December 12, 2017

स्लीपर घोटाले की खबर गरमाई नितीश को बचा रही सीबीआई?

Photo GalleryBy wmadmin123 - Thu Oct 24, 7:54 am

बिहार के मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार केंदz में जब रेलमंत्राी थे, उस दौरान रेलवे में स्लीपर घोटाला हुआ था। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि रेल की पटरी के नीचे बिछाए जाने वाले कंकzीट के इन स्लीपरों की खरीद में हुए तथाकथित घोटाले का संबंध् तत्कालीन रेल मंत्राी से था। लिहाजा, प्रारंभिक छानबीन के लिए यह मामला तब रेल विभाग की स्टैंडिंग कमिटी के हवाले कर दिया गया था। जांच में समिति ने पाया था कि नीतीश कुमार के कारण रेल मंत्राालय को मोटा-मोटी 200 करोड़ का घाटा हुआ। क्योंकि नियम की ध्ज्जियां उड़ाते हुए ‘दया इंजीनियरिंग वक्र्स’ को स्लीपर आपूर्ति करने का दायित्व सौंपा गया था। अंतत: यह कांड आगे की पड़ताल के लिए सीबीआई को हैंड ओवर किया गया। इसकी सूचना बकायदा लोकसभा और राज्यसभा को भी दी गई थी। हैरत की बात यह है कि एक ताजे मामले मेंे सीबीआई ने याचिकाकर्ता मिथिलेश सिंह को सूचित किया है कि उसने घोटाले से संबंध्ति किसी मामले की जांच की ही नहीं। हालांकि यह मामला पीआईएल के माध्यम से दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा लेकिन वहां मुल्क की इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी ने झूठ बोलकर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की। बड़ा सवाल यह है कि पीएमओ इस संगीन घोटाले पर खामोश क्यों है? इतना ही नहीं नीतीश के कट~टर विरोध्ी लालू यादव मई 2004 से 2009 तक रेलवे के वजीर थे, तो उन्होंने अपनी जुबान इस ज्वलंत मुíे पर क्यों बंद रखी? सीबीआई बार-बार अपनी बातों को क्यों बदलती रही? सीबीआई आखिर किसके इशारे पर इस घोटाले के अपराध्यिों को बचा रही है? पूर्व विधन पार्षद पीके सिन्हा कहते हैं-‘इस सवाल का जवाब नीतीश और कांगzेस के बीच लगातार प्रगाढ़ हो रहे मध्ुर संबंध् में छिपा है। हालांकि नीतीश को इससे बहुत लाभ होने वाला नहीं है क्योंकि इस मामले में हमलोगों ने पिछले पांच वर्षों में सूचना अध्किार अध्निियम 2005 के तहत इतना दस्तावेज एवं सबूत इकट~ठा कर लिया है कि अब कांगzेस एवं सीबीआई के संरक्षण से भी नीतीश कुमार को जेल जाने से बचना मुश्किल है। सच यह है कि इसके लिए नीतीश कुमार कांगzेस के साथ सौदेबाजी कर रहे हैं। इस सौदेबाजी से जहां कांगzेस को बचे हुए कार्यकाल में जदयू के 20 सांसदों का सहयोग मिल जाएगा वहीं नीतीश कुमार को स्लीपर खरीदगी घोटाले में पिफलहाल जेल जाने से राहत मिल जाएगी। यह मामला सीध्े-सीध्े भzष्टाचार निरोध् अध्निियम 1988 की धरा 13;1द्ध;डीद्ध के दायरे में आता है जिसमें सात वर्षों तक की सजा का प्रावधन है।’

रेल भवन का कुर्मी कनेक्शन

अटल बिहारी वाजपेयी की हुकूमत में नीतीश कुमार ने नई दिल्ली स्थित ‘रेल भवन’ का तख्त संभाला था, तब उन्होंने अपना ओएसडी बनाया था रामचंदz प्रसाद सिंह को। रामचंदz तब 1984 बैच के यूपी कैडर के आईएएस थे। अपने मित्रा मंडली में वे आरसीपी के नाम से विख्यात हैं। वैसे आरसीपी भी नालंदा निवासी हैं और नीतीश के सजातीय भी। वर्तमान में आरसीपी को जदयू के राष्ट्रीय राजनीति में महासचिव की हैसियत बख्शी गई है। दरअसल, नीतीश से उनका परिचय पहली मर्तबा भारत सरकार के मौजूदा इस्पात मंत्राी बेनी प्रसाद वर्मा ने करवाया था। बेनी खुद भी कुर्मी हैं। बेनी जनमोर्चा सरकार में संचार मंत्राी थे तब आरसीपी उनके पीएस थे। यहीं से आरसीपी को सियासत का चस्का लगा था। पिफर क्या था? आरसीपी ‘रेल भवन’ में चाणक्य की भूमिका निभाने लगे थे। नीतीश और आरसीपी की जुगलबंदी से ही रेल मंत्राालय चलता था। नवंबर 2005 में नीतीश कुमार को सीएम की कुर्सी मिली, तो बिहार कैडर के कई सीनियर आईएएस अपफसरों की नजर प्रधन सचिव के पद पर थी। मगर नीतीश ने अपना प्रिंसिपल सेक्रेट्री नियुक्त किया था आरसीपी को। तब ललन सिंह की गजब की चलती नीतीश दरबार में थी। वे ‘डीपफैक्टो सीएम’ के उपनाम से नवाजे जाते थे। लेकिन अपनी कुटिल सियासत की बदौलत आरसीपी ने ललन की स्थिति इतनी दयनीय कर डाली कि उन्हें नीतीश से अपना दामन छुड़ाना पड़ा। इसी तरह नीतीश कुमार से प्रभुनाथ सिंह को अलग-थलग करने में आरसीपी की ही भूमिका थी। अंतत: आरसीपी को नीतीश ने 2010 में राज्यसभा भेज दिया।

