October 21, 2017

लाल हवेली में लालू

Photo GalleryBy wmadmin123 - Tue Oct 22, 8:35 am

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में पांच वर्षों की सजा हो जाने के बाद राष्ट्रीय जनता दल के उफपर जैसे अंध्ेरा छा गया है। रांची की विशेष सीबीआई कोर्ट द्वारा 30 सितंबर 2013 को सुनाये गए इस पफैसले के बाद बिहार की सड़कों पर कई सवाल तैरने लगे हैं। सवाल यह कि लालू यादव के बाद अब कौन संभालेगा राजद की कमान? सजा के बाद लालू यादव की लोकसभा की सदस्यता तो समाप्त हो ही गयी है साथ ही वे अगले 11 वर्षों तक चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे। लोकसभा चुनाव कुछ ही महीनों के बाद होने वाला है। लालू के बिना कितना असरदार भूमिका निभा पाएगा राजद? क्या लालू यादव का राजनीतिक जीवन सांध्य वेला में पहुंच गया है? इतना ही नहीं सबसे बड़ा सवाल यह है कि लालू का राजनीतिक उत्तराध्किारी कौन होगा? इस बात को लेकर राजद के अंदर ही अंदर वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई है। उध्र लालू के जेल में बंद हो जाने के बाद पार्टी के उफपर टूट के बादल भी मंडराने लगे हैं। उध्र बिहार के कृषि मंत्राी एवं वरिष्ठ जदयू नेता नरेंदz सिंह ने खुलेआम राजद के नेताओं को जदयू में शामिल होने का न्यौता दे दिया है। नरेंदz सिंह ने कहा है-‘राजद में जितने अच्छे लोग हैं उनका जदयू में स्वागत है।’ हालांकि पार्टी के कई नेता राजद मंे किसी भी संभावित टूट से इंकार करते हैं लेकिन सचाई यही है कि इन दिनों हर छोटे-बड़े राजद नेता एक-दूसरे को शक की निगाह से देख रहे हैं। अभी बिहार विधनसभा में राजद के 22 विधयक हैं। संभावना जतायी जा रही है कि आध्े से अध्कि विधयक राजद से अलग हो सकते हैं। राजद के कर्णधरों के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती है विधयकों एवं पार्टी कार्यकर्ताओं को एक सूत्रा में बांध् कर रखने की। जानकारों की मानें तो नीतीश 2010 में जब दोबारा मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर बैठे तो उस समय राजद के कई विधयक नीतीश का दामन पकड़ने को बेताब थे। लेकिन नीतीश ने तब इन विधयकों के आगे घास नहीं डाला था। कारण उस समय उन्हें इन विधयकों की आवश्यकता नहीं थी। अब जबकि जदयू एनडीए से अलग हो गया है, नीतीश को भी सूबे के अलग-अलग क्षेत्राों में भाजपा से मुकाबले के लिए परिचित चेहरांे की आवश्यकता है। बताया तो यहां तक जा रहा है कि नीतीश कुमार के मंत्रिामंडल विस्तार नहीं करने का एक कारण यह भी था कि लालू यादव को सजा होने पर राजद में मचने वाली संभावित भगदड़ की हालत में उनके बड़े बागी नेताओं का स्वागत मंत्राी पद देकर कर सकें। उध्र राजद नेता रघुनाथ झा के नरेंदz मोदी से भेंट करने की चर्चा भी खूब जमकर हो रही है। सूत्रा बताते हैं कि जदयू की नजर राजद के कुछ मजबूत नेताओं मसलन, अब्दुलबारी सिíिकी, अख्तरूल इमान, शकुनी चौध्री, समzाट चौध्री, ललित यादव जैसे नेताओं पर है। खासकर नीतीश चाहते हैं कि अब्दुलबारी सिíिकी जैसे नेता उनके साथ आ जाए। इस मुतल्लिक वे कई बार विधनसभा में इशारा भी कर चुके हैं। कहना न होगा, अब्दुलबारी सिíिकी का सम्मान न केवल मुसलमानों के बीच है बल्कि समाज के अलग-अलग तबकों में भी है। दरअसल, नीतीश को लगता है कि सिíिकी जैसा मुस्लिम चेहरा उनके साथ आता है तो उन्हें मुस्लिम राजनीति और मुस्लिम वोटरों को साध्ने में सहुलियत होगी। इध्र लालू को सजा होते ही सियासी गलियारों में चर्चा यहां तक शुरू हो गई कि अब्दुलबारी सिíिकी जदयू में जाएंगे और नीतीश कुमार उन्हें उपमुख्मंत्राी की कुर्सी सौंपेंगे। हालांकि श्री सिíिकी ऐसी अपफवाहों को अपने विरोध्यिों के द्वारा पफैलाये जाने की बात कहते रहे हैं। राजद के 17वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोध्ति करते हुए श्री सिíिकी ने बहुप्रचारित राजद की संभावित टूट पर कहा था कि हमारी लड़ाई शातिरों से है। कुछ शातिर विरोध्ी दलों में हैं और कुछ शातिर अपनी पार्टी के अंदर भी हैं जो ऐसी अपफवाहें पफैलाते हैं। उस दिन श्री सिíिकी ने एक वाकया भी उपस्थित लोगों को सुनाया था। उन्होंने कहा था-‘एक दिन लालू जी का पफोन आया कि पार्टी में बाWबी काWन है? मैंने कहा, मैं किसी बाWबी को नहीं जानता। पिफर वे बोले समस्तीपुर से बाWबी कार्यकर्ता कह रहा था कि सिíिकी जी 12 विधयकों को लेकर नीतीश जी के साथ जा रहे हैं। यह सुनते ही मुझे ध्क्का लगा। वह इसलिए कि मैं लालू जी के साथ शुरू से हूं और वे मुझसे अध्कि किसी के पफैलाये भzम पर यकीन कर मुझसे पूछ रहे हैंं।’ श्री सिíिकी ने तब यह भी कहा कि लालू जी मैं कर्पूरी के जमाने से आपके साथ हूं। जबतक लालू जी हैं, पार्टी और विचार है तब तक इसे छोड़कर नहीं जाउफंगा।’

