October 21, 2017

सुशासन उन्नीस, अपराधी बीस, दबंग दागियों से घिरे नीतीश

By wmadmin123 - Thu Feb 27, 8:22 am

Nitish-Kumar-Pardaphash-89001सुशासन उन्नीस, अपराधी बीस, दबंग दागियों से घिरे नीतीश

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर यह आरोप लगता रहा है कि वे जदयू में बाहुबलियों, दागियों और हिस्ट्रीशीटराें की पफौज खड़ी करने में लगे हैं। गुड गवर्नेंस की बात करने वाले ‘सुशासन बाबू के जदयू में पिछले माह भी कुछ और हिस्ट्रीशीटर, दागियों और बाहुबलियों को पार्टी का सिपाही बनाया गया है। ऐसे लोगों में हिस्ट्रीशीटर चुन्नू ठाकुर (अब निष्कासित) शाह आलम शब्बू और राजद के पूर्व बाहुबली विधयक राजेश कुमार उर्फ बबलू देव का नाम शामिल है। जदयू के इस कदम के बाद सूबे के सियासी गलियारों में जैसे तूफान आ गया है। गौरतलब है कि आज की तिथि में सूबे के अधिकांश नामचीन दबंग बाहुबली और दागी नीतीश के साथ हैं। हर सियासी दलों में इन दिनों इसी विषय को लेकर चर्चा तेज है कि आखिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ऐसे दागियों, हिस्ट्रीशीटरों और बाहुबलियों पर लगातार आश्रित क्यों होते जा रहे हैं? खासकर जब-जब चुनाव आता है तो ऐसे लोगों को वे गले लगाने लगते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव 2010 के पूर्व भी इन्होंने ऐसा ही कदम उठाया था। आनंद मोहन को पटाने के लिए नीतीश उनके घर पंचगछिया (सहरसा) गये थे और उनकी मां से आशीर्वाद ले आए। उस समय भी आनंद मोहन जेल में ही बंद थे। यह अलग बात है कि आनंद मोहन ने नीतीश को कोर्इ तवज्जो नहीं दिया। इतना ही नहीं, जिस तस्लीमुíीन को नीतीश और उनकी पूरी पलटन अपराध्ी कहकर उनकी निंदा करते नहीं थकते थे, उस तस्लीमुíीन को भी चुनाव से पूर्व गले लगा आए और सार्वजनिक मंच से उन्होंने उनकी जमकर प्रशंसा की। हालांकि बीते वर्ष तस्लीमुíीन फिर राजद में लौट आए हैं। इस बार भी नीतीश चुनाव से पूर्व कुछ इसी तरह के कदम उठाने लगे हैं। लिहाजा, सियासी गलियारों में इन दिनों ‘राजनीति का अपराधीकरण तथा ‘अपराध्ी का राजनीतिकरण जैसे मुíों पर नये सिरे से बहस तेज हो गर्इ है। पूर्व में जदयू के प्रवक्ता रह चुके एवं वर्तमान में कांग्रेस नेता शंभूनाथ सिन्हा कहते हैं-’नीतीश ने अपराधियों के लिए जदयू का दरवाजा खोल दिया है। कोर्इ नेता ऐसा कदम उसी सिथति में उठाता है जब उनका भरोसा आम जनता से टूटने लगता है। इध्र प्रदेश में अपराध् का ग्राफ भी काफी तेजी से उपर उठा है। शायद ही ऐसा कोर्इ दिन गुजरता होगा जिस दिन हत्या, अपहरण और दूसरे तरह के अपराधों की घटना अखबारों की सुर्खी नहीं बनती हो। हाल ही में पटनावासी जब 2013 की विदार्इ की तैयारी कर रहे थे अपराधियों ने बाहुबली एवं जदयू विधायक अनंत सिंह के नजदीकी राजीव सिंह को (29 दिसंबर 2013) गोलियों से छलनी कर राजधनी को दहला कर रख दिया। इस नृशंस घटना के बाद पटना में  गैंगवार की आशंका प्रबल हो गर्इ है। विधानसभा में विपक्ष के नेता नंदकिशोर यादव कहते हैं-’अब सरकार की सिथति को देखकर दुख होता है। जब हमलोग साथ थे तो यहां कानून का राज था पर अब यह जंगलराज की ओर चल पड़ा है। सरकार में पहले अच्छे लोग आते थे। अब बबलू देव, चुन्नू ठाकुर और शाह आलम शब्बू जैसे लोग आ रहे हैं। जबकि ऐसे ही लोगों के खिलाफ जनता ने हमें जनादेश दिया था। नीतीश पूरी तरह दागियों से घिरे हुए हैं। उन्हें अब अपराधियों पर ज्यादा भरोसा है, नहीं तो कोर्इ वजह नहीं दिखता कि ऐसे लोगों को पार्टी में शामिल कराया जाए। हालांकि पार्टी के भीतर और बाहर के दबावों के बाद चुन्नू ठाकुर को पार्टी से बाहर कर दिया गया लेकिन शाह आलम शब्बू और बबलू देव आज भी मुख्यमंत्राी के हाथों को मजबूत करने में लगे हुए हैं। दरअसल, नीतीश का बाहुबली प्रेम किसी से छुपा हुआ नहीं है। आज की तिथि में बिहार के अधिकांश नामचीन बाहुबली नीतीश के साथ हैं। शायद नीतीश के दागी एवं बाहुबली प्रेम का ही परिणाम है कि उनके वर्तमान 118 विधयकों में से 58 विधयक दागी और बाहुबली हैं। 2010 के चुनावी हलफनामें के मुताबिक 43 विधायकों पर गंभीर मामले हैं। 23 विधायकों पर हत्या तथा 35 विधयकों पर हत्या की कोशिश के मामले हैं। यहां तक कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद जिन चार निर्दलीय विधायकों ने नीतीश का समर्थन किया है उनमें से भी दो विधायक दागी हैं। ये दोनों विधायक हैं-लोरिया (पशिचम चंपारण) के निर्दलीय विधयक विनय तिवारी जिनपर एक मुकदमा है और ढ़ाका के विधयक पवन कुमार जायसवाल। पवन जायसवाल  पर तीन मामले दर्ज हैं।
