October 21, 2017

स्लीपर घोटाले पर लालू ने भी क्यों साध रखी थी चुप्पी?

Photo GalleryBy wmadmin123 - Thu Oct 24, 8:11 am


मई 2004 में लालू यादव यूपीए वन की सरकार में रेल मंत्राी बने थे। पूरे पांच सालों तक इस मंत्राालय की जिम्मेदारी वे संभाले रहे। इसी दौरान स्लीपर घोटाला से संबंध्ति रेलवे की स्टैंडिंग कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पहली मार्च 2005 को राज्यसभा एवं दूसरी मार्च 2005 के दिन लोकसभा में उपस्थापित किया था। अपने उपरोक्त सातवें प्रतिवेदन में स्थाई समिति ने पार्लियामेंट को बताया था कि जांच वास्ते मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया है।

अब सवाल उठता है कि स्लीपर घोटाला नीतीश के रेलमंत्राी रहते हुए हुआ था, पिफर उनके सियासी शत्राु लालू यादव ने बतौर रेलवे मिनिस्टर चुप्प्पी क्यों साध्े रखी? बकौल मिथिलेश सिंह लालू जब रेल मंत्राी थे तो उन्होंने उन्हें ;मिथिलेश सिंह कोद्ध तथा तत्कालीन एमएलसी पीके सिन्हा को पफोन कर स्लीपर घोटाले से संबंध्ति दस्तावेज के साथ दिल्ली बुलाया था। दिल्ली में उन्हें रेल यात्राी निवास में ठहराया गया था। लालू ने खुद दस्तावेज लिया और कहा कि किसी भी सूरत में वे नीतीश को इस घोटाले के मुíे पर बख्शने नहीं जा रहे हैं। बावजूद इसके लालू आज तक चुप्पी लगाए हुए हैं। इस बाबत ‘लोक प्रसंग’ ने पड़ताल की तो पाया कि उस स्टैंडिंग कमिटी के एक सदस्य थे राजद सांसद ध्ीरेन्दz अगzवाल। श्री अगzवाल झारखंड के चतरा से लोकसभा के नुमाइंदे थे। उनकी सीध्ी रिश्तेदारी ‘मेसर्स दया इंजीनियरिंग वक्र्स’ गया के अध्पिति दयानंद सहाय से थी। ध्ीरेन्दz अगzवाल भी ‘मेसर्स दया इंजीनियरिंग वक्र्स’ के पार्टनर थे। लिहाजा, अपने पफर्म को पफंसता देख लालू यादव के समक्ष गिड़गिड़ाकर, उनकी चिरौरी कर, उन्हें चाण्क्य नीति से खुशकर उनकी जुबान बंद करने में अगzवाल ने कामयाबी पाई थी। जाहिर है अगर इस घोटाले में नीतीश के खिलापफ उंगली उठती है, तो लालू भी कम दोषी नहीं माने जाएंगे।

