December 12, 2017

चारा घोटाले में नीतीश कुमार का नाम उन लाभार्थियों की सूची में शीर्ष पर है

Photo GalleryBy wmadmin123 - Tue Oct 22, 11:50 am

बिहार की आम जनता, जो चारा घोटाला को लालू यादव के शासन काल का एक बड़ा घोटाला के रूप में जानती है और इसके मुख्य अभियुक्त के रूप में लालू यादव को दोषी पाये जाने के बाद रांची उच्च न्यायालय द्वारा 25 लाख रुपए जुर्माने के साथ 5 वर्ष के लिए कारावास भेज दिए जाने के सामचार से भी अवगत हो चुकी है, को अब यह जान कर थोड़ा विस्मय हो सकता है कि इसी घोटाले के एक मामले में बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार पर भी कानून का पफंदा कसने ही वाला है।

दरअसल, गत 20 सितंबर को भzटाचार के मुíे पर मुखर एक सामाजिक कार्यकर्ता बक्सर के मिथिलेश कुमार सिंह के आवेदन पर रांची उच्च न्यायालय के एकल पीठ के जज श्री आरआर प्रसाद ने सीबीआई को कड़े लहजे में 22 नवंबर तक शपथ-पत्रा दाखिल कर यह बताने के लिए कहा है कि जांच के दौरान साक्ष्य मिलने के बावजूद नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी, राजीव रंजन सिंह उपर्फ ललन सिंह तथा उमेश सिंह के खिलापफ प्राथमिकी दर्ज क्यों नही की गयी? उच्च न्यायालय के इस कड़े रुख के उपरांत अब इस बात की उम्मीद बढ़ गयी है कि देर-सवेर सुशासन बाबू के विरू¼ भी सीबीआई प्राथमिकी दर्ज कर जांच आरंभ करेगी।

वस्तुत: चारा घोटाले में नीतीश कुमार का नाम उन लाभार्थियों की सूची में शीर्ष पर है जो इसके उद~भेदन के समय चारा घोटाले में संलिप्त विभिन्न आरोपितों को ब्लैकमेल करने में व्यस्त थे। इस घोटाले के सूत्राधर अर्थात ‘किंगपिन’ श्याम बिहारी सिन्हा ;अब दिवंगतद्ध ने सीबीआई को दिए अपने 161 के बयान में नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी को क्रमश: 1 करोड़ व 35-40 लाख रुपए और देने की बात कही थी। श्याम बिहारी सिन्हा के उसी बयान के आधर पर श्यामबिहारी सिन्हा से विजय कुमार मल्लिक के मापर्फत नीतीश एवं अन्य के पास रकम पहुंचाने के आरोपी व तत्कालीन मंत्रिामंडल के निगरानी विभाग में प्रशाखा पदाध्किारी के पद पर कार्यरत मध्यस्थ उमेश सिंह को गिरÝतार कर पूछताछ की गयी थी। तथ्य है कि उमेश 3 माह तक जेल में रहे थे। उस दरम्यान सीबीआई के एसपी जावेद अहमद, जिनपर उमेश सिंह ने ‘हैवियस कार्पस’ यानी अवैध् हिरासत का एक मुकदमा सीडब्लूजे 842@1996 किया था, ने जांच के दौरान संज्ञान में आये जिन कई महत्वपूर्ण बातों का खुलासा उसी मुकदमे के प्रति शपथ पत्रा में किया था। उनमें प्रमुख था उमेश सिंह के द्वारा चारा घोटाले के किंग पिन श्याम बिहारी सिन्हा के निदेश पर विजय कुमार मलिक के मापर्फत मिले लाखों-करोड़ों की रकम तत्कालीन राजनीतिक हस्तियों तक पहुंचाया जाना। इसी क्रम में उमेश ने कई चल-अचल संपत्ति भी अपने नाम किया जो उसके आय से अध्कि थी। एसपी जावेद अहमद ने शपथ पत्रा में कहा है कि उमेश सिंह प्रमुख षडयंत्राकर्ताओं में से एक है।

ऐसे खुला राज नीतीश एंड कंपनी का सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश कुमार सिंह को ेजब ज्ञात हुआ कि चारा घोटाला के किंग पिन श्याम बिहारी सिन्हा ने सीबीआई को दिए अपने 161 के बयान में नीतीश कुमार एवं शिवानंद दस्तावेजों में ललन सिंह और रामजतन सिन्हा को भी रकम दिए जाने का जिक्र है।