उधर नीतीश सरकार के खाध एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्याम रजक के खिलाफ पटना व्यवहार न्यायालय के एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ‘एटैंप्ट टू मर्डर सहित अन्य मामले में बीते 16 दिसंबर 2013 को आरोप गठित कर दिया है। मंत्री श्याम रजक पर आरोप है कि उन्होंने 3 अक्टूबर 1987 को गांधी मैदान के पास हरबे-हथियार के साथ पुलिसकर्मियों पर घातक हमला किया था। उनपर भारतीय दंड संहिता की धरा 307, 147, 353, 223 तथा 347 के तहत आरोप गठित किया गया है। इस घटना के बाद सूबे की राजनीति एक बार पिफर से गरमा गर्इ है। दरअसल, कोर्ट द्वारा आरोप गठित किए जाने के बाद अमन चैन पसंद लोगों को यह उम्मीद थी कि नीतीश श्याम रजक को मंत्रिमंडल से चलता कर देंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दागी श्याम रजक आज भी नीतीश सरकार में ‘सुशासन स्थापित करने में जुटे हैं। उध्र पुलिस की बेचारगी देखिए, उसपर हमला करने वाले इस आरोपी के आगे इसे आज भी सलाम बजाना पड़ता है। इसके पूर्व 6 दिसंबर 2013 को श्याम रजक के द्वारा पटना दूरदर्शन की एक महिला अधिकारी रत्ना पुरकायस्थ (सहायक निदेशिका) को फोन पर धमकाने और अपशब्द कहने के मामले में भी बवाल खड़ा हुआ था। इस मामले की भी प्राथमिकी (8413, धारा 504 और 506, भादवि) दर्ज है। लोग अब नीतीश से सवाल कर रहे हैं कि ऐसे दागी को मंत्रिमंडल में रखकर ‘गुड गवर्नेंस की बात करना कितना उचित है? लेकिन नीतीश ऐसे प्रश्नों के जवाब देते नहीं, वे सिर्फ अपने लाभ और हानि के हिसाब से ऐसे निर्णय लेते हैं। बिहार प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता विनोद नारायण झा कहते हैं-’यह नीतीश के कानून के प्रति दोहरे मापदंड का परिचायक है। एक ओर जब कहीं कानून व्यवस्था पर चोट होती है तो वे कानून राज की बात करते हैं और दूसरी ओर श्याम रजक जैसे नेता पर 307 जैसे संगीन धरा के तहत कोर्ट द्वारा आरोप गठित किए जाने के बाद उन्हें आज भी मंत्रिमंडल में शामिल किए हुए हैं। दरअसल, नीतीश कुमार आजकल सुविधा की राजनीति करने लगे हैं।
इध्र सूरत (गुजरात) के एक व्यवसायी हनीफ हिंगोरा ने अपने बेटे सोहेल के अपहरण में नीतीश के एक मंत्री की संलिप्तता की बात उछालकर न केवल सनसनी फैला दी है बलिक नीतीश की सुशासन सरकार और उनके गुड गवर्नेंस के दावे की पोल भी खुलती नजर आ रही है। गौरतलब है कि बीते 29 अक्टूबर 2013 को गुजरात के एक मुसिलम व्यवसायी हनीफ हिंगोरा के बेटे सोहेल हिंगोरा को केंद्र शासित प्रदेश दमन से अगवा कर बिहार के छपरा सिथत नया गांव थाना क्षेत्र के चतुरपुर गांव लाया गया था और 28 नवंबर 2013 को करोड़ों रुपए फिरौती लेकर उसे छोड़ दिया गया। अपहरण के इस पूरे एपीसोड में सफेदपोश के अलावा खाकी की भी संलिप्तता की बात बतायी जा रही है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर कौन हैं वे लोग जिन्होंने ऐसे आपराधिक कुकृत्य को अंजाम दिया था? हालांकि, जदयू मंत्री के नाम आने के बाद नीतीश ने मामले की जांच के आदेश दिये हैं। इस प्रकरण को लेकर अब भाजपार्इ यह सवाल खड़े कर रहे हैं कि खुद को मुसिलम का मसीहा बताने वाले नीतीश के मंत्री और उनकी पुलिस अकलियत को लूटने में लगे हुए हैं। भाजपा इन तमाम बातों को आगामी चुनाव में जोर-शोर से उठाने जा रही है।
उध्र केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दिसंबर के दूसरे सप्ताह में नीतीश सरकार को एक कड़ा पत्र लिखकर इनके सुशासन पर सवाल खड़ा कर दिया है। श्री शिंदे के पत्र से सूबे की राजनीति गरमा गर्इ है। पत्रा में कहा गया है कि सूबे की सरकार माओवादियों-नक्सलियों पर नकेल कसने में पूरी तरह विफल रही है। उसमें इल्जाम लगाया गया है कि कानून व्यवस्था की ध्ज्जी उड़ाने वाले नक्सलियों-माओवादियों के प्रति नीतीश नरम हैं। पत्रा के अनुसार राज्य पुलिस और केंद्रीय बलों के बीच तालमेल नहीं है। इसी का दुष्परिणाम है कि माओवादियों ने सिर्फ 2013 में न केवल 27 पुलिसकर्मियों को मौत की नींद सुला दी बलिक 38 अत्याध्ुनिक हथियार और बड़ी मात्रा में गोली-बारूद भी लूट लिया। ऐसा आंकड़ा देश के किसी दूसरे सूबे का नहीं है। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने यह पत्र बीते नवंबर में साहेबगंज-दानापुर इंटरसिटी एक्सप्रेस पर हुए हमले और औरंगाबाद में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट के बाद लिखा है। श्री शिंदे कहते हैं-’माओवादियों-नक्सलियों को यहां फलने-फूलने का भरपूर मौका सूबे की सरकार ने दिया है। शिंदे की इस चिटठी के बाद जदयू में जैसे खलबली मच गर्इ। नीतीश सहित पार्टी के बयानवीरों ने शिंदे पर ताबड़तोड़ प्रहार शुरू कर दिया। विधानमंडल में विरोधी दल के नेता सुशील मोदी कहते हैं-’केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने नक्सलवाद के मुíे पर नीतीश सरकार को आर्इना दिखाया तो मुख्यमंत्री सहित उनके लोग तिलमिला