गौरतलब है कि ;निविदा संख्या-145@2000द्ध जहां दया इंजीनियरिंग वक्र्स, गया ने प्रति स्लीपर 565 रुपये का रेट दिया था वहीं नये निर्माणकर्ता एवं आपूर्तिकर्ताओं ने उसी गुणवत्ता के कंकzीट की दर 429 रुपये प्रति स्लीपर दिया था। इस तरह समान गुणवत्ता के कंकzीट स्लीपर की दर से प्रति कंकzीट 136 रुपये का अंतर था। इसी तरह निविदा संख्या-152@2002 में जहां मेसर्स दया इंजीनियरिंग वक्र्स गया एवं उनके एसोसिएट आपूर्तिकर्ताओं ने 715 रुपये प्रति कंक्रीट स्लीपर की मांग की वहीं उसी गुणवत्ता के कंकzीट@स्लीपरों का नये निर्माणकर्ताओं एवं आपूर्तिकर्ताओं ने 591 रुपये प्रति की मांग की थी। इस हिसाब से दोनों के मूल्य में भी 124 रुपये का अंतर था। किंतु उच्चतम एवं निम्नतम दाम में इतना अंतर होते हुए भी तत्कालीन रेल मंत्राी नीतीश कुमार ने निम्नतम दर वाले निर्माणकर्ताओं को आपूर्ति आदेश नहीं देकर उच्चतम दर वाले अपूर्तिकर्ता मे. दया इंजीनियरिंग वक्र्स गया एवं उनके एसोसिएट आपूर्तिकर्ताओं को यह ठीकेदारी दे दी। लिहाजा, एक तरपफ जहां रेल विभाग को सिपर्फ कीमत के मामलों में लगभग 320 करोड़ 80 लाख प्रति क्षति हुई वहीं मे. दया इंजीनियरिंग वक्र्स, गया एवं उनके समूह के पुराने आपूर्तिकर्ताओं को इतनी ही राशि का अवैध् लाभ हुआ। लोकतांत्रिाक समता दल के अध्यक्ष पीके सिन्हा कहते हैं कि नीतीश के द्वारा इस तरह से अवैध् लाभ पहुंचाने की पृष्ठभूमि में विशेष स्वार्थ निहित था।

इसके अतिरिक्त गया के पफर्म को आपूर्ति आदेश देने के कारण रेल विभाग को कैरेज में भी अरबों की राशि का नुकसान हुआ क्योंकि गया से दूर यथा गौहाटी, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद जैसे सुदूर क्षेत्राों में रेल विभाग को अपने खर्चे पर कंकzीट स्लीपर ले जाना पड़ा। जबकि संबंध्ति क्षेत्राों में भी निर्माणकर्ता एवं आपूर्तिकर्ता उपलब्ध् थे, जिन्होंने टेंडर भी जमा किया था और जिनके दर भी कम थे।

सवाल उठता है कि ‘मेसर्स दया इंजीनियरिंग वक्र्स’ के पीछे की कथा क्या है? कौन हैं इसके मालिक? लोक प्रसंग ने इस मुतल्लिक जब तÝतीश की तो पाया कि इसके अध्पिति थे राज्यसभा सदस्य दिवंगत दयानंद सहाय। दयानंद की पत्नी सुशीला सहाय 1977 में कर्पूरी ठाकुर सरकार में राज्यमंत्राी थीं। दयानंद सहाय के बारे में बताया जाता है कि वे सियासत के माहिर खिलाड़ी थे। वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी पार्टियोंे के दिग्गज राजनेता उनके अजीज दोस्त थे। कहा जाता है कि सियासतदानों के पास उनकी पसंदीदा चीज पहुंचाकर उन्हें पटाने में स्वर्गीय सहाय को महारत हासिल थी। यही वजह थी कि बतौर निर्दलीय उम्मीदवार राज्यसभा चुनाव में उनका परचम बिहार से लहराता था।

दयानंद सहाय के उपरोक्त पफर्म में पार्टनर थे ध्ीरेंदz अगzवाल। श्री अगzवाल झारखंड के चतरा से राजद सांसद हुआ करते थे और लालू यादव की आंखों की पुतली थे। ध्ीरेंदz अगzवाल सुशीला सहाय के रिश्तेदार थे। दरअसल, दयानंद सहाय ने सुशीला के संग अंतरजातीय विवाह किया था। अब दयानंद के साहबजादे संजय सहाय अपनी कंपनी की देखभाल करते हैं। संजय पिफल्म से भी जुड़े रहे हैं। रूपहले पर्दे के नामवर अभिनेता नसीरूíीन साह को लेकर उन्होंने ‘पतंग’ सिनेमा का निर्माण किया था।