सवाल अपनी जगह अभी भी कायम है कि अब कौन संभालेगा राजद की कमान? इस मुíे पर पार्टी दो भागों मंे बंटी हुई दिखती है। पार्टी का एक बड़ा तबका चाहता है कि राजद की कमान लालू के परिवार से अलग किसी दूसरे योग्य नेता को दी जाए। जबकि दूसरा तबका जिसकी संख्या बहुत कम है, राबड़ी या उनकी संतान के हाथों में देने की इच्छा रखता है। लालू के खासमखास एवं राजद सांसद रामकृपाल यादव कहते हैं- ‘पिछली बार भी लालू यादव के संकट में आने पर राबड़ी देवी ने सबकुछ संभाला था। राबड़ी देवी के नेतृत्व में पार्टी गांव-गांव जाएगी और जनता को यह बताएगी कि लालू यादव को पफंसाया गया है।’ उध्र 30 सितंबर 2013 को लालू यादव के जेल जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्राी एवं लालू की पत्नी राबड़ी देवी ने भी यह बयान दिया था कि वे सोनिया गांध्ी की तरह अपने बेटे के साथ मिलकर पार्टी चलाएंगी। हालांकि राबड़ी का यह बयान पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को रास नहीं आया। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह राबड़ी के उस बयान को खारिज करते हुए कहते हैं कि अपनी बात कहने की आजादी सबको है, राबड़ी जी भी अपनी इच्छा प्रकट कर रही थीं। जहां तक पार्टी की बात है इसे सब मिलकर चलाएंगे। रघुवंश प्रसाद सिंह की बातों से यह स्पष्ट है कि लालू के बाद नेतृत्व के नाम पर सीध्े तौर पर राबड़ी या पिफर उनके बच्चे स्वीकार नहीं होंगे। पिफर क्या था लालू के खासमखास रामकृपाल यादव ने लालू-राबड़ी के पक्ष में बयान देकर नेतृत्व को लेकर शुरू हुई वर्चस्व की लड़ाई को और तीखा कर दिया। दरअसल, लालू का कौन होगा उत्तराध्किारी यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लालू प्रसाद को सजा होने के बाद उनकी लोकसभा की सदस्यता भी समाप्त हो गयी है तथा वे आगामी लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ सकते। ऐसे में सवाल उठता है कि कितना असरदार होगा लालू के बिना वह चुनाव। हालांकि इससे पूर्व 1997 में जब लालू यादव जेल गये थे तो पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर बिठाकर जेल से ही सत्ता चलाते रहे। लेकिन उस समय और आज की परिस्थिति में काफी अंतर है। उस समय लालू यादव की तूती बोलती थी और वे सत्ता में थे लेकिन आज राजनीतिक रूप से लालू हासिये पर हैं।