गए। दरअसल, आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री नक्सलियों के जरिए चुनावी लाभ लेने की जुगत में है। इससे पहले राजद ने अपने पन्द्रह वर्षों के शासनकाल में नक्सलियों के प्रति नरम रवैया चुनावी लाभ लेने के लिए ही अपनाए रखा था। राजद को चुनावी लाभ मिलता भी रहा। इसीलिए उस दौरान न तो निजी सेनाओं के प्रति कोर्इ सख्त कदम उठाया गया और न ही नक्सलियों की नकेल कसने की कोर्इ कोशिश की गर्इ। पिछले एक माह के अंदर दर्जन से ज्यादा जगहों पर जैसे जमुर्इ, गया, अरवल, जहानाबाद, औरंगाबाद और पटना जिले के कर्इ स्थानों सहित झारखंड के लातेहार में पोस्टर लगाकर नक्सलियों ने भाजपा के अनेक प्रमुख नेताओं की हत्या करने की धमकी दी है। नक्सलियाें द्वारा चिपकाए गए इन पोस्टरों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उनके किसी मंत्रिमंडलीय सहयोगी का नाम नहीं है। यह इंगित करता है कि नीतीश के नरम रवैये से नक्सली भी उनके प्रति नरम हैं।
इधर पटना में नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम के दौरान हुए बम ब्लास्ट में मोनू उर्फ तहसीन अख्तर का नाम जब सामने आया तो लोग अवाक होकर रह गए। दरअसल, मोनू उर्फ तहसीन अख्तर जदयू नेता तकी अनवर का भतीजा है। तकी अनवर समस्तीपुर जिला जदयू के महासचिव हैं। खासकर भाजपा ने जब इस मुíे पर नीतीश को घेरने की कोशिश की तो जदयू नेता एवं जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने 30 अक्टूबर 2013 को तकी अनवर के साथ एक संवाददाता सम्मेलन कर उन्हें क्लीन चिट देते हुए कहा कि ‘यह सब पार्टी और मुख्यमंत्री जी को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। उनके अनुसार मोनू उर्फ तहसीन अख्तर का उसके घरवालों से कोर्इ संपर्क नहीं है। जदयू नेता के क्लीनचिट देने के बाद सवाल उठता है कि चूंकि यह विषय जांच का है कि मोनू क्या सचमुच दो वर्षों से घरवालों के संपर्क में नहीं है? लेकिन जदयू ने बिना किसी जांच के ही उन्हें क्लीन चिट दे दिया।
सवाल अपनी जगह अभी भी कायम है कि क्या बिहार सचमुच जंगलराज की ओर लौट रहा है? क्या नीतीश सचमुच नक्सलियों के प्रति नरम हैं? क्या नीतीश  दागियों, बाहुबलियों और हिस्ट्रीशीटरों को सहलाते हैं तथा चुनावी लाभ लेने के लिए उसकी फौज खड़ी करने में लगे हैं?
गौरतलब है कि केसरिया के पूर्व विधायक एवं लालू-राबड़ी के तथाकथित जंगलराज के सितारे बबलू देव को बीते 22 नवंबर 2013 को ससम्मान जदयू में शामिल कराया गया है। बबलू देव पर बिहार के कर्इ जिलों में हत्या, अपहरण, रंगदारी सहित अपराध के कर्इ मामले दर्ज हैं। हालांकि बबलू देव हत्या के मामले में खुद को बरी होने का दावा करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी में शामिल होने के अवसर पर प्रदेश जदयू कार्यालय में आयोजित प्रेस कां्रफेंस में जब पत्रकारों ने बबलू देव के आपराधिक रिकार्ड के बारे में पूछा तो उनके समर्थक भड़क गए। खुद बबलू देव ने बीच-बचाव किया और तब जाकर मामला शांत हुआ। बबलू के लिए अब नारा दिया गया है-’बबलू नहीं आंधी है, चंपारण का गांधी है। यह नारा उस प्रेस कांं्रेंफस के दौरान भी खूब लगाया गया जहां बबलू के स्वागत में नीतीश सरकार के मंत्री विजय कुमार चौधरी, श्याम रजक एवं जदयू प्रदेश अèयक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे नेता मौजूद थे। अब लोग नीतीश कुमार से पूछने लगे हैं कि क्या सचमुच उनकी पार्टी बबलू देव में महात्मा गांधी की छवि देखती है? नाम न छापने की शर्त पर जदयू के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं-’जब-जब यह नारा लगाया जाता है महात्मा गांधी की आत्मा तड़प कर रह जाती होगी।
उधर शाह आलम शब्बू पर मुजफ्फरपुर सिथत बीएमपी शस्त्रागार से हथियार चोरी करने का आरोप लगा था। वर्ष 2006 की बात है, उस समय मुजफरपुर के एसपी रत्न संजय हुआ करते थे। इसी प्रकरण में सुशासन की यही पुलिस शाह आलम शब्बू के घर कुर्की करने गर्इ थी, लेकिन पुलिस को कुर्की करने नहीं दिया गया। उसे शाह आलम के लोगों ने खदेड़ दिया था। शब्बू का घर वैशाली-मुजफ्फरपुर जिला के बार्डर पर सिथत मुजफ्फरपुर के सकरा थाना के तहत गंजगौरीहार गांव में है। शाह आलम शब्बू पर पंकज ठाकुर हत्याकांड में भी उंगलियां उठी थी। 