हम बात कर रहे थे स्लीपर घोटाले के बारे में। स्लीपर खरीदने में हेरापफेरी का मामला जब प्रकाश में आया तो यह बिना किसी हो-हल्ला के रेलवे की ‘स्टैंंडिंग कमिटी’ के पास गया। उस समिति के अध्यक्ष थे पश्चिम बंगाल के बांकुरा से सीपीएम सांसद वासुदेव आचार्य। ‘स्टैंडिंग कमिटी’ का मजेदार पहलू यह था कि ध्ीरेंदz अगzवाल भी उसके एक नुमाइंदे थे। अनुसंधन में समिति ने पाया था कि उस समय के रेलमंत्राी नीतीश कुमार के कारण विभाग को मोटामोटी 200 करोड़ रुपए का घाटा हुआ लिहाजा, कमिटी ने अपनी तÝतीश के पश्चात पफैसला लिया कि किसी स्वतंत्रा एजेंसी द्वारा इस मामले की पड़ताल करवाई जाए। समिति के उक्त प्रथम प्रतिवेदन को राज्यसभा एवं लोकसभा में 19 अगस्त 2004 को विध्वित उपस्थापित कर दी गयी।

स्टैंडिंग कमिटी की टिप्पणी, मंतव्य एवं आदेश के आलोक में रेल विभाग ने स्टैंडिंग कमिटी के समक्ष कार्यान्वयन प्रतिवेदन समर्पित किया, जिसका उल्लेख स्थायी समिति के सातवें प्रतिवेदन की कंडिका 1.7 से 1.10 में की गयी है। इसकी कंडिका 1.9 विशेष रूप से दzष्टव्य है, जिसमें कहा गया है कि ‘In para 1.9 it is stated that the matter has been taken up by the CBI for investigation. Views of the standing committee have been communicated with a request to look in to the standing committee observations.’

इसी प्रतिवेदन की कंडिका 1.10 में कहा गया है कि ‘As matters related to the losses suffered by Railways due to transporation charges of concrete sleepers the same has been handed over to the CBI for investigation.’

इसी कंडिका के अंत में स्थायी समिति ने अपना स्पष्ट आदेश दिया जो निम्नांकित है:-

‘The Committee desire that the enquiry report of the CBI and the new guidelines finalised for procurement of sleepers and decision taken for opening of new plant in zonal be placed before the committee as and when recieved/reviewed.’

मामले की गंभीरता को देखते हुए रेल विभाग ने इसकी जांच सीबीआई को सुपुर्द कर दी थी तथा सीबीआई ने इसे जांच हेतु स्वीकार भी कर लिया था। स्थायी समिति का स्पष्ट आदेश था कि जांच प्रतिवेदन प्राप्त होते ही उसे स्थायी समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाय। अंतत: 17 पफरवरी, 2005 को कमिटी ने अपनी सातवीं रिपोर्ट में खुलासा किया कि सीबीआई को जांच सुपुर्द कर दिया गया है और उसने छानबीन शुरू भी कर दी है। इस आशय की जानकारी पहली मार्च, 2005 को राज्यसभा को तथा दूसरी मार्च, 2005 को लोकसभा को भी दी गई।