अब सवाल उठना लाजिमी है कि स्लीपर घोटाला है किस चिड़िये का नाम? इस घपले को अंजाम कैसे दिया गया? इसका तानाबाना किसने बुना? इस सिलसिले में ‘लोक प्रसंग’ ने अपनी तहकीकात की तो पाया कि नीतीश कुमार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में 19 मार्च, 1998 से 5 अगस्त, 1999 तक तथा 20 मार्च, 2001 से 22 मई, 2004 की अवध् ितक रेलमंत्राी थे। वैसे रेल भवन के तख्त पर नीतीश के बैठने से पूर्व कंकzीट स्लीपर की खरीद खुले टेंडर के आधर पर होती थी। जुलाई 1995 में रेल मंत्राालय ने इस नीति को अपनाया था। नतीजतन, प्रत्येक साल रेलवे को अरबों रुपए की बचत होने लगी। कंक्रीट स्लीपर खरीदगी घोटाला को और विस्तार से समझते हैं।

रेल मंत्राालय को नई रेल लाईन बिछाने एवं गौज परिवर्तन के कारण करोड़ों की संख्या में कंक्रीट स्लीपर की आवश्यकता थी। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मंत्राालय की ओर से निविदाएं निकाली गई। निविदा संख्या -सी.एस 145@2000 के द्वारा 90 लाख एवं निविदा संख्या-सीएस 152@2002 के द्वारा 160 लाख कंकzीट स्लीपर की आपूर्ति हेतु निविदा जारी की गई। ये दोनों निविदायें ओपेन थे। अर्थात इन दोनों निविदाओं में नये एवं पुराने दोनों तरह के निर्माणकर्ता@आपूर्तिकर्ता टेंडर डाल सकते थे। वस्तुत: सभी तरह के अर्थात नये एवं पुराने दोनों तरह के निर्माणकर्ताओं@ आपूर्तिकर्ताओं ने टेंडर जमा भी किया। किंतु तत्कालीन रेल मंत्राी नीतीश कुमार ने स्व. दयानंद सहाय एवं उनके निकट संबंध्ी ध्ीरेंदz अगzवाल के स्वामित्व वाले पफर्म मेसर्स दया इंजीनियरिंग वक्र्स गया को अवैध् लाभ पहुंचाने के उíेश्य से बिना मंत्रिामंडल अथवा सक्षम प्राध्किार की सहमति अथवा स्वीकृति के अपने ही स्तर से अनाध्किृत एवं अनियमित तरीके से खुले रूप में जारी निविदा को ‘सीमित निविदा’ के रूप में परिवर्तित कर दिया और यह भी तब हुआ जब खुला टेंेडर के विज्ञापन के आधर पर टेंडर प्राप्त हो चुके थे। प्रसंगवश यहां इस बात का उल्लेख कर देना उचित होगा कि ममता बनर्जी ने वर्ष 2000 मेंे स्पष्ट तौर पर पुराने निर्माणकर्ताओं एवं आपूर्तिकर्ताओं की ‘सीमित निविदा’ की नीति को लागू करने की मांग को खारिज करते हुए आदेश दिया था कि कंकzीट स्लीपर की खरीदगी के मामले में प्रत्येक दो वर्षों के अंतराल पर खुली निविदा जारी किये जाये। दरअसल, जब ममता बनर्जी ने रेलवे मिनिस्टर की जिम्मेदारी संभाली, तो भगवान बु¼ की नगरी गया के ‘मेसर्स दया इंजीनियरिंग वक्र्स’ समेत तीन अन्य पफर्मों ने ममता के समक्ष एक प्रस्ताव रखवाया था कि स्लीपर खुुली निविदा के बनिस्वत सीमित टेंडर के जरिए खरीदी जाए। मगर ममता बनर्जी इसके पीछे के खेल को भांप चुकी थीं। लिहाजा, उन्होंने जुलाई 1995 के पफार्मूला के संग छेड़छाड़ नहीं की थी। उल्टे बनर्जी ने पफरवरी 2000 में स्लीपर कzय के नियम को और भी सख्त कर डाला था। नए कानून के अनुसार ‘ओपेन टेंडर’ की मियाद तीन वर्ष से घटाकर दो साल कर दी गई थी।

