October 21, 2017

मझधार में नैया डोले तो मांझी पार लगाए, मांझी जब नाव डुबोए उसे कौन बचाए

By wmadmin123 - Mon Sep 15, 8:02 am

वर्ष 1972 में हिंदी की एक fफल्म आयी थी ‘अमर प्रेम’। उस fफल्म का एक सदाबहार गाना है-‘मझधर में नैया डोले तो मांझी पार लगाए, मांझी जब नाव डूबोए उसे कौन बचाए।’ बिहार की सियासत के गलियारों में इन दिनों यह गाना खूब गुनगुनाए जा रहे हं। हालांकि, fफल्म में यह गाना राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर पर fफल्माया गया है लेकिन सियासत के गलियारे में इस गीत को गुनगुनाने वाले सूबे के पूर्व मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार और वर्तमान में सत्ता की कमान संभाले जीतनराम मांझी को ध्यान में रखकर गुनगुना रहे हैं। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों शामिल हैं। विपक्ष के लोग जहां इस गीत को गुनगुना कर नीतीश के उस रणनीति का मजाक उड़ा रहे हैं जिसके तहत सियासी लाभ लेने के लिए उन्होंने मांझी को मुख्यमंत्राी बनाया वहीं सत्ता पक्ष के लोग इसे गुनगुना-गुनगुनाकर अपने मन की पीड़ा को हल्का करने में लगे हैं। कहना न होगा, बीते लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी से टकराकर अपनी पफजीहत करा चुके नीतीश की नैया जब सियासत की मझधर में डगमगाने लगी तो उन्होंने एक नया दांव खेला और बिहार की सत्ता की पतवार जीतनराम मांझी के हाथों में थमा दिया इस उम्मीद के साथ कि श्री मांझी मझधर में डगमगा रही उनकी नैया को संभाल लेंगे और शानदार तरीके से पार भी लगाएंगे। लेकिन मुख्यमंत्राी बनने के बाद श्री मांझी जिस तरह एक के बाद एक विवादित बयान दे रहे हैं इससे जदयू के अध्किांश नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयी है। मांझी का मीडिया में कभी बयान आता है कि-‘छोटे व्यापारी अगर बच्चे को पढ़ाने के लिए कालाबाजारी करते हैं तो ध्न्यवाद के पात्रा हैं। छोटा व्यापारी कितना कालाबाजारी करेगा? थोड़ा-बहुत कमाकर अपने बच्चे को पढ़ा रहा है, तो मेरी तरपफ से मापफी।’ तो कभी सीएम का बयान आता है-‘सूबे में भ्रष्टाचार बढ़ा है। जब वे विधयक थे तो उन्हें भी अपना काम कराने के लिए घूस देना पड़ा था।’ कभी शिड्यूल कास्ट के लोगों को अंतरजातीय विवाह कर अपनी आबादी बढ़ाने की सलाह देते हैं तो कभी पत्राकारों को ‘उचक्का’ शब्द से सुशोभित करते हैं। कभी जनता को ‘पागल’ कहते हैं तो कभी यह बयान देकर भूख से बिलबिला रहे और चूहे खाकर जीवनयापन कर रहे महादलितों के चेहरे का रंग और स्याह कर देते हैं कि चूहा खाना कोई बुरी बात नहीं है, मैं भी चूहा खाता हूं। कभी कहते हैं-‘जिन-जिन विधनसभा क्षेत्रों में मैं प्रचार करने गया, अगर वहां के प्रत्याशी जीते तो उन क्षेत्रों के लोगों की आउट आॅपफ वे जाकर मदद करूंगा।’ इसी प्रकार मांझी कभी यह बयान देकर सभी को सकते में डाल देते हैं कि उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को डीजीपी से कहकर बचाया था जिसने किसी दूसरे व्यक्ति को जान से मारने के लिए बंदूक चलाई थी। गोली चलाने वाले व्यक्ति को न उन्होंने जेल जाने दिया और न ही उसकी बंदूक सीज होने दी। इतना ही नहीं, बवाल मुख्यमंत्राी के बेटे का एक महिला पुलिसकर्मी के साथ गया के होटल में रंगरेलियां मनाने को लेकर भी खड़ा हुआ। यह बात जब मीडिया की सुर्खी बनी तो सीएम ने बेटे के बचाव में जो बयान दिया उसपर भी अंगुलियां उठी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नीतीश के उत्तराध्किारी जीतनराम मांझी सियासत की मझधर में पफंसी उनकी नैया को सकुशल पार लगा पाएंगे?