वक्त आगे बढ़ता रहा। सन~ 2008 में मिथिलेश कुमार सिंह को पता चला कि सीबीआई ने न तो संसद और न ही रेल मंत्राालय की स्थाई समिति के पास उपरोक्त केस का जांच प्रतिवेदन समर्पित किया है। इस घोटाले की लड़ाई लड़ रहे लोकतांत्रिाक समता दल के अध्यक्ष एवं बिहार विधन परिषद के पूर्व सदस्य पीके सिन्हा कहते हैं-‘जब हमलोगों को 2008 में संसद के कतिपय माननीय सदस्यों सहित कुछ विश्वस्त सुत्राों से पता चला कि चार वर्ष बीत जाने के बावजूद सीबीआई द्वारा इस गंभीर घोटाले का जांच प्रतिवेदन संसद अथवा रेल मंत्राालय से संबंध्ति संसद की समिति के समक्ष समर्पित नहीं की गई है तो हमलोगों ने 12 अगस्त 2008 को रेल मंत्राालय एवं सीबीआई से सूचना का अध्किार अध्निियम 2005 के तहत इस मामले की अद्यतन जानकारी की मांग की। इसके बावजूद जहां सीबीआई ने कोई जवाब ही नहीं दिया वहीं रेल मंत्राालय के लोक सूचना पदाध्किारी सुमित कुमार ने अपने पत्रा संख्या-1197 दिनांक 6 अक्टूबर 2008 के द्वारा सूचित किया कि सीबीआई इस मामले में तृतीय पक्ष होने की हैसियत से रेल मंत्राालय को सूचना देने से रोक दिया है।’ बस पिफर क्या था, मिथिलेश सिंह ने सीबीआई द्वारा लगाई गई रोक पर आपत्ति प्रकट करते हुए केंदzीय सूचना आयोग से मांग की कि आरटीआई एक्ट, 2005 की दपफा 18 के अंतर्गत, वह इसकी जांच करे। मिथिलेश सिंह ने यह खत 27 अक्टूबर, 2008 को भेजा था। उपरोक्त शिकायत पत्रा पर सम्यक विचार करने के बाद केंदzीय सूचना आयोग ने सीबीआई को स्पष्ट पफरमान जारी किया कि मिथिलेश सिंह को नियमानुसार वांछित खबर दी जाए। केंदzीय सूचना आयोग के उपसचिव सह ज्वाइंट रजिस्ट्रार केपी श्रेयष्कर ने बाकायदे अपनी चिट~ठी से ;दिनांक 06.01.10द्ध श्री सिंह को यह अवगत कराया था। श्रेयष्कर ने सूचना देने की मियाद दस दिनों की मुकर्रर की थी। बावजूद इसके सीबीआई पूरी तरह उदासीन रही।

घोटाले की इस लड़ाई को मुस्तैदी से लड़ने वाले मिथिलेश कुमार सिंह कहते हैं-‘केंदzीय सूचना आयोग के स्पष्ट आदेश के बावजूद जब प्रासंगिक सूचना न तो रेल मंत्राालय और न सीबीआई के द्वारा दी गयी तब हमलोगों ने 25 पफरवरी 2010 को पुन: केंदzीय सूचना आयोग के समक्ष शिकायत की।’ उक्त शिकायत पत्रा पर विचारोपरांत 31मई 2010 को केंदzीय सूचना आयोग ने वीडीयो काWप्रफेंसिंग के द्वारा सुनवाई की जिसमें तीनों पक्ष शामिल थे। एक पक्ष मिथिलेश कुमार सिंह एवं पीके सिन्हा दूसरा पक्ष सीबीआई की ओर से विकास कुंवर निगरानी निदेशक एवं तीसरा पक्ष मनीष माथुर उपनिदेशक निगरानी उपस्थित थे। तीनों पक्षों को सुनने के उपरांत पीके सिन्हा एवं मिथिलेश कुमार सिंह की अपील को स्वीकार करते हुए मुख्य सूचना आयुक्त ने स्पष्ट आदेश दिया कि सीबीआई द्वारा जांच के संबंध् में रेल मंत्राालय को भेजे गए पत्रा 16 जनवरी 2006 की प्रमाणित प्रति पीके सिन्हा एवं मिथिलेश कुमार सिंह को 10 दिनों के अंदर उपलब्ध् करायी जाय। उक्त आदेश के बावजूद सीबीआई ने रेल मंत्राालय को भेजे गये पत्रा दिनांक 16 जनवरी 2006 की प्रमाणित प्रति यह कहते हुए देने से इंकार कर दिया कि उक्त पत्रा के देने से उस आदमी का जीवन खतरा में पड़ जायेगा जिन्होंने सीबीआई को प्रासंगिक जानकारी दी है। सीबीआई की पत्रा संख्या-1598 दिनांक 08 जून 2010 के द्वारा केंदzीय सूचना आयोग के आदेश की अवहेलना करते हुए वांछित सूचना देने से इंकार कर दिया।