नीतीश का माफिया प्रेम

नीतीश कुमार के रेल मंत्रिात्व काल की कहानी है यह। बतौर रेल मंत्राी, क्या नीतीश ने बिहार में रेलवे ठेकों को मापिफया सरगनाओं के हवाले किया था? यह तो जांच का विषय है, पर इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता कि जब नीतीश कुमार वाजपेयी सरकार में रेलवे मिनिस्टर थे तब सूरजभान सिंह, सुनील पांडेय एवं खूंखार पांडव गिरोह के बीच ठेकों की बंदरबांट हुई थी। पटना-मोकामा रेल खंड का ठेका सूरजभान को मिला था। पटना से मुगलसराय के ठेकों पर तरारी के बाहुबली जदयू एमएलए सुनील पांडेय ने कब्जा जमाया था। पटना-गया व ध्नबाद डिवीजन के कांट्रेक्टों पर तब पांडव सेना का आध्पित्य हो गया था। आज उसी पांडव सेना के एक सदस्य रहे चितरंजन कुमार अरवल से भाजपा विधयक हैं। पांडव सेना ने पटना, जहानाबाद एवं गया में दर्जनों लाशें गिराई थीं। वैसे हाजीपुर में पूर्व-मध्य रेलवे का जोनल दÝतर भी मापिफयाओं के दवाब पर ही बना था। इसके पहले यह कोलकाता में था। तब बिहारी मापिफयाओं की दाल वहां गलती नहीं थी।

लिहाजा, विकास का बहाना बना कर हाजीपुर में जोलन आWपिफस खुलवाया गया था। उसमें मलाईदार ध्नबाद मंडल भी शामिल है। कोयले की ढुलाई के कारण ध्नबाद रेल डिवीजन को सोने का अंडा देने वाली चिड़िया से नवाजा जाता है। इन रेल मापिफयाओं का भंडापफोड़ पटना के रेल एसपी के पद पर रहते हुए अमिताभ कुमार दास ने 2002 में किया था। उन्होंने 4 सितंबर 2002 को बिहार के रेलवे डीआईजी को एक गोपनीय पत्रा ;ज्ञापांक संख्या 427द्ध भेजा था। उसमें मापिफयाओं का काला चिट~ठा भी था। बकौल दास इसी के बाद वे नीतीश कुमार की हिटलिस्ट में आ गए थे। नीतीश ने आगे चलकर सीएम की गíी संभाली तो अमिताभ दास को कुछ मुकदमों में पफंसाकर उनकी प्रोन्नति रोक दी। दास ने ‘कैट’ का दरवाजा खटखटाया। वहां उन्होंने बाकायदे हलपफनामा दायर कर कहा है कि वे रेल एसपी थे तो उन्होंने नीतीश एवं रेल मापिफयाओं की सांठगांठ का भंडापफोड़ किया था, इसीलिए उनकी उनसे ठनी हुई है। ‘कैट’ को कई तस्वीरें भी अमिताभ दास ने पेश की थी। उन तस्वीरों में नीतीश को मापिफयाओं के संग दिखया गया है।

ममता बनर्जी के बाद नीतीश कुमार के जिम्मे रेल मंत्राालय ज्यों ही आया, त्यों ही उन्होंने खुली निविदा नीति में परिवर्तन किए बगैर टेंडर नंबर सीएस@145@2000 तथा सीएस@152@2000 वास्ते सीमित निविदा की प्रक्रिया अपना ली। परिणाम यह हुआ कि इससे रेल मंत्राालय को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ। पर यह कहानी यहीं खत्न नहीं हुई। पिफर रेल मंत्राालय के टेंडर नंबर सीएस@145@2002 एवं सीएस@152@2002 के तहत 2000 करोड़ की लागत पर ढ़ाई करोड़ कंकzीट स्लीपर की खरीदारी हुई। इस निविदा सहित उपरोक्त दोनों टेंडरों को भरा था ‘मेसर्स दया इंजीनियरिंग वक्र्स’ गया ने। बताया जाता है कि इस कंपनी और उससे जुड़े सप्लायरों को कंकzीट स्लीपर की खरीद-पफरोख्त में करोड़ों के रकम का गैरमुनासिब लाभ रेल मंत्राालय की कृपा से हुआ था।

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