लालू की परेशानी यह है कि वे अपने परिवार के अलावे सत्ता के मामले में किसी और पर विश्वास नहीं करते। राजद सुप्रीमो की नजदीकियों की मानें तो उनकी इच्छा है कि अगला लोकसभा चुनाव राजद तेजस्वी के नेतृत्व में लड़े। इसके लिए वे पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से बात भी कर चुके हैं। वैसे भी तेजस्वी कुछ महीनों से सूबे में राजद को खड़ा करने के लिए पसीना बहा रहे हैं। राजद सूत्राों की मानें तो लालू यादव को सजा मिलने का एहसास पहले हो गया था। इसीलिए उन्होंने 11 सितंबर 2013 को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में तेजस्वी और तेज प्रताप को जहां युवा राजद की कमान सौंपी थी वहीं लगे हाथ पार्टी कार्यकर्ताओं को कार्यक्रम भी दे दिया था। सूत्राों की माने तो पार्टी की कमान सौंपने की बुनियाद के तौर पर तेजस्वी को चुनाव स्टार प्रचारक की भूमिका देने की रूपरेखा भी तैयार है। लालू यादव ने लोकसभा चुनाव के लिए पंदzह सदस्यीय चुनावी टीम भी बना चुके हैं। वे यह भी कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान यदि इस टीम को समन्वय की जरूरत पड़ी तो उसके संचालन की कमान राबड़ी देवी के पास रहेगी। इतना ही नहीं, यदि इस टीम को कोई बड़े पफैसले लेने की आवश्यकता होगी तो इसकी स्वीकृति राबड़ी देवी से लेनी होगी। राबड़ी देवी भी बीते कुछ महीनों से अखबारों में दिखने लगी हैं। इतना ही नहीं लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती भी राजद के विभिन्न कार्यक्रमों में उपस्थित होने लगी हैं। दरअसल, राबड़ी, मीसा भारती और तेजस्वी, तेज प्रताप की सक्रियता लालू के उसी राजनीति का हिस्सा है। हालांकि तेजस्वी का लांचिंग तो पिछले विधनसभा चुनाव में ही लालू ने कर दिया था। लेकिन बड़ी हार ने उनके लांचिंग को बदमजा कर दिया। पिफर करीब ढ़ाई साल के बाद जब गांध्ी मैदान में राजद की परिवर्तन रैली हुई उसमंे भी लालू ने तेजस्वी, तेजप्रताप के साथ-साथ बेटी मीसा भारती को भी पार्टीसिपेट करवाया था। सवाल उठता है कि पार्टी के वरिष्ठ नेतागण लालू कीे संतानों और राबड़ी देवी के नेतृत्व को किस तरह स्वीकार करते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। पिफलहाल, पार्टी लालू की सजा को एक मुíा बनाकर आम जनता के बीच जाने की योजना बनायी है। जनता के बीच जाकर ये बताएंगे कि लालू यादव साजिश के शिकार हुए हैं। बात जो भी हो लेकिन सचाई यही है कि लालू के प्रत्यक्ष नेतृत्व के अभाव में पार्टी को एक सूत्रा में बांध्े रखना और आगामी चुनाव में वोट बैंक को जोड़े रखना एक चुनौती है।

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