पीके सिन्हा कहते हैं-‘सीबीआई के उक्त रवैए से जब यह स्पष्ट हो गया कि सीबीआई और रेल मंत्राालय की मिलीभगत से घोटाले में लिप्त तत्कालीन रेल मंत्राी नीतीश कुमार तथा रेल मंत्राालय एवं रेलवे बोर्ड के उच्चाध्किारियों को बचाने की कोशिश की जा रही है तो हमने मामले की पूरी स्थिति से वाकिपफ कराते हुए 15 दिसंबर 2010 को प्रधनमंत्राी डा. मनमोहन सिंह को आवेदन पत्रा भेजा। उक्त आवेदन के संदर्भ में प्रधनमंत्राी कार्यालय के पत्रा संख्या-आरटीआई 251@2011 दिनांक 4 मार्च 2011 के द्वारा सूचना दी गई कि आवेदन को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को प्रेषित कर दिया गया है।’
इसी क्रम में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के पत्रा संख्या-401@11@2011-एभीडीआईभी दिनांक 23 मार्च 2011 के द्वारा सूचना दी गयी कि प्रधनमंत्राी को भेजे गए आवेदन में की गयी शिकायतों पर आवश्यक कार्रवाई हेतु रेल मंत्राालय एवं गृह मंत्राालय को निर्देश दिया गया।

इसके बावजूद जब रेल मंत्राालय अथवा गृह मंत्राालय ने न तो कोई कार्रवाई की और न ही कोई सूचना दिया तब मिथिलेश कुमार सिंह ने माननीय उच्च न्यायालय दिल्ली में 12 दिसंबर 2011 को याचिका दायर की। ;संख्या-8919@12.12.2011द्ध इस याचिका पर 21 दिसंबर 2011 को सुनवाई के दौरान सहायक सोलीसिटर जेनरल एस चाढ़ोस ने माननीय न्यायालय को सूचित किया कि सीबीआई ने इस मामले की जांचकर प्रतिवेदन समर्पित कर दिया है, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया है।

चूंकि सरकार ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय में स्पष्ट रूप से यह बताया था कि प्रतिवेदन समर्पित कर दिया गया है और इसे स्वीकार भी कर लिया गया है इसलिए मिथिलेश कुमार सिंह एवं पीके सिन्हा ने इसकी संपुष्टि हेतु लोकसभा सचिवालय से जानकारी मांगी, जिसके जवाब में लोकसभा सचिवालय ने अपने पत्रा संख्या-1;1484द्ध@प्ब्ध्11 दिनांक 20 जनवरी 2012 द्वारा स्पष्ट रूप से बताया कि स्टैंडिंग कमिटी को कोई ऐसी रिपोर्ट नहीं मिली है। जाहिर है कि रेल विभाग एवं सीबीआई के द्वारा इस मामले में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय को भी गलत सूचना दी गयी थी। इतना ही नहीं, इस आरोप को भी आधर मिल गया कि सीबीआई केंदz सरकार के इशारे पर हजारों करोड़ की राशि के घोटाले के मामले में संलिप्त तत्कालीन रेल मंत्राी नीतीश कुमार एवं इससे जुड़े विभाग के उच्चाध्किारियों को बचाने की साजिश कर रही है।

लोकसभा सचिवालय से प्राप्त स्पष्ट सूचना कि उनके सचिवालय को कोई जांच प्रतिवेदन नहीं मिला है तथा सीबीआई द्वारा जांच प्रतिवेदन देने से इंकार करने के बाद इन नये तथ्यों के आलोक में मिथिलेश कुमार सिंह ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय में पुनर्वीक्षा याचिका ;संख्या-621@2012द्ध दाखिल की। इस पुनर्वीक्षा याचिका पर दिनांक-7 दिसंबर 2012 को सुनवाई हुई जिसमें प्रतिवादी रेलवे विभाग के द्वारा माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रेलवे के रिस्पाWन्डेट कमिटी ने पिफर से उस रिपोर्ट को दिखाया जिससे पता चलता है कि सीबीआई की इन्क्वायरी हुई थी। उस रिपोर्ट को स्टैंडिंग कमिटी के आगे भी पेश की गई थी। उसका हुबहू नीचे उ¼त है।

‘The Counsel for the respondent Railways has again shown the records to us in confidence and which disclose that a CBI inquiry was indeed conducted and the report of the CBI was placed before the standing committee of the Railway.’