राजनीतिक विरोध्ी, लालू जी को झूठे मुकदमे में पफंसा कर व जेल भिजवा कर अपनी जीत समझ रहे हैं। हमारी पार्टी के नेता राज्य की जनता को घूम-घूम कर बताएंगे कि चारा घोटाले में किस तरह दूसरे नेताओं को बचाया गया और लालू प्रसाद को पफंसाया गया। मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी समेत कई अन्य नेताओं पर चारा घोटाले में सीबीआई जांच क्यों नहीं हुई, यह संदेश लोगांे को दिया जाएगा। अब मुझे 22 नवंबर के दिन का बेसबzी से इंतजार है जब लालू जी के विरू¼ षडयंत्रा करने वाले लोग भी कानून की गिरÝत में आएंगे और तभी मुझे न्याय मिलेगा।

सीबीआई द्वारा जांच के दरम्यान उपलब्ध् साक्ष्य ;आWन रिकार्ड व परिस्थिति जन्य दोनोंद्ध के आधर पर नीतीश कुमार व शिवानंद तिवारी से न तो पूछताछ की गई और न ही सीबीआई ने उनके बारे में कोई निश्चित विचार ही व्यक्त किया। सीबीआई ने जमा किए गये साक्ष्यों को ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थापित नहीं किया जिस कारण ट्रायल कोर्ट के माननीय न्यायाध्ीश का ध्यान नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी की तथाकथित संलिप्तता ;लाभार्थी की हैसियत सेद्ध पर नहीं जा सका।

प्रसाद ने ही इस घोटाले को पकड़ा था, लेकिन नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी, ललन सिंह, एवं भाजपा नेता सरयू राय की कंपनी ने उन्हें पफंसा दिया। लालू को पफंसाने वाले लेाग ही चारा घोटाले के सूत्राधर हैं। इन लोगों ने चारा घोटाले से लाभान्वित भी हुए हैं। ये लोग घोटाले के मुख्य आरोपित श्याम बिहारी सिन्हा से नोटों भरा सूटकेस लेकर राजद से अलग हो नई पार्टी खड़ी की थी।

-जगदानंद सिंह साक्ष्य का स्वरूप

आज की तारीख में कíावर राजनीतिक हस्ती नीतीश कुमार जो 2000 से अब तक तीन बार बिहार के मुख्यमंत्राी पद पर आसीन हुए हैं, को चारा घोटाले के लाभार्थी के रूप में लिप्त होने के बावजूद सीबीआई द्वारा बख्श देने की बात सामने आने के उपरांत सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश सिंह ने कानूनी संघर्ष कर सत्य को स्थापित करने और बिहार की अवाम के हित में सरकारी खजाने की लूट के बाद लाभ हासिल करने के तथाकथित आरोपी नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी जैसे राजनेताओंें को बेनकाब करने की ठान ली और जुट गये कानून के रास्ते ठोस कार्रवायी करवाने के अपने उíेश्य में।

