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कैसे होगी जच्चा बच्चा की सुरक्षा

Posted By wmadmin123 On October 22, 2013 @ 9:47 am In लापरवाही | No Comments

मां बनना हर समाज में सौभाग्य की बात मानी जाती है। जीवन का सृजन करने वाली जननी की जिंदगी खुद दांव पर लगी हुई होती है। साथ ही, उसका शिशु भी खतरे से खाली नहीं होता। भारत में हर साल करीब 56 हजार महिलाओं की मौत प्रसव संबंध्ी समस्याओं की वजह से होती है। आंकड़े बताते हैं कि करीब तेरह लाख शिशुओं की मौत जन्म के एक साल के भीतर हो जाती है। इनमें से 50 पफीसदी मौतें जन्म के एक हÝते के भीतर हो जाती हैं। ज्यादातर नवजात जन्म के पहले या दूसरे दिन ही दम तोड़ देते हैं। उल्लेखनीय है कि इसी तस्वीर को बदलने के लिए केंदz सरकार ने साल 2011 में ‘जननी-शिशु सुरक्षा योजना’ की शुरुआत की, जिसका मकसद गर्भवती महिलाओं को मुÝत चिकित्सीय सेवाएं मुहैया कराना है। इसके तहत शहरी और गzामीण इलाकों के सरकारी अस्पतालों में सामान्य और सिजेरियन प्रसव के दौरान महिलाओं को समगz चिकित्सीय सुविध उपलब्ध् कराने का प्रावधन है। इस योजना में बीमार नवजातों को जन्म के तीस दिनों तक चिकित्सीय और अन्य सुविध दी जाती हैं। इस योजना के तहत महिलाओं को सामान्य प्रसव के दौरान मुÝत दवाइयां और अन्य सुविधएं देने के प्रावधन हैं, साथ ही तीन दिनों तक मुÝत आहार भी देना होता है। सिजेरियन प्रसव की सूरत में तमाम सुविधएं 7 दिनों तक देना अनिवार्य है, जिसमें मुÝत जांच, खून उपलब्ध् कराने जैसी सुविधएं भी शामिल हैं। इसके तहत घर से अस्पताल तक एंबुलेंस की सुविध भी मुहैया कराने का प्रावधन है। बीमार नवजातों के लिए तमाम सुविधएं जन्म के 30 दिनों बाद तक उपलब्ध् कराने का प्रावधन भी योजना में शामिल है। जननी और शिशु तक ये सुविधएं पहुंचाने के लिए केंदz सरकार ने साल 2011-12 में 1400 करोड़ रुपए की राशि राज्योंं को आवंटित किया, वहीं साल 2012-13 में 2100 करोड़ रुपए की राशि राज्यों को आवंटित की गयी। योजना के क्रियान्वयन के लिए जागरुकता के महत्व को समझते हुए केंदz सरकार ने ‘राष्ट्रीय गzामीण स्वास्थ्य मिशन’ के तहत हर राज्य के प्रोगzाम क्रियान्वयन योजना में सूचना, शिक्षा और संचार के लिए अलग से बजट को अनिवार्य बनाया है। ‘जननी-शिशु सुरक्षा योजना’ में सापफ दिशा-निर्देश दिया गया है कि राज्य सरकारें योजना के बारे में लोगों को प्रचार के अलग-अलग माध्यमों के जरिए जानकारी दें। इसके लिए छोटे बड़े सरकारी अस्पतालों में बोर्ड, होर्डिंग, वाWल पेंटिंंग्स के जरिए लोगों को जननी-शिशु सुरक्षा के तहत मिलने वाली सुविधओं के बारे में बताना अनिवार्य है। प्रसव गृह, वार्ड, ओपीडी, अस्पताल के प्रवेश द्वार जैसी जगहों पर इस योजना के संबंध् में बोर्ड आदि लगाना अनिवार्य है। बिहार सरकार ने साल 2012 में इस संबंध् में अलग से भी आदेश दिये थे। लेकिन इन तमाम दिशा-निर्देशों के बाद सरकारी अस्पतालों में जमीनी हकीकत कुछ और कहानी कहती हैं। ‘जननी-शिशु सुरक्षा योजना’ के दिशा-निर्देशांे के पालन की सचाई की हकीकत को जानने के निमित्त जब सामाजिक संस्था ‘सेवा सेतु’ की ओर से इस लेखक ने सरकारी अस्पतालों का दौरा किया तो कापफी चमत्कारिक खुलासे देखने को मिले। सर्वे मंे पाया कि इन योजनाओं के बारे में इन अस्पतालों द्वारा लोगों को जागरुकता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। इस साल जून में पटना के 8 अस्पतालों के सर्वे के बाद पता चला कि कई अस्पतालों में दिशा-निर्देशांे का पालन ही नहीं किया जा रहा है। गर्दनीबाग अस्पताल, लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल, पफुलवारी स्वास्थ्य केंदz, दानापुर अस्पताल, पटना सिटी का गुरुगोविंद अस्पताल, राजेंदz नगर अस्पताल, पुनपुन अस्पताल और न्यूगार्डीनर अस्पताल में सर्वे के दौरान पता चला कि योजना के बारे में जन जागरण के लिए केंदz और राज्य सरकारों के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया है। इन अस्पतालों में ‘जननी-शिशु सुरक्षा योजना’ के संबंध् में कोई होर्डिग, बोर्ड या वाWल पेंटिंग्स नहीं मिला। सवाल उठता है कि अगर अस्पतालों में दिशा-निर्देशांे का पालन नहीं किया जाएगा तो लोगों को उनके हक के बारे में कैसे पता चलेगा और प्रसव संबंध्ी मौतों का सिलसिला कैसे थमेगा?


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