उध्र, विपक्ष तो उनके हर विवादित बयान पर हल्ला बोल ही रहा है, इस मुतल्लिक मांझी सरकार को समर्थन देने वाली सहयोगी पार्टियों में भी बेचैनी है। इसके कई नेता दबे जुबान से तो कई खुलकर मुख्यमंत्राी के विवादित बयानों पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया है। सत्ता के सहयोगी पार्टी राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्राी को नसीहत देते हुए कहते हैं-‘स्तरहीन मुद्दों पर अलाय-बलाय बयान देना बंद करें सीएम। वे मुख्यमंत्राी हैं इस बात का उनको ख्याल रखना चाहिए। किसी सीएम को राज्य की तरक्की एवं खुशहाली के बारे में सोचना और बोलना चाहिए। मांझी इससे अलग स्तरहीन मुद्दों पर अलाय-बलाय बयान दे रहे हैं। उन्होंने अपने बेटे के बचाव में भी जो कुछ कहा है वह भी सही नहीं है। उन्हें कहना चाहिए था कि कानून अपना काम कर रहा है।’ श्री सिंह ने मांझी के रिश्वत देने संबंध्ी बयान पर भी सवाल खड़ा किया है। उन्होंने कहा है कि-‘सीएम का काम भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश करना है न कि यह कहना कि हमने भी अपना काम घूस देकर करवाया था।’ दरअसल, 12 अगस्त 2014 को राजधनी में नए प्रखंड विकास पदाध्किारियों की बैठक को संबोध्ति करने के क्रम में श्री मांझी ने कहा था कि-‘नीतीश राज में विकास तो हुआ पर भ्रष्टाचार भी पफैला। मुझे खुद बिजली बिल के सेटलमेंट में पैसे देने पड़े। मेरे गया स्थित आवास का बिजली बिल 25 हजार रुपए आया था। लोगों ने मुझे सलाह दी कि रिश्वत देकर कम करा लीजिए। अपने बेटे को बिजली कार्यालय भेजा। 5 हजार रुपये में काम हो गया। पिफर गया के अध्ीक्षण अभियंता के यहां पहुंचा, उन्हें जानकारी दी तो वे भौंचक रह गए। बाद में 10 अध्किारियों पर आर्थिक अपराध् इकाई का छापा डलवाया, उनके यहां से करोड़ों की संपत्ति मिली।’ मुख्यमंत्राी के इस बयान पर सियासी बवाल खड़ा हो गया। सत्ता पक्ष तो चुप और बचाव की मुद्रा में रहे लेकिन विपक्ष ने इसे एजेंडा बना लिया। भाजपा नेता एवं बिहार प्रभारी ध्र्मेन्द्र प्रधन ने कहा-‘अब स्वयं ही नीतीश के नाॅमिनेट मुख्यमंत्राी अगर ये कहते हैं कि मेरे को भी घूस देना पड़ा था तो नीतीश के राज पर उससे बड़ा सवालिया निशान कुछ नहीं हो सकता।’ सुशील मोदी ने लगे हाथ पूर्व मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार से पूछ डाला कि-‘चारा घोटाले के सजायाफ्रता लालू यादव से गले मिलाकर भ्रष्टाचार कैसे रोक पाएंगे?’ सीएम के घूस प्रकरण की गूंज बिहार के सियासी गलियारों के अलावा जब देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में भी सुनाई पड़ी तब जदयू के अंदर भी खलबली मच गई। कारण, नीतीश कुमार की पूंजी ही ‘सुशासन’ है। भ्रष्टाचार के खिलापफ जीरो टाॅलरेंस की बात करके ही नीतीश ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि गढ़ी। भ्रष्टाचार मुक्त शासन एवं बेदाग छवि के जरिए ही नीतीश कुमार खुद को देश के दूसरे नेताओं से अलग श्रेणी में रखते रहे हैं। लेकिन जब स्वयं मुख्यमंत्राी ने ही भ्रष्टाचार बढ़ने की बात कबूल कर ली तो सियासी घमासान तो मचना ही था। जीतनराम मांझी के इस बयान पर जदयू भी सकते में आ गया। जदयू का कोई नेता यह समझ नहीं पा रहा था कि इसका बचाव कैसे किया जाए। कृषि मंत्राी नरेंद्र सिंह का बयान आया-‘हमारी सरकार भ्रष्टाचार के खिलापफ जीरो टाॅलरेंस की नीति पर काम कर रही है। इसमें कामयाब भी हुए हैं। ठीक है, अब भी गड़बडि़यां हैं। रिश्वतखोरी है, तो रिश्वतखोर पकड़े भी जा रहे हैं।’ राजद के प्रदेश अध्यक्ष अब्दुलबारी सिद्दीकी का बयान आया-‘बेशक प्रदेश में भ्रष्टाचार बेलगाम है। आम आदमी त्रास्त है। रुपये मुख्यालय से चलते हैं मगर इसकी कुछ कम मात्रा ही जमीन तक पहुंचती है। इसके लिए जदयू और भाजपा दोनों जिम्मेदार है।’ पिफर शरद यादव ने मोर्चा संभाला। उल्टे जीतनराम मांझी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा-‘मांझी जब का वाकया बता रहे हैं तब वे भी इसी सरकार में मंत्राी थे और इस नाते उनकी भी जिम्मेदारी बनती है। उन्हें उस समय अपनी बात को कैबिनेट में उठाना चाहिए।’ शरद यादव के इस बयान के बाद मांझी पर दबाव बढ़ा। लिहाजा, मामले को बिगड़ते देख 14 अगस्त 2014 को मुख्यमंत्राी अपने बयान से पलट गए और कहा कि उनके बेटे ने बिजली का बिल ठीक कराने के लिए रिश्वत नहीं दी थी बल्कि उस व्यक्ति ;बिजलीकर्मीद्ध को मिठाई खाने के लिए 200 रुपए दिये। उन्होंने कहा जिस घटना का मैंने उल्लेख किया है वह 1994 की है। कहना न होगा, 1994 में लालू यादव की सरकार थी और मांझी लालू के ही साथ थे। मुख्यमंत्राी ने कहा कि बेहद मामूली बात को पिफजूल में इतना बड़ा बना दिया गया। जबकि सही बात यह है कि मैंने गया में अपने घर के बिजली बिल का भुगतान करने के लिए अपने पुत्रा को 5000 रुपये दिये थे। उसने मुझे 3300 रुपए वापस किए। जब मैंने बिल देखा तो 1500 रुपए ही था। मैंने उससे 200 रुपये के बारे में पूछा तो मेरे बेटे ने बताया कि उसने वे पैसे बिजली कर्मी को मिठाई खाने के लिए दिये जिन्होंने पुराने बिल का पता लगाने का कष्ट उठाया। मुख्यमंत्राी के घूस प्रकरण पर उठा विवाद अभी ठीक तरह से सामान्य भी नहीं हुआ था कि बीते 2 सितंबर 2014 को उन्होंने पिफर एक अजीबो-गरीब बयान देकर सूबे की सियासत को गरमा दिया। इस नये विवादित बयान में उन्होंने कालाबाजारी करने वालों की पीठ थपथपा दी। बिहार राज्य खाद्यान व्यवसायी संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्राी मांझी ने कहा कि-‘बच्चों की पढ़ाई के लिए व्यवसायी कालाबाजारी करते हैं तो वे ध्न्यवाद के पात्रा हैं। दो-चार हजार करोड़ की कालाबाजारी करने वालों पर सख्ती की जरूरत है।’ उन्होंने कहा कि वे छोटी-मोटी कालाबाजारी को अपराध् नहीं मानते। छोटा व्यापारी कितना कालाबाजारी करेगा। थोड़ा-बहुत कमा कर यदि अपने बच्चों को पढ़ा रहा है तो मेरी तरपफ से उसे मापफी है। मजे की बात यह है कि मुख्यमंत्राी के सुर में सुर मिलाते हुए उनके कृषि मंत्राी ने भी कालाध्न से जुड़े एक अजीबोगरीब बयान दे दिया। मंत्राी नरेंद्र सिंह ने कहा कि कालाध्न को सपफेद करने का मौका लोगों को मिलना चाहिए। हम सबके घर में 5-10 लाख का कालाध्न है। इसमें लजाने की बात नहीं है। मोरारजी देसाई सरकार ने 1977 