इसके लिए मिथिलेश सिंह ने सबसे पहले सीबीआई के ट्रायल कोर्ट में अर्जी दायर की। ट्रायल कोर्ट में अपनी बात रखने के लिए मिथिलेश सिंह ने अपने वकील के माध्यम से 28 नवंबर 2011 को नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी के विरू¼ 319@सीआरपीसी के तहत सम्मन जारी करने हेतु प्रार्थना पत्रा दायर किया। इस प्रार्थना पत्रा को यह कहते हुए न्यायाध्ीश ने खारिज कर दिया कि मिथिलेश कुमार सिंह उक्त मामले में न तो सूचक हैं, न आरोपी हैं और न गवाह ही। ‘नो लोकस स्टेंडाई हेंस रिजेक्टेड’ के आदेश के साथ खारिज याचिका को मिथिलेश ने रांची उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उक्त न्यायालय में उनकी याचिका संख्या डब्ल्यू पीसीआर 392@2011 पर सीबीआई कोर्ट के उक्त आदेश को रí करते हुए ;सुबzãण्यम स्वामी वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधर पर जिसमें कोई भी भारतीय नागरिक भzष्टाचार के मामले में भी स्वतंत्रा रूप से न्यायालय की शरण में जा सकता हैद्ध नीचली अदालत को यह आदेश दिया कि मिथिलेश सिंह के वकील की बात कानून सम्मत तरीके से सुनी जाए। तदोपरांत 6 सितंबर 2012 को मिथिलेश सिंह की ओर से उनके वकील ने एक याचिका सीबीआई कोर्ट में पिफर दायर की जिसमें कहा गया कि याचिका को एक बार पिफर खारिज कर दिया। इसके बावजूद सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश ने हार नहीं मानी और पूरे जोश-खरोश के साथ पिफर से रांची हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने पहुंच गये। इसबार मिथिलेश सिंह की तैयारी पूरी थी। उन्होंने वरिष्ठ अध्विक्ता विभूति पांडेय के मापर्फत पूरे साक्ष्यों के साथ अपनी याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता के वकील ने अपनी बात रखते हुए कानून की शक्तियों की व्याख्या की और कहा-‘जब भी सरकार अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करेगी तो न्यायालय को इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि कानून की प्रक्रिया के दुरूपयोग की जगह कानून का शासन हो। यह दुरूपयोग निष्क्रियता की वजह से या असली अभियुक्तों को बचाने की मनमानी की वजह से हो सकता है। ऐसा दुरूपयोग विभिन्न प्राध्किारों द्वारा प्रक्रियात्मक एवं दंडात्मक कानूनों का ेपालन करने की वैधनिक अथवा कानूनी दायित्वों का निर्वहन नहीं करने से भी हो सकता है। प्रस्तुत मामले में सीबीआई द्वारा जांच के दरम्यान उपलब्ध् साक्ष्य ;आWन रिकार्ड व परिस्थिति जन्य दोनोंद्ध के आधर पर नीतीश कुमार व शिवानंद तिवारी से न तो पूछताछ की गई और न ही सीबीआई ने उनके बारे में कोई निश्चित विचार ही व्यक्त किया। सीबीआई ने जमा किए गये साक्ष्यों को ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थापित नहीं किया जिस कारण ट्रायल कोर्ट के माननीय न्यायाध्ीश का ध्यान नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी की तथाकथित संलिप्तता ;लाभार्थी की हैसियत सेद्ध पर नहीं जा सका। याचिकाकर्ता के द्वारा उपलब्ध् साक्ष्यों वाले दस्तावेजों और सीबीआई के रिकाWर्ड में उपलब्ध् दस्तावेजों के हवाले जो याचिकाकर्ता को उपलब्ध् नहीं हो सके हैं, के आधर पर ‘मेरिट’ पर सुनवाई की जाए और इस नयी याचिका को पिछली याचिका का पूरक माना जाए।

सीबीआई को दी गई याचिका में मिथिलेश सिंह ने सबूत के तौर पर चारा घोटाले की कार्रवाई के दरम्यान गवाह बनाये गये आर के दास ;पीडब्लू 17द्ध और जांच अध्किारी ;आईओद्ध अजय कुमार झा ;पीडब्लू 348द्ध के बयानों के साथ मुख्य अभियुक्त व मामले के किंग पिन श्याम बिहारी सिन्हा के सीबीआई के समक्ष धरा 161 में दिए बयानों का हवाला दिया गया और प्रार्थना किया गया कि उचित सुनवायी की जाय। पर, सीबीआई की ओर से बहस कर रहे सरकारी वकील के द्वारा मामले की जांच में कुछ ‘तकनीकी’ परेशनियों का जिक्र वाली दलील को सुन कर सीबीआई कोर्ट ने मिथिलेश सिंह की याचिका को एक बार पिफर खारिज कर दिया। इसके बावजूद सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश ने हार नहीं मानी और पूरे जोश-खरोश के साथ पिफर से रांची हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने पहुंच गये। इसबार मिथिलेश सिंह की तैयारी पूरी थी। उन्होंने वरिष्ठ अध्विक्ता विभूति पांडेय के मापर्फत पूरे साक्ष्यों के साथ अपनी याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता के वकील ने अपनी बात रखते हुए कानून की शक्तियों की व्याख्या की और कहा-‘जब भी सरकार अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करेगी तो न्यायालय को इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि कानून की प्रक्रिया के दुरूपयोग की जगह कानून का शासन हो। यह दुरूपयोग निष्क्रियता की वजह से या असली अभियुक्तों को बचाने की मनमानी की वजह से हो सकता है। ऐसा दुरूपयोग विभिन्न प्राध्किारों द्वारा प्रक्रियात्मक एवं दंडात्मक कानूनों का ेपालन करने की वैधनिक अथवा कानूनी दायित्वों का निर्वहन नहीं करने से भी हो सकता है। प्रस्तुत मामले में सीबीआई द्वारा जांच के दरम्यान उपलब्ध् साक्ष्य ;आWन रिकार्ड व परिस्थिति जन्य दोनोंद्ध के आधर पर नीतीश कुमार व शिवानंद तिवारी से न तो पूछताछ की गई और न ही सीबीआई ने उनके बारे में कोई निश्चित विचार ही व्यक्त किया। सीबीआई ने जमा किए गये साक्ष्यों को ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थापित नहीं किया जिस कारण ट्रायल कोर्ट के माननीय न्यायाध्ीश का ध्यान नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी की तथाकथित संलिप्तता ;लाभार्थी की हैसियत सेद्ध पर नहीं जा सका। यद्यपि जांच एजेंसी अपना विचार बनाने के मामले में सर्वोपरि है, पर जांच एजेंसी के विचारों का परीक्षण समर्थ न्यायालय के द्वारा अपनी न्यायिक विवेक से किया जाना कानून की प्रक्रिया होती है। पर इस मामले में ऐसा नहीं किया जा सका है। जो भी साक्ष्य रिकार्ड पर उपलब्ध् है वह श्यामबिहारी सिन्हा के द्वारा दिए गये बयान को पुष्ट करता है और तत्कालीन सीबीआई एसपी के द्वारा शपथ लेकर दिए गये बयान से मेल खाता है। पिफर भी इन साक्ष्यों को सीबीआई ने दबा दिया और ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया।