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने रेलवे के उक्त कथन पर विश्वास करते हुए पुनर्वीक्षा याचिका को निस्तारित कर दिया। आनेवाले कंडिकाओं के अवलोकन से आपको स्पष्ट हो जाएगा कि माननीय उच्च न्यायालय में भी रेलवे और सीबीआई ने भzामक एवं असत्य बयान दिया था। इस घोटाले को बेपर्द करने के प्रति कटिब¼ मिथिलेश कुमार सिंह एवं पीके सिन्हा ने संसद की स्थायी समिति को समर्पित उस प्रतिवेदन की मांग की, जिसका उल्लेख अपर सोलीसिटर जेनरल ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायलय के समक्ष दिनांक 21 दिसंबर 2011 को सुनवाई के दौरान किया था। किंतु सीबीआई ने जांच प्रतिवेदन देने के बजाय अपने पत्रा संख्या- त्ज्प्ध्276ध्2011ध्ब्ठप्ध्2182 दिनांक 3 पफरवरी 2012 के द्वारा जांच प्रतिवेदन देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि सीबीआई को अब सूचना का अध्किार अध्निियम 2005 की धरा 24 के तहत सेकेण्ड सीड~यूल में डाल दिया है। लिहाजा, इस संस्था पर अब सूचना का अध्किार अध्निियम 2005 लागू नहीं होता है।

“नीतीश को सीबीआई क्यों बचा रही है इस सवाल का जवाब नीतीश और कांगzेस के बीच लगातार प्रगाढ़ हो रहे मध्ुर संबंध् में छिपा है। हालांकि नीतीश को इससे बहुत लाभ होने वाला नहीं है क्योंकि इस मामले में हमलोगों ने पिछले पांच वर्षों में सूचना अध्किार अध्निियम 2005 के तहत इतना दस्तावेज एवं सबूत इकट~ठा कर लिया है कि अब कांगzेस एवं सीबीआई के संरक्षण से भी नीतीश कुमार को जेल जाने से बचना मुश्किल है। सच यह है कि इसके लिए नीतीश कुमार कांगzेस के साथ सौदेबाजी कर रहे हैं। इस सौदेबाजी से जहां कांगzेस को बचे हुए कार्यकाल में जदयू के 20 सांसदों का सहयोग मिल जाएगा वहीं नीतीश कुमार को स्लीपर खरीदगी घोटाले में पिफलहाल जेल जाने से राहत मिल जाएगी। यह मामला सीध्े-सीध्े भzष्टाचार निरोध् अध्निियम 1988 की धरा 13;1द्ध;डीद्ध के दायरे में आता है जिसमें सात वर्षों तक की सजा का प्रावधन है।”

मिथिलेश सिंह कहते हैं यह बातें सरासर मिथ्या है। पिफर इस पत्रा पर कड़ा प्रतिवाद एवं खंडन करते हुए हम लोगों ने अपने पत्रा के द्वारा 21 पफरवरी 2012 को सीबीआई को कहा कि सूचना का अध्किार अध्निियम 2005 की धरा 24 की प्रोविजन ;प्रंतुकद्ध में सापफ कहा गया है कि द्वितीय अनुसूचित में शामिल संस्थाओं और संगठनों के मामले में भी भzष्टाचार एवं मानवाध्किार उल्लंघन से जुड़े सूचनाओं के लिए छूट नहीं मिलेगी। इतना ही नहीं हमलोगों ने पूरी स्थिति का वर्णन करते हुए 22 मार्च 2012 को माननीय केंदzीय सूचना आयोग के समक्ष सूचना का अध्किार अध्निियम 2005 की धरा 18 के अंतर्गत शिकायत करते हुए जांच एवं कार्रवाई की मांग की।’ इस शिकायत पत्रा पर 12 सितंबर 2012 को माननीय मुख्य सूचना आयुक्त ने सुनवाई की जिसमें आवेदक मिथिलेश कुमार सिंह एवं प्रतिवादी सीबीआई की ओर से अपर महानिरीक्षक एमआर कदोले उपस्थित थे। दोनों पक्षों को विस्तार पूर्वक सुनने के बाद मुख्य सूचना आयुक्त सत्येंदz मिश्रा ने मिथिलेश कुमार सिंह की अपील को स्वीकार करते हुए 12 दिसंबर 2012 को निर्णय दिया। जो यथावत नीचे उ¼त किया जा रहा है।