में यह व्यवस्था की थी कि कोई व्यक्ति कर जमा करता है, तो उससे यह नहीं पूछा जाता था कि रुपया कहां से आया। आज भी यह व्यवस्था हो तो कर चोरी पर लगाम लगेगा। कालाबाजारी और कालाध्न को लेकर मांझी और उनके मंत्राी नरेंद्र सिंह के बयान के बाद बवाल खड़ा होना था, सो हुआ भी। एनडीए गठबंध्न के सभी घटक दलों ने एक साथ सीएम के बयानों के विरू( हल्ला बोल दिया। लोजपा ने मुख्यमंत्राी मांझी पर भ्रष्टाचार, देशद्रोह और खाने के सामानों में मिलावट का केस दर्ज कराने की मांग कर दी। लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस और पार्टी के प्रवक्ता ललन कुमार चंद्रवंशी ने कहा-‘मुख्यमंत्राी दिमागी तौर पर डिरेल्ड हो चुके हैं तभी तो वे छोटे व्यापारी को मिलावट करके प्रदेश में नकली सामानों का व्यापार करने का समर्थन कर रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि नकली कारोबार में कम नहीं बल्कि बड़ी पूंजी की जरूरत होती है। मुख्यमंत्राी की इन बातों से मिलावटखोरों का मनोबल बढ़ेगा। सीएम पर भ्रष्टाचार, देशद्रोह और खाने के सामानों में मिलावट का केस दर्ज होना चाहिए।’
हालांकि, जब चारों ओर इस मुतल्लिक विरोध् शुरू हुआ तो पूर्व की तरह एक बार पिफर मुख्यमंत्राी अपने बयान से पलट गए। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी भी कालाबाजारियों का समर्थन नहीं किया बल्कि यह कहा था कि कालाबाजारी करने वालों को किसी प्रकार से बख्शे जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर भूलवश कहीं काजाबाजारी होती है और ऐसा करने वाला घोर आर्थिक संकट में हो तो उस स्थिति में उसके बारे में सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। सीएम के बयान से पलट जाने के बाद बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता विनोद नारायण झा कहते हैं-‘मुख्यमंत्राी चाहे लाख झूठ बोले लेकिन कैमरा कभी झूठ नहीं बोलता। कैमरा पर कालाबाजारी करने वालों की पीठ थपथपाते हैं तो कभी घूस देने की बात कहते हैं। सच तो यह है कि बिहार में पिफर से जंगलराज कायम हो गया है। अब तो नीतीश का जंगलराज चलाने वाले के साथ दोस्ती है और अब ये लोग सरकार में भी शामिल होने जा रहे हैं। मुख्यमंत्राी ने कैमरा पर जो बातें कही हैं उसके अनुसार बिहार में सचमुच भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हम जब तक साथ में थे तब तक सुशासन था। कारण बीजेपी ऐसे तत्वों से समझौता नहीं करती। लेकिन बीजेपी से हटते ही बिहार मंे जंगलराज और आतंकराज पिफर से स्थापित हो गया।’
इसके अलावा मुख्यमंत्राी का एक और विवादित बयान तब आया जब वे विधनसभा उपचुनाव में प्रचार के दौरान हाजीपुर गए हुए थे। वहां उन्होंने कहा-‘जिन-जिन विधनसभा क्षेत्रों में मैं प्रचार करने गया, अगर वहां के प्रत्याशी जीते तो उन क्षेत्रों के लोगों की आउट आॅपफ वे जाकर मदद करूंगा।’ मांझी के इस बयान को चुनाव आयोग ने भी गंभीरता से लिया। हाजीपुर के निर्वाची प्रदाध्किारी डाॅ. उमाशंकर मंडल ने सीएम के भाषण की सीडी की जांच कराने की बात बताई। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्राी का ‘दलित मैरेज ब्यूरो’ पर भी कापफी विवाद हुआ। दरअसल, उन्होंने एक कार्यक्रम को संबोध्ति करते हुए 22 अगस्त 2014 को कहा था-‘शिड्यूल कास्ट के बच्चे को अंतरजातीय विवाह को प्रमोट करना चाहिए। यदि हम एक हो गए तो अपनी आबादी 17 प्रतिशत से बढ़कर 22 प्रतिशत हो जाएगी और 22 प्रतिशत जिसे वोट देगा, बिहार में सरकार उसी की बनेगी।’ इस बयान पर भी हंगामा खड़ा हुआ। मीडिया में खबरों को सुर्खियां मिली। सवाल भी उठाए गए कि देश बढ़ती जनसंख्या से परेशान है। जनता को जनसंख्या के प्रति जागरूक करने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही है। ऐसे में मुख्यमंत्राी के आबादी बढ़ाने वाले बयान का क्या मतलब निकाला जाए। खासकर एनडीए के लोगों ने सर पर आसमान उठा लिया। भाजपा प्रवक्ता डाॅ. योगेन्द्र पासवान कहते हैं-‘मुख्यमंत्राी ने अनुसूचित जाति के लोगों से अपनी आबादी 16-17 प्रतिशत से बढ़ाकर 22 प्रतिशत तक करने की बात कही है। मुख्यमंत्राी अनुसूचित जाति को बेरोजगारी और भूखमरी की आग में झोंकना चाहते हैं। दलित समाज सीएम के इस बयान से हतप्रभ है। उन्होंने लगे हाथ यह भी कह दिया कि नीतीश ने महादलित को नकली रेडिया देकर जिस तरह ठगने का काम किया उसी तरह दलित-महादलितों को तीन डिसिमल जमीन देने का ढकोसला सिपर्फ वोट के लिए किया था। जीतनराम मांझी सेमी कांट्रेक्ट पर बहाल मुख्यमंत्राी हैं अब वे दलित छात्रों को बहुमंजिला छात्रावास बनाने का झांसा दे रहे हैं।’ मांझी के आबादी बढ़ाने से जुड़े इस बयान पर जब एनडीए वालों ने हल्ला बोला और मीडिया में भी मुख्यमंत्राी के इस बयान को सुर्खियां मिली तो सीएम ने पलटकर टीवी चैनलों पर ऐसे समाचार दिखाने वाले तथा समाचार पत्रा-पत्रिकाओं में ऐसे समाचार प्रकाशित करने वाले पत्राकारों को ‘उचक्का’ कह दिया। मुख्यमंत्राी ने आबादी वाले बयानपर सपफाई देते हुए कहा कि-‘हमने अनुसूचित जाति के लोगों से कहा कि तुमको हेय समझता है। तुम आपस में टूटे-पफूटे हो। तुम 22 जातियों में बंटे हो। इस जाति बंध्न को तोड़ो। यह तब टूटेगा जब तुम लोग अंतरजातीय विवाह करोगे। और पिफर हमने कहा कि आज तुम्हारी जनसंख्या 17 प्रतिशत है लेकिन उचित से यदि सर्वे होगा, तुम कंशस हो जाओगे, एक हो जाओगे, सर्वे ठीक से कराओगे, तुम्हारी जनसंख्या बिहार में 22-23 प्रतिशत है। अब इसको उचक्के लोग किस प्रकार कह दिये कि यह जनसंख्या बढ़ाने की बात है। और उसमें दूसरी पार्टी कह रही है कि जीतनराम मांझी रिजाइन करे। क्यों ऐसी बातें हो रही है? क्यों ऐसी पत्राकारिता होती है? यह दुखद है। ऐसा नहीं होना चाहिए। दूसरा कोई रहता तो केस-मुकदमा भी कर सकता था लेकिन मैं केस नहीं करूंगा। हमलोग तो मार खाने वाले लोग हैं। शुरू से मार खाते रहे हैं और सहते रहे हैं। कोई एक लात इध्र से लगा देता है तो कोई एक लात उध्र से। हम तो समझते हैं कि यहां की मीडिया भी हमें एक लात लगा देता है।