इसलिए मेरी प्रार्थना है कि मेरी याचिका स्वीकार की जाय और सीबीआई से पूछा जाय की याचिकाकर्ता के द्वारा आरोपित व्यक्तियों के विरू¼ जांच के दौरान प्राप्त साक्ष्यों को न्यायालय के समक्ष क्यों उपस्थापित नहीं किया गया? क्यों सभी संबंध्ति लोगों की जांच नहीं की गयी और उनके बयान कोर्ट के विवेकपूर्ण निर्णय हेतु क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया?’

बवाली बयान ‘बिहारी’ के चारा घोटाले में श्यामबिहारी सिन्हा के द्वारा सीबीआई को धरा 161 के तहत दिये गये बयान के प्रमुख अंश नीतीश कुमार के बारे में

चूंकि उमेश सिंह हमारी कमिटी के मासिक वेतनभोगी सहयोगी थे इसलिए वे मुझसे रांची, पटना और दिल्ली में अक्सर मिलते रहते थे। उनका राजनीतिक पहुंच बहुत अच्छा था। ऐसा कहा जाता था कि उनका संपर्क समता पार्टी के नीतीश कुमार के साथ भी था। उनका संपर्क शिवानंद तिवारी के मापर्फत ही विकसित हुआ था जो अब समता पार्टी में हैं।

1994 के अक्टूबर या नवंबर माह में मैं दिल्ली गया हुआ था, वहां सर्वप्रिय बिहार नई दिल्ली के मकान संख्या 5@14 में ठहरा था। उस यात्राा के दौरान उमेश सिंह भी दिल्ली में ही थे। उमेश सिंह ने मुझसे सर्वप्रिय बिहार में व्यक्तिगत तौर पर संपर्क किया और मुझसे कहा कि नीतीशजी आगामी विधनसभा चुनाव 1995 के खर्च के मद में कुछ रकम चाहते हैं। जैसा कि उमेश सिंह ने सूचित किया मांग 1 करोड़ रुपये की थी। मैं रांची लौटा और अपनी कमिटी के सदस्यों से इस मुíे पर विचार-विमर्श किया, खासकर डाW. के.एम प्रसाद और डाW. सीबी दुबे से विचार-विमर्श के दरम्यान कमिटि के सदस्यों ने महसूस किया कि समता पार्टी आगामी विधनसभा में एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर सकती है। चूंकि नीतीश कुमार समता पार्टी के एक मजबूत नेता के रूप में उभर रहे थे, इसलिए कमिटी ने निर्णय लिया कि नीतीश कुमार को 1 करोड़ भुगतान कर दिया जाय।