2005 के जिला परिषद चुनाव में शब्बू उपाèयक्ष की कुर्सी पर काबिज हुए थे। अब फिलहाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों को मजबूत करने में लगे हुए हैं। शब्बू पहले लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के विश्वस्त हुआ करते थे। उसने 2010 के विधानसभा चुनाव में लोजपा के ही टिकट पर मुजफ्फरपुर के कुढ़नी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़ा था, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। जहां तक चुन्नू ठाकुर की बात है, उसकी कर्इ स्याह कथाएं सुनकर आज भी लोग सहम जाते हैं। दरअसल, चुन्नू ठाकुर की पहचान छोटन शुक्ला गैंग के सदस्य के रूप में की जाती रही है। उनपर अपहरण, हत्या, रंगदारी आदि के करीब डेढ़ दर्जन मामले दर्ज हैं। चुन्नू ठाकुर की राष्ट्रव्यापी चर्चा 2005 में पटना के एक स्कूली छात्र किसलय के अपहरण कांड के बाद हुर्इ थी। उस समय पूर्व प्रधनमंत्री अटल बिहार वाजपेयी की पटना में एक रैली हुर्इ थी जिसमें उन्होंने अपहृत किसलय को लेकर भाव विहवल होते हुए कहा था-’मेरा किसलय कहां है? हालांकि अपहरण कांड के समय चुन्नू हाजीपुर जेल में बंद था। पुलिस उसकी पत्नी को पूछताछ के लिए तब हिरासत में भी लिया था। हैरत की बात है कि ऐसे स्याह आरोपों के आरोपी शाह आलम शब्बू और चुन्नू ठाकुर को आठ वर्षों के बाद जदयू का तीर थमाया गया। शब्बू और चुन्नू मुफ्फरपुर से आते हैं। उध्र, मुजफ्फरपुर की जदयू इकार्इ में कथित आपराधिक पृष्ठभूमि और विवादास्पद छवि वाले नेताओं को शामिल किए जाने को लेकर दल के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के तेवर सख्त हो गए हैं। (देखें मुजफ्पुरपुर से आर्इ ब्रह्राानंद ठाकुर की रिपोर्ट) जब चुन्नू और शब्बू को जदयू में शामिल किए जाने की बात हो रही थी उस दौरान भी इन लोगों ने जदयू की मुजफ्फरपुर शाखा में बैठक कर कहा था कि जंगलराज के जिम्मेदार लोगों को अगर पार्टी में शामिल किया गया तो इसका खामियाजा आखिरकार पार्टी को ही भुगतना होगा। बावजूद इसके शब्बू और चुन्नू ठाकुर को जदयू की सदस्यता दिलाने से नहीं रोका जा सका। हालांकि विरोधी दल और मीडिया के जबरदस्त दबाव के बाद आखिरकार 16 दिसंबर 2013 को चुन्नू ठाकुर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन शब्बू जैसे लोग आज भी पार्टी में बने हुए हैं। हालांकि चुन्नू ठाकुर प्रकरण पर स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सफार्इ भी दी-’मुझे इसकी जानकारी ;चुन्नू ठाकुर के आचरण एवं जदयू में शामिल होने की बात नहीं थी। मीडिया के ही लोगों से इसकी जानकारी मिली। मैं ऐसे लोगों की इंट्री के लिए बिल्कुल सहमत नहीं हूं। भूलवश हो गया था। सुधर कर लिया गया। पार्टी में किसी को शामिल करने के बारे में स्पष्ट गाइडलाइन है। उसका पालन सुनिशिचत होना चाहिए। उधर पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी नीतीश के उस बयान को खारिज करते हुए कहते हैं-’कुख्यात चुन्नू ठाकुर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जानकारी में जदयू की सदस्यता दिलार्इ गर्इ थी। सच तो यह है कि उनकी सहमति के बिना पार्टी में एक पत्ता तक नहीं हिलता। ऐसे में यह कहना कि चुन्नू ठाकुर के जदयू में शामिल होने की सूचना उन्हें नहीं थी, यह जनता को भ्रमित करने की कोशिश है। चुन्नू ठाकुर को पार्टी से निकालने की कार्रवार्इ को भूल-सुधार बताने वाले मुख्यमंत्री को शाह आलम शब्बू और बबलू देव जैसे आपराधिक छवि वाले लोगों के बारे में भी अपनी राय देनी चाहिए। शाह आलम शब्बू और बबलू देव पर भी हत्या, लूट, डकैती, अपहरण और फिरौती वसूली जैसे कर्इ संगीन आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं। नीतीश ने ऐसी आपराधिक छवि वाले को पनाह देकर एक तरह से अपराधियों को खुली छूट देने के संकेत दिए हैं। सूत्र बताते हैं कि जिस तरह चुन्नू ठाकुर को एक झटके में पार्टी से बाहर कर दिया गया उस तरह शाह आलम शब्बू को नीतीश बाहर नहीं कर सकते। कारण शब्बू अल्पसंख्यक कौम से आते हैं और वे ऐसा कोर्इ कदम नहीं उठाएंगे जिसमें अल्पसंख्यक की नाराजगी का खतरा हो। उधर सहरसा से खबर आर्इ है कि सोनवर्षा के जदयू विधायक एवं विधनसभा में जदयू के मुख्य सचेतक रत्नेश सादा भी अपनी छवि बाहुबली के रूप में गढ़ने लगे हैं। (देखें सहरसा से संजय सोनी की आर्इ रिपोर्ट-विधयक बना बाहुबली)। उधर खगडि़या जिला के अलौली विधानसभा क्षेत्र के जदयू विधायक रामचंद्र सादा पर आरोप है कि उन्होंने बहादुरपुर पंचायत सिथत सोनिहार गांव में सांसद निधि से बनाया गया सामुदायिक भवन पर कब्जा जमा लिया है। विधायक ने भवन की चाहरदिवारी कर घेराबंदी भी करा ली है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने खर्च से उक्त भवन के उफपर नए कमरों का निर्माण भी करा लिया है। हालांकि आरोप लगाए जाने के बाद विधायक ने ऐसे आरोपों को खारिज कर दिया है। हकीकत क्या है यह तो जांच के बाद ही पता लगेगा।
