं की तलाश भी की। उनकी खास नजर रूपौली, ध्मदाहा, बायसी के साथ-साथ किशनगंज जिले के चार विधनसभा क्षेत्रों पर है। निःसंदेह अगले वर्ष होने वाले विधनसभा चुनाव में एनडीए का संयुक्त प्रत्याशी होगा जो यहां महागठबंध्न को शिकस्त देने हेतु दमदार मुकाबला करेगा। वैसी स्थिति में कई विधनसभा क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय के सक्षम प्रत्याशी को उतारने की कवायद होगी। प्रतीत होता है कि उपेन्द्र कुशवाहा के पूर्णिया प्रमंडल ;सीमांचलद्ध में दो दिनों का प्रवास और यात्रा विधनसभा चुनाव में नया रंग भर सकता है। भगवा के साथ हरी और नीली पट्टी भी चढ़ जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।
एक बात तो बहुत सापफ है, सीमांचल में अल्पसंख्यकों का निरादर कर या उसे हाशिये पर डालकर कोई भी पार्टी यहां सियासत नहीं कर सकती। जब भाजपा को सैयद शाहनवाज हुसैन या सबा जपफर को साथ लेने और सियासत की मुख्यधरा ;पार्टी स्तर परद्ध में लाने की जरूरत पड़ सकती है तो अन्य राजनीतिक दलों की बात दूसरी कैसे हो सकती है! बताया तो यह जा रहा है कि सीमांचल में गत लोकसभा चुनाव में शिकस्त मिलने के बाद भाजपा के पुराने रणनीतिकार एकजूट होकर यहां गुप्त तरीके से आकलन में जुटे हैं कि किस क्षेत्रा में एनडीए के घटक दलों को स्थान देकर तथा भाजपा को संगठनात्मक दृष्टि से सक्षम बनाकर विधनसभा चुनाव में उतरा जाय ताकि भ्रम और भूल की गुंजाईश न रहे। लेकिन पेंच तब पफंस जाता है, जब सुशील मोदी को मुख्यमंत्राी के रूप में प्रोजेक्ट करने की बातें सामने आती है। सीमांचल में भी सुशील मोदी के पक्ष-विपक्ष में विगत एक हफ्रते से जोरदार हवा बह रही है। जैसा कि कहा जाता है, केंद्रीय कृषि मंत्राी राधमोहन सिंह के बयान से आहत सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ता ही नहीं एनडीए के घटक दल लोजपा एवं लोक समता पार्टी के नेता व कार्यकर्ता भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चेतावनी भरे पत्रा के साथ ट्वीटर पर भी नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं। इनमें अल्पसंख्यक समुदाय के भी नेता और कार्यकर्ता शामिल हैं, जो एनडीए के समर्थक हैं। दूसरी ओर जनता दल युनाइटेड में भी अंदर ही अंदर महागठबंध्न को लेकर बगावत की आंध्ी चल रही है। अररिया, पूर्णिया जिले के बायसी में तो इसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, जहां जाकिर अनवर के जदयू में शामिल होने एवं पूर्णिया के बायसी में पुनः सैयद घराने के लोग महागठबंध्न के खिलापफ अंदर ही अंदर नई रणनीति अपनाने में अभी से जुट गये हैं। इस खिलापफत का परिणाम क्या होगा यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन पूरब में राजनीतिक क्षितिज पर छायी काली घटा को नजरअंदाज करने की जोखिम जो भी राजनीतिक पार्टी या गठबंध्न उठायेगें उसे नुकसान तो उठाना ही पड़ेगा यह तय है।
इसीलिये सामाजिक सरोकारो ंसे दीर्घकाल से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक गंगा प्रसाद चैध्री, हीरा प्रसाद सिंह सरीखे लोगों ने भी ‘लोक प्रसंग’ से स्पष्ट कहा कि सीमांचल में अल्पसंख्यकों को छोड़कर न तो राजनीति की जा सकती है और न सामाजिक हितों की रक्षा ही हो सकती है। लेकिन यह राजनीति तुष्टीकरण की नीति से उफपर उठकर की जानी चाहिये न कि आत्म सम्मान को गिरवी रख कर। जैसा कि बिहार के दिग्गज राजनेता लोकसभा चुनाव के दरम्यान किया था। इसी का नतीजा था कि वे न घर के रहे न….!त्र


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