कमिटी के सदस्यों से विचार-विमर्श के उपरांत मैं पुन: दिल्ली गया और विजय कुमार मल्लिक को निर्देश दिया कि वे नीतीश के लिए उमेश सिंह को 1 करोड़ रुपये दे दें। यह नवंबर-दिसंबर का कोई समय था जब विजय मल्लिक ने उमेश सिंह को 1 करोड़ रुपया भुगतान नई दिल्ली में किया था। जब अपने तीसरे दौरे पर मैं दिल्ली में था तो नीतीश कुमार ने दूरभाष पर इस बात की पुष्टि की कि उमेश सिंह आये और मुझसे मिले। नीतीश ने तब उस आर्थिक मदद के बारे मंे कहा। उस वक्त तक मैं अपने इलाज हेतु आस्ट्रेलिया जाना तय कर चुका था। यह नीतीश कुमार की जानकारी में थी। उन्होंने मेरी शीघz व तीवz स्वास्थ्य सुधर के लिए मुझे शुभकामनाएं दी। वह जगह जहां नीतीश कुमार ने मुझसे संवाद किया था, होटल खितू हाउस, करोलबाग था जहां उमेश सिंह आमतौर पर ठहरा करते थे। मैंने उमेश सिंह से उसी होटल में मुलाकात की थी। उमेश सिंह ने पुष्टि की थी कि वह 1 करोड़ रुपये जो कि उन्हें विजय कुमार मल्लिक से मिली थी नीतीश कुमार को सौंप दिया गया। उस होटल में उमेश के ठहरने के बिल का भुगतान विजय कुमार मल्लिक ने किया था। बाद में, विजय मल्लिक ने भी इस बात की पुष्टि की कि उमेश सिंह को 1 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया था। वह रकम कैसे और कहां दिया गया इस बात को मल्लिक से ही ज्ञात किया जा सकता है। मैं इस बात से इनकार करता हूं कि उमेश को रकम देने के लिए विजय मल्लिक के साथ मैं भी गया था।

शिवानंद तिवारी के बारे में

वे ‘सिटिजन काउंसिल आWपफ बिहार’ के उपाध्यक्ष थे। पहले वे जनता दल में थे। जनता दल के विभाजन के बाद उन्होंने समता पार्टी ज्वाWयन किया था। उन्होंने उमेश सिंह के मापर्फत पैसों की मांग की थी जो कि बिहार के मंत्रिामंडल सचिवालय के निगरानी विभाग में प्रशाखा पदाध्किारी थे। उन्होंने उमेश सिंह के हवाले कहलवाया था कि यदि वह भुगतान नहीं किया गया तो वे हाईकोर्ट में एक ‘रिट’ दाखिल कर पशुपालन विभाग के कुकृत्यों का भंडापफोड़ कर देंगे। 1994 के नवंबर माह में मैं दिल्ली में था। उमेश सिंह सर्वप्रिय बिहार के मकान संख्या 5@14 में पहुंचे और मुझे शिवानंद तिवारी के पास ले गये जो होटल किला हाउस, करोलबाग मंे ठहरे हुए थे। शिवानंद तिवारी ने 50 लाख रुपये मांगा। मैंने उनसे कहा कि मुझे इस मांग के बारे में अपने अन्य सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श करना हेागा। तब उन्होंने कहा कि आप उमेश सिंह को पटना में पफोन कर लेना। अपनी रांची वापसी पर मैंने दो कमिटी सदस्यों डाW. केएम प्रसाद, डाW. सीबी दुबे से विचार-विमर्श किया। ऐसा तय किया गया कि हमलोग शिवानंद तिवारी को 35-40 लाख से अध्कि भुगतान नहीं करें। तदोपरांत त्रिापुरारी मोहन प्रसाद को निदेश दिया गया कि वे उमेश सिंह को 40 लाख रुपये तक शिवानंद तिवारी को भुगतान हेतु देने को दिया। वह राशि 1994 के नवंबर माह में किसी समय दिया गया था। बाद में त्रिापुरारी मोहन प्रसाद ने पुष्टि की कि उन्होंने 30-35 लाख रुपये शिवानंद तिवारी को देने के लिए उमेश सिंह को दे दिए हैं। मुझे स्मरण नहीं है कि कितनी राशि वास्तव में दी गयी थी। पर यह पटना में ही दिया गया था। त्रिापुरारी मोहन इसका विवरण दे पायेंगे।

null रामजतन सिन्हा के बारे में

रामजतन सिन्हा, तत्कालीन एमपी, जो उस वक्त डीएसी के अध्यक्ष थे, पशुपालन विभाग के अध्किारियों का अक्सर पीछा करते थे कि वे दस्तावेज परीक्षण व जांच के लिए उपस्थित करे। उन्हें भी मांगे जाने पर अच्छा-खासा रकम दिया गया जिसका कारण स्पष्ट था।

इस बार उच्च न्यायालय रांची ने याचिकाकर्ता के विद्वान अध्विक्ता को गंभीरता से सुना और 20 सितंबर 2013 को यह आदेश दिया कि सीबीआई 22 नवंबर 2013 के दिन शपथ पत्रा दायर कर याचिकाकर्ता के आरोपों के मíेनजर सारी बातों को स्पष्ट करें और यह बताए कि साक्ष्य रहने के बावजूद नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी पर प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गयी?