जदयू में और भी कर्इ ऐसे नेता हैं जिनके दामन दूसरे कर्इ कारणों से दागदार हैं। इनके तथाकथित दागदार दामन प्रकाश में आने के बाद जदयू की फजीहत भी हुर्इ है। हाल ही में खोजी पत्रकारिता करने वाले वेब पोर्टल कोबरा पोस्ट ने अपने सिटंग आपरेशन में देश भर के 11 सांसदों की पोल खोली है, जिसमें उसने कहा है कि इन सांसदों ने एक फर्जी आस्ट्रेलियार्इ तेल कंपनी के पक्ष में धन लेकर सिफारिशी पत्र लिखने के बदले 50 हजार रुपए से लेकर 50 लाख रुपए तक की मांग की थी। इन 11 सांसदों में से तीन सांसद जदयू के ही हैं। जदयू के ये तीनों सितारे हैं- सुपौल के सांसद विश्वमोहन कुमार, जमुर्इ के सांसद भूदेव चौधरी और समस्तीपुर के सांसद महेश्वर हजारी। हालांकि जदयू के ये तीनों सांसद ऐसे आरोपों से इंकार करते हैंं। उधर राष्ट्रीय अèयक्ष शरद यादव ने तीनों सांसदाें से इस मुतलिलक जवाब-तलब किया है। इस घटना से पूर्व जदयू के राज्यसभा सदस्य अनिल साहनी पर भी कुछ इसी तरह के आरोप लगाए गए थे। साहनी पर आरोप है कि उन्होंने एमपी कोटे के रेलवे और हवार्इ कूपन बिना यात्रा किए ही 9 लाख रुपए का दावा किया। इस आरोप के मíेनजर सीबीआर्इ ने सांसद के मुजफ्फरपुर एवं दिल्ली आवास पर छापा भी मारा था। हालांकि साहनी कहते हैं कि इसमें मेरी कोर्इ गलती नहीं है। यह फर्जी रेल टिकट का ध्ांधा करने वाले ट्रेवल एजेंसी का कारनामा है। हालांकि सुशासन की शोभा बढ़ाने वालों में एक से बढ़कर एक सूरमा हैं। अगर उनके इतिहास-भूगोल पर रोशनी डाली जाए तो कथा कभी खत्म ही नहीं होगी। राजनीति के अपराधीकरण की बेजोड़ तस्वीर जदयू में एक से एक विधायक एवं पूर्व विधायक प्रस्तुत करते रहे हैं:-
मुन्ना शुक्ला-अन्नू शुक्ला :- सन 2000 से अक्टूबर 2010 तक मुन्ना शुक्ला लालगंज के एमएलए हुआ करते थे। वर्ष 2005 में मुन्ना ने जदयू ज्वाइन किया। फिलवक्त राबड़ी सरकार में मंत्री रहे डा. बृजबिहारी मर्डर केस में ये उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। ये अगस्त 2009 से मुजफ्फरपुर जेल में बंद हैं। मुन्ना शुक्ला को जब सजा हुर्इ थी उस समय वे जदयू के विधायक थे। मुन्ना शुक्ला के दो बड़े भार्इ छोटन शुक्ला एवं भुटकुन शुक्ला का खून गैंगवार में हुआ था। मुन्ना के पिता रामदास शुक्ला मुजफ्फरपुर में बम से उड़ाए गए थे। गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की हत्या में भी मुन्ना चार्जशीटेड थे। नीतीश ने उन्हें मर्इ 2009 में वैशाली संसदीय चुनाव के दौरान अपना उम्मीदवार बनाया था। यह बात दीगर है कि इलेक्शन में उनकी करारी हार हुर्इ थी। चूंकि मुन्ना को अदालत ने दंड मुकर्रर कर दिया था, इसीलिए नीतीश कुमार ने उनकी लालगंज सीट पर मुन्ना की पत्नी अन्नु शुक्ला को अपनी पार्टी से जीत दिलवायी। अक्टूबर 2013 में अधिकार रैली के लिए रंगदारी मांगने का आरोप भी इनपर लगा था। गौरतलब है कि बीते 28 अक्टूबर 2013 को हाजीपुर (वैशाली) के भगवानपुर सिथत पटना साहिब ग्रुप आफ कालेजेज के डायरेक्टर संतलाल यादव ने एक प्राथमिकी दर्ज कर यह आरोप लगाया था कि मुन्ना शुक्ला ने उनसे दो करोड़ रंगदारी मांगी थी। इतना ही नहीं, मुन्ना शुक्ला मुजफ्फरपुर कोर्ट में पेशी के दौरान लोगों के बीच अधिकार रैली में आने का निमंत्राण से संबंधित पर्चा बांटने तथा ‘नीतीश कुमार जिंदाबाद का नारा लगाने को लेकर भी चर्चा में आए थे। इस प्रकरण को लेकर तब सुशासन की काफी फजीहत हुर्इ थी।
सुनील पांडे :- सुनील पांडे तरारी से विधनसभा के सदस्य हैं। समता पार्टी के समय से ही नीतीश के कटटर समर्थक हैं। हाल ही में बरमेश्वर मुखिया हत्याकांड में भी इनपर उंगली उठी थी। मुखिया के पुत्र इंदुभूषण सिंह आज भी इन्हीं दोनों भार्इयों (सुनील पांडे के छोटे भार्इ हुलास पांडे) को अपने पिता की हत्या का जिम्मेदार मानते हैं। पांडे पर हत्या, रंगदारी, किडनैपिंग के ढ़ेर सारे मुकदमे लदे हुए हैं। पटना के नामचीन न्यूरोलाजिस्ट डा. रमेश चंद्रा के अपहरण के मामले में सुनील पांडे को वर्षों तक लाल हवेली की हवा खानी पड़ी। पटना के होटल मौर्या में शराब के नशे में सुनील पांडे ने तत्कालीन एसपी कुंदन कृष्णण के बारे में कहा था कि अगर उसने उनके साथ बदसलूकी की होती तो उन्हें वे गोली मार देते। गौरतलब है उन दिनों आनंद मोहन के साथ पटना के तत्कालीन एसपी कुंदन कृष्णण के द्वारा की गर्इ बदसलूकी की चर्चा सुर्खियों में थी। इनके द्वारा अनेक बड़े-बड़े ठेकेदारोें से रंगदारी टैक्स मांगने के भी मामले प्रकाश में आते रहे हैं।
हुलास पांडे :- सुनील पांडे के सगे भार्इ हैं हुलास पांडे। हुलास स्थानीय निकाय क्षेत्रा से एमएलसी हैं। हुलास पर किडनैपिंग, रंगदारी, खून के कर्इ मुकदमें लंबित हैं। पांडव सेना के सरगना बबलू सिंह की नृशंस हत्या में हुलास पांडे का नाम उछला था। वर्ष 2004 के दशहरा में बबलू को झारखंड के गढ़वा में टपकाया गया था। हुलास पांडे जदयू के वफादार सिपाही हैं।