‘We have carefully considered the facts of the case. The information sought pertains to allegations of corruption and therefore, is squarely convered under the provision to section 24 of the right to information (RTI)Act which mandates, the organisations like the CBI to disclose such information. Therefore we tend to agree with the contention of the Appellant and direct the CPIO to provide the Appellant within 10 working days of receiving this order the copy of the report which the CBI had presented to the Lok Sabha in this matter. However if the CBI had presented no such report of the Lok Sabha the CPIO shall inform the Appellant suit abely.’

माननीय मुख्य सूचना आयुक्त के उक्त निर्णय के आलोक में सीबीआई के उप महानिरीक्षक अशोक तिवारी ने ;अपने पत्रा संख्या सीबीआई 1 क्छण् 21ध्1;12द्धध्2012.च्क्ध्941 दिनांक 29 अप्रैल 2013 के द्वाराद्ध जो आदेश निर्गत किया है वह न सिपर्फ आश्चर्यजनक है बल्कि सीबीआई के द्वारा पूर्व में दी गयी सूचनाओं एवं माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दिए गए बयानों के विपरीत भी है। श्री तिवारी ने कहा है कि स्लीपर खरीदगी के घोटाले के मामले में सीबीआई ने कोई जांच ही नहीं की। जबकि पूर्व में सीबीआई और रेल विभाग ने न सिपर्फ मिथिलेश कुमार सिंह एवं पीके सिन्हा को बल्कि माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय में कहता रहा कि घोटाले की जांच की गयी थी। यहां तक कि इनलोगों ने जांच की कोई संचिका भी माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ;7 दिसंबर 2012द्ध को दिखाया था, जिसकी चर्चा उफपर की जा चुकी है।