बकौल मिथिलेश ‘यकीनन, यह सच है कि जानबूझकर कर सीबीआई ने नीतीश कुमार व शिवानंद तिवारी जैसे संदेहास्पद व्यक्तिव के विरू¼ बन रहे मामले के अनुसंधन में कोई रुचि नहीं ली। जबकि उन्हीं की तरह के साक्ष्यों के आधर पर लालू प्रसाद, जगन्नाथ मिश्रा, आरके राणा, जगदीश शर्मा, भोलाराम तूपफानी, विद्यासागर निषाद के मामले में अनुसंधन, गिरÝतारी से लेकर जेल भेजने तक की कार्रवाई की गयी। आखिर इस तरह का भेदभाव क्यों, यह एक बड़ा सवाल है जो आज भी सुलग रहा है। क्योंकि सीबीआई ने चारा घोटाले में क्लर्क व आदेशपाल तक को नहीं छोड़ा तो पिफर नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी जैसे कíावर नेताओं को क्यों छोड़ दिया। क्या सिपर्फ इसलिए कि इनकी उफंची पहुंच आड़े आ रही थी? वाकई सीबीआई के वर्ताव से ऐसा ही लगा कि नीतीश और शिवानंद के मामले में अनुसंधन को बिना आगे बढ़ाये मौन लगाकर वह किसी ‘बड़े’ राजनीतिक दवाब का सामना करती रही है। शायद इसीलिए इन दोनों के विरू¼ श्यामबिहारी सिन्हा व अन्य अभियुक्तों यथा उमेश सिंह, आरके दास के बयानों से छन कर आ रही साक्ष्यों को ट्रायल कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया गया।

बहरहाल, आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों पर गंभीर दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट होता है कि ‘किंग पिन’ श्याम बिहारी सिन्हा ने अपने सहयोगी विजय कुमार मलिक के द्वारा मंत्रिामंडल निगरानी मेंे कार्यरत जिस उमेश सिंह के मापर्फत समता पार्टी के बड़े नेताओं को ‘मैनेज’ करने के लिए बड़ी रकम भिजवाया उससे पूछताछ के क्रम में आयी तथ्यों को तत्कालीन सीबीआई एसपी जावेद अहमद ने अपने प्रति शपथ पत्रा में उ¼ृत किया है। एसपी जावेद के अनुसार उमेश सिंह पशुपालन विभाग में स्वयं को निगरानी निरीक्षक बताकर वहां के अध्किारियों को एक ओर जहां ब्लैकमेल करता था वहीं विभाग में श्याम बिहारी सिन्हा के काले कारनामांे को दबाये रखने के लिए जरूरी दवाब भी बनाये रखता था। जांच के दौरान श्री अहमद ने पाया कि उमेश सिंह ने चारा घोटाले में आरोपित एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता दीपक चांडक से बड़ी रकम प्राप्त किया था जो कि उसने उस समय के महत्पूर्ण राजनीतिक हस्तियों को ‘मैनेज’ करने के वास्ते लिया था ताकि श्यामबिहारी सिन्हा और उसके सहयोगी घोटालेबाजों के कारनामों को लेकर वे लोग अध्कि हायतौबा न मचाए। यह बात जांच अध्किारी के द्वारा उमेश से हुई पूछताछ के दरम्यान भी सामने आयी। नि:संदेह जावेद साक्ष्यों में से एक है जिसने माननीय रांची उच्च न्यायालय को सीबीआई से शपथ पत्रा देकर अपनी बातें कहने का आदेश देने के लिए विवश किया होगा। जाहिर है, सीबीआई को 22 नवंबर को अपने शपथ पत्रा में यह बताना ही होगा कि .सीबीआई एसपी जावेद अहमद के प्रति शपथ पत्रा में जिस उमेश सिंह को चारा घोटाले में बुरी तरह संलिप्त बताया गया उसकी आगे जांच क्यों नहीं की गयी? उसे गिरÝतार कर महीनों जेल मंे रखने के बाद आखिर कैसे और क्यों छोड़ दिया गया? जिस श्यामबिहारी सिन्हा के बयान पर जांच करने के उपरांत लालू प्रसाद व अन्य राजनेताओं के साथ दर्जनों कर्मचारियों व आईएएस अध्किारियों को आरोपित कर जेल भेजा गया उसी श्याम बिहारी सिन्हा के द्वारा नामित होने के बावजूद नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी एवं अन्य की भूमिका की जांच क्यों नहीं की गयी?