धूमल सिंह :- धूमल सिंह एकमा से जदयू के विधायक हैं। धूमल पर कर्इ संगीन आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। ये कभी अंतर्राज्यीय हिस्ट्रीशीटर के रूप में जाने जाते थे। इनका कार्य क्षेत्र बोकारो, धनबाद रहा है। धूमल की शखिसयत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके खिलाफ दर्जनों केस लंबित हैं। धनबाद माफिया सकलदेव सिंह के कत्ल में शक की सूर्इ धूमल की तरफ भी घूमी थी। ये सन 2000 से ही एमएलए हैं। 13 साल की विधयिकी के दरम्यान उनका कर्इ वर्ष जेल में ही गुजरा। मार्च 2010 मेें अपनी प्रवास यात्रा के क्रम में नीतीश ने धूमल के गांव भजौना छपरा पहुंच कर उनके घर पर लजीज भोजन का लुत्फ उठाया था। आठवीं पास धूमल सिंह की अब इच्छा सांसद बनने की है।
सरफराज आलम :- जोकिहाट से जदयू के टिकट पर सरफराज आलम ने नवंबर 2010 के चुनाव में बाजी मारी थी। सरफराज पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुíीन के शाहबजादे हैं। आलम पर भी आपराधिक मुकदमों के अंबार हैं। सरफराज पर आरोप लगा था कि वे किशनगंज सिथत टेढ़ागाछ थाना के एसआर्इ शंभू शरण पासवान से मारपीट करने के बाद उनकी सरकारी पिस्टल छीन ली थी। इस मुतलिलक उनके विरूद्ध पासवान ने एफआर्इआर रजिस्टर करायी थी। इनकी दबंगर्इ के किस्सों से सीमांचल के थानों की संचिका भरी पड़ी है। खुद इनके अब्बा तस्लीमुíीन को अपने आपराधिक चरित्र के कारण केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। इसीलिए सीमांचल में यह जुमला दोनों बाप-बेटे के बारे में मशहूर है-’बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभहान अल्ला…।
अमरेंद्र पांडे उर्फ पप्पू पांडे:- कुचायकोट से जदयू विधायक पप्पू पांडे खूंखार अपराधी सतीश पांडे के छोटे भार्इ हैं। उनपर मर्इ 2012 में शराब व्यवसायी अनिल साह की हत्या की साजिश का आरोप है। इस हत्या के पीछे ठेका को लेेकर हुर्इ दुश्मनी बतायी जाती है।  पहले बसपा में थे पप्पू फिर नीतीश कुमार का दामन थाम लिया।
बोगो सिंह:- मटियानी से (बेगूसराय) जदयू टिकट पर चुनाव जीते बोगो की गिनती भी बाहुबलियों में होती है। बोगो पर कुछ साल पहले एके 47 रखने के इल्जाम लगे थे। बोगो पर भी आपराधिक कांडों में संलिप्त रहने के आरोप लगते रहे हैं।
रणधीर कुमार सोनी:- सोनी शेखपुरा के जदयू विधयक हैं। सोनी के खिलाफ कर्इ धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज हैं। कांग्रेसी सांसद राजो सिंह मर्डर केस में भी इनका नाम उछला था। सोनी को नीतीश ने अपने प्रिय आरसीपी के इशारे पर जदयू का टिकट उपलब्ध कराया था।
कौशल यादव:- कौशल नवादा के विधायक हैं। कौशल का नाम भी आपराधिक मामलों से जुड़े बताये जाते हैं। पहले निर्दलीय एमएलए थे कौशल, अभी जदयू का प्रतिनिधित्व विधानसभा में कर रहे हैं। कौशल ने पत्नी पूर्णिमा यादव को भी जदयू का विधायक बना लिया है। उध्र, जिला प्रशासन ने उनपर गबन का मामला दर्ज कर रखा है। इतना ही नहीं नवादा दंगे के दौरान उनपर यह आरोप भी लगाया गया था कि कौशल यादव और उनके एक करीबी विधानपार्षद का हाथ दंगे भड़काने में है।
प्रदीप महतो:- वारिसलीगंज से जदयू सिंबल पर अपना परचम लहराने वाले प्रदीप महतो खूंखार अशोक महतो के रिश्तेदार हैं। प्रदीप के विरूद्ध हत्या, खून-खराबा एवं सामूहिक नरसंहार कराने के दर्जन से उपर मामले लंबित हैं।
पवन कुमार जायसवाल:- शिवहर जिला के ढाका विधानसभा के निर्दलीय विधायक पवन कुमार जायसवाल का नाम पिछले दिनों तब सुर्खियों में आया जब एनडीए गठबंधन के टूटने के बाद विश्वास मत प्राप्त करने के दौरान उन्होंने नीतीश में अपना विश्वास व्यक्त किया। पवन जायसवाल के उफपर कर्इ मुकदमें दर्ज है। लिहाजा, इनके नाम के आगे बाहुबली शब्द भी चस्पा है। नेशनल इलेक्शन वाच ‘मार्इ नेता डाट काम की मानें तो पवन जायसवाल पर सात अपराध की धारा लगी हुर्इ है। 18 दिसंबर 1973 को जन्में श्री जायसवाल का राजनीतिक कैरियर कोर्इ डेढ़ दशक पुराना है। बैरगनिया सिथत होटल चंद्रलोक के मालिक कपिलदेव प्रसाद हत्याकांड में श्री जायसवाल के उजले कमीज पर छींटे पड़े थे। पवन जायसवाल एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार भी किए गए थे। बैरगनिया थाना के तत्कालीन दारोगा श्रीराम मांझी ने उन्हें गिरफ्तार किया था और बुरी तरह उनकी पिटार्इ की थी। इस घटना के बाद रघुनाथ झा ने इन्हें राजनीतिक संरक्षण दिया। पवन जायसवाल पहले लोक जनशकित पार्टी और समाजवादी पार्टी में भी रह चुके हैं लेकिन विधायक पहली बार बने हैं।