विवादित बयानों का सिलसिला यहीं समाप्त नहीं हुआ। बिहार विधनसभा उपचुनाव के दौरान श्री मांझी एक चुनावी रैली को संबोध्ति करने दरभंगा गए हुए थे वहां पर जनता को ‘पागल’ कह दिया। दरअसल, रैली को संबोध्ति करने के क्रम में वहां के जिला सांख्यिकी स्वयं सेवक संघ अपने वेतन वृ(ि की मांग को लेकर नारेबाजी करने लगे। उस पर मुख्यमंत्राी नाराज हो गए और प्रदर्शनकारियों को ‘पागल’ कह दिया। मुख्यमंत्राी के शब्द को हम यहां हू-ब-हू रख रहे हैं-‘अरे ठहरो न यार….हल्ला करने से कोई काम होता है?….कोई काम नहीं होता है हल्ला करने से….चुप रहो….तुमलोगों के लिए जितना सोच रहे हैं उतना ही बहुत कापफी है….हल्ला करोगे तो कह देंगे कि तुम्हारे लिए कुछ नहीं होगा….हल्ला करते रहो….पागल।’ अब लोग यह सोच-सोचकर हैरान हैं कि जिस जनता की बदौलत मांझी बिहार के मुखिया बने हैं उस जनता को उन्होंने आखिर पागल कैसे कह दिया? ये वही जनता है जिन्होंने उनकी पार्टी की सरकार बनायी है।
इस घटना के चंद दिनों के बाद मुख्यमंत्राी अपने विधनसभा क्षेत्रा मखदुमपुर ;गयाद्ध के एक गांव में आयोजित एक कार्यक्रम में ग्रामीणों के द्वारा बिजली मांगे जाने पर खुलेआम कह दिया कि-‘आप हमें वोट नहीं देते हैं तो बिजली हमसे कैसे मांगते हैं? मैं आपके वोट से चुनाव नहीं जीतता हूं।’ मांझी के इस बात पर वहां हंगामा खड़ा हो गया। लोग कहने लगे कि ये सबके सीएम नहीं हैं। जिन्होंने इन्हें वोट दिया है ये मात्रा उन्हीं लोगों के सीएम हैं। बाद में बड़ी मुश्किल से वहां के लोगों को शांत कराया गया। दरअसल, श्री मांझी अपने विधनसभा क्षेत्रा के झमणबिगहा गांव के पास स्कूल में आयोजित एक सभा को संबोध्ति कर रहे थे। उसी बीच कुछ लोग ‘बिजली नहीं तो वोट नहीं’ की तख्ती दिखाने लगे। उस तख्ती को देखकर मांझी भड़क उठे और खुलेआम तख्ती दिखाने वाले को अपने मन की सुना दी।
उनके विवादित बयानों की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। एक कार्यक्रम में वे आपबीती सुना रहे थे। उन्होंने कहा जब गांव में पढ़ता था तो गांव का ही एक व्यक्ति मेरी हत्या करने की नीयत से सुनसान खेत की आड़ के नीचे तलवार लेकर बैठा था पर रास्ता बदल लेने के कारण बच गया। लेकिन जब मैं वजीरगंज से विधयक था, तब उसी व्यक्ति ने किसी को गोली मार दी। जिसे गोली लगी थी वह मरा नहीं था, घायल हुआ था। मैंने उनके ;गोली चलाने वालेद्ध परिवार को कहा कि कोई जेल नहीं जाएगा, बंदूक भी सीज नहीं होगी। मैंने डीजीपी नारायण मेहता को कहकर मामले को खत्म करा दिया। हालांकि, बाद में मुख्यमंत्राी की इस स्वीकारोक्ति को पुलिस मेन्स एशोसिएशन के महामंत्राी नरेंद्र कुमार ध्ीरज ने सुधरा और कहा-‘मीडिया वाले लोग मुख्यमंत्राी की इस बात को गलत नहीं लेंगे, उस मामले में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ था।’
पिछले दिनों गया के एक होटल में उनके बेटे के द्वारा एक महिला पुलिसकर्मी के साथ कथित सेक्स स्कैंडल की खबर मीडिया की सुर्खी बनी थी। विरोध्यिों ने इस मामले पर हंगामा खड़ा कर दिया और बीजेपी ने मुख्यमंत्राी से इस्तीपफा मांगते हुए उनके बेटे की जल्द से जल्द गिरफ्रतारी की मांग कर दी। दरअसल, यह मामला 13 अगस्त 2014 का है। यह खबर मीडिया की सुर्खी बनी कि मुख्यमंत्राी जीतनराम मांझी का बेटा प्रवीण मांझी बोध्गया के दोमुहाने रोड पर स्थित आरके पैलेस में बीएमपी