सीबीआई ने अपनी जांच में उमेश सिंह को चारा घोटाला मामले का एक प्रमुख ‘लिंक पर्सन’ पाया था। पशुपालन विभाग के कर्मचारी आरके दास ने भी अपने बयान में जोर देकर कहा था कि उमेश सिंह श्याम बिहारी सिन्हा के सहयोगी के रूप में विजलेंस में होने का धैंस देकर मनमापिफक कार्य करवाया करता था। श्याम बिहारी सिन्हा ने भी जांच के दरम्यान स्पष्ट कहा था कि सिविल डिपोजिट को निर्गत कराने व ‘मेसो स्कीम’ हेतु अनुशंसित होने के लिए उमेश सिंह के मापर्फत ही एक प्रभावशाली तत्कालीन मंत्राी को बड़ी राशि बतौर नजराना दिया गया था। इतना ही नहीं उमेश सिंह के ही मापर्फत सिन्हा ने कई राजनेताओं को मुंह बंद रखने के एवज में मोटी-मोटी राशि भिजवायी थी ताकि वे विधनसभा के अंदर या बाहर हल्ला-हंगामा न करंे। इतने सारे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बावजूद उमेश सिंह को आखिर किस बिनाह पर छोड़ दिया गया, यह एक बड़ा अनुत्तरित सवाल है जिसके सही उत्तर में ही चारा घोटाले के अगले एपीसोड में कई सपफेदपोश राजनेताओं व अध्किारियों के संलिप्त होने का राज छिपा है। इस प्रसंग में याचिकाकर्ता मिथिलेश सिंह का हना है कि-‘जब सीबीआई को लगा कि उमेश नीतीश कुमार और शिवानंद के लाभार्थी होने के संबंध् मंे सारे राज उगल देगा, तो ‘उफपरी’ दवाब में उसने न केवल उमेश के छूट जाने के उपाय कर दिए वरन~ उसके उफपर आगे किसी भी कार्रवाई पर भी विराम लगा दिया। ऐसा निश्चय ही कांगzेस से नीतीश की क्रमश: बढ़ती नजदीकियों के कारण ही हुआ है। मायावती, मुलायम की तरह नीतीश को भी सीबीआई का डर दिखा कर कांगzेस आलाकमान ने बीजेपी से गठबंध्न तोड़ लेने की शर्त पर चारा और स्लीपर घोटाले में बचाने का वचन दिया है। नीतीश ने वैसा ही किया इसलिए सीबीआई पहले स्लीपर और अब चारा घोटाले में भी नीतीश को बचाने का प्रयास कर रही है। पर उफपर वाला सब देख रहा है। मुझे कानून पर पूरा भरोसा है। मैं रांची उच्च न्यायालय का शुक्रगुजार हूं कि वहां मेरी गुजारिश सुन ली गयी और सीबीआई को शपथ पत्रा देकर सारी अनुत्तरित बातों का खुलासा करने का आदेश दिया। देखना है कि 22 नवंबर को सीबीआई माननीय उच्च न्यायालय, रांची को क्या बताती है।’

कहना नहीं होगा कि न्याय के तराजू पर सभी एक समान होते हंै। सीबीआई ने जिन कई तथ्यों की जानकारी होने के बावजूद न्यायालय को अब तक अंध्ेरे में रखा है उसका खुलासा होते ही संभव है कि चारा घोटाला मामले में कई और सपफेदपोश बेनकाब हो जाएं। रांची हाईकोर्ट मेंे दिए गए आवेदन में याचिकाकर्ता मिथिलेश सिंह ने कई ऐसे बातों व साक्ष्यों को शुमार किया है जिससे यह प्रतीत होता है कि सीबीआई ने जानबूझकर नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी जैसे कुछ ऐसी ख्यात लोगों को बचाने का कार्य किया है जो चारा घोटाला प्रकरण के लाभार्थी बताए गए हैं। उक्त आवेदन के अनुसार जब आरसी 33@1996 की सुनवाई के दरम्यान कोर्ट से चारा घोटाले के विभिन्न वादों में उमेश सिंह के दर्ज बयानों को प्रस्तुत करने का आगzह किया गया तो उस वक्त सीबीआई की ओर से उत्तर आया कि वे बयान आरसी 22 ए@1996, 25 ए@1996 तथा 28 ए@1996 में दर्ज कराए गए हैं जो संप्रति उच्च न्यायालय में लंबित है। क्या कहता है कानून?