नीरज कुमार सिंह ‘बबलू:- जनाब जदयू के विधयक हैं। सुपौल जिला के छातापुर विधानसभा क्षेत्र से चुन कर आते हैं। गुरु आनंद मोहन की पाठशाला में इन्होंने राजनीति की पाठ पढ़ी है। विधायक जी पर भी कर्इ मुकदमें दर्ज हैं। हालांकि हाल ही में हत्या और लूट के एक मामले में वे बरी हुए हैं। 2 मर्इ 2000 को कटिहार के फलका थाना अंतर्गत बरैटा सिथत पंजाब नेशनल बैंक शाखा का पांच लाख रुपए लूटने तथा जीप चालक दिनेश राम की हत्या के मामले के विधायक आरोपी थे। इसी मामले में वे बीते 9 सितंबर 2013 को जेल गए थे और 18 अक्टूबर 2013 को 39 दिन जेल में रहने के बाद उन्हें साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए रिहा कर दिया गया। बबलू ने यह दिखा दिया कि सत्ताधारी विधायक होने का रुतबा क्या होता है। बबलू ने जब समर्पण किया तो पुलिस प्रशासन ने दो दिनों तक किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होने दी। और तो और मीडिया को भी तीसरे दिन इसकी जानकारी मिली। दिन दहाड़े हुर्इ लूट और हत्या का शायद यह पहला मामला होगा जिसमें विधायक पर आरोप की सारी सुनवार्इ 39 दिन में पूरी कर ली गर्इ हो। मुकदमे के जानकारों की माने तो फास्ट ट्रैक कोर्ट में भी गंभीर मामलाें की सुनवार्इ इतनी जल्दी नहीं होती। तीन दिन बाद ही पुलिस ने आरोप पत्र कोर्ट में जमा कर दिया और सभी गवाह एक-एक कर मुकरते चले गए। न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद साक्ष्य के अभाव में आरोपी विधायक को संदेह का लाभ देते हुए रिहा कर दिया।
दरअसल, इस घटना की प्राथमिकी गार्ड और कैशियर (जो लूट के समय जीप में मौजूद थे) ने अज्ञात लोगों के खिलापफ दर्ज करायी थी। पुलिस अनुसंधान के क्रम में शंकर सिंह गिरोह के साथ विधायक नीरज कुमार सिंह ‘बबलू का नाम आया था। हैरत की बात यह है कि इनके खिलाफ 2004 में ही वारंट जारी हुआ था। उसके बाद वे दो-दो बार विधायक भी चुने गए।
रणविजय सिंह:- गोह के जदयू विधायक रणविजय सिंह छह वर्षों तक लाल हवेली में बंद रहे। उनपर हत्या के मामले दर्ज थे। हालांकि विधायक जी उस मामले में बरी हो गए हैं।
शिवजी राय:-पूर्वी चंपारण जिला के मधुबन के जदयू विधायक हैं शिवजी राय। शिवजी राय पर करीब आधा दर्जन मामले दर्ज हैं। ‘मार्इ नेता डाट काम  के अनुसार इन पर आर्इपीसी की निम्नलिखित धाराएं मसलन-302, 307, 325, 147, 326, 380, 337, 338 लगी हुर्इ हैं। फिलवक्त, विधायक जी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का हाथ मजबूत करने में लगे हुए हैं।
देवनाथ यादव-गुलजार देवी : फुलपरास के पूर्व विधयक देवनाथ यादव को जब एक हत्या के मामले में सजा हो गर्इ तो वे नीतीश के शरण में चले गए। नीतीश ने उनकी पत्नी गुलजार देवी को जदयू का टिकट थमा दिया। वर्तमान में गुलजार देवी फुलपरास से जदयू की विधायक हैं। देवनाथ यादव समाजवादी पार्टी के विधायक थे। वर्ष 2006 में उन्हें 1992 में हुर्इ एक हत्या के मामले में शामिल होने के आरोप में सजा हो गर्इ। वे 2008 में समाजवादी पार्टी को बाय-बाय कह जदयू में शामिल हो गए। 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने देवनाथ यादव की पत्नी गुलजार देवी को टिकट थमा दिया। गुलजार जीत कर विधानसभा आ गर्इ। फिलहाल नीतीश को मजबूती प्रदान करने में जुटी हैं।
रणवीर यादव-पूनम यादव:- खगडि़या की जदयू विधायक पूनम देवी के पति रणवीर यादव बिहार के तौफिर दियरा नरसंहार के सजायाफ्ता हैं। नीतीश जब अधिकार यात्रा के दौरान खगडि़या पहुंचे तो हजारों लेागों की भीड़ एवं टीवी कैमरा के सामने ही उन्होंने अपनी दबंगर्इ दिखार्इ थी और बदले में ‘सुशासन ने उनकी पीठ थपथपार्इ थी।
अजय सिंह-कविता सिंह:- सीवान जिला के दरौंदा से कविता जदयू विधायक हैं। कविता सिंह के विधायक बनने की कथा भी काफी दिलचस्प है। कविता की दूसरी पहचान दरौंदा की पूर्व विधायक जगमातो देवी की पतोहू तथा बाहुबली अजय सिंह की पत्नी के रूप में की जाती है। दरअसल, जगमातो देवी की मृत्यु हो जाने के बाद दरौंदा की खाली हुर्इ सीट पर होने वाले उपचुनाव में अजय सिंह स्वयं जदयू के टिकट पर लड़ना चाहता था लेकिन नीतीश ने उन्हें टिकट देने से मना कर दिया। अजय सिंह का चरित्र आपराधिक है और उनपर कर्इ संगीन मामले दर्ज हैं। लेकिन नीतीश ने अजय को एक सलाह दी कि यदि वे शादी कर लें तो उनकी बीवी को वे टिकट दे सकते हैं, और ऐसा ही हुआ। चुनाव नजदीक होने के कारण शादी के लिए अशुभ माने जाने वाले पितरपक्ष में ही उन्होंने शादी की। वादे के अनुसार नीतीश ने भी अजय की पत्नी को टिकट थमा दिया और कविता सिंह (अजय की पत्नी) जीत कर विधानसभा पहुंच गर्इ। पिछले दिनों आठवीं पास अजय सिंह ने अपने दबंगर्इ से बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अèयक्ष की कुर्सी कब्जाने के लिए वर्तमान अèयक्ष अनिल सुलभ से भिड़ गए थे। किसी ने ठीक ही कहा है यदि सत्ता साथ हो तो दबंगर्इ का नशा सर चढ़ कर बोलता है। ऐसा ही किया बाहुबली अजय सिंह ने। मामला इतना आगे बढ़ गया कि अंत में प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