इसी पत्रा की कंडिका 4 में मुख्य सूचना आयोग के 12 दिसंबर 2012 के निर्णय की कंडिका 5 में कहा गया है कि माननीय मुख्य सूचना आयुक्त की भzष्टाचार से संबंध्ति सूचना देने के मामले में मुख्य सूचना आयुक्त की यह व्यवस्था कि सीबीआई को भzष्टाचार से संबंध्ति सूचना देना ही है, को सीबीआई ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी है और इसमें माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 4 सितंबर 2013 तक अंतरिम स्थगन मिला हुआ है। सीबीआई में प्रासंगिक पत्रा की कंडिका 5 में अब कहा जा रहा है कि इस मामले में सीबीआई ने लोकसभा को कोई जांच प्रतिवेदन दिया ही नहीं है। जबकि पूर्व में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष 21 दिसंबर 2011 एवं पुन: 7 दिसंबर 2012 को स्पष्ट रूप से केंदz सरकार के द्वारा यह बताया गया था कि सीबीआई के द्वारा जांच की गयी है तथा जांच प्रतिवेदन लोकसभा की स्थायी समिति को समर्पित किया गया है और उसे स्वीकार भी कर लिया गया है। हैरत की बात यह है कि पीके सिन्हा और मिथिलेश कुमार सिंह को भी बार-बार यही बताया जाता रहा कि जांच हुई है, किंतु कभी किसी की जान का खतरा बताकर तो कभी सूचना का अध्किार अध्निियम 2005 की धरा 24 का तर्क देकर मिथिलेश कुमार सिंह एवं पीके सिन्हा को प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रति देने से इंकार किया गया जबकि इसके लिए माननीय मुख्य सूचना आयुक्त पहली बार 31 मई 2010 एवं दूसरी बार 12 दिसंबर 2012 को स्पष्ट आदेश दे चुके हैं जिसकी चर्चा उफपर की जा चुकी है। पीके सिन्हा कहते हैं कि प्रधनमंत्राी डा. मनमोहन सिंह के इशारे पर सीबीआई नीतीश कुमार एवं घोटाले में शामिल अन्य उच्चाध्किारियों को लगातार बचाने की साजिश कर रही है। यहां एक बात मैं आपको स्मरण दिलाउंगा कि 31 मई 2010 को पहली बार माननीय मुख्य सूचना आयुक्त ने सीबीआई को स्पष्ट आदेश दिया था कि आवेदक मिथिलेश कुमार सिंह को जांच प्रतिवेदन की प्रति दे दी जाय। ठीक उसी समय से नीतीश कुमार का केंदz सरकार के प्रति व्यवहार एवं रवैया बदलने लगा और वे विशेष राज्य का दर्जा का बहाना बनाकर कांगzेस से समर्थन की बात करने लगे।’
इसी मामले में जब 12 दिसंबर 2012 को मुख्य सूचना आयुक्त ने स्पष्ट आदेश दिया कि आवेदक मिथिलेश कुमार सिंह को सीबीआई का जांच प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रति उपलब्ध् करा दी जाय तब सीबीआई ने जांच प्रतिवेदन नहीं देकर माननीय मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश के खिलापफ माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर दी और यहां तक कि सूचना का अध्किार अध्निियम 2005 की धरा 24 के प्रोविजन ;प्रंतुकद्ध की व्याख्या को बदल कर भzष्टाचार के मामले में भी सूचना देने से मुक्ति की मांग की है।

इस पूरे प्रकरण में सीबीआई स्वयं अपने ही बुने जाल में पफंस चुकी है। दरअसल, 31 मई, 2010 को मुख्य सूचना आयुक्त के सामने केंदzीय अनुसंधन ब्यूरो के आईओ सौरभ त्रिापाठी ने यह रहस्योद~~घाटन किया था कि एजेंसी ने जांच से इंकार करते हुए इस मुतल्लिक 16 जनवरी, 2006 को ही रेलवे बोर्ड को पत्रा लिख डाला था। हालांकि मुख्य सूचना आयुक्त ने उपरोक्त चिट~ठी की प्रति मिथिलेश सिंह को उपलब्ध् कराने को स्पष्ट हुक्म प्रदान किया था, लेकिन उन्हें उसकी काWपी नहीं दी गई। लिहाजा, यहां यह सवाल बरबस उठता है कि सीबीआई क्यों बार-बार अपना वक्तव्य इस मुíे पर बदलती रही है। एक तरपफ वह ताल ठोंककर दावा करती है कि यह मामला पड़ताल के लायक ही नहीं है जबकि दूसरी ओर वह इस बात पर बल देती है कि जो जानकारी उसके पास है, उसके उजागर होने से उन लोगों के जीवन दूभर हो जाएंगे जिन्होंने इस बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों से उसे रू-ब-रू कराया है। जाहिर है सीबीआई ने खोजबीन की है और उसकी नजर में मसला बेहद गंभीर है। अगर ऐसा नहीं होता, तो जान के खतरे में पड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसका बिल्कुल स्पष्ट अर्थ है कि सीबीआई का तर्क हास्यास्पद और विरोधभासी है।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर सीबीआई इस घोटाले पर पर्दा क्यों डालना चाहती है। क्या सीबीआई कांगzेस के दबाव में ऐसा कर रही है? क्या इस सवाल का जवाब नीतीश और कांगzेस के बीच प्रगाढ़ होते रिश्ते की कहानी में छिपा हुआ है? इंतजार कीजिए, इस सवाल का जवाब भी जल्द ही मिल जाएगा।

Leave a Reply

Powered By Indic IME