याचिकाकर्ता मिथिलेश कुमार सिंह सत्य की स्थापना के लिए एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय का दरवाजा खटखटाते रहे। सबसे पहले तो उन्हें यह कहकर टरका दिया गया कि उनका इस मामले से कोई संबंध् नहीं है। जबकि सुबzãण्यम स्वामी के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था-‘जिस प्रकार एक आम नागरिक अपराध्यिों के विरू¼ भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।’ दूसरे शब्दांे में सर्वोच्च न्यायालय ने भzष्टाचारियों को भी अपराध्यिों की श्रेणी में रखा। वाकई कानूनन किसी आम नागरिक के विरू¼ पूर्वागzह से गzस्त होने की बात कहकर मामले को रपफा-दपफा नहीं किया जा सकता। भzष्टाचार के मुíे पर कानून की स्पष्ट सोच है। वह यह कि हमारे देश में भzष्टाचार न केवल संवैधनिक शासन के लिए गंभीर खतरा है, वरन इसने भारतीय लोकतंत्रा के प्रत्येक आधर और कानून के सामzाज्य को भी खोखला कर रहा है। भzष्टाचार का परिमाण को इतना बढ़ गया है कि इससे समावेशी समाज के निर्माण में व्यवधन उत्पन्न हो रहा हैऋ मानवाध्किार पर चोट किया जा रहा हैऋ कानून को ध्ता बताया जा रहा हैऋ समानता, न्याय, विकास, भाईचारा, स्वाध्ीनता जैसी भारतीय संविधन की मूलभूत प्रस्तावना की बातों को कमतर मानने का कारण बनता जा रहा है। इस स्थिति में न्यायालय का कर्तव्य है कि भzष्टाचार निरोध्ी कानून को इस तरह अमल में लाये कि उससे भzष्टाचार विरोध्ी मुहिम को ताकत मिले। जहंा तक चारा घोटाले मंे नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी जैसे राजनीतिक हस्ती के विरू¼ साक्ष्य रहने के बावजूद सीबीआई द्वारा बचाने की बात है, इस संबंध् मंे कानून के जानकारों का स्पष्ट मत है कि सीबीआई जैसी एजेंसी को ऐसी चूक नहीं करनी चाहिए। साक्ष्य आने पर उसकी जांच और संबंध्ति आरोपियों से पूछताछ करना उसका संवैधनिक दायित्व है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो इससे इस संदेह को बल मिलेगा है कि मामले में ‘बड़े’ लोगों की संलिप्तता को उजागर नहीं करने का ‘उफपरी दवाब’ सीबीआई पर अवश्य रहता है। कानून इस बात की इजाजत कतई नहीं देता की जांच एजेंसी किसी प्रभावशाली राजनीतिक हस्ती को परिस्थिति और कानून की मांग के बावजूद जांच और पूछताछ से वचिंत रखा जाय। अर्थात यदि किसी प्रभावशाली राजनीतिक हस्ती के द्वारा किसी महत्वपूर्ण जांच को ‘हाइजैक’ कर लिया जाय और उसमें उसकी संलिप्तता से संबंध्ति साक्ष्यों को सक्षम न्यायालय के समक्ष उपस्थापित न किया जाय तो न्यायालय मूक दर्शक बन कर सिपर्फ इसलिए नहीं रह सकता कि तकनीकी आधर नहीं बनता या सुनवाई में विलंब होगा। खासकर ऐसे में जब जांच अध्किारी ने अपने बयान में यह माना है कि आरोपितों के एक समूह से संबंध्ति मामले की जांच नहीं की गयी है। इस परिस्थिति में न्यायालय कानूनन पिफर से जांच के आदेश बड़ी सहजता से दे सकता है। यहां पिफर से जांच का हमेशा यही अभिप्राय होगा कि जिन मामलों की जांच नहीं की गयी है, उनकी जांच। याचिकाकर्ता मिथिलेश सिंह के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। ट्रायल कोर्ट ;विचारण न्यायालयद्ध ने बिना तथ्यों और परिस्थितियों का संज्ञान लिए और दस्तावेजों को बिना परखे व सत्यापित करवाए ही तकनीकी आधर पर उनकी अर्जी खारिज कर दी थी, पर उच्च न्यायालय रांची ने वस्तुस्थिति की गंभीरता को कानूनी दृष्टि से परखते हुए सीबीआई को प्रतिशपथ पत्रा दाखिल कर यह बताने का आदेश दिया है कि किन परिस्थितियों में साक्ष्य रहने के बावजूद नीतीश कुमार, शिवानंद तिवारी व अन्य पर प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गयी? अब सीबीआई के समक्ष सांप-छछूंदर वाली गति हो गई है। यदि सीबीआई कोर्ट को सचाई बताती है तो उसे अपने आकाओं का कोपभाजन बनना पड़ेगा। और यदि नहीं बताती है तो कोर्ट के कड़े रुख के संकट का सामना करना पड़ेगा।

Leave a Reply

Powered By Indic IME