इसके अलावा कर्इ महिलाएं भी अपने दबंग पतियों के नाम पर राजनीति कर रही हैं। ऐसी महिलाओं में बीमा भारती, लेसी सिंह का नाम मुख्य रूप से शामिल हैं। बीमा भारती का राजनीतिक जीवन उनके कुख्यात पति अवधेश मंडल के साये में शुरू हुआ था। फिलवक्त, अवधेश मंडल का बीमा भारती से अलगाव हो चुका है। पूर्णिया की विधायक लेसी सिंह हिस्ट्रीशीटर बूटन सिंह की पत्नी हैं। बूटन सिंह की हत्या के बाद लेसी विधायक बनी।
अनंत सिंह : स्टोरी जब बाहुबली की हो तो कथा अनंत सिंह के बिना पूरी नहीं हो सकती। मोकामा के जदयू विधायक अनंत सिंह की कथा अनंत है। हालांकि इन दिनों विधायक जी काफी तनाव में हैं कारण उनके एक नजदीकी अजय सिंह का खून हो गया है। (देखें बाक्स) अनंत सिंह 2005 में जदयू के टिकट पर विधानसभा पहुंचे थे और तब से नीतीश के वफादार बने हुए हैं।
छोटे सरकार के नाम से विख्यात अनंत सिंह कहते रहे हैं-’मुझे लालू यादव के कहर से बचने के लिए राजनीति में आना पड़ा। वे मुझे मिटाने पर तुले हुए थे। इनपर अधिकांश मामले अस्सी और नब्बे के दशक के हैं। वैसे 2008 में भी उनपर ठेकेदार संजय कुमार सिंह की हत्या के आरोप लगे थे। सन 2007 की दीपावली के आसपास इस एमएलए ने पटना सिथत अपने सरकारी आवास 1, माल रोड में एक नामवर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के रिपोर्टर एवं कैमरामैन की जमकर पिटार्इ की थी। इस प्रकरण ने ऐसा तूल पकड़ा था कि विरोधी दलों ने पटना बंद कराया था। अंतत: पटना के तत्कालीन सीनियर एसपी कुंदन कृष्णण तथा डीआर्इजी सुनील कुमार ने हाथ जोड़कर अनंत को सरेंडर कराया था। अनंत सिंह जेल भेज दिये गए थे। लेकिन जानबूझकर पुलिस ने केस डायरी ही कमजोर कर दी। लिहाजा, अनंत को जमानत मिल गर्इ। अब यह मामला मेल-मिलाप हो जाने के कारण समाप्त हो गया है। मर्इ 2006 में एक प्रोग्राम के दौरान एके 47 लेकर स्टेज पर अनंत सिंह को नाचते हुए एक निजी चैनल ने दिखाया था तो खूब हायतौबा मची थी। अनंत के विरोधियों ने तब सीधा सवाल सरकार से पूछा था कि जब एके 47 में सिने अभिनेता संजय दत्त हवालात में बंद रह सकते हैं तो विधायक क्यों नहीं? बावजूद इसके नीतीश की दुआ से अनंत का बाल बांका तक नहीं हो सका था। यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती, अनंत सिंह पर राजधानी पटना के कनाट प्लेस के नाम से विख्यात डाक बंगला चौराहा के निकट अवसिथत ‘हसन मंजिल पर कब्जा करने का भी आरोप है। इस संबंध में कोतवाली पीएस में मुकदमा भी दायर हुआ था। आंध्र प्रदेश कैडर के 1987 बैच के आर्इपीएस विनय कुमार सिंह यहां एसटीएपफ के डीआर्इजी थे तब उन्होंने खुद भारी पुलिस पलटन के साथ अनंत सिंह के लदवां वाले घर पर छापा मारा था। उसमें एसटीएफ का एक ड्राइवर शहीद हो गया था। दोनों तरफ से सैंकड़ों राउंड गोलियां चली थी। मर्इ 2009 में लोकसभा चुनाव के समय भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी अमिताभ दास ने आर्इजी इंटेलिजेंस को चिटठी लिखी थी कि अनंत सिंह के पास हथियारों का जखीरा है। इससे पुलिस महकमें में खलबली मच गर्इ थी। बताया जाता है कि अनंत का नाम सुनकर तब के डीजीपी डीएन गौतम के हांथ कांपने लगे थे। लिहाजा, अनंत के खिलाफ कार्रवार्इ नहीं हो सकी थी। उल्टे अमिताभ दास को ही चुनाव कराने के लिए पंजाब भेज दिया गया था।
यह हकीकत है कि बाढ़ से लेकर मोकामा तक राजपूत-भूमिहारों के बीच खूनी दंगल में अब तक सैंकड़ों से ज्यादा लाशें गिर चुकी है। इसके लिए वहां के निवासी भूमिहारों के मसीहा अनंत सिंह तथा राजपूतों के पोप विजय कृष्ण दोनों को ही कसूरवार मानते हैं। दरअसल, इस अदावत की नींव 1968 में तब पड़ी थी जब अनंत सिंह के बड़े भार्इ विरंची सिंह गोलियों से उड़ा दिये गये थे। हालांकि उस घड़ी अनंत सिंह छोटे थे पर बढ़ते वक्त के साथ उन्हें यह महसूस हुआ था कि राजपूतों ने ही उनके अग्रज को टपकाया था। लिहाजा, राजपूतों से उनकी जंग खुलेआम छिड़ गर्इ जो बदस्तूर जारी है।
नीतीश ने उन्हें पफरवरी 2005, नवंबर 2005 एवं अक्टूबर 2010 के विधानसभार्इ चुनाव में उतारा। तीनों ही चुनाव में उन्हें विजयश्री हासिल हुर्इ थी। अनंत सिंह से नीतीश के अच्छे संबंध रहे हैं।  2004 में नीतीश को अनंत सिंह ने तब चांदी के सिक्कों से तुलवाया था जब वे चुनाव प्रचार के दौरान बाढ़ के एकसोहरा गांव पहुंचे थे। अनंत का रूतबा और हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनपर दर्ज मुकदमों की सूची चुनाव आयोग की वेबसाइट और मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय में भी उपलब्ध नहीं है। जबकि चुनाव आयोग के पास हलफनामा जमा करना आवश्यक होता है। वहां हलफनामों की जगह पर उनके उपर चल रहे मुकदमे के ब्योरे के लिए संलग्नक-2 का जिक्र है और मजे की बात यह है कि ये रिकार्डस में से गायब है।

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