की एक महिला कांस्टेबल के साथ गये और वहां जमकर रंगरेलियां मनाई। बीएमपी की वह महिला पुलिसकर्मी वहीं पदस्थापित है और लाल रंग की स्कूटी वाली खाकी के रूप में चर्चित हैं। हालांकि, घटना जब प्रकाश में आयी तो उस महिला पुलिसकर्मी का स्थानांतरण रोहतास कर दिया गया। लेकिन यह मामला और जोर पकड़ता चला गया। भाजपा नेताओं के तेज हमले के बीच मुख्यमंत्राी ने बेटे के बचाव में सपफाई दी-‘संभव है वह अपने गर्लप्रफेंड के साथ होटल घूमने गया होगा। पटना के इको पार्क में तो बहुत से प्रेमी युगल बैठे रहते हैं। इसपर क्या आपत्ति है? क्यों नहीं उनके बारे में कार्रवाई की बात होती है? यह सब राजनीतिक साजिश के तहत किया गया है। भाजपा को यह बर्दास्त नहीं हो पा रही है कि एक महादलित का बेटा मुख्यमंत्राी बन गया है।’ सवाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे ने मुख्यमंत्राी से पूछा कि उनका शादी-शुदा पुत्रा बोध्गया के होटल में तथाकथित गर्लप्रफेंड के साथ क्या कर रहा था? जबकि वह गर्लप्रफेंड विवाहित है। इसका पर्दापफाश होना जरूरी है कि घटना के बाद उस महिला पुलिसकर्मी सहित बोध्गया में तैनात बीएमपी की पूरी बटालियन को डिहरी वापस क्यों भेज दिया गया? उन्होंने कहा कि आरके पैलेस होटल के लाईसेंस को रद्द करने की ध्मकी देकर उसके सीसीटीवी पफुटेज को डिलीट करने के पीछे क्या राज है। शमशी नामक शख्स कौन है जिसके मोबाइल पर डीआईजी और आईजी स्तर के अध्किारियों के पफोन आते रहे और जिसकी मध्यस्थता में पूरे मामले को रपफा-दपफा किया जा रहा है। क्या यह बात सही नहीं है कि पुलिसकर्मियों ने शराब और खाने के छह हजार रुपये का बिल चुकता किया। जहां तक पटना के इको पार्क में अश्लीलता पफैलाते, घूमते युगल प्रेमियों पर कार्रवाई की बात है तो यह काम सरकार को करना चाहिए। इसमें विपक्ष कहां आता है। यदि मुख्यमंत्राी में हिम्मत है तो मीडिया को ध्मकाने की बजाय निष्पक्ष जांच का आदेश दे। बिहार भाजपा नेता सुशील मोदी ने सीएम की बेटे के गिरफ्रतारी की मांग कर दी। इतना ही नहीं, उन्होंने भी यह आरोप लगा डाला कि गया पुलिस ने होटल का बिल और शराब का खर्चा वहन किया है। इसपर कुल छह हजार रुपये खर्च किये गये। प्रदेश महासचिव डाॅ. सूरजनंदन कुशवाहा ने कहा कि राज्य के मुख्यमंत्राी के बेटे ने जो रंगरेलियां मनाने का खेल खेला उससे राज्य की राजनीति शर्मसार हुई है। उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए सीएम को इस्तीपफा देना चाहिए। इसके साथ ही लगे हाथ डाॅ. कुशवाहा ने सीएम को सलाह भी दे दी कि अच्छा होता वे दो कदम आगे बढ़कर अपने पुत्रा पर एपफआईआर दर्ज कराकर मामले में दूध् का दूध् और पानी का पानी कर होने देते। डाॅ. कुशवाहा ने संदेह व्यक्त किया कि मुख्यमंत्राी के पुत्रा प्रवीण मांझी द्वारा प्रलोभन दिलाकर या कुछ आश्वासन देकर यह एक सरकारी कर्मी के साथ यौन शोषण का मामला भी हो सकता है।’ जब चारों ओर से इस प्रकरण को लेकर हमले होने लगे तो बचाव में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव सामने आये। उन्होंने कहा-‘मुख्यमंत्राी जीतनराम मांझी के सीने में भी दिल है। उसने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की है। औरत और मर्द के बीच रजामंदी से बनाया गया रिश्ता जायज होता है। उसने जो किया उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता। जो भी हुआ उसमें दोनों की रजामंदी थी। पता नहीं, तुमलोग ;मीडियाद्ध क्यों मुख्यमंत्राी के बेटे के पीछे पड़े हो। क्या मुख्यमंत्राी का बेटा आदमी नहीं है? उसे भी दूसरे लोगों की तरह भूख लगती है। वह भी खाना खाता है। क्या शरीर को सिपर्फ भोजन की ही जरूरत होती है। मानव शरीर की दूसरी जरूरतें भी होती हैं।’ शरद के इस विचित्रा बयान के बाद पफेसबुक पर आम लोगों के द्वारा कमेंट करने का सिलसिला शुरू हो गया। प्रेमेंद्र मिश्र नामक एक व्यक्ति ने लिखा-‘सवाल केवल दोनों की मित्राता का नहीं है। इस मामले का दूसरा और असली पहलू यह भी है कि एक सत्ताध्ीश का बेटा एक चतुर्थवर्गीय सरकारी महिला कर्मचारी की किस मजबूरी का पफायदा उठाकर उसका शोषण कर रहा था। क्या एक मजबूर महिला सत्ता प्रमुख के बेटे के खिलापफ मुंह खोल सकती है कि उसका मित्रा नहीं अत्याचारी है जो उसका शोषण कर रहा था? उस महिला के दृष्टिकोण से किसी ने मामले को देखा? उफपर से शरद यादव जैसे लोग बयान दे रहे हैं कि मांझी जैसे लोग जब मुख्यधरा में आ रहे हैं तो ताक-झांक की जा रही है। क्या ऐसे आएगा दलित समुदाय मुख्यधरा में? क्या इसे कहते हैं सामाजिक न्याय? याद रखिए शरद बाबू ऐसी ही शोषित महिलाओं की आह ने पुराने सत्ताध्ीशों को मिट्टी में मिला दिया। अब आप जैसे लोगों को भी ये आहंे चैन से जीने नहीं देगी। आप उस महिला का शोषण कर सकते हैं, उसे बदनाम कर सकते हैं, उसे डरा कर मुंह बंद करा सकते हैं, उसका और उसकी बटालियन का तबादला करा सकते हैं पर उसकी आहांे से खुद को बचा नहीं सकते।’ हालांकि, सपफाई मुख्यमंत्राी के बेटे प्रवीण मांझी की ओर से भी आई। उन्होंने कहा-‘उस रोज मैं होटल में दिन का खाना खाने गया था। महिला कांस्टेबल ने पफोन कर मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की। मैंने उसे होटल में ही बुला लिया। महिला कांस्टेबल के पिता पुलिस विभाग में ही नौकरी करते थे। उनकी मौत हो चुकी है। पेंशन आदि बकाया के भुगतान के लिए वह मदद चाहती थी। कई लोगों के सामने वह मुझसे मिली। लेकिन दुखद बात यह है कि वहां मौजूद भाजपा के कुछ लोगों ने बदनाम करने के लिए एक साजिश के तहत इसपर बखेड़ा खड़ा कर दिया। महादलित होने का गुनाह भुगत रहा हूं’ चूंकि इस प्रकरण में किसी ने किसी के विरू( प्राथमिकी दर्ज नहीं करायी थी। लिहाजा, इस पर पुलिसिया कार्रवाई नहीं हुई। डीजीपी पीके ठाकुर का भी बयान आया-‘किसी ने शिकायत दर्ज नहीं कराई है इसलिए जांच नहीं होगी।’ हालांकि, यह प्रकरण अब ध्ीरे-ध्ीरे ठंडा पड़ता जा रहा है। लेकिन मुख्यमंत्राी का विवादित बयान देने का सिलसिला जारी है। देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्राी का अगला विवादित बयान क्या होता है और उस विवादित बयान का असर जदयू की राजनीति पर क्या पड़ता है। यह तो भविष्य के गर्भ में है।त्र
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